Sunday, November 30, 2008

अनकथ तेरी शहादत को, किस पैमाने पर तोल, लिखूँ ?



दो बोल लिखूँ!
शब्दकोष खाली मेरे, क्या कुछ मैं अनमोल लिखूँ!

आक्रोश उतारुँ पन्नों पर,
या रोष उतारूँ पन्नों पर,
उनकी मदहोशी को परखूँ,
तेरा जोश उतारूँ पन्नों पर?

इस कर्मठता को अक्षर दूँ,
निस्सीम पर सीमा जड़ दूँ?
तू जिंदादिल जिंदा हममें,
तुझको क्या तुझसे बढकर दूँ?
अनकथ तेरी शहादत को, किस पैमाने पर तोल, लिखूँ?


मैं मुंबई का दर्द लिखूँ,
सौ-सौ आँखें सर्द लिखूँ,
दहशत की चहारदिवारी में
बदन सुकूँ का ज़र्द लिखूँ?

मैं आतंक की मिसाल लिखूँ,
आशा की मंद मशाल लिखूँ,
सत्ता-विपक्ष-मध्य उलझे,
इस देश के नौनिहाल लिखूँ?
या "राज"नेताओं के आँसू का, कच्चा-चिट्ठा खोल,लिखूँ?

फिर "मुंबई मेरी जान" कहूँ,
सब भूल, वही गुणगान कहूँ,
डालूँ कायरता के चिथड़े,
निज संयम को महान कहूँ?

सच लिखूँ तो यही बात लिखूँ,
संघर्ष भरे हालात लिखूँ,
हर आमजन में जोश दिखे,
जियालों-से जज़्बात लिखूँ।
शत-कोटि हाथ मिले जो, तो कदमों में भूगोल लिखूँ!
हैं शब्दकोष खाली मेरे, क्या कुछ मैं अनमोल लिखूँ?


हिंद युग्म के कवि विश्व दीपक "तन्हा" की ये कविता बहुत कुछ कह जाती है दोस्तों. आवाज़ के कुछ मित्रों ने इन ताज़ा घटनाओं पर हम तक अपने विचार पहुंचाएं. दिल्ली के आनंद का कहना है -

मित्रो,मुंबई की घटना ने हमे ये सोचने पर मजबूर कर दिया है की कब तक ..........
कब तक हमे ऐसे माहौल में जहाँ चारो तरफ एक डर और अविश्वास का वातावरण है इसमें रहना पड़ेगा ,
कब तक इन लफ्फाज नेताओं की लफ्फाजी और आश्वाशनो की घुट्टी पीनी पड़ेगी
आखिर कब तक .............
दोस्तों आज हम युवाओं को आगे आकर जिम्मेदारी उठानी होगी ,चुप्पी तोड़नी होगी
याद करो दोस्तों भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत. क्या ऐसे ही भारत का सपना उनकी आँखों में था, नहीं दोस्तों, उस वक़्त वो आगे आये आज तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी है तुम आगे आओ, चुप्पी तोड़ो ...............
हमे नाज है अपने उन जांबाज सुरक्षाकर्मीओं पर जिन्होंने देश की अस्मिता पर आये इस भयानक संकट को मिटाने के लिए अपने आप को मिटा दिया हम सलाम करते है उनकी बहादुरी को ..........
और धिक्कारते है इन लफ्फाज और बेशर्म नेताओं को जिनके राजनीति की वजह से हजारों -लाखों निर्दोष लोग काल के गाल में समां जाते है,
ये हमारे रोल मॉडल कतई नहीं हो सकते हमारे हीरो तो हेमंत करकरे,विजय सालसकर,संदीप उन्नीकृष्णन जैसे जांबाज है जो वक़्त आने पर देश पर अपनी जान भी देना जानते है.


ग्वालियर पुलिस में कार्यरत हमारे साथी अरविन्द शर्मा इस मंच के माध्यम से आप सब से एक अनुरोध कर रहे हैं -

प्रिये साथियो,
देश मे फिर आंतकवाद ने कितने घरों के चिराग बुझा दिए. यह आप हम नहीं जानते ऐसा कर उन को क्या मिला पर दोस्तों, साथियो उन माँओं से पूछो जो अपने बच्चो को खोने का दर्द सहती है या उन बहनों से पूछो जो सारी उम्र टक टकी लगाए इंतजार करती रहती है ...माँ, बहनें, जीवन संगनी, बच्चे, कितने रिश्ते खत्म हो जाते है एक पल में. कितना अकेला पन होता इन रिश्तों के बिखर जाने के बाद ...कोई उनको समझाए ...कि उनके भी रिश्ते ऐसा ही उनके जाने के बाद दर्द पैदा करते है वो भी रिश्तो की डोर से बंधे होंगे. हम शर्मिंदा है आज ...उन रिश्तो के आगे जो इस पीडा के शिकार बने ..उन देश भक्तों को नमन जो शहीद हुवे ..आज हम सब भाई, दोस्त,साथी, उन सब के लिए भगवान् से प्रार्थना करें कि उनको अपने चरणों मे स्थान दें शान्ति दें व उनके परिवार, रिश्तो को हिम्मत दे !
हम सब का फ़र्ज़ बनता है की हम उनके आत्मा के लिए एक दिया जला उनको समर्पित करे व् दुआ करे. यह मेरी आप सब दोस्तों साथियो से हाथ जोड़ प्रार्थना है ..एक दिया - एक प्रार्थना ...


वीर सिपाहियों के साथ साथ मीडिया की भी तारीफ करनी पड़ेगी विशेषकर NDTV की, जिसने इस पूरी घटना को बेहद संवेदनात्मक रूप से आम जनता तक पहुंचाया. शहीदों को श्रद्धा सुमन प्रस्तुत करते समय उन्होंने जिस गीत का पार्श्व में उपयोग किया वो फ़िल्म "आमिर" का है. अमिताभ वर्मा के लिखे इस गीत की धुन बनाई है अमित त्रिवेदी ने और गाया है शिल्पा राव ने. दोस्तों, इस गीत को आज आवाज़ पर पूरा सुनें और याद करें एक बार फ़िर देश पर शहीद हुए उन अमर सपूतों की शौर्य गाथा.



आप भी अपने विचार टिप्पणियों के माध्यम से या मेल द्वारा हम तक पहुँचायें. इस मुश्किल समय में एक मजबूत देश की एकजुटता आज दुनिया देखे.



पॉडकास्ट कवि सम्मेलन - नवम्बर २००८




Doctor Mridul Kirti - image courtesy: www.mridulkirti.com
डॉक्टर मृदुल कीर्ति
कविता प्रेमी श्रोताओं के लिए प्रत्येक मास के अन्तिम रविवार का अर्थ है पॉडकास्ट कवि सम्मेलन। लीजिये आपके सेवा में प्रस्तुत है नवम्बर २००८ का पॉडकास्ट कवि सम्मलेन। अगस्त, सितम्बर और अक्टूबर २००८ की तरह ही इस बार भी इस ऑनलाइन आयोजन का संयोजन किया है हैरिसबर्ग, अमेरिका से डॉक्टर मृदुल कीर्ति ने। आवाज़ की ओर से हर महीने प्रस्तुत किए जा रहे इस प्रयास में गहरी दिलचस्पी और सहयोग के लिए धन्यवाद! आप सभी के प्रेम के लिए हम आपके आभारी हैं। इस बार भी हमें अत्यधिक संख्या में कवितायें प्राप्त हुईं और हमें आशा है कि आप अपना सहयोग इसी प्रकार बनाए रखेंगे। हम बहुत सी कविताओं को उनकी उत्कृष्टता के बावजूद इस माह के कार्यक्रम में शामिल नहीं कर सके हैं और इसके लिए क्षमाप्रार्थी है। कुछ कवितायें समयाभाव के कारण इस कार्यक्रम में स्थान न पा सकीं एवं कुछ रिकॉर्डिंग ठीक न होने की वजह से। कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे १२८ kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो। ऑडियो फाइल के साथ अपना पूरा नाम, नगर और संक्षिप्त परिचय भी भेजना न भूलें ।

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन भौगौलिक दूरियाँ कम करने का माध्यम है और इसमें विभिन्न देश, आयु-वर्ग, एवं पृष्ठभूमि के कवियों ने भाग लिया है। इस बार के पॉडकास्ट कवि सम्मेलन की शोभा को बढाया है शेफाली, बोकारो से पारुल, फ़रीदाबाद से श्रीमती शोभा महेन्द्रू, सिनसिनाटी (यू एस) से श्रीमती लावण्या शाह, लन्दन (यू के) से श्रीमती शन्नो अग्रवाल, हैदराबाद से डॉक्टर रमा द्विवेदी, वाराणसी से डॉक्टर शीला सिंह, उदयपुर से डॉक्टर श्रीमती अजित गुप्ता, गाजियाबाद से कमलप्रीत सिंह, कोलकाता से अमिताभ " मीत", तथा पिट्सबर्ग (यू एस) से अनुराग शर्मा ने। ज्ञातव्य है कि इस कार्यक्रम का संचालन किया है हैरिसबर्ग (अमेरिका) से डॉक्टर मृदुल कीर्ति ने।

पिछली बार के सम्मेलन से हमने एक नया खंड शुरू किया है जिसमें हम हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कवियों का संक्षिप्त परिचय और उनकी एक रचना को आप तक लाने का प्रयास करते हैं। इसी प्रयास के अंतर्गत इस बार हम सुना रहे हैं अमर-गीत "वंदे मातरम" और उसके रचयिता जाने-माने कथाकार, उपन्यासकार, चित्रकार, चिन्तक, कवि एवं गीतकार बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का परिचय। "वंदे मातरम्" का सस्वर उद्घोष हमारे कवियों एवं आवाज़ की और से मुम्बई के ताज़ा आतंकी हमले में अपना जीवन देश पर न्योछावर करने वाले वीरों के प्रति एक श्रद्धांजलि भी है।

पिछले सम्मेलनों की सफलता के बाद हमने आपकी बढ़ी हुई अपेक्षाओं को ध्यान में रखा है। हमें आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि इस बार का सम्मलेन आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा और आपका सहयोग हमें इसी जोरशोर से मिलता रहेगा। यदि आप हमारे आने वाले पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में भाग लेना चाहते हैं तो अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे १२८ kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के दिसम्बर अंक का प्रसारण २८ दिसम्बर २००८ को किया जायेगा और इसमें भाग लेने के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की अन्तिम तिथि है २१ दिसम्बर २००८

नीचे के प्लेयर से सुनें:


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


हम सभी कवियों से यह अनुरोध करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हिन्द-युग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी ने इसी बावत एक पोस्ट लिखी है, उसकी मदद से आप रिकॉर्डिंग कर सकेंगे।

अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 5. Month: November 2008.


Saturday, November 29, 2008

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'सौत'



उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लघु कहानी 'सौत'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना 'बंद दरवाजा' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं मानव मूल्यों को केन्द्र में रखती हुई प्रेमचंद की कहानी "सौत", जिसको स्वर दिया है लन्दन निवासी कवयित्री श्रीमती शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 19 मिनट और 37 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

रजिया को साड़ी की उतनी चाह न थी जितनी रामू और दसिया के आनन्द में
विघ्न डालने की। बोली, "रूपये नहीं थे, तो कल अपनी चहेती के लिए चुंदरी
क्यों लाये? चुंदरी के बदले उसी दाम में दो साड़ियां लाते, तो एक मेरे
काम न आ जाती?" (प्रेमचंद की "सौत" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.



#Fifteenth Story, Saut: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2008/14. Voice: Shanno Agrawal

Friday, November 28, 2008

मेरी आगोश में आज है...कहकशां....



