Thursday, July 31, 2008

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे...



आवाज़ पर आज का दिन समर्पित रहा, अजीम फनकार मोहमद रफी साहब के नाम, संजय भाई ने सुबह वसंत देसाई की बात याद दिलाई थी, वे कहते थे " रफ़ी साहब कोई सामान्य इंसान नही थे...वह तो एक शापित गंधर्व था जो किसी मामूली सी ग़लती का पश्चाताप करने इस मृत्युलोक में आ गया." बात रूपक में कही गई है लेकिन रफ़ी साहब की शख़्सियत पर एकदम फ़बती है.( पूरा पढ़ें ...)

मोहम्मद रफी, ऐतिहासिक हिन्दी सिनेमा जगत का एक ऐसा स्तम्भ जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिल पर अमिट छाप बनाये है, जिनकी सुरीली अद्वितीय आवाज हर रोज हमें दीवाना करती है और जिन्होंने करीब पैंतीस सालों में अपनी अतुलनीय आवाज में मधुर गीतों का एक बड़ा अम्बार हमारे लिये छोड़ा । रफी जी की आवाज एक ऐसी आवाज, जिसने दुःख भरे नगमों से लेकर धूम-धड़ाके वाले मस्ती भरे गीतों सभी को एक बहतरीन गायकी के साथ निभाया, यूँ तो बहुत से नये गायक कलाकारों द्वारा रफी जी की आवाज को नकल करने की कोशिश की गयी और उनको सराहा भी गया परंतु कोई भी मोहम्मद रफी के उस जादू को नही ला सका; शायद कोई कर भी न सके । पुरजोर कोशिशों के बावजूद कोई भी ऐसा गायक रफी साहब की केवल एक-आध आवाज को नकल करने में सफल हो सकता है परंतु कोई भी रफी साहब की उस आवाज की विविधता को नही ला सकता जैसा वे करते थे.

रफी साहब, गीत-संगीत के आकाश में इस सितारे का उदय अमृतसर के निकट एक गांव कोटला सुल्तान सिंह में 24 दिसम्बर 1924 को हुआ । जब रफी जी अपने बचपन की सीढियां चढ रहे थे तब इनका परिवार लाहौर चला गया । रफी जी का गीत-संगीत के प्रति इतना लगाव था कि ये बचपन के दिनों में उस फकीर का पीछा करते थे जो प्रतिदिन उस जगह आता था और गीत गाता था जहाँ ये रहते थे । इनके बड़े भाई हामिद इनके संगीत के प्रति अटूट लगाव से परिचित थे और हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे । लाहौर में ही उस्ताद वाहिद खान जी से रफी जी ने सगीत की शिक्षा प्राप्त करनी शुरू कर दी । रफी साहेब के शुरुवाती दिनों की कहानी आप को युनुस भाई बता ही चुके हैं ( यहाँ पढ़ें...)


रफ़ी साहब के संगीत सफर की बड़ी शुरूआत फिल्म "दुलारी(१९४९)" के सदाबहार गीत "सुहानी रात ढल चुकी" से हुई थी। इस गाने के बाद रफ़ी साहब ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सत्तर के दशक तक वे पार्श्व-गायन के बेताज बादशाह रहे। इस सफलता के बावजूद, रफी साहब में किसी तरह का गुरूर न था और वे हमेशा हीं एक शांत और सुलझे हुए व्यक्तित्व के रूप में जाने गए। उनके कई सारे प्रशंसक तो आज तक यह समझ नहीं पाए कि इतना शांत और अंतर्मुखी व्यक्ति अपने गानों में निरा जोशीला कैसे नज़र आता है।

उनके पुत्र शाहिद के शब्दों में -

"जब एक बार हमने उनसे पूछा कि क्या वास्तव में आपने हीं 'याहू' गाया है, तो अब्बाजान ने मुस्कुराकर हामीं भर दी। हम उनसे पूछते रहे कि 'आपने यह गाना गाया कैसे?', पर उन्होंने इस बारे में कुछ न कहा। हमारे लिए यह सोचना भी नामुमकिन था कि उनके जैसा सरल इंसान "याहू" जैसी हुड़दंग को अपनी आवाज दे सकता है।"

शायद यह रफ़ी साहब की नेकदिली और संगीत जानने व सीखने की चाहत हीं थी, जिसने उन्हें इतना महान पार्श्व-गायक बनाया था। उन्होंने किसी भी फनकार की अनदेखी नहीं की। उनकी नज़रों में हर संगीतकार चाहे वह अनुभवी हो या फिर कोई नया, एक समान था। रफ़ी साहब का मानना था कि जो उन्हे नया गीत गाने को दे रहा है, वह उन्हें कुछ नया सीखा रहा है, इसलिए वह उनका "उस्ताद" है। अगर गीत और संगीत बढिया हो तो वे मेहनताने की परवाह भी नहीं करते थे। अगर किसी के पास पैसा न हो, तब भी वे समान भाव से हीं उसके लिए गाते थे।

गौरतलब है कि रफ़ी साहब ने अपने समय के लगभग सभी संगीतकारों के साथ काम किया था, परंतु जिन संगीतकारों ने उनकी प्रतिभा को बखूबी पहचाना और उनकी कला का भरपूर उपयोग किया , उनमें नौशाद साहब का नाम सबसे ऊपर आता है। नौशाद साहब के लिए उन्होंने सबसे पहला गाना फिल्म "पहले आप" के लिए "हिन्दुस्तान के हम हैं , है हिन्दुस्तान हमारा" गाया था। दोनों ने एक साथ बहुत सारे हिट गाने दिए जिन में से "बैजू बावरा" , "मेरे महबूब" प्रमुख हैं। एस०डी० बर्मन साहब के साथ भी रफ़ी साहब की जोड़ी बेहद हिट हुई थी। "कागज़ के फूल", "गाईड", "तेरे घर के सामने", "प्यासा" जैसी फिल्में इस कामयाब जोड़ी के कुछ उदाहरण हैं।

सत्तर के दशक के प्रारंभ में रफ़ी साहब की गायकी कुछ कम हो गई और संगीत के फ़लक पर किशोर दा नाम का एक नया सितारा उभरने लगा। परंतु रफ़ी साहन ने नासिर हुसैन की संगीतमय फिल्म "हम किसी से कम नहीं(१९७७)" से जबर्दस्त वापसी की। उसी साल उन्हें "क्या हुआ तेरा वादा" के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया।

रफ़ी साहब के संगीत सफर का अंत "आस-पास" फिल्म के "तू कहीं आस-पास" गाने से हुआ। ३१ जुलाई, १९८० को उनका देहावसान हो गया। उनके शरीर की मृत्यु हो गई, परंतु उनकी आवाज आज हीं सारी फ़िज़ा में गूँजी हुई है। उनकी अमरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि , उनकी मृत्यु के लगभग तीन दशक बाद भी , उनकी लोकप्रियता आज भी चरम पर है। कितना सच कहा है रफी साहब ने अपने इस गीत में...."तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे...."

जानकारी सोत्र - इन्टरनेट , आवाज़ के लिए संकलन किया - विश्व दीपक 'तनहा' और भूपेंद्र राघव.

( ऊपर चित्र में रफी साहब, साथी लता और मुकेश के साथ )

हमें यकीं है कि आज पूरे दिन आपने रफी साहब के अमर गीतों को सुनकर उन्हें याद किया होगा, हम छोड़ जाते हैं आपको एक अनोखे गीत के साथ, जहाँ रफी साहब ने आवाज़ दी, किशोर कुमार की अदाकारी को, ये है दो महान कलाकारों के हुनर का संगम...देखिये और आनंद लीजिये.



रफी साहब के केवल दो ही साक्षात्कार उपलब्ध हैं, जिनमे से एक आप देख सकते हैं यहाँ.

वो शुरुवाती दिन...



मो. रफी को याद कर रहे हैं, युनुस खान

अट्ठाईस बरस पहले 31 जुलाई के दिन सुरसंसार का ये सुरीला पंछी, दुनिया को बेगाना मानकर उड़ गया, और तब से आज तक वो डाली कांप रही है । दरअसल मोहम्‍मद रफ़ी संगीत की दुनिया में शोर की साजिश के खि़लाफ़ एक सुरीला हस्‍तक्षेप थे।

दुनिया के नक्‍शे में खोजने चलें, तो पाकिस्‍तान के दायरे में लाहौर के नज़दीक कोटला सुल्‍तान सिंह को खोज पाना, काफी मशक्‍कत का काम होगा । यहां चौबीस दिसंबर 1924 को रफ़ी साहब का जन्‍म हुआ था । बाद में रफ़ी का परिवार लाहौर चला आया । यहां उन्होंने उस्ताद बड़े गु़लाम अली ख़ां साहब और उस्ताद अब्‍दुल वहीद ख़ां साहब से संगीत की तालीम ली थी ।


लाहौर में कुंदन लाल सहगल का एक कंसर्ट हो रहा था, लेकिन अचानक बिजली चली गयी और आयोजन रूक गया । सहगल ने कहा कि जब तक बिजली नहीं आयेगी वो नहीं गायेंगे । तेरह बरस के मोहम्‍मद रफ़ी इस आयोजन में अपने जीजा मोहम्‍मद हमीद के साथ आये हुए थे । उन्होंने कहा कि रफ़ी गाना गाकर जनता को शांत कर सकते हैं । इस तरह रफ़ी साहब को मंच पर गाने का मौका़ मिला था । रफ़ी साहब को पहली बार गाने का मौक़ा संगीतकार श्याम सुंदर ने दिया था सन 1942 में, फ़िल्म थी 'गुलबलोच' । इसमें रफ़ी ने अठारह बरस की उम्र में ज़ीनत बेगम के साथ 'सोणिए नी, हीरिए नी, तेरी याद ने बहुत सताया' गाना गाया था । ये गाना बेहद लोकप्रिय हुआ था । इसके बाद रफ़ी को लाहौर रेडियो स्टेशन पर नियमित गाने के बुलावे आने लगे । ये फ़िल्म 1944 में रिलीज़ हुई थी ।

यही वो साल था जब मो. रफ़ी बंबई चले आए थे । मैंने रफ़ी साहब की शुरूआत के बारे में एक किस्सा सुना है, पता नहीं इसमें किस हद तक सच्चाई है । रफ़ी साहब की मुलाक़ात नौशाद के वालिद से हुई थी और रफ़ी का गाना सुनकर उन्होंने नौशाद के नाम एक सिफ़ारिशी चिट्ठी लिखी थी । नौशाद से जब उनकी मुलाक़ात हुई तो उन्होंने इसी साल कारदार की फ़िल्म 'पहले आप' के गाने 'हिंदुस्‍तान के हम हैं हिंदोस्‍तां हमारा, हिंदु-मुस्लिम दोनों की आंखों का तारा' में रफ़ी साहब की आवाज़ का इस्तेमाल कोरस में किया था । इस गाने को दरअसल दुर्रानी, श्‍याम कुमार, मोतीराम, अलाउद्दीन वग़ैरह ने गाया था । इस मार्च-पास्ट गीत को सिपाहियों पर फिल्माया गया था । नौशाद ने सोचा था कि इस गाने में सिपाहियों के बूटों की आवाज़ ज़रूर होंगी । चूंकि उस ज़माने में उतनी तकनीकी सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए गायकों को फौजी बूट पहनाए गये और पैर पटकते हुए गाने को कहा गया । इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान रफ़ी साहब के पैर में बहुत चोटें आ गयी थीं । रफ़ी साहब को इस गाने के बदले में पचास रूपये मेहनताना दिया गया था । इस फ़िल्म के लिए रफ़ी ने दो और कोरस गाने गाए थे ।

सन 1944 में रफ़ी साहब ने फिल्‍म 'गांव की गोरी' ( विलेज गर्ल) में संगीतकार श्‍याम सुंदर के निर्देशन में एक गाना गाया था जी.एम. दुर्रानी के साथ, बोल थे—'अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी-तैसी' . रिकॉर्ड कंपनी के रिकॉर्ड नंबर के मुताबिक़ ये रफ़ी साहब का दूसरा रिलीज़ गाना था । इस दौर में रफ़ी साहब कुछ फिल्‍मों में गानों में नज़र भी आए थे । 1945 में आई थी स्‍वर्णलता और नज़ीर के अभिनय से सजी फिल्‍म –'लैला मंजनू' । इस फ़िल्म में रफ़ी साहब ने एस. डी. बातिश और साथियों के साथ गाना गाया था 'तेरा जलवा जिसने देखा वो दीवाना हो गया'. ।संगीतकार थे पंडित गोविंदराम । इस गाने में रफ़ी परदे पर भी नज़र आए थे ।

संगीत के क़द्रदान जानते हैं कि मुकेश, रफ़ी और किशोर कुमार तीनों पर अपने शुरूआती दौर में कुंदन लाल सहगल का गहरा असर रहा था । लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इन तीनों में से केवल रफ़ी साहब को ही सहगल के साथ गाने का मौक़ा मिला था । रफ़ी अकसर नौशाद से कहा करते थे कि उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया जाये ।

ये मौक़ा आया सन 1946 में । जब नौशाद ने मो. रफ़ी को फिल्‍म 'शाहजहां' में कुंदनलाल सहगल के पीछे कोरस में मुख्या आवाज़ के रूप में मौक़ा दिया था । गाना था मजरूह सुल्‍तानपुरी का लिखा -'मेरे सपनों की रानी रूही रूही रूही' . आपको बता दें कि इसी फ़िल्म से बतौर गीतकार मजरूह का सफ़र शुरू हुआ था । कोरस के साथ साथ इस गाने में एकदम आखिर में रफ़ी साहब दो लाईनें गाते हैं । नौशाद साहब बताया करते थे कि रफ़ी इस गाने की दो पंक्तियां गाकर इतने खुश थे मानो उन्‍हें सारी दुनिया की दौलत मिल गयी हो ।

आप समझ सकते हैं कि आज़ादी के आसपास का समय भारतीय फ़िल्म संगीत में संक्रमण का समय था । अब तक कलाकार अपने गाने स्वयं गाते थे । सहगल, नूरजहां, सुरैया वग़ैरह प्ले बेक नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने गाने खुद ही गा रहे थे और परदे पर भी होंठ हिला रहे थे । पर रफ़ी जिस दौर में उभर रहे थे तब प्लेबैक का सफ़र शुरू हो रहा था । सन 1946 में मो. रफी को अपना पहला हिंदी एकल गीत गाने का मौक़ा मिला था फिल्‍म थी महबूब ख़ान की 'अनमोल घड़ी' और गाने के बोल थे—'तेरा खिलौना टूटा बालक' . ये गाना फ़िल्म के नायक पर नहीं बल्कि एक खिलौने वाले पर फिल्‍माया गया था ।
इसी साल फीरोज़ निज़ामी के निर्देशन में रफी ने फिल्‍म 'शरबती आंखें' में दो एकल गीत रिकॉर्ड किए थे । 1947 में उन्‍होंने फीरोज़ निजामी के ही संगीत निर्देशन में मलिका-ए-तरन्‍नुम नूरजहां के साथ गाया-'यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है' । ये गाना बड़ा हिट हुआ । इस फ़िल्म के कोरस गीत 'वो अपनी याद दिलाने को' में रफी साहब परदे पर भी दिखे । लेकिन सन 1948 में एस यू सनी की फिल्‍म 'मेला' में रफ़ी ने अपना पहला हिट एकल गीत दिया था—'ये जिंदगी के मेले'। दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म में ये रफ़ी का गाया एकमात्र गाना था । बाकी सारे गाने मुकेश ने गाए थे । 1949 में फिल्‍म 'दुलारी' के लिए रफ़ी साहब ने 'सुहानी रात ढल चुकी' जैसा बेमिसाल नगमा गाया था । इसी साल अंदाज, चांदनी रात,दिल्लगी जैसी फिल्मों ने रफी साहब को फिल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया था ।

जब बात शुरुवाती दिनों की हो रही है तो, क्यों न उनके द्वारा, उसी दौर में गाया गया बेहद चर्चित "सुहानी रात ढल चुकी " को सुन लिया जाए, ये विडियो, लन्दन में हुए रफी साहब के एक लाइव कंसर्ट से लिया गया है...आनंद लीजिये.



