Saturday, December 20, 2008

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'दूसरी शादी'



उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'दूसरी शादी'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने लन्दन निवासी कवयित्री शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना 'पूस की रात' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की कहानी "दूसरी शादी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 5 मिनट और 19 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८३१-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

जब तक यह कलंक हमारी कौम से दूर नहीं हो जाता, मैं हर्गिज, कुंवारी तो दूर की बात है, किसी विधवा से भी ब्याह न करूंगा। (प्रेमचंद की "दूसरी शादी" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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#Eighteenth Story, Shadi Ki Vajah: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2008/17. Voice: Anurag Sharma

Friday, December 19, 2008

सारी बस्ती निगल गया है (नई धुन, नई ग़ज़ल)



दूसरे सत्र के २५वें गीत के रूप में सुनिए एक ग़ज़ल


कुमार आदित्य
नाज़िम नक़वी
हम वर्ष २००८ के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। हिन्द-युग्म की बड़ी उपलब्धियों में से एक उपलब्धि यह भी रही कि ४ जुलाई से अब तक हमने हर शुक्रवार एक नया गाना रीलिज किया। अब तक १७ संगीतकारों से अपना तार जोड़ा। ऐसे ही एक संगीतकार हमें मिले जो फिल्मों में जाने की तमन्ना रखते हैं, जिनके द्वारा कम्पोज एक गीत हमने पिछले शुक्रवार इस सत्र के २४वें गीत के रूप में ज़ारी किया था। आप इनके ऊर्जावान होने का अंदाज़ा यहाँ से लगा सकते हैं कि यह शुक्रवार आया और इन्हें एक नया गीत तैयार कर लिया। जिसमें फिर से इन्हीं की आवाज़ है। जी हाँ, हम अपने २५ गीत के रूप में हिन्द-युग्म के कवि नाज़िम नक़वी की एक ग़ज़ल 'जिस्म कमाने निकल गया है' रीलिज कर रहे हैं, जिसे संगीतबद्ध किया है ग्वालियर के संगीतकार कुमार आदित्य विक्रम ने और आवाज़ है खुद संगीतकार की। तो चलिए सुनते हैं हिन्द-युग्म का २५वाँ गीत-

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(सही उच्चारण के साथ)


We are heading towards the end of present session. We have releasing released a fresh song on every friday since 4 July 2008. This is one of the big achievements of Hind-Yugm. Today, we are going to rock you with a fresh Ghazal that is written by Poet Nazim Naqvi and composed by Kumar Aditya Vikram. Kumar Aditya Vikram has also given his voice to this new combo . Please listen and leave your comment.

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(With right pronounciation)

ग़ज़ल के अशआर

सूरज हाथ से फिसल गया है
आज का दिन भी निकल गया है

तेरी सूरत अब भी वही है
मेरा चश्मा बदल गया है

ज़ेहन अभी मसरूफ़ है घर में
जिस्म कमाने निकल गया है

क्या सोचें कैसा था निशाना
तीर कमां से निकल गया है

जाने कैसी भूख थी उसकी
सारी बस्ती निगल गया है

ग़ज़ल पसंद आने पर इसे अपने मित्रों तक पहुँचायें। अपने ब्लॉग/वेबसाइट/ऑरकुट स्क्रैपबुक/माईस्पैस/फेसबुक में 'जिस्म कमाने निकल गया है' का पोस्टर लगाने के लिए पसंदीदा पोस्टर का कोड कॉपी करें।



SONG # 25, SEASON # 02, JISM KAMANE NIKAL GAYA HAI, OPENED ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.




Thursday, December 18, 2008

एक आम आदमी जिसने भोजपुरी को बना दिया खास...



भिखारी ठाकुर की जयंती पर हमारी संगीतमयी प्रस्तुति

भिखारी ठाकुर
एक आम आदमी के सतह से शिखर तक की बेजोड़ मिसाल हैं भिखारी ठाकुर... बहुत कम लोग होते हैं जो जीते-जी विभूति बन जाते हैं... दरअसल, इस भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा ही है...फर्क सिर्फ यह है कि लीजेंड बनने की यह यात्रा भिखारी ने किसी रुपहले पर्दे पर नहीं असल ज़िंदगी में जिया.