मैं देखता हूँ तुम्हारे हाथ
चटख नीली नसों से भरे
और
उंगलियों में भरी हुई उड़ान
मैं सोचता हूँ
तुम्हारी अनवरत देह की सफ़ेद धूप
और उसकी गर्म आंचश
मैं जीत्ताता हूँ तुमको
तुम्हारे व्याकरण और
नारीत्व की शर्तो के साथ
मैं हारता हूँ
एक पूरी उम्र
तुम्हारे एवज में!

हिंद युग्म के इस माह के यूनिकवि डॉ मनीष मिश्रा की इन पक्तियों में छुपे कुछ भाव लिए है हमारे दूसरे सत्र का ये २२ वां गीत जहाँ "जीत के गीत" की तिकडी ऋषि एस, बिस्वजीत नंदा और सजीव सारथी लौटे हैं लेकर एक नया गीत "तू रूबरू" लेकर. सुनिए ये ताज़ा तरीन गीत और अपने विचार देकर हमारा मार्गदर्शन/ प्रोत्साहन करें.




The composer singer and lyricist trio Rishi S, Biswajith Nanda, and Sajeev Sarathie of super successful "jeet ke geet" fame is back again with their new creation called "tu ru-ba-ru". This time the mood is much more romantic with a bit sufiayana feel in it. so enjoy this brand new offering from the awaaz team, and leave your valuable comments.




Lyrics- गीत के बोल

तू रूबरू....
चार सू....सिर्फ़ तू....
रूबरू....

तू है मेरे रूबरू, मुझे हासिल है दोनों जहाँ,
मेरी आगोश में आज है...कहकशां....
तू रूबरू....
चार सू....सिर्फ़ तू....
रूबरू....

सजदों इबादत में,
इश्कों मोहब्बत में,
देखूं तुझे ही मैं...मेहरबां.....
तू रूबरू....
चार सू....सिर्फ़ तू....
रूबरू....

सुरमई उदासियों के सायों में,
चम्पई उम्मीदों की आमद तू,
बेरंगों बेज़ार सी मेरी आँखों में,
ख्वाबों की हसीन जन्नत तू...
तू रूबरू....
चार सू....सिर्फ़ तू....
रूबरू....

शिकवे तुझसे हैं, तुझसे चाहतें,
दर्द भी तुझ से है, तुझसे राहतें...
तू ही हर खुशी, तू ही जिंदगी,
तू ही धडकनों की है बंदगी
तू रूबरू....
चार सू....सिर्फ़ तू....
रूबरू....
तू है मेरे रूबरू, मुझे हासिल है दोनों जहाँ,
मेरी आगोश में आज है...कहकशां....

दूसरे सत्र के २२ वें गीत का विश्व व्यापी उदघाटन आज
SONG # 22, SEASON # 02, "TU RU-BA-RU", OPENED ON AWAAZ ON 28/11/2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.



Thursday, November 27, 2008

नए राग से बांधे अक्सर बिछडे स्वर टूटी सरगम के...



हिन्दी ब्लॉग जगत पर पहली बार - पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा

पुस्तक - साया (काव्य संग्रह)
लेखिका - रंजना भाटिया "रंजू"
समीक्षक - दिलीप कवठेकर


युगों पहले जिस दिन क्रौंच पक्षी के वध के बाद वाल्मिकी के मन में करुणा उपजी थी, तो उनके मन की संवेदनायें छंदों के रूप में उनकी जुबान पर आयी, और संभवतः मानवी सभ्यता की पहली कविता नें जन्म लिया.तब से लेकर आज तक यह बात शाश्वत सी है, कि कविता में करुणा का भाव स्थाई है. अगर किसी भी रस में बनी हुई कविता होगी तो भी उसके अंतरंग में कहीं कोई भावुकता का या करुणा का अंश ज़रूर होगा.

रंजना (रंजू) भाटिया की काव्य रचनायें "साया" में कविमन नें भी यही मानस व्यक्त किया है,कहीं ज़ाहिर तो कहीं संकेतों के माध्यम से. इस काव्यसंग्रह "साया" का मूल तत्व है -

ज़िंदगी एक साया ही तो है,
कभी छांव तो कभी धूप ...


मुझे जब इस कविता के पुष्पगुच्छ को समीक्षा हेतु भेजा गया, तो मुझे मेरे एहसासात की सीमा का पता नहीं था. मगर जैसे जैसे मैं पन्ने पलटता गया, अलग अलग रंगों की छटा लिये कविताओं की संवेदनशीलता से रु-ब-रु होने लगा, और एक पुरुष होने की वास्तविकता का और उन भावनाओं की गहराई का परीमापन करने की अपनी योग्यता, सामर्थ्य के कमी का अहसास हुआ.

जाहिर सी बात है. यह सन्मान, ये खुसूसियत मात्र एक नारी के नाज़ुक मन की गहराई को जाता है.मीठी मीठी मंद सी बयार लिये कोमल संवेदनायें, समर्पण युक्त प्रेम, दबी दबी सी टीस भरी खामोशी की अभिव्यक्ति, स्वप्नों की दुनिया की मासूमियत , इन सभी पहलूओं पर मात्र एक नारी हृदय का ही अधिपत्य हो सकता है. प्रस्तुत कविता की शृंखला ' साया 'में इन सभी विशेषताओं का बाहुल्य नज़र आता है.

कविता हो या शायरी हो, कभी उन्मुक्त बहर में तो कभी गेय बन्दिश में, कभी दार्शनिकता के खुले उत्तुंग आसमान में तो कभी पाठ्यपुस्तक की शैली हो, सभी विभिन्न रंगों में चित्रित यह भावचित्र या कलाकृति एक ही पुस्तक में सभी बातें कह जाती है, अलग अलग अंदाज़ में, जुदा जुदा पृष्ठभूमि में. मीरा का समर्पण है,त्याग की भावना है और साथ ही कमाल की हद तक मीर की अदबी रवानी और रिवायत भी.

आगे एक जगह फ़िर चौंक पडा़, कि सिर्फ़ स्त्री मन का ही स्वर नहीं है, मगर पुरुष के दिल के भीतर भी झांक कर, उसके नज़रीये से भी भाव उत्पत्ति की गई है . ये साबित करती है मानव संबंधों की विवेचना पर कवियत्री की पकड जबरदस्त है. साथ ही में विषयवस्तु पर उचित नियंत्रण और परिपक्वता भी दर्शाती है.

रन्जु जी के ब्लोग पर जा कर हम मूल तत्व की पुष्टि भी कर लेतें है, जब एक जगह हम राधा कृष्ण का मधुर चित्र देखते है, और शीर्षक में लिखा हुआ पाते हैं- मेरा पहला प्यार !!!

उनके प्रस्तुत गीत संग्रह के प्रस्तावना "अपनी बात" में वे और मुखर हो ये लिखती हैं कि:

"जीवन खुद ही एक गीत है, गज़ल है, नज़्म है. बस उसको रूह से महसूस करने की ज़रूरत है. उसके हर पहलु को नये ढंग से छू लेने की ज़रूरत है."

सो ये संग्रह उनके सपनों में आते, उमडते भावों की ही तो अभिव्यक्ति है, जीवन के अनुभव, संघर्ष, इच्छाओं और शब्दों की अभिव्यक्ति है.

मेरा भी यह मानना है, कि हर कवि या कवियत्री की कविता उसके दिल का आईना होती है. या यूं कहें कि कविता के शैली से, या बोलों के चयन से अधिक, कविता के भावों से हम कविहृदय के नज़दीक जा सकते है, और तभी हम साक्षात्कार कर पाते हैं सृजन के उस प्रवाह का, या उसमें छिपी हुई तृष्णा के की सांद्रता का. तब जा कर कवि और कविता का पाठक से एकाकार हो रसोत्पत्ति होती है, और इस परकाया प्रवेश जैसे क्रिया से आनंद उत्सर्ग होता है. व्यक्ति से अभिव्यक्ति का ये रूपांतरण या Personification ही कविता है.

अब ज़रा कुछ बानगी के तौर पर टटोलें इस भावनाओं के पिटारे को:

संवेदना-

दिल के रागों नें,
थमी हुई श्वासों ने,
जगा दी है एक संवेदना......
(Sayaa 7)

अजब दस्तूर-

ज़िन्दगी हमने क्या क्या न देखा,
सच को मौत के गले मिलते देखा
(Saayaa )

जाने किस अनजान डगर से
पथिक बन तुम चले आये...

काश मैं होती धरती पर बस उतनी
जिसके ऊपर सिर्फ़ आकाश बन तुम चल पाते....

ऐसा नहीं है कि यह कविता संग्रह संपूर्ण रूप से मुकम्मल है, या इसमें कोई कमी नहीं है.

जैसा कि इस तरह के प्रथम प्रस्तुतिकरण में अमूमन होता चला आया है, कि रंगों की या रसों की इतनी बहुलता हो जाती है, कि कभी कभी वातवरण निर्मिती नही हो पाती है, और पाठक कविता के मूल कथावस्तु से छिटका छिटका सा रहता है.मगर ये क्षम्य इसलिये है, कि इस तरह के संग्रह को किसी जासूसी नॊवेल की तरह आदि से लेकर अंत तक अविराम पढा़ नहीं जा सकता, वरन जुगाली की तरह संत गति से विराम के क्षणों में ही पढा़ जाना चाहिये.

हालांकि इन कविताओं में काफ़िया मिलाने का कोई यत्न नहीं किया गया है, ना ही कोई दावा है, मगर किसी किसी जगह कविता की लय बनते बनते ही बीच में कोई विवादी शब्द विवादी सुर की मानिंद आ जाता है, तो खटकता है, और कविता के गेय स्वरूप की संभावनाओं को भी नकारता है.

संक्षेप में , मैं एक कवि ना होते हुए भी मुझे मानवीय संवेदनाओं के कोमल पहलु से अवगत कराया, रंजु जी के सादे, सीधे, मगर गहरे अर्थ वाले बोलों नें, जो उन्होने चुन चुन कर अपने अलग अलग कविता से हम पाठकों के समक्ष रखे हैं. वे कहीं हमें हमारे खुदी से,स्वत्व से,या ब्रह्म से मिला देते है, तो कभी हमें हमारे जीवन के घटी किसी सच्ची घटना के अनछुए पहलु के दर्शन करा देते है.क्या यही काफ़ी नही होगा साया को पढने का सबसे बडा़ कारण?

पेश कर रहा हूँ अपनी आवाज़ में इस काव्य संग्रह से कुछ रचनाएँ -

"साया" - एक नर्मो नाज़ुक सा एहसास



अंतर्मन



एहसास



एक टुकडा आसमान





Wednesday, November 26, 2008

अमर उजाला पर आवाज़ भी



हिन्द-युग्म के बाल-उद्यान पृष्ठ को अमर-उजाला में आप कई बार पढ़ भी चुके हैं। अब बारी है हिन्द-युग्म के संगीत-पृष्ठ की। २५ नवम्बर के हिन्दी दैनिक अमर उजाला के 'ब्लॉग कोना' स्तम्भ में आवाज़ पर सलिल चौधरी के बारे में २४ नवम्बर २००८ को प्रकाशित आलेख 'सलिल दा के बहाने येसुदास की बात' के कुछ अंश प्रकाशित हुए हैं। आप भी पढ़ें-


षड़ज ने पायो ये वरदान - एक दुर्लभ गीत




येसू दा का जिक्र जारी है, सलिल दा के लिए वो "आनंद महल" के गीत गा रहे थे, उन्हीं दिनों रविन्द्र जैन साहब भी अभिनेता अमोल पालेकर के लिए एक नए स्वर की तलाश में थे. जब उन्होंने येसू दा की आवाज़ सुनी तो लगा कि यही एक भारतीय आम आदमी की सच्ची आवाज़ है, दादा(रविन्द्र जैन) ने बासु चटर्जी जो कि फ़िल्म "चितचोर" के निर्देशक थे, को जब ये आवाज़ सुनाई तो दोनों इस बात पर सहमत हुए कि यही वो दिव्य आवाज़ है जिसकी उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए तलाश थी. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास बना. चितचोर के अविस्मरणीय गीतों को गाकर येसू दा ने राष्टीय पुरस्कार जीता और उसके बाद दादा और येसू दा की जुगलबंदी ने खूब जम कर काम किया.