- युनुस खान

(लेखक विविध भारती में कार्यरत हैं । आवाज़ के पाठकों, के लिए विशेष, रफी साहब की पुण्यतिथि पर, दैनिक भास्कर में उनके द्वारा लिखे गए लेख की पुनाप्रस्तुती )



साथ ही पढिये, मो. रफी पर संजय पटेल का ये भावपूर्ण लेख.
बने रहिये आवाज़ के साथ, शाम सात बजे पढिये रफी साहब के संगीत सफर पर एक संक्षिप्त आलेख.

कविता और संगीत से अव्वल, सुर को जिताने वाले मोहम्मद रफ़ी



अमर आवाज़ मोहम्मद रफ़ी को उनकी 28वीं बरसी पर याद कर रहे हैं संजय पटेल

मेरा तो जो भी कदम है वो तेरी राह में है॰॰॰

जी हाँ, स्तम्भकार संजय पटेल ने अपने ज़िंदगी के बहुत से कदम रफ़ी की याद में बढ़ाये हैं। संयोग है कि हमारे लिये ये विशेष आलेख रचने वाले संजय भाई ने मोहम्मद रफ़ी की मृत्यु पर ही पहला लेख इन्दौर के एक प्रतिष्ठित दैनिक में लिखा था. संजय भाई रफ़ी साहब के अनन्य मुरीद हैं और इस महान गायक की पहली बरसी से आज तक 31 जुलाई के दिन रफ़ी साहब की याद में उपवास रखते हैं। प्रस्तुत संजय की श्रद्धाँजलि-

रफ़ी एक ऐसी मेलोडी रचते थे कि मिश्री की मिठास शरमा जाए,सुनने वाले के कानों में मोगरे के फ़ूल झरने लगे,सुर जीत जाए और शब्द और कविता पीछे चली जाए.
मेरी यह बात अतिरंजित लग सकती है आपको लेकिन रफ़ी साहब का भावलोक है ही ऐसा. आप जितना उसके पास जाएंगे आपको वह एक पाक़ साफ़ संसारी बना कर ही छोड़ेगा.

मोहम्मद रफ़ी साहब को महज़ एक प्लै-बैक सिंगर कह कर हम वाक़ई एक बड़ी भूल करते हैं.दर असल वह महज़ एक आवाज़ नहीं;गायकी की पूरी रिवायत थे.सोचिये थे तो सही साठ साल से सुनी जा रही ये आवाज़ न जाने किस किस मेयार से गुज़री है. पंजाब के एक छोटे से क़स्बे से निकल कर मोहम्मद रफ़ी नाम का किशोर मुंबई आता है,कोई गॉड फ़ादर नहीं,कोई ख़ास पहचान नहीं ,सिर्फ़ संगीतकार नौशाद साहब के नाम का एक सिफ़ारिशी पत्र और अपनी क़ाबिलियत के बूते पर मोहम्मद रफ़ी देखते देखते पूरी दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम बन जाता है . इसमें क़िस्मत के करिश्मे का हाथ कम और मो.रफ़ी की अनथक मेहनत का कमाल ज़्यादा है. जिस तरह के अभाव और बिना आसरे की बसर मो.रफ़ी साहब ने की वह रोंगट खड़ी कर देने वाली दास्तान है. उस पर फ़िर कभी लेकिन ये तो बताना भी चाहूँगा कि मो.रफ़ी साहब की ज़िन्दगी में एक दिन ऐसा भी हुआ कि रेकॉर्डिंग के
बाद सब चले गए हैं और रफ़ी साहब स्टुडियो के बाहर देर तक खड़े हैं . तक़रीबन दो घंटे बाद तमाम साज़िंदों का हिसाब-किताब करने के बाद नौशाद साहब स्टुडियो के बाहर आकर रफ़ी साहब को देख कर चौंक गए हैं.पूछा तो बताते हैं कि घर जाने के लिये लोकल ट्रेन के किराये के पैसे नहीं है. नौशाद साहब हक़्के – बक़्के ! अरे भाई भीतर आकर माँग लेते ...रफ़ी साहब का जवाब : अभी काम पूरा हुआ नहीं और अंदर आकर पैसे माँगूं ? हिम्मत नहीं हुई नौशाद साहब. नौशाद साहब की आँखें छलछला आईं हैं. सोचिये किस बलन के इंसान थे रफ़ी साहब. और आज किसी रियलिटी शो में थोड़ा नाम कमा लेने वाले छोकर कैसे इतरा रहे हैं. लगता है भद्रता और शराफ़त का वह दौर रफ़ी साहब के साथ ही विदा हो गया.

आइये अब रफ़ी साहब की गायकी के बारे में बात हो जाए.सहगल साहब के बाद मोहम्मद रफ़ी एकमात्र नैसर्गिक गायक थे. उन्होने अच्छे ख़ासे रियाज़ के बाद अपनी आवाज़ को माँजा था. जिस उम्र में वे शुरू हुए उसके बारे में जान कर हैरत होती है कि कब तो उन्होंने सीखा , कब रियाज़ किया और कब की इतनी सारी और बेमिसाल रेकॉर्डिंग्स. संगीतकार वसंत देसाई की बात याद आ गई ...वे कहते थे रफ़ी साहब कोई सामान्य इंसान नही थे...वह तो एक शापित गंधर्व था जो किसी मामूली सी ग़लती का पश्चाताप करने इस मृत्युलोक में आ गया.बात रूपक में कही गई है लेकिन रफ़ी साहब की शख़्सियत पर एकदम फ़बती है. आज तो रफ़ी , किशोर और मुकेश गायकी परम्परा के ढेरों नक़ली वर्जन पैदा हो गए है लेकिन जिस दौर में रफ़ी साहब शुरू हुए तब के.एल.सहगल,पंकज मलिक,के.सी.डे,जी.एम.दुर्रानी जैसे चंद नामों को छोड़ कर पार्श्वगायन में कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी. हाँ जो अच्छा था वह यह कि बहुत क़ाबिल म्युज़िक डायरेक्टर्स थे जो गायकों को एक लाजवाब घड़ावन देते रहे.
रफ़ी साहब को भी श्यामसुंदर,नौशाद, ग़ुलाम मोहम्मद, मास्टर ग़ुलाम हैदर,खेमचंद प्रकाश,हुस्नलाल भगतराम जैसे गुणी मौसीकारों का सान्निध्य मिला जो रफ़ी साहब के कैरियर में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुए.

रफ़ी साहब ने क्लासिकल म्युज़िक का दामन कभी न छोड़ा यही वजह है कि लगभग रफ़ी साहब को पहली बड़ी क़ामयाबी देने वाली तस्वीर बैजूबावरा में उन्होंने राग मालकौंस(मन तरपत)और दरबारी (ओ दुनिया के रखवाले) को जिस अधिकार और ताक़त के साथ गाया वन इस महान गुलूकार के हुनर की पुष्टि करने के लिये काफ़ी है. रफ़ी साहब ने जो सबसे बड़ा काम पार्श्वगायन के क्षेत्र में क्या वह यह कि उन्होनें अपने आप को कभी भी टाइप्ट नहीं होने दिया. ख़ुशी,ग़म,मस्ती,गीत,ग़ज़ल,लोक-संगीत,वैस्टर्न सभी स्टाइल में गाया और बख़ूबी गाया. सन अड़तालीस में वे शुरू हुए इस लिहाज़ से 2008 उनके गायकी का हीरक जयंती वर्ष है. साठ साल बाद भी उनके गीत पुराने नहीं पड़े और यक़ीनन कह सकता हूँ सौ साल बाद भी नहीं पड़ेंगे.
शब्दों की साफ़-शफ़्फ़ाक़ अदायगी,कविता के मर्म को समझने वाला दिल,संगीत को गहराई से जानने की समझ और एक ऐसा विलक्षण दिमाग़ जो संगीतकार और कम्पोज़िशन की रूह तक उतर जाता हो और जैसा चाहा गया उससे ज़्यादा डिलिवर करता है.

इस दुनिया से चले जाने के बाद भी (सनद रहे रफ़ी साहब को गुज़रे 28 बरस हो गए हैं;एक पीढ़ी ऐसी तैयार हो गई है जो साल भर में अपने माँ-बाप को भूल जाती है) रफ़ी साहब की गायकी का जलवा क़ायम है क्योंकि रफ़ी शब्द को गाते हुए भी शब्द और समय के पार की गायकी के कलाकार थे इसीलिये उनके गीतों की ताब और चमक बरक़रार है. रफ़ी साहब को सुनने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि हम उन्हें सुनें और चुप हो जाएँ.ऐसा चुप हो जाना ही सबसे अच्छा बोलना है. सादगी से रहने और गाने वाले रफ़ी साहब ने ऐसा गाया है जैसे कोई ख़ुशबू का ताजमहल खड़ा कर दे.स्वर में ओस की बूँद की पाक़ीज़गी पैदा करने वाले मोहम्मद रफ़ी कभी भी रेकॉर्डिंग ख़त्म होने के बाद कभी नहीं कहते थे कि मैं जाता हूँ.31 जुलाई 1980 को संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की एक गीत रेकॉर्ड करने के बाद रफ़ी साहब बोले “ओके नाऊ आइ विल लीव “ क्या कोई सोच सकता है उसी दिन आवाज़ का ये जादूगर इसी शाम इस दुनिया को अलविदा कह गया.....क्या सूफ़ी और दरवेश के अलावा किसी को मृत्यु जैसी सचाई का पूर्वाभास हो सकता है ?

चित्र सौजन्य- हमाराफोटोस डॉट कॉम

आज हम पूरे दिन रफी की याद फीचर आलेख प्रकाशित करेंगे। युनूस खान की कलम से दोपहर दो बजे, रफी के बारे में विशेष जानकारी शाम ७ बजे। तो बने रहिए 'आवाज' के साथ और गुनगुनाते रहिए रफ़ी के मीठे-मीठे तराने।

Wednesday, July 30, 2008

अलविदा इश्मित...



स्टार प्लस की संगीत प्रतियोगिता वायस आफ इंडिया के विजेता और पंजाबी के प्रसिद्ध गायक इश्मित सिंह की मंगलवार को डूबने से मौत हो गई, जिसके साथ ही हमने एक उभरती हुई आवाज़ को हमेशा के लिए खो दिया है.
उनके साथ बिताये लम्हों को याद कर रहे हैं, आवाज़ के लिए, लुधिआना से रिपोर्टर
जगदीप सिंह

ईश्वर का मीत हो गया इश्मीत
नाम-इश्मीत सिंह

जन्म-3 सितंबर 1989
उम्र-19 साल
एजूकेशन- बीकॉम, सेकेंड इयर, सीए अधूरी छोड़ी थी।
24 नवंबर 2007 को वॉयस ऑफ इंडिया बना, इसी दिन गुरु नानक देव जी का प्रकाशोत्सव था।
शौक-गायकी, कम्पयूटर इंटरनेट, स्पोट्र्स

आज मैं ऊपर, आसमां नीचे... यह गाना गाने वाला इश्मीत इतनी जल्दी आसमां के पार चला जाएगा, यकीन नहीं होता। हम जितना भी इस युवा गायक के बारे में सोचते हैं, उतनी ही मीठी यादें ताजा हो जाती हैं। 19 साल का यह फरिश्तों सा गायक जो खुद पानी की तरह था, जो हर हाल में खुद को ढाल लेता था, आखिर पानी की भेंट चढ़ गया। दूसरों के छोटे से दुख से उसकी आंखें छलक आती थीं। आज वह अपने चाहने वालों की आखों में ढेरों आंसू छोड़ गया।

सफर जिंदगी का

धर्म को समर्पित और एक कर्मठ परिवार में जन्मा इश्मीत बचपन से ही होनहार था। शास्त्री नगर स्थित घर के आसपास वह अपनी गायकी और रिज़र्व अंदाज़ के कारण बेहद मशहूर था.

बस जीतना था जुनून.

हर मैदान में जीतना उसका जुनून था। चाहे गायकी हो या पढ़ाई उसने हर जगह अच्छा प्रदर्शन किया। गुरु नानक पब्लिक स्कूल का स्टूडेंट रहा इश्मीत अपने दोस्तों में दोस्ती के साथ ही पढ़ाई में होशियारी के लिए भी जाना जाता था। यही वजह थी कि मुश्किल माने जाने वाले चार्टेड अकाउंटेंसी के कोर्स के शुरूआती एग्जाम उसने बहुत आराम से पास कर लिए थे। संस्थान के नियम बदलने की वजह से सीए न कर पाने का उसे अफसोस भी था। मुझे याद है कि एक निजी मुलाकात में उसने कहा था कि अब बीकॉम के साथ सीए नहीं कर पाऊंगा।

अधूरी रही महाराजा रणजीत सिंह बनने की चाहत.