भोजपुरी के नाम पर सस्ता मनोरंजन परोसने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है, जितना भोजपुरी का इतिहास....18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया.....उन्होंने भोजपुरी संस्कृति को सामीजिक सरोकारों के साथ ऐसा पिरोया कि अभिव्यक्ति की एक धारा भिखारी शैली जानी जाने लगी...आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का सशक्त मंच बन कर जहाँ-तहाँ भिखारी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है....
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भिखारी ठाकुर के स्वर में उन्हीं की कविता 'डगरिया जोहता ना".
यह काव्यपाठ 'बिदेसिया' फिल्म से ली गई है
बिदेसिया, गबर-घिचोर, बेटी-बियोग भा बेटी-बेचवा सहित उनके सभी नाटकों में बदलाव को दिशा देने वाले एक सामाजिक चिंतक की व्यथा साफ दिखती है....सबसे बड़ी बात कि उनके नाटकों में पात्र कभी केंद्र में नहीं रहे, हमेशा परिवेश केंद्र में रहा....यही वजह थी कि उनके पात्रों की निजी पीड़ा सार्वभौमिक रुप अख्तियार कर लेती थी... हर नयी शुरुआत को टेढ़ी आंखों से देखने वाले भिखारी के दौर में भी थे...सामाजिक व्यवस्था के ऐसे ठेकेदारों से भिखारी अपने नाटकों के साथ लड़े...वो अक्सर नाटकों में सूत्रधार बनते और अपनी बात बड़े चुटीले अंदाज़ में कह जाते....अपनी महीन मार की मार्फत वो अंतिम समय तक सामाजिक चेतना की अलख जगाते रहे....
कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता हैं तो कोई भोजपुरी का भारतेंदू हरिश्चंद्र.....महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें "भोजपुरी का शेक्सपियर" की उपाधि दे दी.....इसके अलावा उन्हें कई और उपाधियाँ व सम्मान भी मिले....भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया..... इतना सम्मान मिलने पर भी भिखारी गर्व से फूले नहीं, उन्होंने बस अपना नाटककार ज़िंदा रखा...पूर्वांचल आज भी भिखारी से नाटकों से गुलज़ार है....ये बात अलग है कि सरकारी उपेक्षा का शिकार इनके गांव तक अब भी नाव से ही जाना पड़ता है....

राममुरारी के साथ निखिल आनंद गिरि



सन् १९६३ में भिखारी ठाकुर के अमर नृत्य-नाटक बिदेशिया पर एक फिल्म बनी, इसी नाम से। जिसका संगीत बहुत हिट हुआ। भिखारी ठाकुर का लिखा एक गीत 'हँसी-हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा, अ रे बसेला परदेस' जिसे एस॰ एन॰ त्रिपाठी ने संगीतबद्द किया था और मन्ना डे गाया था। बहुत प्रसिद्ध हुआ। हम आज अपने श्रोताओं के लिए वह गीत तो लाये ही हैं, साथ में बिलकुल नये तरह से कम्पोज किया गया यही गीत लाये हैं।

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(फिल्म- बिदेसिया, संगीत- एस॰एन॰ त्रिपाठी, आवाज़- मन्ना डे)

यह प्रस्तुति हिन्द-युग्म से सितम्बर २००८ में जुड़े राजकुमार सिंह की है, जो न्यूयार्क रहते हैं। ये अपने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। फिल्म का नाम होगा 'लूंगी, लोटा और सलाम'। राज भिखारी ठाकुर के इस गीत को अपनी फिल्म में रखना चाहते हैं। और यह गीत नये तरीके से तैयार भी हो गया है। 'हँसी-हँसी पनवा' को नया रूप दिया है 'Valley Of Flower' फिल्म के संगीत निर्देशक विवेक अस्थाना ने। गीत को गाया है भोजपुरी गीतों की चर्चित गायिका पूनम जैन ने। हम उम्मीद करते हैं कि यह नया प्रयोग आपको पसंद आयेगा।