वो सही मायनों में संगीत का सुनहरा दौर था. जब पूरे पूरे ओर्केस्ट्रा के साथ हर गीत के लिए जम कर रिहर्सल हुआ करती थी, जहाँ फ़िल्म के निर्देशक भी मौजूद होते थे और गायक अपने हर गीत में जैसे अपना सब कुछ दे देता था. येसू दा और रविन्द्र दादा के बहाने हम एक ऐसे ही गीत के बनने की कहानी आज आपको सुना रहे हैं. येसू दा की माने तो ये उनका हिन्दी में गाया हुआ सबसे बहतरीन गीत है. पर दुखद ये है कि न तो ये फ़िल्म कभी बनी न ही इसके गीत कभी चर्चा में आए.

राजश्री वाले एक फ़िल्म बनाना चाहते थे संगीत सम्राट तानसेन के जीवन पर आधारित, चूँकि पुरानी तानसेन काफी समय पहले बनी थी राजश्री ७०-८० के दशक के दर्शकों के लिए तानसेन को फ़िर से जिन्दा करना चाहते थे और उनके पास "तुरुप का इक्का" संगीतकार रविन्द्र जैन भी थे, तो काम असंभव नही दिखता था. बहरहाल काम शुरू हुआ. रविन्द्र जी ने गीत बनाया "षड़ज ने पायो ये वरदान" और सबसे पहले रफी साहब से स्वर देने का आग्रह किया. रफी साहब उन दिनों अपने चरम पर थे, तो हो सकता है बात समय के अभाव की रही हो पर उन्होंने दादा से बस यही कहा "रवि जी,मोहमद रफी इस जीवन काल में तो कम से कम ये गीत नही गा पायेगा...". दादा आज भी मानते हैं कि ये उनका बड़प्पन था जो उन्होंने ऐसा कहा. हेमंत दा से भी बात की गई पर काम कुछ ऐसा मुश्किल था कि हेमंत दा भी पीछे हट गए, यह कहकर कि इस गीत को गाने के बारे में सोचकर ही मैं तनावग्रस्त हो जाता हूँ. तब जाकर दादा ने येसू दा से इसे गाने के लिए कहा. दोनों महान कलकारों ने पूरे दो दिन यानी कुल ४८ घंटें बिना रुके, बिना भोजन खाए और बिना पानी का एक घूँट पिये काम करते हुए गीत की रिकॉर्डिंग पूरी की. ५९ वीं बार के "टेक" में जाकर गीत "ओके" हुआ. सुनने में असंभव सी लगती है बात, पर सच्चे कलाकारों का समर्पण कुछ ऐसा ही होता है.

फ़िल्म क्यों नही बनी और इसके गीत क्यों बाज़ार में नही आए इन कारणों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नही है, पर येसू दा अपने हर कंसर्ट में इस गीत का जिक्र अवश्य करते हैं, १९८६ में दुबई में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने इसे गाया भी जिस की रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आए हैं....हमारे सुधि श्रोताओं के नाम येसू दा और रविन्द्र जैन "दादा" का का ये नायाब शाहकार -




दादा इन दिनों वेद् और उपनिषद के अनमोल बोलों को धुन में पिरोने का काम कर रहे हैं. और वो इस कोशिश में येसू दा को नए रूप में आज के पीढी के सामने रखेंगें. संगीत के कद्रदानों के लिए इससे बेहतर तोहफा भला क्या होगा. सोमवार को हम लौटेंगे और बात करेंगे रविन्द्र जैन साहब के बारे में, विस्तार से. बने रहिये आवाज़ पर.

Tuesday, November 25, 2008

"दासेएटन" (येसुदास) के हिन्दी गीतों की मिठास भी कुछ कम नहीं...




कल हमने बात की सलिल दा की और बताया की किस तरह उन्होंने खोजा दक्षिण भारत से एक ऐसा गायक जो आज की तारीख में मलयालम फ़िल्म संगीत का दूसरा नाम तो है ही पर जितने भी गीत उन्होंने हिन्दी में भी गाये वो भी अनमोल साबित हुए. आज हम बात करेंगे ४०.००० से भी अधिक गीतों को अपनी आवाज़ से संवारने वाले गायकी के सम्राट येसुदास की.
लगभग ४ दशकों से उनकी आवाज़ का जादू श्रोताओं पर चल रहा है, और इस वर्ष १० जनवरी को उन्होंने अपने जीवन के ६० वर्ष पूरे किये हैं. उनके पिता औगेस्टीन जोसफ एक मंझे हुए मंचीय कलाकार एवं गायक थे, जो हर हाल में अपने बड़े बेटे येसुदास को पार्श्वगायक बनाना चाहते थे. उनके पिता जब वो अपनी रचनात्मक कैरिअर के शीर्ष पर थे तब कोच्ची स्थित उनके घर पर दिन रात दोस्तों और प्रशंसकों का जमावडा लगा रहता था. पर जब बुरे दिन आए तब बहुत कम थे जो मदद को आगे आए. येसुदास का बचपन गरीबी में बीता, पर उन्होंने उस छोटी सी उम्र से अपने लक्ष्य निर्धारित कर लिए थे, ठान लिया था की अपने पिता का सपना पूरा करना ही उनके जीवन का उद्देश्य है. उन्हें ताने सुनने पड़े जब एक इसाई होकर वो कर्नाटक संगीत की दीक्षा लेने लगे. ऐसा भी समय था कि वो अपने RLV संगीत अकादमी की फीस भी बमुश्किल भर पाते थे और एक ऐसा भी दौर था जब चेन्नई के संगीत निर्देशक उनकी आवाज़ में दम नही पाते थे और AIR त्रिवेन्द्रम ने उनकी आवाज़ को प्रसारण के लायक नही समझा. पर जिद्द के पक्के उस कलाकार ने सब कुछ धैर्य के साथ सहा.

"एक जात, एक धर्म, एक ईश्वर" आदि नारायण गुरु के इस कथन को अपने जीवन मन्त्र मानने वाले येसुदास को पहला मौका मिला १९६१ में बनी "कलापदुक्कल" से. शुरू में उनकी शास्त्रीय अंदाज़ की सरल गायकी को बहुत से नकारात्मक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा पर येसु दा ने फ़िर कभी पीछे मुड कर नही देखा. संगीत प्रेमियों ने उन्हें सर आँखों पे बिठाया. भाषा उनकी राह में कभी दीवार न बन सकी. वो प्रतिष्टित पदमश्री और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित हुए और उन्हें ७ बार पार्श्व गायन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, जिसमें से एक हिन्दी फ़िल्म "चितचोर" के गीत "गोरी तेरा गाँव" के लिए भी था.

मलयालम फ़िल्म संगीत तो उनके जिक्र के बिना अधूरा है ही पर गौरतलब बात ये है कि उन्होंने हिन्दी में भी जितना काम किया, कमाल का किया. सलिल दा ने उन्हें सबसे पहले फ़िल्म "आनंद महल" में काम दिया. ये फ़िल्म नही चली पर गीत मशहूर हुए जैसे "आ आ रे मितवा ...". फ़िर रविन्द्र जैन साहब के निर्देशन में उन्होंने चितचोर के गीत गाये. येसु दा बेशक कम गीत गाये पर जितने भी गाये वो सदाबहार हो गए. मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री में "दासेएटन" के नाम से जाने जाने वाले येसुदा की तम्मना थी कि वो मशहूर गुरुवायुर मन्दिर में बैठकर कृष्ण स्तुति गाये पर मन्दिर के नियमों के अनुसार उन्हें मन्दिर में प्रवेश नही मिल सका. और जब उन्होंने अपने दिल बात को एक मलयालम गीत "गुरुवायुर अम्बला नादयिल.." के माध्यम से श्रोताओं के सामने रखा, तो उस सदा को सुनकर हर मलयाली ह्रदय रो पड़ा था.

जैसा कि युनुस भाई ने भी अभी हाल ही में अपने चिट्टे में जिक्र किया था कि येसु दा के हिन्दी फिल्मी गीत आज भी खूब "डिमांड" में हैं, हम अपने संगीत प्रेमियों और श्रोताओं के लिए लाये हैं येसु दा के चुनिन्दा हिन्दी गीतों का एक गुलदस्ता. आनंद लें इस आवाज़ के जादूगर की खनकती आवाज़ में इन सदाबहार गीतों को सुनकर-



कल हम बात करेंगें येसु दा के एक खास "अनरिलीसड" गीत की और बात करेंगे एक और अदभुत संगीत निर्देशक की.




Monday, November 24, 2008

सलिल दा के बहाने येसुदास की बात




बीते १९ तारीख को हम सब के प्रिय सलिल दा की ८६ वीं जयंती थी, लगभग १३ साल पहले वो हम सब को छोड़ कर चले गए थे, पर देखा जाए इन्ही १३ सालों में सलिल दा की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ है, आज की पीढी को भी उनका संगीत समकालीन लगता है, यही सलिल दा की सबसे बड़ी खासियत है. उनका संगीत कभी बूढा ही नही हुआ.सलिल दा एक कामियाब संगीतकार होने के साथ साथ एक कवि और एक नाटककार भी थे और १९४० में उन्होंने इप्टा से ख़ुद को जोड़ा था. उनके कवि ह्रदय ने सुकांता भट्टाचार्य की कविताओं को स्वरबद्ध किया जिसे हेमंत कुमार ने अपनी आवाज़ से सजाया. लगभग ७५ हिन्दी फिल्मों और २६ मलयालम फिल्मों के अलावा उन्होंने बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजरती, मराठी, असामी और ओडिया फिल्मों में अच्छा खासा काम किया. सलिल दा की पिता डाक्टर ज्ञानेंद्र चौधरी एक डॉक्टर होने के साथ साथ संगीत के बहुत बड़े रसिया भी थे. अपने पिता के वेस्टर्न क्लासिकल संगीत के संकलन को सुन सुन कर सलिल बड़े हुए. असाम के चाय के बागानों में गूंजते लोक गीतों और और बांग्ला संगीत का भी उन पर बहुत प्रभाव रहा. वो ख़ुद भी गाते थे और बांसुरी भी खूब बजा लेते थे. अपने पिता के वो बहुत करीब थे. कहते हैं एक बार एक ब्रिटिश प्रबंधक ने उनके पिता को एक भद्दी गाली दी जिसके जवाब में उनके पिता ने उस प्रबंधक को एक ऐसा घूँसा दिया कि उसके ३ दांत टूट गए. दरअसल उनके पिता ब्रिटिश साम्राज्य के सख्त विरोधी थे और उन्होंने असाम के चाय बागानों में काम कर रहे गरीब और शोषित मजदूरों और कुलियों के साथ मिल कर कुछ नाटकों का भी मंचन किया जो उनका अपना तरीका था, अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का. यही आक्रोश सलिल दा में भी उपजा, उन्होंने भी बहुत से ballad किए जिसमें उन्होंने संगीत और संवाद के माध्यम से अपने नज़रिए को बहुत सशक्त रूप से सामने रखा.