इश्मीत की डील-डोल शख्सियत को देखकर बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता राज बब्बर ने उसे पंजाब के सबसे महान शहंशाह महाराजा रणजीत सिंह की किशोर अवस्था का रोल ऑफर किया था। साल के अंत में शुरू होने वाले सीरियल की शूटिंग उसने विदेश दौरे से लौट कर शुरू करनी थी। इश्मीत को बॉलीवुड के दिग्गज संगीतकार उत्तम सिंह ने भी गाने का प्रस्ताव दिया था।

जगजीत के बेटे की याद में मिला पहला सम्मान

चोटी के गजल गायक जगजीत सिंह के मरहूम बेटे विवेक सिंह की याद में स्थापित किया गया पहला अवार्ड इश्मीत को दिया गया था। लुधियाना में हुए कार्यक्रम के दौरान अवार्ड प्राप्त करते हुए जहां इश्मीत फफक-फफक कर रो पड़ा था, वहीं खुद जगजीत और चित्रा सिंह की छलकती आखें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। इश्मीत सिंह की जिंदगी का ये यादगार पल था।

कंपनियों का भी बना चहेता

वॉयस ऑफ इंडिया बनने से पहले ही इश्मीत काफी लोकप्रिय हो गया था। कंपनियां भी उसे अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाने के लिए रुचि दिखा रही थीं। फाइनल से पहली ही सोनाटा कंपनी ने अपनी युवा घडिय़ों की रेंज उसी से लांच करवाई थी। कीर्ति लाल ज्यूलर ने उसे हीरों से नवाजा था, तो पंजाब स्टेट लॉजरीज ने भी उसे अपनी लॉटरीज का ब्रांड एम्बेसडर बनाया था।

दुनिया घूमने को था उत्साहित

वॉयस ऑफ इंडिया बनने के बाद जब उसे 50 देशों में शो करने का कार्यक्रम दिया गया तो वह काफी उत्साहित था। उसका कहना था कि दुनिया भर में अपना टैलेंट इस तरह दिखाना खास तजुर्बा रहेगा।

मुंबई में नहीं लगा था दिल.

तरक्की और शोहरत की खातिर मुंबई गए इश्मीत का दिल अपने शहर और दोस्तों में बसा था। एक निजी मुलाकात में उसने कहा था कि मुंबई में तो अपने लिए वक्त ही नहीं मिलता चौबीस घंटे बस काम ही काम।

पब्लिसिटी से दूर

लुधियाना आने पर अक्सर इश्मीत घर में आराम करने और अपने दोस्तों के साथ समय बिताने को तरजीह देता था। कई बार परिवार के लोग चाहते भी थे कि वह मीडिया से इंटरेक्ट करे तो इश्मीत टालने की कोशिश करता था।

विकलांगों के साथ बिताया दिन

संवेदनशील इश्मीत को आम लोगों का दर्द काफी भावुक कर देता था। विकलांग दिवस पर इश्मीत रखबाग में पिकनिक मना रहे मंदबुद्धि और विकलांग बच्चों के पास पहुंच गया। वहां पर उनके साथ वक्त बिताने के साथ ही उन्हें कुछ कर दिखाने को प्रोत्साहित किया।

तिरंगे पर नहीं दिया ऑटोग्राफ

गायकी का दीवाना इश्मीत देश-भक्ति से सराबोर था। जीतने के बाद लुधियाना में एक कार्यक्रम के दौरान एक नन्हे प्रशंसक ने जब छोटे से तिरंगे पर उससे ऑटोग्राफ देने को कहा तो इश्मीत ने बच्चे को समझाया कि राष्ट्रीय झंडे के सम्मान को बरकरार रखने के लिए ऐसा नहीं करते।

कंपनी को झुकाया

गुरुद्वारा दुखनिवारण साहिब में अरदास में किए वादे के मुताबिक इश्मीत अपनी पहली धार्मिक एलबम निकालना चाहता था, लेकिन उसकी कामर्शियल एलबम लाना चाहती थी। आखिर इश्मीत की भावनाओं के आगे झुकते हुए बिग म्यूजिक ने उसकी धार्मिक एलबम को गुरुद्वारा दुखनिवारण साहिब में रिलीज किया।

नहीं मनेगा जन्मदिन का जश्न

तीन सितंबर को इश्मीत के जन्मदिन को लेकर सभी दोस्त उत्साहित थे। वायस आफ इंडिया बनने के बाद सभी ने उसका जन्मदिन ·का जश्न मनाने के बारे में सोच रहे थे, लेकिन अब सबके चहरों पर उदासी छा गई है।


जगदीप सिंह
रिपोर्टर, लुधिआना

दोस्तों, याद करें इश्मित को, VOICE OF INDIA में उनके गाये उनके इस भावपूर्ण गीत के साथ -


Ishmit (Ishmeet) Singh: An unforgotten young voice of Punjab

तेज़ बारिश में कबड्डी खेलना अच्छा लगता है ...



दिल्ली के अनुरूप कुकरेजा हैं, आवाज़ पर इस हफ्ते का उभरता सितारा.

इस बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार की ताज़ा स्वरबद्ध ग़ज़ल "तेरे चेहरे पे" बीते शुक्रवार आवाज़ पर आयी और बहुत अधिक सराही गयी. ग़ज़लों को धुन में पिरोना इनका जनून है, और संगीत को ये अपना जीवन समर्पित करना चाहते हैं. फरीदा खानम, मुन्नी बेगम और जगजीत सिंह इन्हे बेहद पसंद हैं, अपने भाई निशांत अक्षर, जो ख़ुद एक उभरते हुए ग़ज़ल गायक हैं, के साथ मिलकर एक एल्बम भी कर चुके हैं. संगीत के आलावा अनुरूप को दोस्तों के साथ घूमना, बेड़मिन्टन, लॉन टेनिस, बास्केट बोंल और क्रिकेट खेलना अच्छा लगता है, मगर सबसे ज्यादा भाता है, तेज़ बारिश ( जो हालाँकि दिल्ली में कम ही नसीब होती है ) में कबड्डी खेलना. जिंदगी को अनुरूप कुछ इन शब्दों में बयां करते हैं -

Life always creates new and BIG troubles through which i pass learning new and BIGGER things.
Even A failure is a success if analyzed from the other side of it.


हमने अनुरूप से गुजारिश की, कि वो हिंद युग्म के साथ उनके पहले संगीत अनुभव के बारे में, यूनि कोड का प्रयोग कर हिन्दी में लिखें, तो उन्होंने कोशिश की, और इस तरह उन्होंने हिन्दी टंकण का ज्ञान भी ले लिया, अब हो सकता है जल्द ही वो अपना ख़ुद का हिन्दी ब्लॉग भी बना लें.....तो लीजिये पढिये, क्या कहते हैं अनुरूप, अपने और अपने संगीत के बारे में -

नमस्कार दोस्तों, सबसे पहले तो में हिंद युग्म का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि मुझे अपना संगीत प्रस्तुत करने का मौका दिया. उन सभी श्रोतागणों का आभार, जिन्होंने इस ग़ज़ल को सुना और अपने विचार प्रकट किए.

मेरा संगीत का सफर बचपन से ही शुरू हुआ, पिताजी को तबला व् हारमोनियम बजाते देख मैं भी इसी ओर खिंचा चला आया. शुरू से ही मुझे गाने का शौक नही रहा बल्कि संगीत का शौक रहा, जैसे जैसे उम्र बढ़ी, मेरी रूचि संगीत में बढती गई और मैंने गिटर बजाना शुरू किया. ११ वि कक्षा में मुझे एक होम स्टूडियो सेट अप करने का मौका मिला जिसको मैंने पलक झपकते ही पूरा किया. १२वि कक्षा के अंत तक मेरे भाई (निशांत अक्षर) और मैंने मिलकर एक ग़ज़ल एल्बम को पूरा किया जिसका नाम है "चुप की आवाज़ ", जिसका उदघाटन समारोह दिल्ली के हिन्दी भवन में किया गया, और जिसके बोल लिखे विज्ञान व्रत ने.

सफर आगे बढ़ा और मैं दिल्ली विश्व विद्यालय के रेडियो से जुड़ा.

रेडियो पर एक दिन इंटरव्यू देते वक्त मैंने हिंद युग्म के बारे में सुना, जो मुझे बेहद अच्छा लगा. सजीव जी से मेरी मुलाक़ात डी यू रेडियो के मैनेजर के द्वारा हुई, जो कि उस वक्त इंटरव्यू ले रहे थे. बात करने के कुछ हफ्तों बाद ही उन्होंने मुझे कुछ कवियों से ऑनलाइन मिलवाया जिन्होंने मुझे अपनी रचनायें भेजी. काफ़ी समय बाद, मनुज जी की रचना मुझे और मेरे भाई, निशांत अक्षर, को पसंद आयी और हमने इस पर काम शुरू कर दिया, और उसके बाद कि कहानी आपके सामने है.

अंत में एक बार फ़िर से सभी श्रोतागणों, मनुज जी,सजीव जी और हिंद युग्म की पूरी टीम का धन्येवाद, आगे भी आप सब मेरी कोशिशों को युहीं प्रोत्साहित करते रहेंगे इस आशा के साथ -

अनुरूप

मुझसे संपर्क करें -

Web : http://anuroop.in

iLike : http://ilike.com/artist/anuroop

Blog : http://www.anuroopsmusic.blogspot.com

अनुरूप को, आवाज़ और हिंद युग्म की ढेरों शुभकामनायें...अगर आप ने, अब तक नही सुना तो अब सुनिए, इस युवा संगीतकार की स्वरबद्ध की ये खूबसूरत ग़ज़ल, और अपना प्रोत्साहन/मार्गदर्शन दें.


Tuesday, July 29, 2008

चिड़िया रानी



मीनाक्षी धन्वंतरि की आवाज़ में सुषमा गर्ग की बाल-कविता 'गुड़िया रानी'

आज कई महीनों के बाद मीनू आंटी बच्चों के लिए एक कविता पॉडकास्ट लेकर आई हैं। मीनू आंटी ने अब से नियमित पॉडकास्ट भेजने का वादा किया है। सुनकर ज़रूर बतायें कि कैसी लगी?

नीचे ले प्लेयर से सुनें.

(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)



यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)

VBR MP3
64Kbps MP3
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सभी बाल-रचनाएँ सुनने के लिए क्लिक करें।

# Baal-Kavita 'Chidiya Rani' of Shushma Garg, # Voice- Meenakshi Dhanvantri 'Meenu'

Monday, July 28, 2008

पहला सुर के गीतों को अपना कॉलर ट्यून बनायें



इंटरनेट के माध्यम से बने पहले संगीतबद्ध एल्बम 'पहला सुर' के गीतों को अपना कॉलर ट्यून बनायें

Very First Musical Albumयह बहुत खुशी की बात है कि हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' के गीतों/ग़ज़लों को आप अपना कॉलर ट्यून बना सकते हैं। अभी यह सुविधा वोडाफोन के साथ है। जल्द ही यह सुविधा हम अन्य मोबाइल नेटवर्क उपभोक्ताओं को भी देंगे। हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए भी यह एक सफलता ही है कि ब्लॉगिंग के माध्यम से एक एल्बम बना और वो इतनी जगह, इतनी बार सुना गया और सराहा गया।

Friends,

We are very happy to announce that the tracks of Hind-Yugm's very first album of 'Pehla Sur' that was made through internet jamming, are uploaded at Vodafone... You can set those as your caller tune..
CODESONG_NAMEALBUM_NAME
10600300Baat Yeh Kya Hai JoPehla Sur
10600301In DinonPehla Sur
10600302JhalakPehla Sur
10600303Mujhe Dard DePehla Sur
10600304SammohanPehla Sur
10600305Subah Jeeta HunPehla Sur
10600306Subah Ki TaazgiPehla Sur
10600307Tu Hal Dil Ke PaasPehla Sur
10600308Wo Narm SiPehla Sur
10600309Yeh Zaroori NahinPehla Sur


SMS CT to 56789 to set the song as your Caller tune

For Example: If you want to set 'Wo Narm Si' as your Vodafone Caller Tune, then create/compose/write a SMS CT space followed by code (CT 10600308) and sent it to 56789..

Rs 15 / Caller tune selection I Rs 30 / month I Rs 3 / SMS


'पहला सुर' के गीतों को कॉलर ट्यून के रूप में अपने मोबाइल में सेट करने से पहले उन्हें यहाँ सुन लें।
Please listen all the tracks of Pehla Sur here, before setting these as your caller tune..

नोट- कॉलर ट्यून अगस्त के पहले सप्ताह से एक्टिवेट किया जा सकेगा। थोड़ी सी प्रतीक्षा।

Sunday, July 27, 2008

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का आमंत्रण अंक



दोस्तो,

जैसाकि हमने वादा किया था कि महीने के अंतिम रविवार को पॉडकास्ट सम्मेलन का प्रसारण करेंगे। इंटरनेट की गति हर एक प्रयोक्ता के पास अलग-अलग है, इसलिए हम एक समान गुणवत्ता नहीं तो रख पाये हैं, मगर फिर भी एक सम्मिलित प्रयास किया है। आशा है आप सभी को पसंद आयेगा।

नीचे के प्लेयर से सुनें।



प्रतिभागी कवि
रंजना भाटिया, दिव्य प्रकाश दुबे, मनुज मेहता, नरेश राणा, शोभा महेन्द्रू, शिवानी सिंह, अनिता कुमार, अभिषेक पाटनी
संचालक- हरिहर झा
उप-संचालक- शैलेश भारतवासी

हमें हरिहर झा, ब्रह्मनाथ त्रिपाठी अंजान और पीयूष पण्डया की भी रिकॉर्डिंग प्राप्त हुई थी, लेकिन उन्हें आसानी से सुन पाना सम्भव नहीं था। इसलिए हम उनका इस्तेमाल नहीं कर सके।

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


हम सभी कवियों से यह गुज़ारिश करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 1. Month: July 2008.

Friday, July 25, 2008

तेरे चेहरे पे, एक खामोशी नज़र आती है...