इस फिल्म की बातें फिर कभी, पहले आप गीत सुनें।



(फिल्म- लूँगी, लोटा और सलाम (प्रस्तावित) , संगीत- विवेक अस्थाना और राजकुमार सिंह, आवाज़- पूनम जैन)

इस गीत के माध्यम से हम राजकुमार सिंह के साथ मिलकर अमर नाटककार भिखारी ठाकुर को श्रद्धाँजलि देना चाहते हैं।


साथ में पढ़िए भिखारी ठाकुर का दुर्लभ साक्षात्कार

Wednesday, December 17, 2008

हम भूल न जाए उनको, इसलिए कही ये कहानी...



आईये नमन करें उन शहीदों को जो क्रूर आतंकवादियों का सामना करते हुए शहीद हो गए


२६ नवम्बर की वह रात कितनी भयावह थी, जब चारों ओर आग बरस रही थी और सम्पूर्ण भारतीय आतंकित और भयभीत था। एक पिता के कानों में पुत्र की करूण पुकार गूँज रही थी और अपने लाल को बचाने के लिए वह दीवार पर सिर पटक रहा था, प्रशासन के सामने गिड़गिड़ा रहा था। कितनी ही माताएँ अपनी गोद उजड़ने का दृश्य अपनी आँखों से देख रही थी। देश-विदेश के अतिथि किंकर्तव्य विमूढ़ थे। । सबकी साँसें रूकी हुई थी। पल-पल की खबर सबकी धड़कनों को तीव्र कर रही थी। आतंकवादियों ने हमारे स्वाभिमान को ठेस लगाई। मानवता पर कलंक लगाया। कुछ लोगों के कुकृत्यों एवं हिंसक योजनाओं ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। वीरों की संतान कहलाने वाले हम सब कितने असहाय,कितने कमजोर और कितने असावधान थे। अपनी सुरक्षा व्यवस्था के सुराग बहुत स्पष्ट दिखाई दिए। देश के नागरिकों ने अपने दायित्वों को भी जाना ।

सुरक्षा बल अपनी सम्पूर्ण लगाकर भी इसे रोक पाने में असमर्थ था। ऐसे में देश के बलिदानी निकल पड़े जान हथेली पर लेकर। उनकी आँखों में बस एक ही सपना था। देश की सुरक्षा का । उन्होंने माता की आँखों के आँसुओं को पोंछा और उसे अभय प्रदान किया। आतंक का सामना किया । आग उगलती गोलियों की वर्षा उनका मार्ग अवरूद्ध ना कर सकी। उस समय सुरक्षा बल के कमांडो भगवान बन गए। प्रत्यक देशवासी बहुत आशापूर्ण दृष्टि से उन्हें निहार रहा था उस पल यदि वो जा भी चूक जाते तो आतंक का राक्षस विजयी हो जाता। धन्य है उनकी शक्ति और उनका बलिदान। इस पुन्य कार्य को करते हुए उन्हें अपनी जान भी गँवानी पड़ी। उनका परिवार सारा देश बन गया। उनके बलिदान पर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊँचा हो गया। तुमने देखा होगा आकाश से कि सम्पूर्ण भारत मुक्त कंठ से उन्हें दुआएँ दे रहा था । उनपर पुष्प वर्षा कर रहा था। वो मरे नहीं अमर हो गए। हर भारतीय के दिल में हमेशा-हमेशा रहेंगें। उन्होने भारत के उस स्वरूप का दर्शन करा दिया जो विश्व के लिए वन्दनीय है। तुमने आज भारत की ही नहीं विश्व की भी आँखें नम कर दी तथा सभी को कर्तव्य उन्मुख बना दिया। तुम्हारा बलिदान प्रत्येक भारतीय के दिल को दहला गया। तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसने हम सब के हृदयों में राष्ट्रीयता की एक तीव्र लहर का संचार किया, बिखरे देश को एकता के सूत्र में बाँध दिया तथा मदहोशी की नींद में सोए भारतीयों को होश में ला दिया। हर भारतीय आँखों में आँसू और दिल में नूतन संकल्प लिए तुम्हारे सामने नत पूरे भारत ने मोमबत्तियाँ जलाकर तुम्हारे प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं। हम हिन्दुस्तानी कोमल हृदय हैं, तुम्हारे बलिदान ने हमारे दिलों को द्रवित कर दिया है। मेरे देश के शहीद वीरों! हमारे श्रद्धा सुमन स्वीकार करो।