बांग्ला फ़िल्म "रिक्शावाला" का जब हिन्दी रूपांतरण बना तो विमल दा ने उन्हें मुंबई बुला लिया और बना "दो बीघा ज़मीन" का संगीत. मूल फ़िल्म भी सलिल दा ने ख़ुद लिखी थी और संगीत भी उन्हीं का था. दोनों ही फिल्में बहुत कामियाब रहीं. और यहीं से शुरू हुआ था सलिल दा का सगीत सफर, हिन्दी फ़िल्म जगत में. "जागतेरहो", "काबुलीवाला", "छाया", "आनंद", "छोटी सी बात" जैसी जाने कितनी फिल्में हैं जिनका संगीत सलिल दा के "जीनियस" रचनाकर्म का जीता जागता उदहारण बन कर आज भी संगीत प्रेमियों को हैरान करता है.

१९६५ में एक मलयालम फ़िल्म आई थी जो कि साहित्यिक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तकजी शिवशंकर पिल्लै के उपन्यास "चेमीन" पर आधारित थी. फ़िल्म का शीर्षक भी यही थी. चेमीन एक किस्म की मछली होती है और ये कहानी भी समुद्र किनारे बसने वाले मछवारे किरदारों के इर्द गिर्द बुनी एक प्रेम त्रिकोण थी. ये उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ था कि सभी भारतीय भाषाओं के अलावा इसका अंग्रेजी, रुसी, जर्मन, इटालियन और फ्रेंच भाषा में भी रूपांतरण हुआ. जाहिर सी बात है कि जब निर्देशक रामू करिआत को इस कहानी पर फ़िल्म बनाने का काम सौंपा गया. तो उन्हें समझ आ गया था कि ये फ़िल्म मलयालम सिनेमा के लिए एक बड़ी शुरुआत होने वाली है. वो सब कुछ इस फ़िल्म के लिए बहतरीन चाहते थे. यह फ़िल्म मलयालम की पहली रंगीन और सिनेमास्कोप फ़िल्म भी थी तो रामू ने मलयालम इंडस्ट्री के बहतरीन कलाकारों को चुनने के साथ साथ बॉलीवुड के गुणी लोगों को भी इस महान प्रोजेक्ट में जोड़ा, ऋषिकेश मुख़र्जी ने संपादन का काम संभाला. तो संगीत का जिम्मा सौंपा गया हमारे सलिल दा को. सलिल दा जानते थे कि उन पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, पर ये एक ऐसा काम था जिसमें सलिल दा कोई कमी नही छोड़ना चाहते थे. वो मुंबई से अचानक गायब हो गए कोई चार पाँच महीनों के लिए. किसी को नही पता और सलिल दा जा कर बस गए केरल के एक मछवारों की बस्ती में. वो उनके साथ रहे उनके संगीत को और बोलियों को ध्यान से सीखा समझा और इस तरह बने फ़िल्म "चेमीन" के यादगार गीत. इस फ़िल्म के संगीत ने मलयालम संगीत का पैटर्न ही बदल डाला या यूँ कहें कि रास्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित यह फ़िल्म मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए मील का पत्थर साबित हुई. यहीं सलिल दा को मिला एक बेहद प्रतिभाशाली गायक -येसुदास. पहले फ़िल्म के सभी गीत येसु दा की आवाज़ में रिकॉर्ड हुए, पर सलिल दा को एक गीत "मानसा मयिले वरु" में कुछ कमी सी महसूस हो रही थी, उन्हें लगा कि यदि इस गीत को मन्ना डे गाते तो शायद और बेहतर हो पाता. बहरहाल मन्ना डे ने इस गीत को गाया और इतना खूब गाया कि मन्ना डे ने ख़ुद अपने एक इंटरव्यू में यह माना कि शायद ही उनका कोई प्रोग्राम हुआ हो जिसमें उन्हें ये गीत गाने की फरमाईश नही मिली हो. सुनते है पहले मन्ना दा की आवाज़ में वही गीत.



इस फ़िल्म में ही एक और गीत था "पुथन वलाकरे". इस एक ही गीत में सलिल दा ने बहुत से शेड्स दिए. बीच में एक पंक्ति आती है "चाकरा...चाकरा.." (जब मछुवारों को जाल भर मछलियाँ मिलती है ये उस समय का आह्लाद है) में जो धुन सलिल दा बनाई वो उस धुन को अपने जेहन से निकाल ही नही पा रहे थे. यही कारण था कि १९६५ में ही आई फ़िल्म "चंदा और सूरज" में उन्होंने उसी धुन पर "बाग़ में कली खिली" गीत बनाया. सुनते हैं दोनों गीत, पहले मलयालम गीत का आनंद ले येसुदास और साथियों की आवाज़ में, लिखा है वायलार रवि ने, जिन्होंने अपने सरल गीतों से साहित्य को जन जन तक पहुँचने का अनूठा काम किया. उनका जिक्र फ़िर कभी फिलहाल आनंद लें इस गीत का.



और अब सुनिए फ़िल्म चंदा और सूरज का वो मशहूर गीत आशा जी की आवाज़ में -



यहीं से शुरुआत हुई सलिल दा और येसुदास के संगीत संबंधों की, येसुदास को हिन्दी सिनेमा में लाने वाले भी अपने सलिल दा ही थे. कल हम बात करेंगे येसु दा पर विस्तार से. फिलहाल हम आपको छोड़ते हैं तनूजा पर फिल्माए गए इस गीत के विडियो के साथ जो कि बहुत खूब फिल्माया गया है, देखिये और आनंद लीजिये -





Sunday, November 23, 2008

संगीत जगत की नई सुर्खियाँ



भारत-पाक रॉक बैंड समागम

हिंदुस्तान के हिन्दी रॉक बैंड "यूफोरिया" (धूम पिचक और माये री से मशहूर) ने पाकिस्तानी बैंड स्ट्रिंग्स के साथ जोड़ बनाने के बाद अब एक और पाकिस्तानी बैंड "नूरी" के साथ अपने नए एल्बम पर काम शुरू कर दिया है. पाकिस्तान में हुए एक सम्मान समारोह में यूफोरिया के सदस्य नूरी के अली नूर और अली हमजा बंधुओं से मिले थे. अगस्त में नूरी की टीम भारत दौरे पर भी आई थी. पाकिस्तान के इस बेहद मशहूर बैंड के साथ काम कर यूफोरिया के सदस्य काफ़ी उत्साहित हैं. एक गीत "वो क़समें" है जो आधा भारत और आधा पाकिस्तान में फिल्माया जाएगा. पहली बार पाकिस्तान की किसी बड़ी कंपनी द्वारा किसी हिन्दुस्तानी रॉक बैंड का एल्बम निकला जा रहा है, जो कि निश्चित ही एक अच्छी शुरुआत है.


जेथ्रो तुल और अनुष्का की बेजोड़ जुगलबंदी

मशहूर ब्रिटिश रॉक समूह जेथ्रो तुल अपने एक सप्ताह के भारत दौरे पर हैं, ३० नवम्बर को दिल्ली के प्रगति मैदान में सितार वादिका अनुष्का शर्मा के साथ जुगलबंदी के बाद ये ६ सदस्यया समूह कोलकत्ता, मुंबई, बंगलोरु और हैदराबाद की यात्रा करेगा. १९६७-६८ में गठित हुए इस समूह की खासियत इनके गायन के अंदाज़ के साथ साथ टीम प्रमुख इआन एंडरसन का बांसुरी वादन भी है. हालाँकि एंडरसन का ये पांचवां भारत दौरा है पर ये पहली बार है जब वो पंडित रवि शंकर की सुपुत्री के साथ ताल मिला रहे हैं. इससे पहले वो पंडित हरी प्रसाद चौरसिया जी के साथ भी मंच बाँट चुके हैं. यदि आप उपरोक्त शहरों में हैं तो इस अवसर को जाया मत होने दें.


बॉलीवुड अभिनेत्रियों की नई आवाज़

बॉलीवुड के ताज़ा हिट्स "ठा करके" (गोलमाल रिटर्न), "मेरी एक अदा शोला सी" (किड्नाप) और जोनी गद्दार और वेल्कम के शीर्षक गीत को अपनी आवाज़ देने वाली पार्श्व गायन् की दुनिया की नई सनसनी हैं आकृति ककर. टेलीविजन के एक टेलेंट प्रतियोगिता में जीतने के बाद भी आकृति के लिए बॉलीवुड के दरवाज़े नही खुले, पर परिवार का सहयोग निरंतर बना रहा. दीपल शाह पर फिल्माए गए "रंगीला रे" के रीमिक्स ने आकृति को थोडी बहुत पहचान जरूर दी पर वो ख़ुद मानती हैं कि रीमिक्स गाकर कोई भी अपने हुनर को भरपूर तरीके से पेश नही कर सकता. शंकर एहसान और लोय के लिए गाये गीत "छम से " ने उन्हें सही मौका मिला. कैटरिना कैफ के लिए आदर्श आवाज़ मानी जा रही आकृति अपनी इस शुरूआती सफलता से बेहद खुश है, आने वाली बिल्लू बार्बर, तो बात पक्की और लव हुआ जैसी फिल्मों में हम आकृति की आवाज़ का लुत्फ़ उठा सकेंगें, साथ ही आकृति शंकर महादेवन के साथ एक एल्बम पर भी काम कर रही है. ख़ुद अपने दम पर इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में जुटी आकृति को हिंद युग्म आवाज़ की शुभकामनायें.


भव्य है युवराज का संगीत भी

देश भर में चुनावों की सरगर्मियाँ जोर पकड़ रही हैं. युवाओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने के लिए इन दिनों ए आर रहमान के मशहूर गीत "पप्पू कांट डांस" की तर्ज पर एक पैरोडी गीत बना कर हर जगह बजाया जा रहा है, साथ ही चुनाव आयोग ए आर को व्यक्तिगत तौर पर भी आकर इस मुहीम में शामिल होने की फरमाइश कर चुका है. यूँ भी इन दिनों ए आर की नई फ़िल्म युवराज का संगीत, संगीत प्रेमियों पर जादू चला रहा है. शो-मैन सुभाष घई की इस फ़िल्म का आधार ही संगीत है.फ़िल्म के सभी प्रमुख किरदार किसी न किसी रूप में संगीत से जुड़े हुए दिखाए गए हैं और रहमान ने अपने संगीत से इन सभी किरदारों को अलग अलग रंग दिए हैं. दिल से और साथिया जैसी फिल्मों के बाद गुलज़ार -रहमान एक बार फ़िर अपनी सफलता को दोहराने में कामियाब हुए हैं. अपनी भव्यता और संगीत की मधुरता के लिए ये फ़िल्म देखी जा सकती है.

Saturday, November 22, 2008

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'बंद दरवाजा'



उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लघु कहानी 'बंद दरवाजा'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना 'देवी' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं बाल-मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण करती प्रेमचंद की एक छोटी कहानी "बंद दरवाजा", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 2 मिनट और 59 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

उसकी शरारतें शुरू हो गईं। कभी कलम पर हाथ बढ़ाया, कभी कागज पर। मैंने गोद से उतार दिया। वह मेज का पाया पकड़े खड़ा रहा। घर में न गया। दरवाजा खुला हुआ था। (प्रेमचंद की "बंद दरवाजा" से)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)




#Fourteenth Story, Band Darwaza: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2008/13. Voice: Anuraag Sharma

Friday, November 21, 2008

सरहद पार से आया आवारा "माहिया"




आज आवाज़ पर सरहद पार से कुछ मेहमाँ आए हैं जो लाये हमारे संगीत प्रेमियों के लिए एक अनूठा तोहफा. संगीत का भी प्रेम की तरह कोई कोई मजहब नही होता. इसे आप सरहदों में बाँट नही सकते. भुगौलिक नज़रिए से भारत -पाकिस्तान आज दो अलग अलग मुल्क सही पर संगीत प्रेमियों के लिए इन जमीं पर खिंछी रेखाओं का कोई महत्त्व नही. संगीत की लम्बी परम्परा में आज एक और नए पाकिस्तानी बैंड का नाम जुड़ रहा है - आवारा. आवाज़ गर्व के साथ आज इस संगीत समूह को विश्वपटल पर पेश कर रहा है इनके सबसे पहले गीत "माहिया" के साथ.