आवाज़ पर संगीत के दूसरे सत्र के, चौथे गीत का विश्व व्यापी उदघाटन आज.
संगीत प्रेमियो,
इस शुक्रवार, बारी है एक और नए गीत की, और एक बार फ़िर संगीत पटल पर दस्तक दे रहे हैं एक और युवा संगीतकार अनुरूप, जो अपने साथ लेकर आए हैं, ग़ज़ल-गायन में तेज़ी से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती एक आवाज़ निशांत अक्षर . ग़ज़लकार है युग्म के छायाचित्रकार कवि मनुज मेहता.
"पहला सुर" की दो ग़ज़लों के कलमकार, निखिल आनंद गिरि का आल इंडिया रेडियो पर साक्षात्कार सुनकर, अनुरूप ने युग्म से जुड़ने की इच्छा जताई और शुरू हुआ संगीत का एक नया सिलसिला. मनुज के बोल और निशांत से स्वर मिलें तो बनी, नए सत्र की यह पहली ग़ज़ल -"तेरे चेहरे पे". तो दोस्तो, आनंद लीजिये इस ताजातरीन प्रस्तुति का, और अपनी मूल्यवान टिप्पणियों से इस नई टीम का मार्गदर्शन / प्रोत्साहन करें.

ग़ज़ल को सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -



Hind Yugm, once again proudly present another, very young ( just 18 yrs old ) and talented composer, Anuroop from New Delhi, for whom composing ghazal is just natural, this ghazal here has been made keeping in mind the intricacies of a beloved away from his loved one due to some mistake which had taken place in their life. Penned by Maunj Mehta, and rendered by a very talented upcoming ghazal singer Nishant Akshar, enjoy this very first ghazal of this new season, and do leave your valuable comments, and help this new team to perform even better in the coming assignments.

To listen to this ghazal, click on the player below -



ग़ज़ल के बोल -

तेरे चेहरे पे, एक खामोशी नज़र आती है,
जिंदगी और भी, यास अफ्रीं नज़र आती है,

जितना भी रूठता हूँ जिंदगी से मैं,
उतना ही ये मुझे मनाती नज़र आती है.

तुम्ही बताओ कहाँ ढूँढू, किसी आगाह को,
हर तरफ़ मुझको, गर्द -ऐ-राह नज़र आती है.

LYRICS -

Tere chehre pe ek khamoshi nazar aati hai,
zindagi aur bhi *yaas aafreen nazar aati hai.


Jitna bhi ruthta hoon zindagi se main,
utna hi yeh, mujhey manati nazar aati hai.



tumhi batao, kahan dhundoon kisi *aagah ko,
har taraf mujhko gard-e-raah hi nazar aati hai.


*Yaas Aafreen- Na-umeed se bhari hui
*Aagah- Friend/ loved one

चित्र- अनुरूप (ऊपर), निशांत अक्षर (मध्य) और मनुज मेहता (नीचे)

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SONG # 04, SEASON # 02, " Tere Chehare Pe ", opened on 25/07/2008 on Awaaz, Hind Yugm.
Music @ Hind Yugm, where music is a passion

Thursday, July 24, 2008

सीखिए गायकी के गुर



गाना आए या न आए,गाना चाहिए...जनाब बाथरूम सिंगिंग छोडिये, और महफिलों की जान बनिए, आवाज़ पर संजय पटेल लेकर आए हैं, नए गायकारों के लिए मशहूर संगीतकार कुलदीप सिंह के सुझाये कुछ नायाब टिप्स...

दोस्तो,
एक संगीत प्रतियोगिता के संचालन के दौरान, मैंने बतौर निर्णायक उपस्थित, जाने माने संगीतकार कुलदीप सिंह (फ़िल्म साथ-साथ और अंकुश से मशहूर), जिन पर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह को पहली बार पार्श्व गायन में उतारने का श्रेय भी है, से जानना चाहा कुछ ऐसे मशवरे, जो उभरते हुए नए गायकों, विशेषकर जो सुगम संगीत (गीत, ग़ज़ल,और भजन आदि ) गा रहे हैं या फ़िर इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं. कुलदीप जी ने जो बातें बतायीं वो आपके साथ बाँट रहा हूँ, एक बार फ़िर "आवाज़" के मध्यम से, तो गायक दोस्तो, नोट कर लीजिये कुछ अनमोल टिप्स :

- ज़्यादातर बाल कलाकार अपने गुरू का रटवाया हुआ गाते हैं.गुरूजनों का दायित्व है कि वे इस बात का ख़ास ख़याल रखें कि क्या जो बच्चे को सिखाया जा रहा है, वह उसकी उम्र पर फ़बता है.

- कविता/शायरी की समझ सबसे बड़ी चीज़ है.जब गा रहे हैं 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ’ तो ये जानना ज़रूरी है कि एहमद फ़राज़ ने इस ग़ज़ल में क्या कहा है. यदि कबीर गा रहे हैं तो जानें कि ’जो भजे हरि को सदा; वही परम-पद पाएगा', ये परम-पद क्या बला है. रचना का तत्व जानें बिना गायकी में भाव पैदा करना मुमकिन नहीं.

- वह गाइये जा आपकी आवाज़ को सूट हो , इसलिये कोई ग़ज़ल,गीत या भजन न गाएँ कि वह बहुत सुना जाता है. क्या आपकी आवाज़ से वह बात जाएगी जो कविता/शायरी में कही गई है.आपकी आवाज़ और रचना की जुगलबंदी अनिवार्य है.

- तलफ़्फ़ुज़...उच्चारण ...सुगम संगीत की जान हैं. भजन,ग़ज़ल और गीत ..ये सब शब्द प्रधान गायकी के हिस्से हैं . यदि शब्द ही साफ़ नहीं सुनाई दिया तो आपके गाने का मक़सद पूरा नहीं होगा.सुगम संगीत में रचना की पहली पंक्ति सुनते ही श्रोता तय कर लेता है कि उसे ये रचना या इस गायक को पूरा सुनना है या नहीं.संगीत गुरू यदि भाषा की सफ़ाई का जानकार न हो तो ऐसे किसे व्यक्ति से संपर्क बनाए रखना चाहिये जो उच्चारण की नज़ाकत को जानता हो.(इस मामले में मैं रफ़ी साहब और लता जी को उच्चारण का शब्दकोश मानता हूँ; नई आवाज़ों को चाहिये कि वे इन दो गायको के गाए गीतों के शब्दों को बहुत ध्यान से सुनें)

- सरल गाना ज़्यादा कठिन है. बड़े और नामचीन गायकों को सुनिये ज़रूर, लेकिन फ़िज़ूल में उनकी आवाज़ की हरक़तों की नक़ल न करें. बात को सीधे सीधे कहिये .ज़्यादा घुमाव फ़िराव से शब्द प्रदूषित हो जाता है. जगजीतसिंह को सुनिये...कितना सादा गाते हैं .वे क्लासिकल पृष्ठभूमि से आए हैं, लेकिन जानते हैं कि ग़ज़ल गायकी की क्या ख़ूबी है.वे अपनी आवाज़ को बहुत लाजवाब तरीक़े से घुमाना जानते हैं (यक़ीन न हो तो फ़िल्म आविष्कार में उनका और चित्रा सिंह का गाया 'बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जा' ...सुनिये)लेकिन वे शब्द और सिर्फ़ शब्द का दामन ही नहीं छोड़ते.

- शास्त्रीय संगीत आधार है...यदि गाने के क्षेत्र में वाक़ई गंभीरता से आना चाहते हैं तो शास्त्रीय संगीत सीखे बिना क़ामयाबी संभव नहीं.

- देहभाषा (बॉडी लैंग्वेज), सहज रखिये...गले या शरीर के दीगर भागों पर गाने का तनाव मत लाईये...तसल्ली गाने की सबसे बड़ी चीज़ है. देखिये तो कभी मेहंदी हसन साहब को गाते हुए...कितनी शांति से सुर छेड़ते हैं...बल्कि उससे खेलते हैं...उसमें रम जाते हैं....गाते वक़्त गाने वाला ख़ुद अपने भीतर बैठे कवि को प्रकट कर दे यानी किसी रचना को ऐसे गाए जैसे वह उसी की लिखी है और यहाँ फ़िर वही बात लागू हो जाती कि कविता/शायरी की समझ के बिना ये संभव नहीं.

- सुनना और सुनना ...नई आवाज़ों को अपने क्षेत्र की (जिस भी विधा आप गाते हैं)पूर्ववर्ती वरिष्ठ कलाकारों की रेकॉर्डिंग्स सुनिये.अपने पसंदीदा गुलूकार का कलेक्शन सहेजिये..समझिये कैसे गाते रहे हैं ये बड़े कलाकार..सुनिये...गुनिये...और फ़िर गाइये.
विभिन्न विधाओं में इन आवाज़ों ज़रूर सुनें:

- नक़ल बड़ी ख़तरनाक़ चीज़ है...मत पड़िये इस उलझन में ..जब जब भी आप किसी अन्य गायक को दोहराएंगे..वही कलाकार याद आएंगे (जिसको आप दोहरा रहे हैं या नक़ल कर रहे हैं) आप स्थापित नहीं हो पाएंगे. भगवान ने आपके गले में जो दिया है उसे निखारिये.

- अच्छा कलाकार बनने से पहले अच्छा इंसान बनिये,और शऊर पैदा कीजिये ज़िन्दगी की अच्छी बातों को अपनाने का. गाते हैं तो साहित्य पढ़ने में कविता/शायरी सुनने,चित्रकला में रूचि लेने,अभिनय में, यानी दूसरी विधाओं से राब्ता रखने से आप बेहतर कलाकार बन सकते हैं.

ये बातें नई आवाज़ों के लिये निश्चित ही काम की हैं .इन बातों में मैंने कुलदीप सिंह जी के अलावा अपनी थोड़ी बहुत अक़्ल का इस्तेमाल भी किया है.

उम्मीद है इन बातों में दी गई नसीहतें और मशवरे,भजन,गीत और ग़ज़ल गाने वाले नए कलाकारों के लिये बहुमूल्य साबित होंगीं, शुभकामनाओं सहित.

Wednesday, July 23, 2008

" मैं निरंतर प्रयत्नशील हूँ, अभी बहुत कुछ सीखना है....", सुभोजित को है अपने संगीत पर विश्वास, आवाज़ पर इस हफ्ते का सितारा.



आवाज़ पर इस हफ्ते के हमारे सितारे हैं, मात्र १६ साल के एक बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार - सुभोजित, जिनका पहला स्वरबद्ध किया गीत "आवारा दिल" बीते शुक्रवार आवाज़ पर ओपन हुआ और अत्याधिक सराहा गया.

दमदम कैंट, कोलकत्ता के निवासी सुभोजित, ११ वीं कक्षा के छात्र हैं, और संगीत को ही अपनी जिंदगी, अपना कैरियर बनाना चाहते हैं। ९ साल की उम्र से ही सुभोजित ने पियानो से खेलना शुरू कर दिया था, तीसरी कक्षा में थे जब पहली बार सुरों को पिरोकर एक धुन बनायी, धुन तो बचकानी थी, पर जो धुन उसके बाद दिलो-दिमाग पर सवार हुई, वो कभी नही उतारी।

मात्र १३ साल की उम्र थी, जब पहली "full fledge composition" बनायी, और तभी से सुभोजित ने यह जान लिया और मान लिया, कि वो संगीत ही है, जिसके लिए उनका जन्म हुआ है. तब से पढ़ाई के बाद जो भी समय उन्हें मिलता है, समर्पित कर देते हैं वो - अपने संगीत को। मोजार्ट, बीथोवन, यानी, और ऐ.आर.रहमान खूब सुनते हैं ये, और संगीत पर लिखी किताबें पढ़ने का शौक रखते हैं।

शास्त्रीय संगीत को अपना आधार मानने वाले सुभोजित, पिछले दो सालों से हिन्दुस्तानी गायन में दीक्षा ले रहे हैं। माता-पिता और गुरु के आशीर्वाद को अपनी ताक़त मानने वाले सुभोजित से, जब हिंद युग्म ने जानना चाहा कि अपने पहले गीत को मिली सफलता के बाद वो कैसा महसूस कर रहे हैं, तो आत्मविश्वास से भरे सुभोजित का जवाब था, " ये तो बस शुरूवात है, मैं निरंतर प्रयत्नशील हूँ, अभी बहुत कुछ सीखना है, और सीख रहा हूँ, मेरा दावा है कि आने वाले समय में मैं और बेहतर काम कर के दिखाऊंगा...".

और जब हमने जानना चाहा कि युग्म परिवार से उनकी क्या अपेक्षाएं हैं, तो कुछ ये शब्द थे उनके -

"I would like to thank Hind Yugm, for giving an opportunity to compose. I'm doing three more songs and learning a lot at the same time.Thank you all, for such great response to my first song, I will definitely give better results, taking tips from your comments. Thanks for your love, please wish me best of luck for my music career."

यकीनन सुभोजित, युग्म परिवार की शुभकामनायें आपके साथ हमेशा रहेंगी, यूँ भी पश्चिम बंगाल की मिटटी ने संगीत की दुनिया को बहुत से नायाब हीरे दिए हैं, हम उम्मीद करेंगे कि आप भी आने वाले समय में संगीत के आसमान का एक चमकता हुआ सितारा बनें।

चित्र - सुभोजित (ऊपर), सुभोजित का home studio (नीचे)

आप भी सुभोजित का गीत "आवारा दिल" अवश्य सुनें और प्रोत्साहन/मार्गदर्शन दें.


Monday, July 21, 2008

झूमो रे, दरवेश...( भाग १ ), सूफी संगीत परम्परा पर एक विशेष श्रृंखला, अशोक पाण्डे की कलम से



सूफी संगीत यानी, स्वरलहरियों पर तैरकर जाना और ईश्वर रुपी समुंदर में विलीन हो जाना, सूफी संगीत यानी, "मै" का खो जाना और "तू" हो जाना, सदियों से रूह को सकून देते, सूफी संगीत पर "आवाज़" के संगीत विशेषज्ञ, और वरिष्ट ब्लॉगर, अशोक पाण्डे लेकर आए हैं, एक विशेष श्रृंखला, जिसका हर अंक हमें यकीं है, हमारे संगीत प्रेमियों के लिए, एक अनमोल धरोहर साबित होगा. प्रस्तुत है, इस श्रृंखला की पहली कड़ी आज, अशोक पाण्डे की कलम से.....

