Friday, May 6, 2011

यश राज की "लव का द एंड" है ठंडी संगीत के मामले में



Taaza Sur Taal (TST) - 11/2011 - LOVE KA THE END

नमस्कार! 'ताज़ा सुर ताल' मे आप सभी का स्वागत है। युवा पीढ़ी को नज़र में रख कर फ़िल्म बनाने वाले फ़िल्म निर्माण कंपनियों में एक महत्वपूर्ण नाम है 'यश राज फ़िल्म्स'। इसी 'यश राज फ़िल्म्स' की एक सबसिडियरी बैनर का गठन हुआ है 'Y-Films' के नाम से, जिसका शायद मूल उद्देश्य है युवा पीढ़ी को पसंद आने वाली फ़िल्में बनाया, यानी कि Y for Youth। इस बैनर तले पहली फ़िल्म का निर्माण हुआ है जो आज देश भर में प्रदर्शित हो रही है। जी हाँ, 'लव का दि एण्ड'। फ़िल्म प्रेरीत है २००५ की अमरीकी फ़िल्म 'जॉन टकर मस्ट डाइ' से। १९ अप्रैल को फ़िल्म का संगीत रिलीज़ हुआ था। फ़िल्म में पर्दे पर नज़र आयेंगे नवोदित जोड़ी ताहा शाह और श्रद्धा कपूर।

किसी अमरीकी फ़िल्म को लेकर उसका भारतीयकरण करने में यश राज फ़िल्म्स नें पहले भी कोशिश की थी। पिचले साल ही 'लव इम्पॉसिबल' में यह नीति अपनाई गई थी, और उसके संगीत में भी वही यंग् शैली नज़र आयी थी, हालाँकि न फ़िल्म चली न ही उसका संगीत। देखते हैं 'लव का दि एण्ड' का क्या हाल होता है! और जब संगीत का पक्ष सम्भाला है राम सम्पत जैसे संगीतकार नें और गीत लिखे हैं आज के दौर के अग्रणी गीतकारों में से एक अमिताभ भट्टाचार्य नें, तो फ़िल्म के गीतों की तरफ़ कम से कम एक बार ध्यान देना तो अनिवार्य हो जाता है।

ऐल्बम का पहला गीत है गायिका अदिति सिंह शर्मा की आवाज़ में, जो है फ़िल्म का शीर्षक गीत। चैनल-वी पर एक कार्यक्रम आता है 'Axe your Ex'। इस सीरीज़ का अगर कोई टाइटल सॉंग् चुनना हुआ तो इस गीत का प्रयोग हो सकता है, क्योंकि गीत का भाव ही है अपने एक्स-लवर को सबक सिखाना। वह ज़माना गया जब प्यार में असफल होकर दर्द भरा गीत गाया जाता था। इस गीत का मूड ग़मगीन बिल्कुल नहीं है, बल्कि गीत एक पेप्पी नंबर है, और इसके बोलों को सुनकर मज़ा आता है। ७० के दशक में आपने सुना होगा "मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये, बोल तेरे साथ क्या सुलूग किया जाये"। "लव का दि एण्ड" गीत इसी गीत का २०११ संस्करण मान लीजिये, बस!। फ़िल्म की कहानी के हिसाब से गीत अर्थपूर्ण ही प्रतीत हो रहा है, बाकि फ़िल्म देखते वक़्त पता चलेगा। लेकिन केवल सुन कर इस गीत का किसी के होठों पर सज पाना ज़रा मुश्किल सा लगता है।

दूसरा गीत है "टूनाइट"। भले ही यह दूसरा ट्रैक रखना है, इस गीत को पिछले गीत से पहले होना चाहिये था, क्योंकि इसका जो भाव है वह कुछ ऐसा है कि एक जवान लड़की जो थोड़ी डरी हुई है क्योंकि उसे अपने पहले पहले नाइट आउट पे जाना है अपने बॉय-फ़्रेण्ड के साथ। उसे पता नहीं कि क्या होने वाला है। यह भी यह यंग् नंबर है, एक टीनेजर सॉंग् और इस तरह का गीत अक्सर पश्चिमी फ़िल्मों में पाया जाता है। ज़्यादा साज़ों की भरमार नहीं है, एक सीधा सरल सा गीत है। भले ही गीत का अंदाज़ ज़रा उत्तेजक है, लेकिन अदायगी में मासूमीयत है, मिठास है, सादगी है। गायिका सुमन श्रीधर नें अच्छा निभाया है गीत को, और एक १८ वर्षीय लड़की पर उनकी आवाज़ ख़ूब जँची है। कम्पोज़िशन के पार्श्व में जैज़ म्युज़िक की झलक मिलती है।