"माहिया" एक सॉफ्ट रॉक गीत है, जिसे गाया है मोहम्मद वलीद मुस्तफा ने जो इस बैंड के रिदम गिटारिस्ट और इस गीत के गीतकार भी हैं. साथ में हैं लीड गिटारिस्ट अफान कुरैशी और drummer वकास कादिर बालूच. सुनते हैं ये जोरदार गीत जिसने दिया आवाज़ को एक और ऐतिहासिक दिन. हम उम्मीद करेंगे कि हमारे सुधी श्रोता इस ताज़ा गीत को भरपूर प्यार देंगे. हो सकता है कि आपका प्रोत्साहन /मार्गदर्शन, "आवारा" बैंड की कमियाबी के लिए मील के पत्थर का काम करे.



AWARA THE BAND:


MUHAMMAD WALEED MUSTAFA:Lead vocalist,Rhythm guitarist,Lyrics writer
AFFAN QURESHI:Lead guitarist,back vocalist
WAQAS QADIR BALOCH:Drummer,basses
Band was formed in 2007 at Islamabad (Pakistan).All the band members started their music career in the age of 15.AWARA releasing their debut song MAHIYA in association with "Awaaz" (India's only music community site dedicated to promote original talents). So for the first time from Pakistan here comes 'AWARA'- the band, with their debut song "mahiya". Hear it and share your thoughts about this brand new offering from Hind Yugm.



Lyrics -

baton mein tum ho khayalo mein tum
subho mein meri shamo mein tum
ji na paoon tere bin mein sanam
tum hi khushi tum hi ho ghum

aye khuda kya dard diya
chaha jisay woh laapata

mahiya maHiYa tu hai kahan
mahiya mahiya tu hai kahan

ankh mein pani hai sansein hain thum
jan jati hai niklay hai dum
roya hai yeh dil kahan gaey tum
maan bhi jao satao na tum

o sathiya yeh kya kiya
tor kar dil chalay kahan

mahiya mahiya a bhi ja
mahiya mahiya a bhi ja

jahan hogi tum mujhko pao gi tum
asani say na bhul pao gi tum
meri ho tum bas meri ho tum
zindagi kuch nahi bin teray sanam
maan lay janejan
pyar sirf tujh say kiya

mahiya mahiya sun lay sada
mahiya mahiya sun lay sada

दूसरे सत्र के २१ वें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज

SONG # 21, SEASON # 02, "MAHIYA" OPENED ON AWAAZ ON 21-11-2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion




Thursday, November 20, 2008

शिवानी की कविताएँ, रूपेश के स्वर और संगीत



२ महीने पूर्व आवाज़ ने शिवानी सिंह की कविताओं का एल्बम 'मेरे ज़ज़्बात' ज़ारी किया था, आज हम उसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं और सुनवा रहे हैं शिवानी सिंह दो संगीतमयी कविताएँ रूपेश ऋषि के स्वर में। यदि यह प्रयास श्रोताओं को भाता है तो हम इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

नाविक




बहुत आसान होता है ,
तमन्नाओं का मचल जाना !
बहक जाना ,बहल जाना ,
किसीकी चाहत में मिट जाना !
बहुत आसान होता है ,
तमन्नाओं का मचल जाना !
है मुश्किल दिल के अरमानों का
मंजिल तक पहुँच पाना !
संभल जाना ,सिमट जाना,
किसीके दिल में उतर जाना !
बहुत आसान होता है,
तमन्नाओं का मचल जाना !
बहुत कम हैं वो खुशकिस्मत,
की पूरी हों तमन्नाएं !
कब मंजिल तक पहुँच पायी हैं,
अरमानों की नौकाएं !
समुन्दर में ही रह जाती हैं,
या फंस जाती भंवर में ही !
बहुत कम होते हैं वो नाविक
जो साहिल तक पहुंचते हैं !
बहुत कम होते हैं वो नाविक
जो साहिल तक पहुंचते हैं !

मेरे आँसू



मेरे आंसू न रोके कोई
आज इन्हें बह जाने दो !
कल तक थे ये साथी मेरे,
इनको भी अब जाने दो !
मेरे आंसू न रोके कोई
आज इन्हें बह जाने दो !
टूटे रिश्तों की दुनिया में
कौन किसी का होता है
बस अपना एक साया समझो
साथ हमेशा रहता है !
टूटे रिश्तों की दुनिया में
कौन किसी का होता है !
बस अपना एक साया समझो
साथ हमेशा रहता है !
बहने पर आमादा हैं ये
इनको भी बह जाने दो !
कब तक रोकूंगा मैं इनको
जाते हैं तो जाने दो !
कब तक रोकूंगा मैं इनको
जाते हैं तो जाने दो !

Monday, November 17, 2008

GO GREEN का संदेश दे रहे हैं गुलज़ार, शंकर, एहसान और लॉय



NDTV इंडिया ने पर्यावरण के प्रति लोगों को जागुरुक बनाने के लिए अब संगीत का सहारा लिया है. एक हरे भरे कल का सपना लेकर लगभग ७ महीने पहले शुरू हुए इस प्रोजेक्ट ने अब अपने अभियान को और तेज़ करने के लिए एक थीम गीत बनाया है. इस नेक काम में NDTV का साथ दे रहे हैं संगीतकार त्रिमूर्ति शंकर एहसान लोय और गीतकार गुलज़ार. शंकर की आवाज़ में यह गीत यकीनन बहुत कुछ कह जाता है. आवाज़ अपने श्रोताओं के लिए लाया है ये ताज़ा गीत. ख़ुद भी सुनें और सब को सुनवायें. यह संदेश सब तक पहुंचें ताकि हम सब आज पर्यावरण के प्रति सजग बनें ताकि आने वाली पीढी के लिए हम एक बेहतर धरती का निर्माण कर सकें.



अपने इस नए गीत पर टिपण्णी करते हुए शंकर कहते हैं - "अगर इस प्रयास से हम १ व्यक्ति के मन भी पर्यावरण के प्रति प्रेम जगा पायें तो अपने काम को सफल मानेंगें." साथी एहसान नूरानी भी काम से बेहद खुश नज़र आए- "संगीत हिंदुस्तान में फिल्मों तक ही सीमित है, यहाँ इसे एक बड़े माध्यम की तरफ़ इस्तेमाल नही किया जाता. हमने इससे पहले भी कैंसर और ऐड्स जागरुकता के लिए भी संगीत के माध्यम से प्रयास किए हैं." लोय मंडोसा भी मानते हैं कि "शुरुआत हमें अपने घर से करनी पड़ेगी. मैंने अपने घर के सभी टूब्स बदल कर बल्ब इस्तेमाल करने शुरू कर दिए हैं."

गैर फिल्मी गीत बनते समय रचनाकार अपनी पसंद की चीजें करने के लिए अधिक स्वतंत्र होता है. शंकर एहसान और लोय ने भी इस गाने में बहुत से कुदरती पर्काशन और लाइव वाद्यों का प्रयोग किया है. गीत के बारे में क्या कहें. गुलज़ार साहब अपने हर काम में परफेक्शन लेकर आते हैं ये हम सब जानते हैं, और ये गीत भी इसका अपवाद नही है.

हवायें पत्ते पानी पेड़ जंगल सब्ज सोना है,
अगर तुम हो इतना ही जरूरी इनका होना है.

हवायें मैली मत करना कि जब तुम साँस लोगे,
ये दम वापस नही आएगा जब तुम खांस लोगे
उगाओ जिंदगी पर याद रखो दिल को बोना है...

पेड़ उगाओ छानो हवायें साफ़ करो,
अपनी जमीं से इतना तो इन्साफ करो,
उगाओ जिंदगी पर याद रखो दिल को बोना है...

अक्तूबर के अजय वीर पहली बार आमने सामने



अक्तूबर के अजय वीर गीतों के पहले चरण की पहली समीक्षा में समीक्षक ने मेलोडी को तरजीह दी है...

गीत # १४ - डरना झुकना छोड़ दे

एकदम सामान्य गीत, पूरा सुन पाना भी मुश्किल... गीत के ३ और गायकी के ३ अंक के अलावा बाकी सारे पक्षों में एक भी नंबर दे पाना मुश्किल।
गीत ३, संगीत ० , गायकी ३, प्रस्तुति ०, कुल ६ / २०.

3/10.

गीत # 15 -ऐसा नही कि आज मुझे चाँद चाहिए

एक और कर्णप्रिय रचना.. गीत बढ़िया संगीत उम्दा , प्रस्तुति भी बढ़िया बस गायकी में (नीचे सुरों में )थोड़ी सी गुंजाईश और हो सकती थी। फिर भी आलओवर बहुत बढ़िया रचना।
गीत ४, संगीत ४, गायकी ३.५, प्रस्तुति ३.५, कुल १५ /२०

7.5/10

गीत # 16 -सूरज चाँद सितारे..

कर्णप्रिय गीत, एक बार सुनने लायक।
गीत ४,संगीत ३.५,गायकी ३.५, प्रस्तुति ४ कुल १५/२०.

7.5/10.


गीत # 17 -आखिरी बार तेरा दीदार ...

बहुत ही सुन्दर गज़ल,सभी पहलूओं पर कलाकारों ने अपना पूरा योगदान दिया। संगीत,गायकी,गीत सब कुछ शानदार। बेहद कर्णप्रिय।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४.५ प्रस्तुति ४.५ कुल १८/२०.

9/10.

गीत # 18 -ओ साहिबा

एक बार फिर सजीव सारथी के मधुर गीत को शुभोजीत ने सुन्दर संगीत में ढ़ाला और उतनी ही सुन्दरता से बिस्वजीत ने इसे गाया। कहीं कहीं साँस लेने की आवाज को बिस्वजीत छुपा नहीं पाये, थोड़ा सा ध्यान देना होगा उन्हें।
गीत ४.५ संगीत ४.५ गायकी ४ प्रस्तुति ५ कुल १८ / २०.

9/10.

चलते चलते -

लगता है अब तक समीक्षा के पहले चरण को पार चुके आधे सत्र के गीतों को इन नए गीतों से जबरदस्त टक्कर मिलने वाली है. कुल मिला कर यह सत्र एक उत्तेजना से भरे पड़ाव की तरफ़ बढ रहा है, जहाँ एक से बढ़कर एक गीत एक दुसरे से भिड रहे हैं सरताज गीत की दावेदारी लेकर. संगीत और संगीत प्रेमियों के लिए तो ये सब सुखद ही है


Sunday, November 16, 2008

बस एक धुन याद आ गई थी....संगीतकार रोशन की याद में



संगीतकार रोशन की ४१ वीं पुण्यतिथी पर हिंद युग्म आवाज़ की श्रद्धांजली

संगीतकार रोशन अक्सर अनिल दा (अनिल बिस्वास) को रिकॉर्डिंग करते हुए देखने जाया करते थे. एक दिन अनिल दा रिकॉर्डिंग कर रहे थे "कहाँ तक हम गम उठाये..." गीत की,कि उन्होंने पीछे से किसी के सुबकने की आवाज़ सुनी.मुड कर देखा तो रोशन आँखों में आंसू लिए खड़े थे. भावुक स्वरों में ये उनके शब्द थे- "दादा, क्या मैं कभी कुछ ऐसा बना पाउँगा..." अनिल दा ने उन्हें डांट कर कहा "ऐसा बात मत कहो...कौन जाने तुम इससे भी बेहतर बेहतर गीत बनाओ किसी दिन..." कितना सच कहा था अनिल दा ने.