सूफ़ीवाद के प्रवर्तकों में अग्रणी गिने जाने वाले तेरहवीं सदी के महान फ़ारसी कवि जलालुद्दीन रूमी एक जगह लिखते हैं:

"मैंने चुपचाप आहें भरीं ताकि आने वाली कई सदियों तक दुनिया में मेरी 'हाय' प्रतिध्वनित होती रहे"

विशेषज्ञों ने सूफ़ीवाद को परिभाषित करते हुए उसे एक ऐसा विज्ञान बताया है जिसका उद्देश्य हृदय का परिष्कार करते हुए उसे ईश्वर के अलावा हर दूसरी चीज़ से विरत करना होता है. एक दूसरी परिभाषा के अनुसार सूफ़ीवाद वह विज्ञान है जिसके माध्यम से हम सीख सकते हैं कि किस तरह ईश्वर की उपस्थिति में जीवन बिताते हुए अपने आन्तरिक व्यक्तित्व की अशुद्धियों को परिष्कृत किया जाए और उसे लगातार सुन्दर बनाए जाने का उपक्रम किया जाए. मूलतः इस्लाम की रहस्यवादी शाखा के रूप में विकसित हुआ सूफ़ीवाद क़रीब एक हज़ार साल पुराना है. इस दौरान भाषा के रास्ते फ़ारसी, तुर्की और क़रीब बीस अन्य भाषाओं से हो कर गुज़रते हुए सूफ़ीवाद विश्व के तमाम देशों तक पहुंचा.

सूफ़ी दर्शन का संगीत से संबंध कैसे और कब क़ायम हुआ इस बारे में बहुत प्रामाणिक जानकारी तो नहीं मिलती लेकिन जलालुद्दीन रूमी की ही एक कविता से यह क़यास लगाया जा सकता है कि संभवतः तेरहवीं सदी तक आते आते संगीत सूफ़ीवाद का अभिन्न अंग बन चुका था. कविता यूं है -

"हर दिन की तरह आज भी
हम सब जागते हैं ख़ाली और डरे हुए.
अपने अध्ययनकक्ष का द्वार खोल कर कुछ पढ़ना मत शुरू कर दो.
बेहतर है,
कोई वाद्य यन्त्र ले लो.
उसके बाद बन लेने दो सौन्दर्य को वह
जिसे हम प्यार करते हैं
."

सूफ़ीवाद में संगीत से उपजने वाले उत्कृष्ट आध्यात्मिक सौन्दर्य को ईश्वर से एकाकार होने का सबसे उचित उपकरण माना जाता है. जहां पारम्परिक इस्लाम में संगीत को नीची निगाहों से देखे जाने की परम्परा रही थी, वहीं संगीत के माध्यम से ईश्वर के साथ संवाद स्थापित कर लेने पर ज़ोर देने वाले सूफ़ीवाद में इस प्रयोजन हेतु 'धिक्र' (या 'ज़िक्र') को सर्वोपरि माना गया. 'ज़िक्र' में ईश्वर के नाम का जाप, प्रार्थना, ध्यान, कविता, क़ुरान की आयतों और वाद्य यंत्रों इत्यादि सभी के लिए स्थान होता है. इस कार्य में रत रहने वाले को सूफ़ी भी कहा गया है और दरवेश भी.

ज़िक्र एक सामूहिक परम्परा मानी गई है जिसके अनुसार शेख़ या पीर के नाम से सम्बोधित किया जाने वाला कोई वरिष्ठ सूफ़ी बहुत सारे अन्य सूफ़ियों या दरवेशों की अगुवाई करता था. इस अनुष्ठान में मौके के हिसाब से पवित्र संगीत सुनना सबसे महत्वपूर्ण होता था. सुनने की इस प्रक्रिया में परमानन्द जैसी अनुभूति होने पर नैसर्गिक रूप से नृत्य करने लगना या आविष्ट हो जाना आम हुआ करता था. हमारे यहां दरगाहों पर क़व्वालियों के उरूज पर आने की स्थिति में ऐसे दृश्य देखे ही जाते रहे हैं. तुर्की की दरवेश नृत्य परंपरा इस का एक बेजोड़ नमूना है. भावावेश की अवस्था में सफ़ेद लहरदार पोशाकें पहने घूम-घूम कर नाचने की इस शैली में सूफ़ीगण सूर्य के गिर्द घूमती धरती को सांकेतिक तरीके से प्रदर्शित करते हैं.


सूफ़ी सम्प्रदायों की उपस्थिति समूचे मुस्लिम जगत में दर्ज़ है. दक्षिण और मध्य एशिया से लेकर तुर्की. ईरान और उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी अफ़्रीकी देशों में फैले हुए सूफ़ीवादी धाराओं की अपनी अपनी वैविध्यपूर्ण परम्पराएं हैं: इनमें भारत-पाकिस्तान की क़व्वाली, सेनेगल की वोलोफ़ भाषा के गीत और तुर्की के दरवेश नृत्य जैसी विधाएं लगातार विकसित होती गई हैं.

इस क्रम में आज सुनिये सिन्धु घाटी के बलूचिस्तानी इलाक़े के सूफ़ी संगीत की एक बानगी के तौर पर रहीमा साहबी की मुख्य आवाज़ में कलंदरी ज़िक्र और क़व्वाल बहाउद्दीन, क़ुतुबुद्दीन एंड पार्टी से हज़रत अमीर ख़ुसरो की एक क़व्वाली:






(जारी...)


Friday, July 18, 2008

कोलकत्ता से उड़ता उड़ता आया " आवारा दिल " - दूसरे सत्र के, तीसरे नए गीत का, विश्व व्यापी उदघाटन आज



इस शुक्रवार आवाज़ पर हैं, १६ वर्षीय युवा संगीतकार. कोलकत्ता के सुभोजेत का, स्वरबद्ध किया गीत " आवारा दिल ", यह गीत भी बिल्कुल वैसे ही बना है, जैसे अब तक, युग्म के अधिकतर गीत बने हैं, अर्थात अलग अलग, तीन शहरों में बैठे गीतकार, संगीतकार और गायक ने, व्यक्तिगत रूप से बिना मिले, इन्टरनेट के माध्यम से टीम बना कर मुक्कमल किया है, यह गीत भी. यहाँ कोलकत्ता के सुभोजेत को साथ मिला, दिल्ली के गीतकार सजीव सारथी का, और नागपुर के गायक, सुबोध साठे का. सजीव का युग्म के लिए यह आठवां सोलो गीत है, और सुबोध ने यहाँ चौथी बार अपनी गायकी का जौहर दिखाया है.
अपना पहला गीत सुभोजेत ने, उन आवारा क़दमों को समर्पित किया हैं, जो जीवन नाम के सफर में, हर पल को भरपूर जीते हैं, सुख-दुःख, धूप-छांव, हर मुकाम से हँस कर गुजरते हैं, और जहाँ जाते हैं बस खुशियाँ बाँटते हैं.
तो सुनिए मस्ती भरा, यह गीत, और अपनी बेबाक समीक्षा से इस टीम का मार्गदर्शन करें.

"आवारा दिल" को सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें.



This 16 years old composer, from Dumdum Cantt, Kolkatta, is the youngest of the bunch we have, Subhojet is really a found, for Hind Yugm. teamed with Sajeev Sarathie and Subodh Sathe, here we bring his first ever song for you - Awaara Dil. This song is all about the fullness of life, where one enjoy every moment, in all its beauty, without complaining, but singing and dreaming,all the time, with all the hopes in heart and a smile on face, even while walking through, the tough roads of life journey.
So friends, enjoy this song, and leave your fair comments, we hope that you will surely enjoy this presentation.

To listen to "Awaara Dil" please click on the player



चित्र - संगीतकार सुभोजेत (ऊपर), और अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करते सुबोध साठे (नीचे )

गीत के बोल - आवारा दिल

उड़ता उड़ता मैं फिरूं दीवाना,
ख़ुद से, जग से, सब से बेगाना,
ये हवा ये फिजा, ये हवा ये फिजा,
है ये साथी मेरे, हमसफ़र-
है ये साथी मेरे, हमसफ़र-
आवारा दिल .... आवारा दिल....
आवारा दिल....आवारा दिल....

धूप में छाँव में ,
चलूँ सदा झूमता,
और बरसातों में,
फिरता हूँ भीगता,
साहिल की रेत पे बैठ कभी.
आती जाती लहरों को ताकता रहूँ,
मस्त बहारों में लेट कभी,
भंवरों के गीतों की शोखी सुनूँ,
आवारा दिल.....

रास्तों पे बेवजह,
ढूंडू मैं उसका पता,
जाने किस मोड़ पर,
मिले वो सुबह,
पलकों पे सपनों की झालर लिए,
आशा के रंगों में ढलता रहूँ,
जन्मों की चाहत को मन में लिए,
पथिरीली राहों पे चलता चलूँ,
आवारा दिल....

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


SONG # 03, SEASON # 02, " AWAARA DIL " ( RELEASED ON 18/07/2008 ) @ AWAAZ (PODCAST)
MUSIC @ HIND YUGM, WHERE MUSIC IS A PASSION

Thursday, July 17, 2008

"बटाटा वड़ा...ये समुन्दर...संगीत...तुम्हे इन छोटी छोटी चीज़ों में कितनी खुशी मिलती है..."



आवाज़ पर आज दिन है - Music video of the month का, हमारी टीम आपके लिए चुन कर लाएगी -एक गीत जो सुनने में तो कर्णप्रिय हो ही, साथ ही उसका विडियो भी एक शानदार प्रस्तुति हो, यानि कि ऐसा गीत जो पांचों इन्द्रियों को संतृप्त करें, हमारी टीम की पसंद आपको किस हद तक पसंद आएगी, ये तो आपकी टिप्पणियां ही हमें बतायेंगीं.

आज हम जिस गीत का विडियो लेकर उपस्थित हैं, वो गीत है फ़िल्म "सत्या" का, सत्या को राम गोपाल वर्मा, एक Hard Core Realistic फ़िल्म बनाना चाहते थे, तो जाहिर है, गीत संगीत के लिए, उसमें कोई स्थान नही था, पर जब फ़िल्म बन कर तैयार हुई, तो निर्माता जिद करने लेगे फ़िल्म में गीत डाले जायें ताकि फ़िल्म की लम्बाई बढ़े और Audio प्रचार भी मिल सके, अन्तता रामू जी को अपनी जिद छोडनी पड़ी, उन दिनों माचिस के गीतों से हिट हुई जोड़ी, विशाल भारद्वाज और गुलज़ार, को चुना गया इस काम के लिए, पटकथा में परिस्थियाँ निकाली गयीं और आनन फानन में ५ गीत रिकॉर्ड हुए और फिल्माए गए, फ़िल्म बेहद कामियाब रही, और संगीत ने लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई, "सपने में मिलती है" और "गोली मार भेजे में" आदि गीत अधिक चले, पर आज आपके लिए, जो गीत हम चुन कर लाये हैं इस फ़िल्म का, वो कुछ ख़ास है, इसकी हर बात निराली है, हालाँकि बहुत अधिक मशहूर नही हुआ, पर गुलज़ार साब के बेहतरीन गीतों में से एक है - यह गीत. इसमें इनकी विशिष्ट शैली खूब जम कर झलकती है, बानगी देखिये -

बादलों से काट काट कर,
कागजों पे नाम जोड़ना,
डोरियों से बाँध बाँध कर,
रात भर चाँद तोड़ना, और...
जामुनों की नर्म डाल पर,
नाखूनों से नाम खोदना.....


विशाल का संगीत, गीत को मूड को पूरी तरह से स्थापित करता है, Guitar का पीस सुनने लायक है, इस गीत से लंबे अरसे बाद Playback Singing में वापसी की, गायक भूपेंद्र ने, गुलज़ार के कोमल शब्दों को बहुत सलीके से अपनी रेशमी आवाज़ में उतारते रहें हैं भूपेंद्र, हमेशा से,और यह गीत भी अपवाद नही रहा इस मामले में.

अब बात करें चित्रांकन की. तो इसमे कोई शक नहीं कि इस मुलायम से गीत को बेहद उन्दा तरीके से परदे पर उतरा है, निर्देशक ने.

नायक एक Angry Young Man है जो मुंबई शहर में ख़ुद को बहुत सहज महसूस करता है, वह चुप चुप रहता है ख़ुद में दबा दबा, संवेदनाएं मर चुकी हैं, और कंक्रीट के शहर में तो बस जीते जाना भी जैसे, एक उपलब्धि है, मगर जब वो नायिका को देखता है तो उसे लगता है, कि वो किसी और ही दुनिया की है,और उसे दिखता है- गुनगुनाता एक आबशार.

गाने के बीच में कुछ संवाद भी है -

नायक - "तुम्हे इन छोटी छोटी चीज़ों में कितनी खुशी मिलती है,…बटाटा वड़ा, ये समुन्दर, संगीत, ये सब...."

नायिका - "हाँ... मगर यही तो जिन्दगी है..."

नायक - "मुझे पहली बार महसूस हो रहा है"


इस छोटे से संवाद में महानगरीय जीवन की तमाम पीडा झलकती है, जहाँ हर खुशी है दामन में, बस जीने के लिए वक्त नही है...लगभग पूरा गीत Outdoor Shoot हुआ है, और पार्श्व में दिख रहा मुंबई महानगर भी एक किरदार बन कर उभर कर आता है, यूँ तो दोनों कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है, पर उर्मिला मातोंडकर अपनी नैसर्गिग सुन्दरता और उत्कृष्ट अभिनय से पूरे गीत पर छायी हुई लगती है, कैमरा के सुंदर प्रयोग ने. हर फ्रेम में जैसे जान डाल दी है.

आप भी देखिये और सुनिए ये लाजावाब गीत, और अपनी राय से हमें अवगत कराएँ -



Series - Music Video of the Month Episode 1
Song - Badalon Se...
Album/ Film - Satya
Lyrics - Gulzaar
Music - Vishal Bhardwaj
Singer - Bhupendra
Director - Ram Gopal Verma
Artists - Chakraborthy, Urmila Matondkar, and Mumbai City

Wednesday, July 16, 2008

लता मंगेशकर को अपना रोल मॉडल मानती हैं, गायिका -मानसी पिम्पले, आवाज़ पर इस हफ्ते का उभरता सितारा



आवाज़ पर इस हफ्ते की हमारी "फीचर्ड आर्टिस्ट" हैं - मानसी पिम्पले, हिंद युग्म पर अपने पहले गीत "बढ़े चलो" से चर्चा में आयीं मानसी रमेश पिम्पले, मूल रूप से महाराष्ट्र से हैं, और इन्हे हिंद युग्म से जोड़ने का श्रेय जाता है, युग्म की बेहद सक्रिय कवयित्री सुनीता यादव को. मानसी इन्हीं की शिष्या थीं कभी, और तभी से सुनीता ने इनके हुनर को परख लिया था. मानसी ने अभी-अभी ही अपनी बारहवीं की पढ़ाई पूरी की है, और अब अपने कैरियर से जुड़ी दिशा की तरफ़ अग्रसर है. संगीत को अपना जनून मानने वाली मानसी, लता जी को अपना रोल मॉडल मानती हैं, तथा आज के दौर के, श्रेया घोषाल और शान इनके सबसे पसंदीदा गायिका/गायक हैं. Zee tv के कार्यक्रम Hero Honda सा रे गा मा पा, के लिए भी मानसी का चुनाव हुआ था,जहाँ हिमेश रेशमिया भी बतौर जज़ मौजूद थे, पर नियति ने शायद पहले ही, उनकी कला को दुनिया तक पहुँचने का माध्यम, हिंद युग्म को चुन लिया था. चित्रकला और टेबल टेनिस का भी शौक रखने वाली मानसी, युग्म को एक शानदार प्लेटफोर्म मानती हैं, नए कलाकारों के लिए. जब हमने उनसे बात की तो वो अपने पहले गीत को मिली आपार सराहना से बेहद खुश नज़र आयीं. "I saw a means of pursuing my passion through Hind Yugm, which is a very good platform for new talent and art" - ये कथन थे मानसी के.

