Friday, June 24, 2011

यादों के इडियट बॉक्स से झांकती कुछ स्मृतियाँ रिवाईंड होती, एक कहानी में जज़्ब होकर



Taaza Sur Taal (TST) - 18/2011 - REWIND - NINE LOST MEMORIES A NON FILM ALBUM BY "THE BAND CALLED NINE"

ताज़ा सुर ताल में एक बार हम फिर हाज़िर हैं कुछ लीक से हट कर बन रहे संगीत की चर्चा लेकर. पत्रकारिता में एक कामियाब नाम रहे नीलेश मिश्रा ने काफी समय पहले ट्रेक बदल कर बॉलीवुड का रुख कर लिया था. एक उभरते हुए गीतकार के रूप में यहाँ भी वो एक खास पहचान बना चुके हैं. "जादू है नशा है" (जिस्म), "तुमको लेकर चलें" (जिस्म), "क्या मुझे प्यार है" (वो लम्हें), "गुलों में रंग भरे" (सिकंदर), "आई ऍम इन लव" (वंस अपौन अ टाइम इन मुंबई) और 'अभी कुछ दिनों से (दिल तो बच्चा है जी) खासे लोकप्रिय रहे हैं. निलेश ने संगीत की दुनिया में अपना अगला कदम रखा एक बैंड "द बैंड कोल्ड नाईन" बना कर. आज हम इसी बैंड के नए और शायद पहले अल्बम "रीवायिंड" की यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं.

अभी बीते सप्ताह इस अल्बम का दिल्ली में एक भव्य कार्यक्रम में विमोचन हुआ, "मोहल्ला लाईव" के इस कार्यक्रम में मैंने भी शिरकत की. दरअसल नीलेश और उनकी टीम केवल इसी बात से हम सबकी तालियों की हकदार हो जाती है कि उन्होंने इस अल्बम में कुछ बेहद नया कॉसेप्ट ट्राई किया है. जिस तरह हिंद युग्म में अपनी पहली अल्बम "पहला सुर" में कविताओं और गीतों को मिलाकर पेश करने का अनूठा प्रयोग किया था, यहाँ भी एक कवितामयी कहानी है जिसके बीच में गीत भी चलते हैं, यानी "थोड़े गीत थोड़ी कहानी". इस प्रयोग को नाम दिया गया है "किस्सागोई". यानी कि श्रोता को ये भी पता चल जाता है कि अमुख गीत किस सिचुएशन के लिए बना होगा. इस प्रयोग में मगर एक खामी है, गीत आप बार बार सुन सकते हैं, मगर सुनी हुई कहानी को बार बार सुनना शायद बहुत से श्रोता पसंद न करें. मगर मैं आपको बता दूं कि नीलेश की आवाज़ और कहानी को कहने की अदायगी बेहद शानदार और बाँध के रखने वाली है.

अब इस किस्सागोई में जो किस्सा है उसमें छोटे शहर और मध्यमवर्गीय परिवारों के किरदार चुनकर एक रिश्ता कायम करने की कोशिश तो की गयी है, पर कहानी में कुछ खास नयापन नहीं है हाँ उसे कहने के लिए नीलेश ने जो शब्द चुने हैं शानदार हैं बेशक. तो चलिए अब गीतों की बढ़ा जाए.

"इडियट बॉक्स" में वो सब है जो आपके बचपन को आपके लिए रीवायिंड कर देगा. आकाशवाणी की सुबहें और दूरदर्शन की शामें, बड़े सुहाने दिन थे, आज की पीढ़ी को तो शायद यकीन भी न हो उन बातों पर. शिल्पा राव की आवाज़ में वो नोस्टोलोजिया बहुत खूब छलकता है.

छोटे शहर से बड़े शहर में आये एक इंसान की तनहाईयाँ दिखती है "माज़ी" में. सूरज जगन एक उभरते हुए रोक्क् गायक है. पर मुझे शिकायत है कि जब प्रयोग में इतनी ताजगी है तो संगीत में क्यों नहीं. जब आजकल बॉलीवुड में भी सिर्फ और सिर्फ रोक्क् ही चालू है तो "बैंड कोल्ड नाईन" को यहाँ भी कुछ नया करना चाहिए था. गीत में जान आती है शिल्प राव जब 'मोरे पिया' गाती है.