बात १९४९ की है. निर्देशक केदार शर्मा फ़िल्म बना रहे थे "नेकी और बदी", जिसके संगीतकार थे स्नेहल भटकर. तभी उन्हें मिला हाल ही में दिल्ली से मुंबई पहुँचा एक युवा संगीतकार रोशन, जिसकी धुनों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने स्नेहल साहब से बात कर फ़िल्म "नेकी और बदी" का काम रोशन साहब को सौंप दिया. फ़िल्म नही चली पर केदार जी को अपनी "खोज" पर पूरा विशवास था तो उन्होंने अगली फ़िल्म "बावरे नैन" से रोशन साहब को फ़िर से एक नई शुरुआत करने का मौका दिया. इस बार रोशन साहब भी नही चूके. १९५० में आई इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद मकबूल हुए विशेषकर -"ख्यालों में किसी के इस तरह आया नही करते...","तेरी दुनिया में दिल लगता नही..." और "सुन बैरी बालम सच बोल रे इब क्या होगा..." ने तो रातों रात रोशन साहब को इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया.

मुश्किल से मुश्किल रागों पर रोशन साहब ने धुनें बनाईं और इतनी सहजता से उन्हें आम श्रोताओं तक पहुंचाया कि वो आज तक हम सब के मन से उतर नही पाये. फिल्मों में कव्वालियों को उन्होंने नया रंग दिया. सोचिये ज़रा क्या ये गीत कभी पुराने हो सकते हैं - "निगाहें मिलाने को जी चाहता है...", "लागा चुनरी में दाग....", "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा....", "बहारों ने मेरा चमन लूटकर...", "मिले न फूल तो...", "कारवां गुजर गया ....", "रहें न रहें हम...", "ओ रे ताल मिले..." या फ़िर रफी साहब का गाया फ़िल्म चित्रलेखा का वो अमर गीत "मन रे तू काहे न धीर धरे...."

१९६४ में आई चित्रलेखा भी केदार शर्मा की रीमेक थी रंगीन रजत पटल पर. तुलसी दास की दो पंक्तियों से प्रेरित होकर (मन तू कहे न धीर धरे अब, धीरे धीरे सब काज सुधरता...) केदार जी ने ही इस स्थायी का सुझाव दिया था जिसे साहिर साहब ने मुक्कमल रूप दिया और रफी साहब ने आवाज़. इसी फ़िल्म में लता मंगेशकर के गाये इन दो गीतों को भी याद कीजिये -"संसार से भागे फिरते हो..." और "ऐ री जाने न दूँगी...". रागों का इतने शुद्ध रूप में अन्य किसी फ़िल्म संगीतकार ने इस मात्रा में प्रयोग नही किया, जैसा रोशन साहब ने किया.

आगे बढ़ने से पहले क्यों न हम ये अमर गीत एक बार फ़िर सुन लें - "मन रे तू काहे न धीर धरे..."



वापस आते हैं रोशन साहब के संगीत सफर पर. गुजरांवाला से लखनऊ के मौरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक में दाखिला लेने आए रोशन साहब से कॉलेज के प्रधानाचार्य ने कॉल बेल बजाकर उस स्वर के नाद को पहचानने को कहा. सही नाद पहचानने के एवज में उन्हें दाखिला मिला. मुंबई कूच करने से पहले उन्होंने दिल्ली के आल इंडिया रेडियो में १० साल जलतरंग वादक के रूप में काम किया. बावरे नैन की सफलता के बाद उन्होंने ५० के दशक में मल्हार, शीशम और ऐ के अब्बास की अनहोनी जैसी फिल्मों में संगीत दिया. अनहोनी में तलत महमूद का गाया "मैं दिल हूँ एक अरमान भरा..." रोशन के १० बहतरीन गीतों में से एक कहा जा सकता है. १९६० में मिली एक और बड़ी सफलता फ़िल्म बरसात की रात के रूप में. "जिंदगी भर नही भूलेगी..." और याद कीजिये वो मशहूर और लाजवाब कव्वाली "न तो कारवां की तलाश है...". सुरों का उतार चढाव, शब्दों की लयकारी, और ताल में संजीदगी भी मस्ती भी, क्या नही है इस कव्वाली में. आगे बढ़ेंगे पर इस कव्वाली को सुने बिना नही, सुनिए -



1963 में आई फ़िल्म ताज महल ने रोशन साहब के संगीत सफर में चार चाँद लगा दिए. "जो वादा किया ...." और पाँव छू लेने दो..." जैसे गीत आज भी अपने नर्मो नाज़ुक मिजाज़ के मामले में नासानी हैं. इसी फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला. इंडस्ट्री के दांव पेंचों से दूर रोशन उम्र भर बस संगीत की ही साधना करते रहे. वो अपने समकालीन संगीतकारों से बहुत अलग थे. वो मेलोडी को साज़ बाजों से अधिक ताजीह देते थे. शास्त्रीय संगीत पर भी उनकी पकड़ बखूबी झलकती थी, कुछ गीत तो उन्होंने शुद्ध बंदिश के बनाये जैसे - "आली पिया बिन.." (राग यमन). वो फ़िल्म के मूड और फ़िल्म की सिचुएशन को गीत में उभारने के लिए नए प्रयोगों से भी नही चूकते थे. "दुनिया करे सवाल तो हम..." और "तुम एक बार मोहब्बत का..." जैसे गीत आम फिल्मी गीतों से अलग छंद रुपी थे. वाध्यों के लेकर उनकी समझ बेमिसाल थी.

स्वभाव से हंसमुख रोशन साहब संसार से विदा भी हुए तो हँसते हँसते..जी हाँ, एक पार्टी में अदाकार प्राण के किसी चुटकुले पर वो इतनी जोर से हँसे कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा और ५० वर्ष की उम्र में, आज ही के दिन १९६७ में वो हम सब को छोड़ कर चले गए. उनके बेटे और मशहूर निर्देशक राकेश रोशन उन्हें याद करते हुए बताते हैं -"अक्सर वो हमें रात के २ बजे जगे हुए मिल जाते थे पूछने पर कहते थे - बस एक धुन याद आ गई..." ऐसे थे हम सब के प्रिय रोशन साहब. उन्होंने कम काम किया पर जो भी किया लाजवाब किया. फ़िल्म इंडस्ट्री से उन्हें वो सब नही मिला,जिसके कि वो हक़दार थे पर ४१ सालों के बाद आज भी हर संगीत प्रेमी ह्रदय उनके गीतों को सुन धड़कता है, इससे बड़ी कमियाबी एक कलाकार के लिए क्या होगी.शायद ये गीत उनके संगीत की अमरता को सही रूप से वर्णित करता है. लता मंगेशकर, फ़िल्म ममता में - "रहें न रहें हम, महका करेंगे बन के कली बन के सबा बागे वफा में ....", गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी. सुनें और याद करें रोशन साहब को -





Saturday, November 15, 2008

परदा है परदा



गायक कलाकार भी बड़े परदे पर दिखने की कसक को रोक नहीं पाते। हिमेश रेशमिया तो अब ख़ुद को स्टार मानने लगे हैं, सोनू निगम भी एक बार फ़िर वापसी का मन बना रहे हैं। हमारे कैलाश खेर मगर ख़ुद को अभिनय से दूर रखना चाहते हैं, हालाँकि अपने पहले ही मशहूर गीत "अल्लाह के बन्दे" में वो अपने गीत को गाते हुए दुनिया को दिखे थे। उस्ताद नुसरत फतह अली खान ने भी बड़े परदे पर अपनी कव्वाली पर अभिनय किया था और अब अपने गुरु के पदचिन्हों पर चलते उस्ताद राहत फतह अली खान साहब भी दिखेंगे फ़िल्म "दिल कबड्डी" में ख़ुद अपने गाने पर अभिनय करते हुए, अभिनेत्री सोहा अली खान के साथ। यकीनन ये गीत फ़िल्म का सबसे खूबसूरत पहलू होने वाला है.


परी को मिला सपनों का शहजादा

"परी हूँ मैं..." गाकर पॉप संगीत को लोकप्रिय बनाने वाली सुनीता राव आखिरकार विवाह के बंधन में बंध ही गईं। फ़िल्म "रॉक ऑन" के सिनेमाटोग्राफर (छायाकार), जर्मनी के जासन वेस्ट हैं इस परी के सपनों के शहजादे। जासन सुनीता को पाने के लिए जर्मनी छोड़ मुंबई भारत में आकर बस गए हैं। फ़िल्म रॉक ऑन के आलावा उन्होंने सुनीता के नये वीडियो "सुन ज़रा" का भी छायांकन किया है। सुनीता और जासन को आवाज़ परिवार की बधाई।


तीन पहर संगीत बजे

मुंबई में धूम मचाने के बाद "तीन पहर" (शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत समारोह) इस बार दिल्ली में आयोजित हुआ। दिन के तीन पहर तक चलने वाले इस संगीत उत्सव की खासियत ये है कि इसमें प्रस्तुत होने वाली सभी जुगलबंदियां और वाध्य संगीत के रचयिता नए उभरते हुए कलाकार होते हैं। इस माध्यम से श्रोताओं को इन आने वाले समय के होने वाले उस्तदों के फन का पहला जायका मिल जाता है। सोमबाला सतले, राकेश चौरसिया, उस्ताद शुजात हुसैन खान, देवकी पंडित, और मुकुल शिवपुत्र जैसे बड़े कलाकारों ने भी इस कार्यकम में शिरकत की। संचालक महेश बाबू बताते हैं राहुल शर्मा ने १२ साल पहले इस कार्यक्रम में अपना जौहर दिखाया था और आज वो शिखर पर हैं। हम दुआ करेंगे कि और भी नामी और गुणी कलाकार इस मंच से उभर कर सामने आयें.


बड़े कलाकारों की टक्कर में संगीत प्रेमियों का फायदा

दिसम्बर के अंत तक तीन बड़ी फिल्में प्रर्दशित होने वाली हैं. और इंडस्ट्री की मशहूर "ज़ंग-ए-खान" फिर छिड़ने वाली है। शाहरुख़ खान अपने लौह पुरूष अंदाज़ से बिल्कुल अलग इस बार एक आम आदमी के किरदार में लग रहे हैं फ़िल्म "रब ने बना दी जोड़ी" में तो आमिर ने "माचों मेन" का लुक दिया है अपने "गजनी" के किरदार को। वहीं अपने चिर परिचित प्रेमी के अंदाज़ में हैं सलमान खान फ़िल्म "युवराज" में। अब तीनों ही बड़ी फिल्में बड़े बैनर की हैं। संगीत के धुरंधरों ने इन फिल्मों को सजाया है तो जाहिर सी बात है कि तीनों फिल्मों का संगीत जबरदस्त होगा ही। " रब ने..." में सलीम सुलेमान का संगीत है तो "युवराज" और "गजनी" में ए॰आर॰ रहमान का संगीत हैं। युवराज के गीतकार हैं गुलज़ार साहब और गजनी के प्रसून जोशी। इन फिल्मों के "आजा के हवाओं में...", "धीमे धीमे..." और "गुजारिश" जैसे गीत आजकल सब की जुबान पर चढ़ चुके हैं...कुल मिलाकर संगीत प्रेमियों के लिए एक अच्छी "ट्रीट" होंगीं ये फिल्में, ये तय है।

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'देवी'



उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लघु कहानी 'देवी'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना 'वरदान' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की एक छोटी किंतु प्रेरणादायी कहानी "देवी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 2 मिनट और 35 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

देवी ने बात काटते हुए कहा, "अजी वह क्या बात थी, मुझे वह नोट पड़ा मिल गया था, मेरे किस काम का था।" (प्रेमचंद की "देवी" से एक अंश)


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#Thirteenth Story, Devi: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2008/12. Voice: Anuraag Sharma

Friday, November 14, 2008

वो बुतखाना, ये मयखाना सब धोखा है...