नीचे पेश है, हिंद युग्म की मानसी से हुई बातचीत के कुछ अंश, आप भी मानसी की आवाज़ में ये दमदार गीत "बढ़े चलो" अवश्य सुनें और इस उभरती हुई प्रतिभावान गायिका को अपना स्नेह दे.

हिंद युग्म - मानसी स्वागत है एक बार फ़िर, ये बताइए कि संगीत आपके जीवन में क्या महत्त्व रखता है ?

मानसी - संगीत मेरा जनून है, और ये मेरे जीवन में विशेष स्थान रखता है, मेरा मानना है शब्द जब संगीत में ढल कर आते हैं तो हर व्यक्ति तक अपनी पहुँच बना पाते हैं, संगीत वो कड़ी है जो आपको इश्वर से जोड़ती है.

हिद युग्म - आप zee tv के सा रे गा मा पा शो के लिए भी चुनी गई थीं, उसके बारे में बताइए.

मानसी - मैं २००४ में चुनी गई थी पहले राउंड के लिए मगर १८ वर्ष से कम उम्र होने के कारण प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बन पायी, उसके बाद कभी कोशिश नही की, फ़िर पढ़ाई की तरफ फोकस बदल गया.

हिंद युग्म - क्या आपके अभिभावक आपके इस जनून को बढ़ावा देते हैं ?

मानसी - जी बिल्कुल, ये उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन ही है जो मैं आज यहाँ हूँ, वो मेरे सबसे अच्छे समीक्षक है, जब भी मुझे कुछ गाना होता है, सब से पहले उन्हें ही सुनाती हूँ, ध्यान से सुनकर वो मेरी कमियों को दुरुस्त करते हैं, अगर मैंने कुछ अच्छा गाया है तो ये उन्ही की बदौलत है .

हिंद युग्म - अब आप B Pharma की पढ़ाई करने जा रही हैं, पढ़ाई के साथ-साथ अपने शौक को कैसे प्लान किया है आपने ?

मानसी - अभी तो सारा ध्यान दाखिले और पढ़ाई की तरफ़ ही है, पर संगीत तो हमेशा ही दिनचर्या का हिस्सा रहेगा, मेरी कोशिश रहेगी की इस दौरान अपने रियाज़ के लिए और अधिक समय निकालूं और ख़ुद को इतना काबिल कर लूँ कि किसी भी नए गीत और उन्दा तरीके से निभा पाऊं.

हिंद युग्म - आप हिंद युग्म के लिए एक खोज हैं, हमारे संगीतकार ऋषि एस के साथ काम करना कैसा रहा ?

मानसी - मैं सुनीता मेम की शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे हिंद युग्म और ऋषि एस से मिलवाया, ऋषि जी के संगीत के एक आत्मा है, वो हर गीत पर बहुत मेहनत करते हैं, और गायक को अपनी बात बड़े अच्छे तरीके से समझाते हैं, वो आपको हमेशा सहज महसूस कराते हैं, उनके साथ काम करना बेहद बढ़िया अनुभव रहा.

हिंद युग्म - "बढे चलो" में आपकी गायकी की बहुत तारीफ हुई है, आप कैसा महसूस कर रही हैं ?

मानसी - मैं बहुत खुश हूँ, साथ ही धन्येवाद देना चाहूंगी ऋषि जी और सजीव जी को, जिन्होंने मुझे इस गीत को गाने का मौका दिया, और अलोक शंकर जी का जिन्होंने बहुत सुंदर लिखा इस गीत को, और अपने तमाम समीक्षकों /श्रोताओं का जिन्होंने अपनी टिप्पणियों से मुझे प्रोत्साहित किया, मेरा सोलो गीत "मैं नदी" भी सब को पसंद आएगा, ऐसी मुझे आशा है.

हिंद युग्म - बहुत बहुत शुक्रिया मानसी, आपके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनायें, संगीत का जनून बरकरार रहे और आप इसी तरह मधुर गीत गाती रहें, यही हमारी कामना है ...

मानसी - जी शुक्रिया, मैं हर गाने में अपना बेस्ट देने की कोशिश करूंगी, और उम्मीद करती हूँ कि हिंद युग्म परिवार भी मुझे यूँ ही प्रोत्साहित करता रहेगा .


मूल इंटरव्यू ( original interview )

Hind Yugm - Hi Manasi, Welcome once again, first of all tell us, what place music has in your life, how you connect with music?

Manasi - Music is my passion. It is very close to my heart and it holds a very high place in my life. Music has the power to convey every human feeling which words alone cannot do. And I feel that music is a form of worship, too.

Hind Yugm - You also got selected for ZEE TV, sa re ga ma pa, what was that story?

Manasi- I gave the auditions for Sa Re Ga Ma in 2004 and I just got short-listed in the preliminary round when they informed me that I was under-age (below 18) and so could not participate in the competition. So there was no further development in that and I haven’t tried to participate again after that as studies became my priority.

Hind Yugm - Do your parents support your interest?

A patriotic SongManasi - Oh yes, of course. Without their support and guidance I couldn’t have been whatever I am today. They are my biggest and best critics. If I have to perform or sing, they personally hear the song and point out all the mistakes and make me correct them before I give my performance. Their guidance and support is of extreme importance in my life.

Hind Yugm - Now you are going to study B Pharma, what plan you have, to manage your interest of singing in the coming days ?

Manasi - Right now I am concentrating mainly on my admission and studies. But that doesn’t mean I’ll put a full stop to my passion. I would try to train my voice in this period of my studies so that I can sing even better and be prepared to face any sort of challenge, i.e., to be able to sing any song flawlessly and with the same ease. I would try to continue my ‘riyaaz’ so that I stay in touch with music.

Hind Yugm - You are a found to hind yugm ( thanks to sunita yadav ) how was the experience of working with Rishi S. the composer ?

Manasi - Definitely, I myself wish to thank Sunita ma’am for introducing me to Hind Yugm and Rishi S Balaji. It was really a pleasant experience working on these two songs with Rishi Sir. He is an excellent upcoming composer and his music is definitely the soul of his songs. He makes it a point that the singer understands whatever he wants them to sing and is ready to explain it until it is understood. I consider myself very fortunate to have worked with such a talented person.

Hind Yugm - We are looking forward to hear your first solo song “main nadi",”badhe chalo“ is also well received by the audience, how is the feeling?

Manasi - I am feeling elated and at the same time I wish to thank Rishi sir and Sajeev sir for giving me an opportunity to sing these two songs. and Alok Shankar ji for providing such excellent lyrics, I also wish to thank all our critics who have given their precious comments which will help us to eliminate our flaws and present something much better. I only wish to request all of them to always give their support and encouragement. I am myself looking forward to the release of ‘Main Nadi’ and I hope it gets a good response.

Hind Yugm - Thank you very much manasi, and all the best for your future plans.....keep this passion for music, and keep singing such beautiful songs always ...

Manasi - Thanks for everything. I’ll try my best to give my best to each song I sing and I hope my association with Hind Yugm continues…

बिल्कुल मानसी, हम भी यही उम्मीद करेंगे, कि आप युहीं अपनी आवाज़ का जादू अपने हर गीत में बिखेरती रहें, हिंद युग्म कि समस्त टीम की तरफ़ से आपके उज्जवल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनायें.

Monday, July 14, 2008

"नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" - संजय पटेल ने ताज़ा किया एक मार्मिक संस्मरण, संगीत के महान फनकार मदन मोहन को आवाज़ की श्रद्दांजलि



Mangeshkar christened him 'The Emperor Of Ghazals'. She should know because it is in her voice that Madan Mohan created all those masterpieces that set an impossibly high standard for ghazals in films. The irony of the fact is that Madan Mohan couldn't combine class and mass appeal the way an S.D.Burman or Shanker-Jaikishan could. He composed the only way he knew to - with great respect for each of his tunes.

दोस्तो, आज मदन मोहन जी की ३३ वीं पुन्यतिथि है, इस अवसर पर उन्हें याद कर रहे हैं आवाज़ के पारखी संजय पटेल, जानिए उन्हीं की जुबानी ये मार्मिक संस्मरण, जो जुडा है एक अमर गीत " नैना बरसे " से....

मदन मोहन के गीत नैना बरसे रिमझिम रिमझिम से जुड़ा एक मार्मिक संस्मरण.
- संजय पटेल

जब हमारे मन में संगीतकार मदन मोहन का स्मरण आता है तब स्वतः ही यह बात स्थापित हो जाती है कि हम उस सुरीले दौर की बात कर रहे हैं जब संगीत में शोर कम और माधुर्य अधिक हुआ करता था। इसका मतलब ये भी नहीं कि वैसा दौर बाद में नहीं आया लेकिन यह निर्विवाद है कि मदन मोहन की बलन का संगीतकार परिदृश्य पर उपस्थित नहीं हुआ। मदनजी को ग़ज़लों का बादशाह कहा जाता है। पोएट्री की उनकी समझ बेमिसाल थी और संगीत की लाजवाब। यही वजह है कि ग़ज़ल जैसी मासूम काव्य विधा मदन मोहन के गीतों में आकर विलक्षण बन जाती है। यह समय का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि मदन मोहन नाक़ामयाब फ़िल्मों के क़ामयाब संगीतकार कहलाए। बात स्पष्ट है कि फ़िल्में ज़रूर पिट गई होंगी लेकिन मदन मोहन का संगीत अजर अमर बन गया।

मदन मोहन के संगीत का जादू कुछ ऐसा अद्भुत है कि आप एक गीत पर रूक कर रह ही नहीं सकते। यदि आप "हम प्यार में जलने वालों को चैन कहॉं, आराम कहॉं (जेलर)' सुन रहे हैं तो लगता है कि यही मदनजी की श्रेष्ठ रचना है लेकिन जैसे ही आपके कानों पर भैरवी में निबद्ध फ़िल्म भाई-भाई का गीत "कदर जाने ना मोरा बालमवा' पड़ता है तो आप पिछले गीत को भूल जाते हैं। शास्त्रीय संगीत हर एक के बूते का नहीं होता इस लिहाज़ से फ़िल्म संगीत एक सामान्य व्यक्ति की ज़िंदगी में सुरीलापन घोलने का बड़ा काम करता है। ज़रा सोचिये यदि मदनजी जैसे संगीतकार फ़िल्म विधा की ओर न आकर शास्त्रीय संगीत की ओर चले जाते तो आप हम जैसे संगीतप्रेमियों का क्या होता।

आज जिस गीत की चर्चा हम कर रहे हैं वह फ़िल्म”वो कौन थी’ से लिया गया है और मुखड़ा आपका मेरा सबका जाना पहचाना है ... "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' सुनने को यह एक बहुत सामान्य गीत है लेकिन जब इसकी पृष्ठभूमि मालूम होती है तो वाकई हमारी आँखों से भी दुःख का बादल बरसने लगता है। हुआ यूँ कि मदनजी के भाई प्रकाश दिल्ली से मुंबई के बीच रेल से यात्रा कर रहे थे। एकदम स्थान तो याद नहीं आ रहा लेकिन यात्रा के दौरान कुछ कुख्यात लुटेरों ने प्रकाशजी की हत्या कर दी। मदनजी अपने सहयोगी घनश्यामजी के साथ भरे मन और थकान भरी सड़क यात्रा से घटना स्थल तक पहुँचे और अपने भाई की लाश को लेकर मुंबई लौटे। अंतिम संस्कार करने के बाद मदन मोहन कुछ ऐसी विचित्र मानसिक स्थिति में आए कि उन्होंने अपने आपको दो-तीन दिनों के लिए अपने कक्ष में बंद कर लिया। जब कुछ समय बीत गया तो परिजन चिंतित हुए और घनश्यामजी को आगामी रिकार्डिंग्स के डेट्स को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा। हिम्मत करके घनश्यामजी ने मदनजी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्हें बताया कि इस फ़िल्म के गीत की रिकार्डिंग के लिए आज के लिये ही स्टूडियो और लताजी को बुक किया हुआ है। घनश्यामजी ने परिस्थिति के मद्देनज़र पूछा कि क्या स्टूडियो की बुकिंग कैंसल करके लताजी को ख़बर कर दूँ? मदनजी का उत्तर चौंकाने वाला था ! उन्होंने कहा नहीं घनश्याम रेकॉर्डिंग आज ही होगी।

ज़रा सोचिये जिस व्यक्ति ने अपने प्रिय भाई को महज़ तीन दिन पहले गंवाया हो वह संगीत कैसे रच सकता है। लेकिन यदि वह व्यक्ति मदन मोहन है तो सब कुछ संभव है। उसी भरे मन से मदन मोहन स्टूडियो पहुँचते हैं रिकार्डिंग शुरू होती है और ये लाजवाब गाना हम संगीतप्रेमियों की अमानत बन जाता है। ये क़िस्सा सुनने के बाद इस गीत को सुनिये तो आपको लगेगा कि दुनिया जहान का सारा दर्द इस गीत में आ समाया है। "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम' ये रिमझिम कहीं न कहीं मदनजी के भाई के दुःखद स्मरण की रिमझिम है। कहीं न कहीं मन में समोया दर्द उघाड़ रही है। मदन मोहन के संगीत में लता मंगेशकर की गायकी कुछ अलग ही रंग और अंदाज़ अख़्तियार कर लेती है। १९५६ से लेकर १९७५ तक लताजी ने न जाने कितने गीत मदनजी के संगीत निर्देशन में गाए हैं लेकिन इस गीत में लताजी गीतकार राजा मेहंदी अली ख़ाँ के शब्दों को जैसे अपने गायकी का अमृत स्पर्श प्रदान कर रही है। ऑर्केस्ट्रा और लताजी की गायकी का ब्लेंडिंग मदन मोहन के संगीत में कुछ ऐसा होताहै कि वे एक दूसरे का पूरक बन जाता है। न ये तोला ऊपर न वह माशा नीचे। संगीत को सुने तो मदनजी सुनाई देते हैं, लताजी को सुनें तो लताजी सुनाई देती हैं। कोई एक दूसरे को ओवरलैप नहीं करता है। इस गीत में भी ये सारी ख़ूबियॉं चमकती दिखाई देती हैं।मदन मोहन के संगीत का एक जादू यह भी है कि हो सकता है आप उनकी रचे गीत/ग़ज़ल के शब्द भूल जाएँ लेकिन धुन नहीं भूल सकते. अपने जीवन काल में 93 फ़िल्मों के 612 गीतों को संगीतबध्द करने वाले इस महान संगीत सर्जक ने कुछ ऐसी अनमोल धुनें संगीत प्रेमियों को दी हैं जिन्हें कालातीत ही कहना होगा.समय बदलेगा,रहन-सहन,खानापीना,फ़ैशन,इंसानी फ़ितरतें और बदलेगा हमारी ज़ुबान की तमीज़ लेकिन नहीं बदलेगा मदन मोहन के संगीत का अलौकिक सिलसिला ...हम सब के मन को मालामाल करता हुआ. ...