(यह विशेष कार्यक्रम NDTV पर प्रसारित हुआ था)

प्रस्तुति- शोभा महेन्द्रू

Tuesday, December 16, 2008

तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा...



ग्रेट शो मैन राज कपूर की जयंती पर विशेष


१४ दिसम्बर को हमने गीतकार शैलेन्द्र को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था. गौरतलब ये है कि फ़िल्म जगत में उनके "मेंटर" कहे जाने वाले राज कपूर साहब की जयंती भी इसी दिन पड़ती है. पृथ्वी राज कपूर के एक्टर निर्माता और निर्देशक बेटे रणबीर राज कपूर को फ़िल्म जगत में "ग्रेट शो मैन" के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दी फिल्मों के लिए उनका योगदान अमूल्य है. १९४८ में बतौर अदाकार शुरुआत करने वाले राज कपूर ने मात्र २४ साल की उम्र में मशहूर आर के स्टूडियो की स्थापना की और पहली फ़िल्म बनाई "आग" जिसमें अभिनय भी किया. फ़िल्म की नायिका थी अदाकारा नर्गिस. हालाँकि ये फ़िल्म असफल रही पर नायक के तौर पर उनके काम की तारीफ हुई. नर्गिस के साथ उनकी जोड़ी को प्रसिद्दि मिली १९४९ में आई महबूब खान की फ़िल्म "अंदाज़" से. निर्माता निर्देशक और अदाकार की तिहरी भूमिका में फ़िल्म "बरसात" को मिली जबरदस्त कमियाबी के बाद राज कपूर ने फ़िल्म जगत को एक से बढ़कर एक फिल्में दी और कमियाबी की अनोखी मिसालें कायम की. आईये आज उन्हें याद करें उनकी चंद फिल्मों का जिक्र कर.

शुरुआत करते हैं राज साहब की अमर कृति "आवारा" से. ये वो फ़िल्म है जिसने राज कपूर को देश विदेश में एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित किया. भारत में बेहद कामियाब हुई इस लाजवाब फ़िल्म को एशिया और रूस में भी जबरदस्त सराहना मिली. राज साहब की अपनी एक टीम हुआ करती थी जिन पर वो भरोसा करते थे. आर के स्टूडियो में बनी इस पहली फ़िल्म में भी सभी उनके चहेते साथी थे. अभिनेत्री नर्गिस थी जोडीदार तो संगीत का जिम्मा था शंकर जयकिशन शैलेन्द्र और हसरत की टीम पर, आवाजें थी मुकेश (राज कपूर) और लता (नर्गिस) की. इस फ़िल्म में ही पहली बार राज कपूर चैपलिन के भेष में दिखाई दिए थे. हालाँकि ये एक छोटा सा तोहफा था राज का अपने प्रिये अभिनेता के लिए (श्री ४२० में ये अधिक मुखर था),पर सिने प्रेमी इस लघु भूमिका को नही भूले. राज कपूर के प्रशंसकों को ये जानकर खुशी होगी ये परिधान आज भी आर के स्टूडियो ने जतन से सहेज कर रखा हुआ है. राज कपूर और नर्गिस कभी न बिछड़ने वाले प्रेमी युगल के रूप में परदे पर आए और छा गए. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना था. शीर्षक गीत 'आवारा हूँ' और 'दम भर जो उधर मुंह फेरे ..." के आलावा एक ९ मिनट का स्वप्न दृश्य गीत अपने बहतरीन सेट सज्जा के लिए आज भी जाना जाता है. घुमावदार सीढियों और उड़ते बादलों के बीच (स्वर्ग) में लय पर थिरकरी अप्सराएँ और सब से उपर की सीढ़ी पर खड़ी नायिका गा रही है "तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा ..." नायक काली टी शर्ट और पैंट पहने कहीं नर्क जैसी जगह में तड़प रहा है "ये नही ये नहीं जिन्दगी...." चारों तरफ़ आग है नाचते अस्थि पिंजर और शैतानी मुखौटों से मुक्त हो कर अंत में वह बादलों से निकलता है और ध्वनि होती है "ओम् नम शिवाय..." की. ब्रह्म विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है सीढियों की शुरुआत में नायिका नीचे उतरती है और नायक को ऊपर स्वर्ग की तरफ़ ले चलती है गाती हुई "घर आया मेरा परदेसी...". घुमावदार सीढ़ियों से नायिका के पीछे चलता नायक अंत में नटराज की मूर्ति के आगे पहंचता है. जहाँ से एक नई सड़क चलती है, यहीं खलनायक एक चाकू लिए प्रकट होता है. नायक नायिका का नाम पुकारता है पर जब तक नायिका उस तक पहुंचें नायक एक बार फ़िर गर्त में गिर कर ख़ाक हो जाता है. ये स्वप्न दृश्य एक "विसुअल ट्रीट" है अवश्य देखें -