भोपाल शहर की एक अलसाई सी दोपहर, एक सूनी गली का आखिरी मकान जहाँ जमा हैं "मार्तण्डया" संगीत समूह के सभी संगीत सदस्य. फिज़ा में विरक्ति के स्वर हैं, जैसे सब देखा जा चुका है, अनुभव किया जा चुका है महसूस किया जा चुका है हुस्न और इश्क जैसी सब बातों का खोखलापन, अब कहाँ दिल लगायें. मन बैरागी चाहता है कि कहीं दूर जंगल में डेरा डाला जाए और दरवेशों में बसर किया जाए. कुछ ऐसे ही भाव लिए है वर्तमान सत्र का ये २० वां गीत. संजय द्विवेदी ने लिखा है इसे और स्वरबद्ध किया है चेतैन्य भट्ट और कृष्णा पंडित ने. आवाजें हैं कृष्णा पंडित, रुद्र प्रताप और अभिषेक की. टीम के गिटारिस्ट हैं सागर और रिदम संभाला है हेमंत ने. सुनते हैं इस उभरते हुए जबरदस्त सूफी संगीत समूह का ये नया दमदार गीत. अपनी बेशकीमती राय देकर इन नए संगीत योद्धाओं का मार्गदर्शन अवश्य करें.

गीत को सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -



After the success of their first song "sooraj chand aur sitare" with us, this new upcoming sufi band from bhopal "martandya" is back again, with a completely different flavored song - "husn". under the guidance of Krishana Pandit and Chaitanya Bhatt, Rudra Pratap and Abhishek done the vocals. supported by Hemant and Sagar, this song has again penned by Sanjay Dwivedi. if you like the song do spare a few minutes to encourage/ guide these young talented musicians.

To listen to this brand new song, please click on the player.




Lyrics - गीत के बोल

ये हुस्न है क्या, ये इश्क है क्या,
सब धोखा है, सब धोखा है,
ये चाँदनी शब्, ये ठंडी हवा,
सब धोखा है, सब धोखा है...

वो कैस की लैला धोखा थी,
वो हीर का राँझा धोखा था,
ये ताज महल, ये लाल किला,
सब धोखा है, सब धोखा है ....

वहां शेख ठगी में माहिर है,
यहाँ साकी चालें चलता है,
वो बुतखाना, ये मयखाना,
सब धोखा है, सब धोखा है ...

अब दरवेशों में काट उमर,
यहाँ दौलत शोहरत छोड़ भी आ,
क्या फरक हुआ, जब जान लिया,
सब धोखा है, सब धोखा है ...

दूसरे सत्र के २० वें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज

SONG # 20, SEASON # 02, "HUSN", OPENED ON AWAAZ ON 14/11/2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.



Thursday, November 13, 2008

क्या फिर लौटेगा "आशिकी" का दौर




वो १९७२ में मिले थे एक दूजे से। १९८१ में आई फ़िल्म "मैंने जीना सीख लिया" से इस संगीतकार जोड़ी ने कदम रखा फ़िल्म जगत में। "हिसाब खून का", "लश्कर", और "इलाका" जैसी फिल्मों में इनका काम किसी की भी नज़र में नहीं आया, फिर इन्हें मिला संगीत की दुनिया में नई मिसाल बनाने की योजनायें लेकर दिल्ली से मुंबई पहुंचे गुलशन कुमार का साथ। १९९० में आई महेश भट्ट निर्देशित फ़िल्म "आशिकी" ने संगीत की दुनिया को हिला कर रख दिया, और उभर कर आए - नदीम-श्रवण। एक ऐसा दौर जब फ़िल्म संगीत अश्लील शब्दों और भौंडे संगीत की गर्त में जा रहा था, एक साथ कई नए कलकारों ने आकर जैसे संगीत का सुनहरा दौर वापस लौटा दिया। शुरूआत हुई आनंद मिलिंद के संगीत से सजी फ़िल्म "क़यामत से क़यामत तक" से और इसी के साथ वापसी हुई रोमांस के सुनहरे दौर की भी। फ़िल्म "आशिकी" भी इसी कड़ी का एक हिस्सा थी, कमाल की बात यह थी कि इस फ़िल्म के सभी गीत एक से बढ़कर एक थे और बेहद मशहूर हुए। इसके बाद नदीम-श्रवण ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक सुपर हिट संगीत से सजी फिल्में -दिल है कि मानता नहीं, साजन, सड़क, फूल और कांटे, दीवाना....और सूची लम्बी होती चली गई। नदीम-श्रवण के साथ साथ गीतकार समीर, गायक कुमार सानू, अलका याग्निक, और साधना सरगम ने भी कमियाबी का स्वाद चखा। लगातार तीन सालों तक वो फ़िल्म फेयर सम्मान के सरताज रहे, १९९६ में "राजा हिन्दुस्तानी" और १९९७ में आई "परदेश" जैसी फिल्मों से उन्होंने अपना एक नया अंदाज़ दुनिया के सामने रखा.

गुलशन कुमार की निर्मम हत्या और नदीम पर लगे आरोपों ने संगीत के इस सुहावने सफर में एक ग्रहण का काम किया। लंबे समय तक इस जोड़ी ने फिल्मों से ख़ुद को दूर रखा, २००५ में लन्दन से फ़ोन कर नदीम ने श्रवण से कहा कि "मैं कुछ समय तक अपने परफ्यूम के काम पर ध्यान देना चाहता हूँ..." इसी के साथ लगा कि यह जोड़ी अब टूट गई। श्रवण की सुनें तो उन्होंने स्वीकार किया कि-"नदीम की इस बात से वो आहत ज़रूर हुए, शुरू में नहीं समझ पाये कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, पर अब सोचता हूँ कि यह अन्तराल हम दोनों के लिए ज़रूरी सा था"।

एक समय आया जब यह जोड़ी संगीत-प्रेमियों की नज़र से ओझल हो गई। लेकिन कलाकार काम किये बिने चैन नहीं पाता। श्रवण ने अकेले ही 'सिर्फ़ तुम' में संगीत दिया और बहुत हिट हुए। लेकिन संगीत प्रेमियों को संगीत को वह सुंगंध और ताजगी एकाकी संगीत में नहीं मिली। न्यायिक कारणों ने सिर्फ तुम के एल्बम पर संगीतकार का नाम तक नहीं लिखा गया।

इस जोड़ी ने 'राज़' से दुबारा वापसी की, या यूँ कहिए कि दमदार वापिसी की। वैसे धड़कन फिल्म के संगीत ने ही इस जोड़ी ने लौटने का संकेत दे ही दिया था, लेकिन इनकी संगीत का असली फ्लैवर राज़ में दिखा। इसके बाद कसूर का संगीत हिट हुआ। संगीत प्रेमियों के लिए अब ये खुशी की बात है कि अब ये जोड़ी एक बार फ़िर साथ में काम करेगी, और वो भी फूरे जोर-शोर के साथ। डेविड धवन की "डू नोट डिसटर्ब" और धर्मेश दर्शन की "बावरा" है उनकी आने वाली फिल्में। हो सकता है फ़िर कुछ ऐसे नगमें सुनने को मिलें जो बरसों तक यादों में बसे रहें।
आइए सुनते हैं इसी जोड़ी द्वारा संगीतबद्ध कुछ एवरग्रीन गीत



Wednesday, November 12, 2008

आधे सत्र के गीतों ने पार किया समीक्षा का पहला चरण



सितम्बर के सिकंदरों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा, और तीन महीनों में प्रकाशित १३ गीतों की पहले चरण की समीक्षा के बाद का स्कोरकार्ड

समीक्षक की व्यस्तता के चलते हम सितम्बर के गीतों की पहले चरण की अन्तिम समीक्षा को प्रस्तुत करने में कुछ विलंब हुआ. तो लीजिये पहले इस समीक्षा का ही अवलोकन कर लें.


खुशमिजाज़ मिटटी
बढ़िया गीत होते हुए पर भी पता नहीं क्या कमी है, गीत दिल को छू नहीं पाता। ठीक संगीत, गीत बढ़िया और गायकी भी ठीकठाक। गायक को अभिजीत की शैली अपनाने की बजाय खुद की शैली विकसित करनी चाहिये।
गीत: ३, संगीत 3, गायकी ३, प्रस्तुति ३, कुल १२/२०, पहले चरण में कुल अंक २५ / ३०.

राहतें सारी
एक बार सुन लेने लायक गीत, बोल सुंदर परन्तु संगीत ठीक है। वैसे संगीतकार की उम्र बहुत कम है उस हिसाब से बढ़िया कहा जायेगा, क्यों कि बड़े बड़े संगीतकार भी इस उम्र में इतने बढ़िया संगीत नहीं रच पाये हैं।
गीत ३.५, संगीत ३.५ गायकी ३ प्रस्तुति 3 कुल १३/२०, पहले चरण में कुल अंक १८ / ३०.

ओ मुनिया
बढ़िया गीत को संगीत और प्रस्तुति के जरिये कैसे बिगाड़ा जाता है उसका बेहद शानदार नमूना, एक पंक्ति भी सुनने लायक नहीं, जबरन एक दो लाइनें सुनी। हिन्द युग्म पर प्रकाशित गीतों में अब तक का सबसे सामान्य गीत। हिन्द युग्म को ऐसे गीतों से बचना चाहिये। सिर्फ वर्चूअल स्पेस भरने के लिये ऐसी रचनायें प्रकाशित करने का कोई फायदा नहीं।
गीत 5, संगीत ०, गायकी ०, प्रस्तुति ० कुल ५/२०, पहले चरण में कुल अंक १९.५ / ३०.

सच बोलता हैएक बार फिर सुन्दर गज़ल, गायकी और संगीत प्रस्तुति एकदम बढ़िया होते हुए भी गीत को एक बार सुन लेने के बाद सुनने का मन नहीं होता। कुछ चीजों में कमी दिखाई नहीं देती, उसको वर्णित नहीं किय़ा जा सकता कि इस गीत में यह कमी है पर वो कमी अखरती रहती है, मन में कसक सी रहती है। इस गीत को सुनने के बाद भी सिसा ही महसूस होता है।
गायक की आवाज में मो. रफी साहब की आवाज की झलक दिखती (सुनाई देती) है।
गीत ४, संगीत ४.५, गायकी ३, प्रस्तुति ४.५ कुल १६/२०, पहले चरण में कुल अंक २४.५ / ३०.

सितम्बर माह की समाप्ति के साथ ही हमारे वर्तमान सत्र का आधा सफर पूरा हो गया. हालाँकि बीते शुक्रवार तक हम १९ नए गीत प्रकाशित कर चुके हैं, पर सितम्बर तक प्रकाशित सभी १३ गीत अपनी पहले चरण की समीक्षा का समर पार चुके हैं. आईये देखते हैं इन १३ गीतों में कौन है अब तक सबसे आगे. अब तक का स्कोर कार्ड इस प्रकार है.

खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.

हम आपको याद दिला दें कि कुल अंक ५० में से दिए जायेंगे, यानी अन्तिम दो निर्णायकों के पास २० अंक हैं, अन्तिम चरण की रेंकिंग जनवरी में होगी, जिसके बाद ही अन्तिम फैसला होगा, सरताज गीत का और टॉप १० का भी, फिलहाल हम मिलेंगे आने वाले रविवार को, अक्टूबर के अजयवीर गीतों की पहली समीक्षा लेकर.

हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.



Tuesday, November 11, 2008

आपके पीछे चलेंगी आपकी परछाईयाँ....



निर्देशक बी आर चोपडा पर विशेष

व्यावसायिक दृष्टि से कहानियाँ चुनकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों से अलग सामाजिक सरोकारों को संबोधित करती हुई फिल्मों के माध्यम से समाज को एक संदेश मनोरंजनात्मक तरीके से कहने की कला बहुत कम निर्देशकों में देखने को मिली है. वी शांताराम ने अपनी फिल्मों से सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत की थी, आज के दौर में मधुर भंडारकर को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं, पर एक नाम ऐसा भी है जिन्होंने जितनी भी फिल्में बनाई, उनकी हर फ़िल्म समाज में व्याप्त किसी समस्या पर न सिर्फ़ एक प्रश्न उठाती है, बल्कि उस समस्या का कोई न कोई समाधान भी पेश करती है. निर्देशक बी आर चोपडा ने अपनी हर फ़िल्म को भरपूर रिसर्च के बाद बनाया और कहानी को इतने दिलचस्प अंदाज़ में बयां किया हर बार, कि एक पल के लिए देखने वालों के लिए फ़िल्म का कसाव नही टूटता. चाहे बात हो अवैध रिश्तों की (गुमराह), या बलात्कार की शिकार हुई औरत की (इन्साफ का तराजू), मुस्लिम वैवाहिक नियमों पर टिपण्णी हो (निकाह), या वैश्यावृति में फंसी औरतों का मानसिक चित्रण (साधना), या हो एक विधवा के पुनर्विवाह जैसा संवेदनशील विषय (एक ही रास्ता),अपनी फिल्मों से बी आर ने हमेशा ही समाज में एक सकारात्मक हलचल मचाई है, कई ऐसे विषय जिन पर तब तक परदों में रह कर चर्चा होता थी, उन्हें समाज के सामने बेनकाब किया, यही उनकी फिल्मों की वास्तविक कमियाबी रही है, पर जैसा कि हमने बताया गंभीर विषयों पर आधारित होने के बावजूद उनमें मनोरंजन भी भरपूर होता था, जिस कारण बॉक्स ऑफिस पर भी उनकी फिल्में सफलता के नए कीर्तिमान लिखती थी.


बीते बुधवार सुबह बी आर ने हमेशा के लिए संसार को अलविदा कह दिया, और पीछे छोड़ गए कुछ ऐसी फिल्मों की विरासत जिन से वर्तमान और आने वाली फिल्मकारों की पीढी को हमेशा गर्व रहेगा. आज हम उनकी जिस फ़िल्म का यहाँ जिक्र करेंगे वो है १९५७ में आई गोल्डन जुबली हिट फ़िल्म "नया दौर". आज के निर्देशक सईद मिर्जा और अज़ीज़ मिर्जा के वालिद अख्तर मिर्जा की लिखी इस बेहद "हट के" कहानी को महबूब खान, एस मुख़र्जी और एस एस वासन जैसे निर्देशकों ने सिरे से नकार दिया. कहा गया कि यह एक बढ़िया डोक्यूमेंट्री फ़िल्म तो बन सकती है पर एक फीचर फ़िल्म...कभी नही. बी आर ने इसी कहानी पर काम करने का फैसला किया. पर जब उन्होंने दिलीप कुमार के साथ इस फ़िल्म की चर्चा की तो उन्होंने कहानी सुनने से ही इनकार कर दिया. बी आर अगली पसंद, अशोक कुमार के पास पहुंचे. अशोक कुमार का मानना था कि उनका लुक शहरी है और वो इस गाँव के किरदार के लिए वो नही जमेंगें, पर उन्होंने बी आर की तरफ़ से दिलीप कुमार से एक बार फ़िर बात की. इस बार दिलीप साहब राजी हो गए. आधुनिकता की दौड़ में पिसने वाले एक आम ग्रामीण की कहानी को फ़िल्म के परदे पर लेकर आना आसान नही था. कुछ हफ्तों तक कारदार स्टूडियो में शूट करने के बाद लगभग १०० लोगों की टीम को कूच करना था आउट डोर लोकेशन के लिए जो की भोपाल के आस पास था. उन दिनों मधुबाला और दिलीप साहब के प्रेम के चर्चे इंडस्ट्री में मशहूर थे. तो फ़िल्म की नायिका मधुबाला के पिता ने मधुबाला को शूट पर भेजने से इनकार कर दिया, यूँ भी उन दिनों आउट डोर शूट जैसी बातों का चलन नही था. बी आर ने कोर्ट में मुकदमा लड़ा, अपील में तर्क दिया कि फ़िल्म की कहानी के लिए यह आउट डोर बहुत ज़रूरी है. दिलीप ने बी आर के पक्ष में गवाही दी जहाँ उन्होंने मधुबाला से अपने प्यार की बात भी कबूली. मुकदमा तो जीत लिया पर मधुबाला को कानूनी दांव पेचों से बचने के खातिर केस को वापस लेना पड़ा, और इस तरह फ़िल्म में मधुबाला के स्थान पर वैजंतीमाला का आगमन हुआ. महबूब खान की "मदर इंडिया" के लिए लिबर्टी सिनेमा १० हफ्तों के लिए बुक था. पर फ़िल्म तैयार न हो पाने के कारण उन्होंने बी आर की "नया दौर" को अपने बुक किए हुए १० हफ्ते दे दिए, साथ में हिदायत भी दी कि चाहो तो ५ हफ्तों के लिए ले लो, तुम्हारी इस "ताँगे वाले की कहानी" को पता नही दर्शक मिले या न मिले. और यही महबूब खान थे जिन्होनें, जब फ़िल्म "नया दौर" ने अपनी सिल्वर जुबली मनाई तो बी आर को उनकी फ़िल्म के प्रीमियर के लिए मुख्य अतिथि होने का आग्रह किया. चढ़ते सूरज को दुनिया सलाम करती है पर बी आर उन निर्देशकों में थे जिन्हें अपने चुनाव और अपने फैसलों पर हमेशा पूरा विश्वास रहा. उनकी हर फ़िल्म का संगीत पक्ष भी बहुत मजबूत रहा. नया दौर के गीतों को याद कीजिये ज़रा- मांग के साथ तुम्हारा (पार्श्व में चल रही ताँगे की आवाज़ पर गौर कीजिये), आना है तो आ, साथी हाथ बटाना, उडे जब जब जुल्फें तेरी, रेशमी सलवार या फ़िर आज भी हर राष्ट्रीय त्योहारों पर बजने वाला गीत -"ये देश है वीर जवानों का...",हर गीत कहानी से जुडा हुआ, हर गीत में शब्द और संगीत का परफेक्ट तालमेल.

आज की पीढी उन्हें महान धारावाहिक "महाभारत" के निर्देशक के रूप में अधिक जानती है. पर बहुत कम लोग जानते हैं कि बी आर ने फिल्मों में अनूठे प्रयोग किए हैं जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है, फ़िल्म "कानून" हिंदुस्तान की अब तक की एक मात्र मुक्कमल उर्दू फ़िल्म मानी जाती है, चूँकि इस फ़िल्म में एक भी शब्द संवाद का हिन्दी में नही था, बी आर ने सेंसर बोर्ड से अपील भी की थी कि इस फ़िल्म को उर्दू में सर्टिफिकेशन दिया जाए. एक और बड़ी खासियत इस फ़िल्म के ये थी कि ये शायद हिंदुस्तान की पहली बिना गीतों की फ़िल्म थी. गुरुदत्त भी इस फ़िल्म के दीवाने थे क्योंकि जो बरसों से गुरुदत्त करना चाहते थे पर अपने जीवन काल में कभी कर नही पाये वो बी आर इस फ़िल्म के माध्यम से कर दिखाया था. आज भी कितने निर्देशक होंगें जो बिना गीतों के कोई हिन्दी फ़िल्म बनने का खतरा उठा सके. बी आर को फिल्मों में उनके अमूल्य योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा...फ़िल्म इंडस्ट्री ने फिल्मों के माध्यम समाज को आईना दिखने वाला एक बेहतरीन निर्देशक को खो दिया है. हिंद युग्म,आवाज़ दे रहा है बी आर चोपडा को यह संगीतमय श्रद्धाजंली.





Monday, November 10, 2008

अच्छा कलाकार एक प्रकार का चोर होता है



भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी पर विशेष
"I accept this honour on behalf of all Hindustani vocalists who have dedicated their life to music" ये कथन थे पंडित भीमसेन जोशी जी के जब उन्हें उनके बेटे श्रीनिवास जोशी ने फ़ोन कर बताया कि भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान "भारत रत्न" के लिए चुना है. पिछले ७ दशकों से भारतीय संगीत को समृद्ध कर रहे शास्त्रीय गायन में किवदंती बन चुके पंडितजी को यह सम्मान देकर दरअसल भारत सरकार ने संगीत का ही सम्मान किया है, यह मात्र पुरस्कार नही, करोड़ों संगीत प्रेमियों का प्रेम है, जिन्हें पंडित जी ने अपनी गायकी से भाव विभोर किया है. उस्ताद अब्दुल करीम खान साहब के शिष्य रहे सवाई गन्धर्व ने जो पंडित जी के गुरु रहे, अब्दुल वहीद खान साहब के साथ मिलकर जिस "किराना घराने" की नींव डाली, उसे पंडित जी ने पहचान दी. १९ वर्ष की आयु में अपनी पहली प्रस्तुति देने वाले भीम सेन जोशी जी संगीत का एक लंबा सफर तय किया. हम अपने आवाज़ के श्रोताओं के लिए लाये हैं भारती अचरेकर द्वारा लिया गया उनका एक दुर्लभ इंटरव्यू जिसमें पंडित जी ने अपने इसी सफर के कुछ अनछुए पहलू खोले...

(सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें)



गदक, कर्नाटक में ४ फरवरी १९२२ में जन्में पंडित जी ने यूँ तो इस सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से पहले भी पदम् श्री, पदमभूषण, पदमविभूषण और कर्नाटक रत्न जैसे बड़े सम्मान पायें हैं पर सच तो ये है कि उनका कद हर सम्मान से बढकर है. बचपन में बेहद शरारती रहे पंडितजी के बारे में उनकी गुरु माँ गोदा बाई याद करती है "वो बचपन में गदक के वीरनारायण मन्दिर के "गोपुरम" पर चढ़ जाया करते थे, आज वो संगीत के उच्चतम शिखर पर हैं"

क्या कुछ और कहने की जरुरत है...सुनते है पंडित जी की गायकी के कुछ भिन्न भिन्न रूप -

ऐ री माई शुभ मंगल गाओ री...



संगीतकार ऐ आर रहमान के निर्देशन में उनका गाया "जन गण मन" सुनना भी है एक अनुभव -



फ़िल्म "बसंत बहार" में उन्होंने गाया ये गीत, जिसमें नायक की आवाज़ है मन्ना डे की. कहा जाता है कि मन्ना डे को जब ज्ञात हुआ कि उन्हें पंडितजी के साथ गाना है तो वो डर कर शहर छोड़ कर ही भाग गए...शायद ये उनका अपना अंदाज़ था पंडित जी जैसे बड़े कलकार का सम्मान करने का...क्योंकि कम तो वो भी नही थे...दो बड़े कलाकारों की इस जुगलबंदी का आनंद लें इस मशहूर गीत "केतकी गुलाब जूही...." को सुनकर.



पंडित जी को आवाज़ परिवार के सभी संगीत प्रेमियों की तरफ़ से हार्दिक बधाईयाँ.



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