अगला गीत है "फ़्रेक-आउट", जिसे अदिति सिंह शर्मा और जॉय बरुआ नें गाया है। इस गीत को इन दिनों ख़ूब लोकप्रियता मिल रही है, गीत के बोल या संगीत की वजह से नहीं, बल्कि इस बात के लिये कि यह पहला भारतीय फ़िल्मी गीत है जिसमें 'स्टॉप-मोशन' तकनीक का इस्तमाल हुआ है इसके विडियो में। इस रॉक-पॉप नंबर के पार्श्व में व्हिसल की ध्वनि का सृजनात्मक प्रयोग किया गया है। आज के युवाओं की ज़िंदगी में क्या कुछ हो रहा है, उन्हीं सब बातों को लेकर के है यह गीत। इस गीत को सुनने के लिये लोग जितने बेकरार हैं, उससे कई गुणा ज़्यादा प्रतीक्षा है इसके फ़िल्मांकन को देखने की।

और अब बारी एक आइटम नंबर की। "शीला" और "मुन्नी" के बाद अब पेश है "दि मटन सॉंग्‍"। कृष्णा बेउरा की आवाज़ में है यह गीत। चौंक गये न यह देख कर कि आइटम गीत में गायक का क्या काम? जी हाँ, फ़िल्म में एक मर्द औरत का भेस धारण कर इस गीत में नृत्य प्रस्तुत करता है। इससे पहले कृष्णा नें राहत फ़तेह अली ख़ान के साथ 'नमस्ते लंदन' में "मैं जहाँ रहूँ" गीत में क्या ख़ूब गायन प्रस्तुत किया था। लेकिन यह गीत न तो 'नमस्ते लंदन' के उस गीत के करीब है, और ना ही "मुन्नी" या "शीला" के साथ कोई टक्कर है। फ़िल्मांकन पर पूरी तरह से निभर करेगा इस गीत की कामयाबी। सिर्फ़ सुन कर तो न कान पर कोई असर हुआ, ना ही दिल पर।

पाँचवें नंबर पर है "फ़न फ़ना"। इन दिनों युवाओं की पसंदीदा गायकों में हैं अली ज़फ़र, जिन्होंने इस गीत को गाया है। इस टीनेजर गीत को सुन कर ज़रा सी निराशा हुई क्योंकि अली के पहले गीतों के मुक़ाबले यह गीत ज़रा कम कम ही लगा। वैसे इस हिंग्लिश गीत को अली नें अपनी तरफ़ से अच्छा-ख़ासा निभाया है, लेकिन अब जैसे इस ऐल्बम में एकरसता आने लगी है। विविधता की कमी महसूस होने लगी है। यह भी एक ज़िप्पी-पेप्पी नंबर है, रॉक शैली में निबद्ध।

और 'लव का दि एण्ड' का दि एण्ड हो रहा है "हैप्पी बड्डे बेबी" से। इसे गीत कम और हिजराओं द्वारा लड़की को दी जा रही बधाई ज़्यादा लग रही है। राम सम्पत को यह सूझा कि स्टैण्ड-अप कॉमेडियन जिमी मोसेस से इस "गीत" को गवाया जाये। यह हमारी ख़ुशक़िस्मती है कि इस "गीत" की अवधि ४५ सेकण्ड्स की ही है।

दोस्तों, जिस उम्मीद से इस ऐल्बम की तरफ़ मेरी निगाह गई थी, जिस बैनर के साथ इस फ़िल्म का संबंध है, मुझे तो भई निराशा ही हाथ लगी। ठीक है, माना कि यंग फ़िल्म है, लेकिन हर बार यंग फ़िल्म कहकर उसके संगीत के साथ अन्याय होता हुआ भी तो नहीं देखा जाता। क्या ख़राबी है अगर एक गीत "दिल पे नहीं कोई ज़ोर, तेरी ओर तेरी ओर" जैसा भी कम्पोज़ किया जाये तो? ख़ैर, पसंद अपनी अपनी, ख़याल अपना अपना। मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ४ की रेटिंग्, और इस ऐल्बम से मेरा पिक है सुमन श्रीधर का गाया "टूनाइट"।

आज के लिये बस इतना ही। अगले हफ़्ते फिर किसी फ़िल्म के संगीत की समीक्षा के साथ उपस्थित होंगे, तब तक के लिये 'ताज़ा सुर ताल' केर मंच से इजाज़त दीजिये, नमस्कार!

इसी के साथ 'ताज़ा सुर ताल' के इस अंक को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिये, नमस्कार!

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अगर आप में नये फ़िल्म संगीत के प्रति लगाव है और आपको लगता है कि आप हर सप्ताह एक नई फ़िल्म के संगीत की समीक्षा लिख सकते हैं, तो हम से सम्पर्क कीजिए oig@hindyugm.com के पते पर। हमें तलाश है एक ऐसे वाहक की जो 'ताज़ा सुर ताल' को अपनी शैली में नियमीत रूप से प्रस्तुत करे, और नये फ़िल्म संगीत के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ाये!




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

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