१९६४ में आई "संगम" राज की पहली रंगीन फ़िल्म थी और पहली ऐसी फ़िल्म जो उन्होंने विदेश में शूट की. दरअसल इसी फ़िल्म ने विदेश में शूट करने का ट्रेंड शुरू किया था. बाद में तो लगभग हर फ़िल्म में एक गीत स्विट्जरलैंड में शूट करना लाजमी हो गया चाहे उसका कहानी से कुछ लेना देना हो या नही. साधारण सी प्रेम त्रिकोण कहानी में भी उनका निर्देशन फ़िल्म की जान था. हालाँकि फ़िल्म कुछ जरुरत से ज्यादी लम्बी थी पर राज साहब हमेशा ही बड़े कैनवास के फिल्मकार थे. राज की हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी धूम मचायी. "बोल राधा बोल", "बुड्डा मिल गया", "ये मेरा प्रेम पत्र" जैसे लाजवाब गीतों के अलावा एक गीत और था "दोस्त दोस्त न रहा...". जिस खूबसूरती से राज ने इस गीत को फिल्माया फ़िल्म का एक एक किरदार और उसके मन के भावों जिस तरीके परदे पर उभारा गया इस गीत में, वो हिन्दी फ़िल्म क्राफ्ट में राज की दक्षता का जीवंत उदाहरण है.

कुछ साल और आगे बढ़ते हैं. शानदार अभिनय से सजी "तीसरी कसम" और उनकी बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की नकामियाबी ने राज को बहुत बड़ा सदमा दिया. उन्होंने फैसला किया की अब वो अभिनय नही करेंगे. चुनांचे उन्होंने परदे पर उतरा अपने मंझले बेटे ऋषि कपूर को. ऋषि इससे पहले "मेरा नाम जोकर" राज के बचपन की भूमिका निभा चुके थे. साथ ही एक नई नायिका दी उन्होंने फ़िल्म जगत को डिम्पल कपाडिया के रूप में. दोनों ही कलाकार अपनी "टीनएज" अवस्था में थे जब ये फ़िल्म शुरू की. "बॉबी" को हम राज की पहली शो मैन सरीखी फ़िल्म मान सकते हैं जहाँ उन्होंने फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाए और फ़िल्म को एक "लार्जर देन लाइफ" प्रस्तुति दी. के ऐ अब्बास की लिखी इस प्रेम कहानी में राज ने सब कुछ दिया दर्शकों को. सुखद अंत दिया कहानी को ताकि खतरा कम रहे असफलता का. सुपर हिट संगीत और नए परिधानों में सजा धजा एक प्रेमी युगल जिसने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया दीवारों को तोड़ कर प्रेम करने के लिए. ऋषि कपूर अगले २० सालों तक कमोबेश इसी रोमांटिक इमेज में जीये. फ़िल्म का एक दृश्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है. युवा नायक नायिका से मिलने उसके घर जाता है. पकौडे बना रही नायिका जब दरवाज़ा खोलती है तो अनजाने में हाथ में लगा आटा अपने बालों में लगा बैठती है. कहते हैं कि जब राज पहली बार नर्गिस के घर गए थे तब कुछ ऐसा ही हुआ था. नायक का नायिका से पूछना "मुझसे दोस्ती करोगी" एक ऐसा संवाद था जिसने आने वाली पीढी के फिल्मकारों को एक लड़का और लड़की की दोस्ती और प्रेम जैसे विषय पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया. सूरज बड़जात्या की "मैंने प्यार किया" और करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" जैसी फिल्में इसका उदाहरण है. राज साहब की ८४ वीं जयंती पर उन्हें आवाज़ का सलाम.