(मदन मोहन और लता जी जब भी मिले संगीत का नया इतिहास बना)

आइये संगीतकार मदन मोहन को याद करते हुए देखते हैं उन्हीं का रचा,फ़िल्म "वो कौन थी" का यह गीत जो मनोज कुमार और साधना पर फिल्माया गया है.



MADAN MOHAN - "THE UNFORGETABLE" ( A LIFE BRIEF ) ( SOURCE - INTERNET )

Madan Mohan was the son of Rai Bahadur Chunnilal, one of the big names of the 30's and 40's, and a partner in Bombay Talkies and then Filmistan. Madan Mohan was sent to Dehradun to join the army on the insistence of his father. Once he was posted at Delhi, he quit the Army and went to Lucknow to do what he wanted to do, to join All India Radio. His musical roots strengthened in Lucknow because he came across famous people like Ustad Faiyyaz Khan, Ustad Ali Akbar Khan, Roshan Ara Begum, Begum Akhtar, Siddheshwari Devi, and Talat Mehmood, all renowned names in the field of classical music and ghazal singing. He carried their influence with him always, which was clearly evident by his music compositions in his career, and one of the main reasons why he excelled in aesthetic composition inspite of having no formal training in music.
A patriotic Song


Madan Mohan came to Bombay in the late 40's, and assisted S. D. Burman and Shyam Sunder for a brief spell, for films being made by filmistan studios. Madan's first big independant break was Aankhen in 1950. After his film 'Aankhen' Madan and Lata became a great team together and Lata sang for almost all his films. Lata Mangeshkar was the last word for him. The sweetness Madan achieved here in Lata Mangeshkar’s voice is something rare in his repertory. It was never enough that there was enough of only Lata in a Madan tune. Lata used to call Madan ‘Ghazal Ka Shehzadaa’. ‘Woh chup rahen to mere dil ke daag jalte hain’ from the film Jahan Ara and ‘Maine rang li aaj chunariya’ from Dulhan Ek Raat Ki are some others of his compositions. He scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha.

Madan Mohan made excellent use of voices of Talat Mahmood and Mohd. Rafi as well. His favourite lyricists were Raja Mehndi Ali Khan, Rajendra Krishan, and Kaifi Azmi. Majrooh Sultanpuri and Sahir Ludhianvi also wrote for him for a few films. Madan’s light compositions have the same individualistic quality as his serious songs. What's more none of his contemporaries had the knack of picking the right instruments for the right song.

Madan Mohan was totally different from the Punjab school of composers dominating Hindi film Music in the late l94O and early 195O's. Even O.P. Naiyyar, for all his sheen of modernity displayed traces of his Punjabi roots but not once could you scent the 'dehati’ Punjabi at work in a Madan Mohan composition. The Punjab school produced some of the finest music in our films. But always you got the impression that it was music literally rooted in the Punjab soil. Here is where Madan Mohan was diametrically different. He was the artistic aristocrat at work. The son of Rai Bahadur Chuni Laal, the Filmistan chief, at work. Madan Mohan's best music belonged to the drawing room that is why Madan had problems consistently equating with the masses. He was essentially a composer for the classes.

Every composer had a favorite raga, Madan had none. Look at the flair and imagination with which he scored for a theme in mime like Chetan Anand's Heer Ranjha. Sachin Dev Burman paid Madan Mohan the ultimate tribute; ‘ I could not have scored Heer Ranjha with half the felicity Madan Mohan did.’ Madan Mohan was still a struggling composer when he created his masterly tunes. And it is when you are struggling that you really create. Later, at least in the l970's, one felt Madan became rather stylized. In other words, he was, composing to live up to his reputation as the ‘Ghazal King’, which cramped his style in the matter of being a freewheeler composer, - a must for films.

He died on July 14th, in the year 1975. He did not live to see the success of two of his very big hits 'Mausam' and 'Laila Majnu'. Most Popular films of Madan Mohan are 'Ashiyana, Madhosh, Baghi, Bhai Bhai, Mastane, Gateway Of India, Dekh Kabeera Roya, Adalat, Chacha Zindabad, Manmauji, Sanjog, Woh Kaun Thi, Jahan Ara, Ghazal, Sharabi, Mera Saaya, Neela Akash, Ek Kali Muskayi, Chirag, Dastak, Heer Ranjha, Haste Zakhma, Mausam, etc.

Friday, July 11, 2008

आज के हिंद के युवा का, नया मन्त्र है - " बढ़े चलो ", WORLD WIDE OPENING OF THE SONG # 02 "BADHE CHALO"



जुलाई माह का दूसरा शुक्रवार, और हम लेकर हाज़िर हैं सत्र का दूसरा गीत. पिछले सप्ताह आपने सुना, युग्म के साथ सबसे नए जुड़े संगीतकार निखिल वर्गीस का गीत "संगीत दिलों का उत्सव है", और आज उसके ठीक विपरीत, हम लाये हैं युग्म के सबसे वरिष्ठ संगीतकार ऋषि एस का स्वरबद्ध किया, नया गीत, अब तक ऋषि, युग्म को अपने तीन बेहद खूबसूरत गीतों से नवाज़ चुके हैं, पर उनका यह गीत उन सब गीतों से कई मायनों में अलग है, मूड, रंग और वाद्य-संयोजन के आलावा इसमें, उन्हें पहले से कहीं अधिक लोगों की टीम के साथ काम करना पड़ा, तीन गीतकारों, और दो गायकों के साथ समन्वय बिठाने के साथ साथ उन्होंने इस गीत में बतौर गायक अपनी आवाज़ भी दी है, शायद तभी इस गीत को मुक्कमल होने में लगभग ६ महीने का समय लगा है.
गीत का मूल उद्देश्य, हिंद युग्म की विस्तृत सोच को आज के युवा वर्ग से जोड़ कर उन्हें एक नया मन्त्र देने का है - "बढ़े चलो" के रूप में. गीत के दोनों अंतरे युग्म के स्थायी कवि अलोक शंकर द्वारा लिखी एक कविता, जिसे युग्म का काव्यात्मक परिचय भी माना जाता है , से लिए गए हैं. ”बढ़े चलो” का नारा कवि अवनीश गौतम ने दिया है, और मुखड़े का स्वरुप गीतकार सजीव सारथी ने रचा है, दो नए गायकों को हिंद युग्म इस गीत के माध्यम से एक मंच दे रहा है,दोनों में ही गजब की संभावनाएं नज़र आती हैं, जयेश शिम्पी (पुणे),युग्म पर छपे "गायक बनिए" इश्तेहार के माध्यम से चुन कर आए तो मानसी पिम्पले,को युग्म से जोड़ने का श्रेय जाता है कवियित्री सुनीता यादव को. हिंद युग्म उम्मीद करता है कि पूरी तरह से इंटरनेटिया प्रयास से तैयार, इस प्रेरणात्मक गीत में आपको, आज के हिंद का युवा नज़र आएगा....

Rishi S is not a new name for Hind Yugm listeners, already 3 compositions old this highly talented upcoming composer, here bringing for you, a new song which is completely different from his earlier compositions in many ways.

(Rishi S along with Mansi and Jayesh, the singers)
Almost 6 people are involved in this song and the jamming was completely through the internet, none of them ever meet each other, in person. This song, is actually meant for the sharp thinking, youth of new India, who don’t want to wait for others to make an initiative, they believe in themselves and proudly accept their own bhasha and culture, India is the youngest country in the world (having maximum youth population ) and the new mantra of success for this youthful India is "badhe chalo”. Penned by Alok Shankar, Sajeev Sarathie and Avanish Gautam, and sung by all debutant singers in Jayesh Shimpi, Manasi Pimpley, and Rishi S, this song will surely make you think twice before passing a judgment on today’s young generation. So guys, CHARGED UP, AND CHEER FOR THIS NEW INDIA.

CLICK ON THE PLAYER TO HEAR THE SONG " BADHE CHALO "

गीत के बोल -

मैं आज के हिंद का युवा हूँ,
मुझे आज के हिंद पे नाज़ है,
हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन,
हिन्दी मेरी आवाज़ है..

बदल रहा है हिंद, बदल रहे हैं हम,
बदल रहे हैं हम, बदल रहा है हिंद,
बढे चलो .... बढे चलो.... -2
हम आज फ़लक पर बिछी हुई
काई पिघलाने आए हैं
भारत की बरसों से सोई
आवाज़ जगाने आये हैं


तुम देख तिमिर मत घबराओ
हम दीप जलाने वाले हैं
बस साथ हमारे हो लो, हम
सूरज पिघलाने वाले हैं

मैं युग्म, तुम्हारी भाषा का,
हिन्दी की धूमिल आशा का ;
मैं युग्म , एकता की संभव
हर ताकत की परिभाषा का

मैं युग्म, आदमी की सुन्दर
भावना जगाने आया हूँ
मैं युग्म, हिन्द का मस्तक
कुछ और सजाने आया हूँ ।

हममें है हिम्मत बढ़ने की
तूफ़ान चीरकर चलने की
चट्टानों से टकराने की
गिरने पर फ़िर उठ जाने की

बदल रहा है हिंद, बदल रहे हैं हम,
बदल रहे हैं हम, बदल रहा है हिंद,
बढे चलो .... बढे चलो.... -2



( Team of the Lyricists )

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)

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SONG #02 , SEASON 2008, " BADHE CHALO " MUSIC @ HINDYUGM, Where Music Is a Passion

Thursday, July 10, 2008

यादों के बदल छाए, उमड़ घुमड़ घिर आए....



दोस्तो,
हमें यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है, की हिंद युग्म के संगीत-सफर के सबसे पहले गायक सुबोध साठे (नागपुर) ने अपनी वेब साईट http://www.subodhsathe.com/ पर अपनी पहली मराठी एल्बम " मेघा दातले " का भव्य विमोचन किया है, जहाँ से आप इनके गीतों को डाउनलोड कर सकते हैं, साथ ही उन्होंने इसी एल्बम के एक गीत "ती जताना" का एक विडियो भी बनाया है जिसे आप यहाँ भी देख सकते हैं -



हमने की इसी बाबत सुबोध से बातचीत की, पेश है कुछ अंश -



Hind Yugm - Hi Subodh, finally a full marathi album, tell us what this "megha datle" is all about, the theme behind the album ?

'पहला सुर' में सुबोध के गीत
सुबह की ताज़गी
वो नर्म सी
झलक
Subodh - Yeah, finally! After starting all my compositions in Hindi, I thought I should do something in Marathi as well and started searching for meaningful poems. I found very tallented people through orkut who penned these songs for me (some of them on demand and some were already written) Lyricists are..Tushar Joshi, Renuka Khatavkar, Arun Nandan, Prasanna Shembekar, Kshipra and Shilpa Deshpande.

"Megh Datle, Aathvaninche..." in hindi, it means "Ghir aaye Badra....yadon ke"............ i think :)


All songs are composed and sung by me and music is arranged by my friend from Pune, Chaitanya Aadkar (who plays Keyboard with Sunidhi Chavan's group)

Hind Yugm - You made a video also, why you choose this perticular song for the video ?

Subodh - I think, this song relates to anyone or atleast it relates to me unknowingly, + lyrics and composition both are very close to my heart. This song is special!

Hind Yugm - How was the response ? What can we expect next, an Hindi album ?

Subodh - Response has been very very good, Thanks to all!! Haven't think about Hindi album (my 1st 3 albums are in Hindi only). But if I find meaningful lyrics will definitely do one Hindi album as well. I am going to launch my 2nd Marathi album in 2009.

Thank you Subodh, all the very best....Hind Yugm is eagly waiting to hear your first self composed song for Awaaz ( for the new season ) " khushmizaaz mitti ".

सुबोध को तलाश है अर्थपूर्ण गीतों की, जो भी गीतकार सुबोध के साथ जुड़ कर अपने गीत रचना चाहें संपर्क करें "subodh sathe" , पर.

हमने इस गीत ( ती जताना ), के गीतकार तुषार जोशी जी, जो कि हिंद युग्म के वरिष्ट कवियों में से एक हैं, उनसे भी पूछे कुछ सवाल, पेश है कुछ अंश -

हिंद युग्म - तुषार जी, सुबोध के साथ आपकी पहली मराठी एल्बम " मेघा दाटले " आ चुकी है, कैसा रहा ये अनुभव आपके लिए ?

तुषार जोशी - बड़ा ही सुखद अनुभव रहा। सुबोध ने गीत बडा़ ही दिल लगाकर गाया है। यूँ गीत में जान आ गई है। इसके पहले भी सुबोध ने मेरे कई हिन्दी और मराठी कविताओं को धुन देकर गाया है मगर इस गीत की बात ही कुछ और है क्योंकि ये गीत और गीतों के साथ अल्बम के रूप में प्रकाशित किया गया है।

हिद युग्म - आपका पहला हिन्दी गीत " भूल गए हो " हिंद युग्म पर आया था सुबोध का बनाया और गाया हुआ, जिसे बहुत अधिक सराहा गया था, आज की इस सफलता पर आप क्या श्रेय देना चाहेंगे हिंद युग्म को ?