"कोल्लेज में कोई दस बीस साल लंबा कोर्स नहीं होता क्या.." नीलेश पूछते हैं, और वो लड़कपन की यादें एक बार फिर उभरती है इस बार सूरज जगन की आवाज़ में "इडियट बॉक्स" के एक अन्य संस्करण में. "काठ गोदाम की बस ५ बजे जाती है...पूरी फिल्म भी नहीं देखने दी उसने..." के बाद "रूबरू" प्यार के उस अल्हडपन की कहानी है. संगीत पक्ष मुझे यहाँ भी बोलों के लिहाज से कमजोर लगा. धुन वही बढ़िया होती है जो दिल के तार छेड़े और गीत वही यादगार होता है जिसे हम अकेले में गुनगुना सकें. अगला गीत 'शायद" भी आजकल बन रहे बॉलीवुड के गीतों से कुछ खास अलग नहीं है, पर मैं बताता चलूँ कि नीलेश के बोल और उनकी कमेंट्री इन सब गीतों में भी शानदार है. नायक को सामने की बिल्डिंग में अचार के लिए नीम्बू सुखाती औरत को देख कर याद आती है "माँ" और गीत उभरता है "आँगन" "खाली खाली शामों में, उलझन से भरी दुपहरों में, कुछ ढूँढता है मन...." वाह बेहद खूबसूरत है ये गीत, यहाँ सौभाग्यवश संगीत पक्ष भी गीत के बोलों के टक्कर का है, और सूरज जगन ने दिखाया है कि वो गीतों में भाव लाना भी खूब जानते हैं.

टूटते रिश्तों की कहानी बयां करती "नैना तोरे" में शिल्पा खूब जमी है, सुन्दर शब्द और संगीत उनका भरपूर साथ देते हैं. इंटरल्यूड में सितार का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है. ट्रांस मिक्स का उत्कृष्ट नमूना है ये गीत. नीलेश खुद माइक के पीछे आकर गाते भी हैं. एक मुश्किल कम्पोजीशन है ये. गज़ल नुमा ये गीत है "उनका ख्याल" जिसे वो अच्छा निभा गए हैं, गायिकी उनकी जैसी भी हो पर भाव पक्ष खूब संभाला है. एक गीत से रिश्ता जोड़ने के लिए ये काफी होता है. अल्बम का अंतिम गीत "दिल रफू" एक डांस नंबर है, जो भरपूर मज़ा देता है. कोंसर्ट के दौरान बहुत से लोगों को इस पर थिरकते देखा. संगीतकार अमर्त्य राहूत यहाँ कामियाब रहे हैं.

कुल मिलाकर ये अलबम आपको बेहद भाएगा ये मैं दावे के साथ कह सकता हूँ. एक नए और लाजवाब प्रयोग को इतने बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने के लिए ये पूरी टीम बधाई की हकदार है. हम तो सिफारिश करेंगें कि आप इसे अवश्य सुनें.

आवाज़ रेटिंग - 9/10

मुझे इस अल्बम के गाने कहीं ऑनलाइन सुनने को नहीं मिले, पर फ्लिप्कार्ट से इसे खरीद कर आप सुन सकते हैं



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

फेसबुक-श्रोता यहाँ टिप्पणी करें
अन्य पाठक नीचे के लिंक से टिप्पणी करें-

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

श्रोता का कहना है :

run 3 का कहना है कि -

Your article is very useful, the content is great, I have read a lot of articles, but for your article, it left me a deep impression, thank you for sharing.

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

संग्रहालय

25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

भेंट-मुलाक़ात-Interviews

संडे स्पेशल

ताजा कहानी-पॉडकास्ट

ताज़ा पॉडकास्ट कवि सम्मेलन