Monday, December 15, 2008

सुनिए बाल-कविता 'गिलहरी का घर'



आवाज़ पर बहुत दिनों से हम आपको कोई बाल-कविता नहीं सुनवा पाये थे, क्योंकि मीनू आंटी इन दिनों छुट्टी पर हैं।
लेकिन बच्चों के लिए यह काम करने का जिम्मा नीलम मिश्रा जी ने भी स्वीकारा है। नीलम आंटी बतौर अपने पहला प्रयास डॉ॰ हरिवंश राय बच्चन की कविता 'गिलहरी का घर' लेकर आई हैं। तो आप सुनिए, अपने घर के बच्चों को सुनवाइए और हमें बताइए कि कैसा लगा।

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Sunday, December 14, 2008

मेरा ही बेटा है अजमल कसाब



एक माँ की गुजारिश

कल सुबह-सुबह जब अखबार में पढ़ा कि "अजमल" के अब्बू ने जो पकिस्तान में रहते हैं, सामने आने का दुस्साहस किया है कि, वो मेरा बेटा है।
अब पाकिस्तान की सरकार बाप-बेटे के रिश्ते को कैसे झूठा साबित करेगी, यही हम सब को देखना है। देखना है कि सियासत के ठेकेदार अपनी दरिंदगी के खेल के लिए कब तक नौजवानों को गुमराह करेंगे और झूठे लालच और आश्वासन देकर सिर्फ़, सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी तसल्ली के लिए खून बहायेंगे|

मेरी गुजारिश है, एक माँ कि गुजारिश दुनिया के तमाम नौजवानों से वो किसी भी ऐसे जाल में अपने आप को फँसने से बचाएं, जहाँ कोई मजहब नहीं, कोई ईमान नहीं।
नौजवानों हमेशा एक ही बात याद रखो कि सिर्फ़ अपनी मेहनत का भरोसा रखो, कोई चमत्कार नहीं होता कहीं, कोई अल्लादीन का चराग नहीं है किसी के पास जो हमारी दुश्वारियों का हल दे दे| मेहनत ही हमें कोई रास्ता दे सकती है,
खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा बन्दे से पूछे ,
बता तेरी रज़ा क्या है |
अपनी मेहनत, अपनी लगन से अपने मुल्क को तरक्की के राह पर ले जाओ, क्योंकि ये सियासत के ठेकेदार सिर्फ़ गुमराह करते थे, करते हैं और आगे भी करते रहेंगे। ये किसी के नहीं है | आज हम सब ये कसम खाएं कि हम न तो हिंदू हैं, न मुसलमान सबसे पहले हम हैं एक इंसान जिसका एक ही मजहब है, वो है इंसानियत |

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(एल्बम- मिराज़ १९९६, गीतकार- शाहिद कबीर, गायक और संगीतकार- जगजीत सिंह)
--नीलम मिश्रा

तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर



अमर गीतकार और कवि शैलेन्द्र की ४२वीं पुण्यतिथि पर विशेष

"अपने बारे में लिखना कोई सरल काम नही होता. किंतु कोई आदमी फंस जाए तो ! तो लिखना आवश्यक हो जाता है. मैं भी लिखने बैठा हूँ. बाहर बूंदा-बांदी हो रही है. मौसम बड़ा सुहाना है. कभी कभी तेज़ हवा के झोंखों से परदे फड़फड़ा उठते हैं. जैसे उड़ान भरने की कोशिश कर रहें हो ! मेरी कल्पना में अतीत के धुंधले चित्र स्पष्ट होने लगते हैं. पुरानी स्मृतियाँ उममें ऐसा रंग, जो तन मन मिट जाने पर भी ना मिटे...." (कवि और गीतकार शैलेन्द्र की आत्मकथा से)

और आज से ४२ साले पहले, स्मृतियों के आकाश में विचरता वो जन साधारण के मन की बात कहने वाला कवि शरीर रूपी पिंजरा छोड़ हमेशा के लिए कहीं विलुप्त हो गया पर दे गया कुछ ऐसे गीत जो सदियों-सदियों गुनगुनाये जायेंगें, कुछ ऐसे नग्में जो हर आमो-ख़ास के दिल के जज़्बात को जुबाँ देते रहेंगे बरसों बरस. वो जिसने लिखा "दुनिया न भाये मुझे अब तो बुला ले" (बसंत बहार), उसी ने लिखा "पहले मुर्गी हुई कि अंडा" (करोड़पति), वो जिसने लिखा "डस गया पापी बिछुआ" उसी ने लिखा "क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में". वो जो यूँ ही बैठे-बैठे शब्द बुन लेता था और सिगरेट के डिब्बों पर लिख डालता था. उन्हीं शब्दों को तब पूरा देश गुनगुनाता था. वो जो सरल शब्दों में कहीं गहरे उतर जाता था. ऐसे थे हिन्दी फ़िल्म जगत कामियाब और संवेदनशील गीतकारों में से एक शंकरदास केसरीलाल शैलेन्द्र जिन्हें दुनिया शैलेन्द्र के नाम से जानती है. मशहूर संगीत समीक्षक एम॰ देसाई साहब जो शैलेन्द्र से एक बार मिले थे मरहूम संगीतकार रोशन के घर पर, उन्होंने एक जगह लिखा हैं - "शैलेन्द्र चाहते थे कि उनके गीत सबकी समझ में आए और उन्हें एक अनपढ़ कुली भी उसी मस्ती में गुनगुना सके जिस अंदाज़ में कोई पढ़ा लिखा शहरी. वो चाहते थे कि उनके गीतों को हर उम्र के लोग पसंद करें. अक्सर उनके गीत उनके ख़ुद अपने जीवन से प्रेरित होते थे. रिंकी भट्टाचार्य (स्वर्गीय विमल राय की सुपुत्री और स्वर्गीय बासु भट्टाचार्य की पत्नी) ने भी उनके बारे में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किया- "वो बहुत भावुक इंसान थे जो अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं से इस कदर प्रभावित रहते थे कि उनके रोमांटिक गीतों में भी अगर आप देखें तो आपको दार्शनिकता नज़र आएगी. पर वो गरीबी का महिमा मंडन नही करते थे, न ही दर्द को सहनभूति पाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर जताते थे. उनके गीतों में घोर निराशा भरे अन्धकार में भी जीने की ललक दिखती थी जैसे उनका गीत "तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पे यकीन कर".