तुषार जोशी - हिंद युग्म हमेशा से लोगों को जोडने का माध्यम रहा है। मुझे खुशी है कि हिन्दयुग्म के माध्यम से मेरी कविता और सुबोध ने गाया हुआ गीत लाखों लोगों तक पहुँचा। यूँ हिन्दयुग्म हमारे लिये सारी दुनिया के साथ जोडने वाला दरवाज़ा बन गया है।

हिंद युग्म - तुषार जी, अगला कदम क्या होगा, क्या हम उम्मीद करें की जल्द ही आपकी और सुबोध की जोड़ी एक हिन्दी एल्बम देगी, हिंद युग्म , आवाज़ के श्रोताओं के लिए ?

तुषार जोशी - ये खयाल मुझे पसंद आया। मै कहूँगा जरूर, क्यों नहीं?

हिंद युग्म आवाज़ की पूरी टीम की तरफ़ से सुबोध और तुषार जी को बधाइयाँ और शुभकामनाएं आने वाली समस्त योजनाओं के लिए.

Wednesday, July 9, 2008

कहाँ गए संगीत के सुर! मर गई क्या मेलोडी ? जवाब देंगे मनीष कुमार



Most of the time people Criticized today's music saying that it has nothing worth listening comparing to the music that created by the old masters in their time, while the composer of this generation claimed that they make music for the youth and deliver what they like, but seriously do we need any comparsion like that ? music can ever lost its sweetness or its melody ? Well, who better than our music expert Manish Kumar can answer this question, so guys over to manish and read what he wants to comment on this issue


समय समय पर जब भी आज के संगीत परिदृश्य की बात उठती है, इस तरह के प्रश्न उठते हैं और उठते रहेंगे। पर मेरा इस बात पर अटूट विश्वास है कि भारत जैसे देश में संगीत की लय ना कभी मरी थी ना कभी मरेगी। समय के साथ साथ हमारे फिल्म संगीत में बदलाव जरूर आया है। ५० के दशक के बाद से इसमें कई अच्छे-बुरे उतार-चढ़ाव आये हैं । अक्सर लोग ये कहते हैं कि आज के संगीत में कुछ भी सुनने लायक नहीं है। आज का संगीतकारों में मेलोडी की समझ ही नहीं है। पर मुझे इस तरह के वक्तव्य न्यायोचित नहीं लगते। इससे पहले कि मैं आज के संगीतकारों के बारे में कुछ कहूँ, भारतीय फिल्म संगीत के अतीत पर एक नज़र डालना लाज़िमी होगा ।

इसमें कोई शक नहीं पुरानी फिल्मों के गीत इतने सालों के बाद भी दिल पर वही तासीर छोड़ते हैं ।
एस. डी. बर्मन, सलिल चौधरी, मदनमोहन, हेमंत, नौशाद, शंकर जयकिशन, जैसे कमाल के संगीतकारों,
तलत महमूद,सहगल, सुरैया, गीता दत्त, लता, रफी, मन्ना डे, मुकेश, आशा, किशोर जैसे सुरीले गायकों
और राज कपूर, विमल राय, महबूब खान और गुरूदत जैसे संगीत पारखी निर्माता निर्देशकों ने ५० से ७० के दशक में जो फिल्म संगीत दिया वो अपने आप में अतुलनीय है। इसीलिये इस काल को हिन्दी फिल्म संगीत का स्वर्णिम काल कहा जाता है । ये वो जमाना था जब गीत पहले लिखे जाते थे और उन पर धुनें बाद में बनाई जाती थीं ।

वक्त बदला और ७० के दशक में पंचम दा ने भारतीय संगीत के साथ रॉक संगीत का सफल समावेश पहली बार 'हरे राम हरे कृष्ण' में किया । वहीं ८० के दशक में बप्पी लाहिड़ी ने डिस्को के संगीत को अपनी धुनों का केन्द्र बिन्दु रखा । मेरी समझ से ८० का उत्तरार्ध फिल्म संगीत का पराभव काल था । बिनाका गीत माला में मवाली, हिम्मतवाला सरीखी फिल्मों के गीत भी शुरू की पायदानों पर अपनी जगह बना रहे थे । और शायद यही वजह या एक कारण रहा कि उस समय के हालातों से संगीत प्रेमी विक्षुब्ध जनता का एक बड़ा वर्ग गजल और भजन गायकी की ओर उन्मुख हुआ। जगजीत सिंह, पंकज उधास, अनूप जलोटा, तलत अजीज, पीनाज मसानी जैसे कलाकार इसी काल में उभरे।

९० का उत्तरार्ध हिन्दी फिल्म संगीत के पुनर्जागरण का समय था । पंचम दा तो नहीं रहे पर जाते-जाते १९४२ ए लव स्टोरी (१९९३) का अमूल्य तोहफा अवश्य दे गए । कविता कृष्णामूर्ति के इस काव्यात्मक गीत का रस आपने ना लिया हो तो जरूर लीजिएगा

क्यूँ नये लग रहे हैं ये धरती गगन
मैंने पूछा तो बोली ये पगली पवन
प्यार हुआ चुपके से.. ये क्या हुआ चुपके से

मैंने बादल से कभी, ये कहानी थी सुनी
पर्वतों से इक नदी, मिलने सागर से चली
झूमती, घूमती, नाचती, दौड़ती
खो गयी अपने सागर में जा के नदी
देखने प्यार की ऐसी जादूगरी
चाँद खिला चुपके से..प्यार हुआ चुपके से..


पुरानी फिल्मों से आज के संगीत में फर्क ये है कि रिदम यानि तर्ज पर जोर ज्यादा है। तरह-तरह के वाद्य यंत्रों का प्रयोग होने लगा है। धुनें पहले बनती हैं, गीत बाद में लिखे जाते हैं। नतीजन बोल पीछे हो जाते हैं और सिर्फ बीट्स पर ही गीत चल निकलते हैं।
ऐसे गीत ज्यादा दिन जेहन में नहीं रह पाते। पर ये ढर्रा सब पर लागू नहीं होता ।

१९९५-२००६ तक के हिन्दी फिल्म संगीत के सफर पर चलें तो ऐसे कितने ही संगीतकार हैं जिन पर आपका कथन आज का संगीतकार 'मेलॉडियस' संरचना .................बिलकुल सही नहीं बैठता । कुछ बानगी पेश कर रहा हूँ ताकि ये स्पष्ट हो सके कि मैं ऐसा क्यूँ कह रहा हूँ।

साल था १९९६ और संगीतकार थे यही ओंकारा वाले विशाल भारद्वाज और फिल्म थी माचिस ! आतंकवाद की पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म का संगीत कमाल का था ! भला

छोड़ आये हम वो गलियाँ.....
चप्पा चप्पा चरखा चले.. और
तुम गये सब गया, मैं अपनी ही मिट्टी तले दब गया


जैसे गीतों और उनकी धुनों को कौन भूल सकता है ?

इसी साल यानी १९९६ में प्रदर्शित फिल्म इस रात की सुबह नहीं में उभरे एक और उत्कृष्ट संगीतकार एम. एम. करीम साहब ! एस. पी. बालासुब्रमण्यम के गाये इस गीत और वस्तुतः पूरी फिल्म में दिया गया उनका संगीत काबिले तारीफ है

मेरे तेरे नाम नये है
ये दर्द पुराना है,
जीवन क्या है
तेज हवा में दीप जलाना है

दुख की नगरी, कौन सी नगरी
आँसू की क्या जात
सारे तारे दूर के तारे, सबके छोटे हाथ
अपने-अपने गम का सबको साथ निभाना है..
मेरे तेरे नाम नये है.....


१९९९ में आई हम दिल दे चुके सनम और साथ ही हिन्दी फिल्म जगत के क्षितिज पर उभरे इस्माइल दरबार साहब ! शायद ही कोई संगीत प्रेमी हो जो उनकी धुन पर बने इस गीत का प्रशंसक ना हो

तड़प- तड़प के इस दिल से आह निकलती रही....
ऍसा क्या गुनाह किया कि लुट गये,
हां लुट गये हम तेरी मोहब्बत में...



पर हिन्दी फिल्म संगीत को विश्व संगीत से जोड़ने में अगर किसी एक संगीतकार का नाम लिया जाए तो वो ए. आर रहमान का होगा । रहमान एक ऐसे गुणी संगीतकार हैं जिन्हें पश्चिमी संगीत की सारी विधाओं की उतनी ही पकड़ है जितनी हिन्दुस्तानी संगीत की । जहाँ अपनी शुरूआत की फिल्मों में वो फ्यूजन म्यूजिक (रोजा, रंगीला,दौड़ ) पेश करते दिखे तो , जुबैदा और लगान में विशुद्ध भारतीय संगीत से सारे देश को अपने साथ झुमाया। खैर शांत कलेवर लिये हुये मीनाक्षी - ए टेल आफ थ्री सिटीज (२००४) का ये गीत सुनें

कोई सच्चे ख्वाब दिखाकर, आँखों में समा जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
जब सूरज थकने लगता है
और धूप सिमटने लगती है
कोई अनजानी सी चीज मेरी सांसों से लिपटने लगती है
में दिल के करीब आ जाती हूँ , दिल मेरे करीब आ जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है



२००४ में एक एड्स पर एक फिल्म बनी थी "फिर मिलेंगे" प्रसून जोशी के लिखे गीत और शंकर-एहसान-लॉय का संगीत किसी भी मायने में फिल्म संगीत के स्वर्णिम काल में रचित गीतों से कम नहीं हैं। इन पंक्तियों पर गौर करें

खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे
बूंदों को धरती पर साज एक बजाने दे
हवायें कह रहीं हैं, आ जा झूमें जरा
गगन के गाल को चल जा के छू लें जरा

झील एक आदत है, तुझमें ही तो रहती है
और नदी शरारत है तेरे संग बहती है
उतार गम के मोजे जमीं को गुनगुनाने दे
कंकरों को तलवों में गुदगुदी मचाने दे



और फिर २००५ की सुपरिचित फिल्म परिणिता में आयी एक और जुगल जोड़ी संगीतकार शान्तनु मोइत्रा और गीतकार स्वान्द किरकिरे की !
अंधेरी रात में परिणिता का दर्द क्या इन लफ्जो में उभर कर आता है

रतिया अंधियारी रतिया
रात हमारी तो, चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद, आई वो अकेली है
चुप्पी की बिरहा है, झींगुर का बाजे साथ



गीतों की ये फेरहिस्त तो चलती जाएगी। मैंने तो अपनी पसंद के कुछ गीतों को चुना ये दिखाने के लिये कि ना मेलोडी मरी है ना कुछ हट कर संगीत देने वाले संगीतकार।

हमारे इतने प्रतिभावान संगीतकारों और गीतकारों के रहते हुये आज के संगीत से ये नाउम्मीदी उनके साथ न्याय नहीं है । मैं मानता हूँ कि हिमेश रेशमिया जैसे जीव अपनी गायकी से आपका सिर दर्द करा देते होंगे पर वहीं सोनू निगम और श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज भी आपके पास हैं। अगर एक ओर अलताफ रजा हैं तो दूसरी ओर जगजीत सिंह भी हैं । अगर रीमिक्स संगीत पुराने गीतों को रसातल में ले जाता दिखता है तो वहीं कैलाश खेर ने सूफी संगीत के माध्यम से संगीत की नई ऊँचाईयों को छुआ है। आपको MTV का पॉप कल्चर ही आज के युवाओं का कल्चर लगता है तो एक नजर Zee के शो सा-रे-गा-मा पर नजर दौड़ाइये जहाँ युवा प्रतिभाएँ हिन्दी फिल्म संगीत को ऊपर ले जाने को कटिबद्ध दिखती हैं ।

हाँ, ये जरूर है कि आज के इस बाजार शासित संगीत उद्योग में ऍसे गीतों की बहुतायत है जो लफ़्जों से ज्यादा अपनी रिदम की वज़ह से चर्चित होते हैं। आखिर ऐसा क्यूँ है कि एक अच्छे गीत को सुनने के लिए हमें दस बेकार गीतों का शोर सुनना पड़ता है ?

इस समस्या की तह तक जाएँ तो ये पाएँगे कि आज की इस शिक्षा प्रणाली में साहित्य चाहे वो हिंदी हो या उर्दू, पर कोई जोर नहीं है। अच्छे नंबर लाने के लिए दसवीं में लोग हिंदी छोड़ संस्कृत ले लेते हैं। जब ये युवा अपने कैरियर की दिशा चुनने के लिए चिकित्सा, अभियांत्रिकी और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में जाते हैं तो ये कटाव और गहरा हो जाता है। जब तक हम आरंभ से ही नई पीढ़ी में हिन्दी और उर्दू साहित्य रुझान नहीं पैदा करेंगे तब तक काव्यात्मक गीत संगीत को प्रश्रय देने वाला एक वर्ग तैयार नहीं होगा और ना ही गुलज़ार, जावेद अख्तर, प्रसून जोशी और स्वानंद किरकिरे जैसे गीतकार संगीत जगत पर समय समय पर उभरते रहेंगे ।

पर यह बात भी गौर करने की है कि जैसी विविधता संगीत के क्षेत्र में आज उपलब्ध है वैसी पहले कभी नहीं थी। मैं मानता हूँ कि ८० के दशक की गिरावट के बाद पिछले १५ सालों में एक नया संगीत युवा प्रतिभावान संगीतकारों की मदद से उभरा है । आज संगीत की सीमा देश तक सीमित नहीं, और जो नये प्रयोग हमारे संगीतकार कर रहे हैं उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के हमें खुले दिल से सुनना चाहिए। ये नहीं कि ये उस स्वर्णिम काल की पुनरावृति कर देंगे पर इनमें कुछ नया करने और देने की ललक और प्रतिभा दोनों है जिसे निरंतर बढ़ावा देने की जरूरत है।
जब तक संगीत को चाहने वाले रहेंगे, सुर और ताल कभी नहीं मरेंगे । जरूरत है तो अच्छे गीतकारों की एक पौध तैयार करने की और एक अच्छे श्रोता के नाते संगीत के सही चुनाव की।

(मूल रूप में ये आलेख मेरे चिट्ठे एक शाम मेरे नाम पर अगस्त २००६ में छपा था । हिन्द-युग्म,आवाज़ के लिए थोड़ी फेर बदल के बाद यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ।)

- मनीष कुमार
आवाज़ के संगीत समीक्षक

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