अगस्त १९२३ को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) में जन्में शैलेन्द्र के पिता सेना में अधिकारी थे. रिश्तेदारी के कलहों के चलते धन संपत्ति का नुक्सान उठाने के बाद उनका परिवार मथुरा आकर बस गया जहाँ उनका बचपन बीता. गरीबी का आलम ये थे कि बच्चों को बीड़ी पीने के लिए उकसाया जाता था ताकि भूख मिट जाए. दोस्तों और अध्यापकों के आर्थिक मदद से पढ़ाई का खर्चा निकला किसी तरह. सेंट्रल रेलवे में मकेनिक की नौकरी लगी तो मुंबई तबादला हो गया. मगर कवि हृदय तो क्लेकिंग मशीन के ताल पर भी गीत गुनने लगा. काम से छूटने के बाद शैलेन्द्र PWA (प्रोग्रेसिव रायटर्स असोसिएशन) में अपना समय बिताते जिसका दफ्तर पृथ्वी राज कपूर के रोयल ओपरा हाउस के बिल्कुल सामने हुआ करता था. हर शाम यहाँ कवि संगोष्ठी हुआ करती थी. एक दिन शैलेन्द्र ने यहीं जब अपनी जोश से भरी "जलता है पंजाब" कविता सुनाई तो एक शख्स उनके पास आकर बोला - "मैं पृथ्वी राज कपूर का बेटा राज कपूर हूँ, बँटवारे की त्रासदी पर एक फ़िल्म बना रहा हूँ. मुझे लगता है कि आप उस फ़िल्म के लिए गीत लिख सकते हैं". शैलेन्द्र ने साफ़ शब्दों में मना कर दिया. महीनों गुजर गए. राज कपूर साहब ने "आग" बनाई. और नई फ़िल्म "बरसात" पर काम जारी था. शैलेन्द्र राज साहब के दफ्तर में पहुंचे और पूछा कि क्या वो राज साहब को याद हैं. राज कपूर हीरों के सच्चे कद्रदान थे, कहाँ भूलने वाले थे. शैलेन्द्र ने उनसे कहा -"मुझे ५०० रुपयों की जरुरत है" राज साहब ने झट निकाल कर दिए और पूछा कि क्या वो अब उनकी फ़िल्म में गीत लिखेंगें. इस बार शैलेन्द्र ने इनकार नहीं किया. तब तक फ़िल्म "बरसात" के दो गीतों को छोड़कर सभी गीत हसरत जयपुरी साहब मुक्कमल कर चुके थे. अन्तिम दो गीत जो शैलेन्द्र ने लिखे वो थे - "बरसात में हम से मिले तुम सजन" और "तिरछी नज़र है पतली कमर है". दोनों ही गीत बेहद मकबूल हुए. और यहीं से राजकपूर की टीम में चार नामों ने सदा के लिए अपना स्थान बना लिया. शंकर जयकिशन, हसरत और शैलेन्द्र. इस चार जन जोड़ी में अंग्रेजी अच्छे से जानने वाले केवल शैलेन्द्र ही थे. यही वजह थी कि सभी कानूनी चीज़ें (अग्रीमेंट आदि) उनके पढ़ने के बाद ही अन्य सदस्यों के दस्तखतों के लिए आगे बढ़ाई जाती थे. शंकर-जयकिशन ने तो यहाँ तक कह दिया थे कि बेशक हसरत और शैलेन्द्र किसी अन्य संगीतकार के साथ काम कर लें पर वो इन्हीं दोनों गीतकारों के साथ काम करेंगे. पर जब "कॉलेज गर्ल" के लिए राजेंद्र कृष्ण के साथ शंकर-जयकिशन ने फ़िल्म साइन की तो शैलेन्द्र बुरा मान गए. और शंकर को एक नोट लिखा "छोटी सी ये दुनिया, पहचाने रास्ते हैं तुम कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल..". उन्होंने संगीतकार जोड़ी के साथ बेरुखी से पेश आना शुरू किया. जिससे दूरियां बढ़ गई. अंत में राज साहब सब को साथ लेकर चौपाटी गए और वहां भेलपुरी खिलाकर आपसी मतभेद दूर किए. बाद में उनके लिखे उन्हीं बोलों पर किशोर कुमार का गाया गीत भी हमारे संगीत प्रेमियों को अवश्य याद आ गया होगा. फ़िल्म "बंदनी" के लिए उनका लिखा गीत "अब के बरस भेज भइया को बाबुल" बिमल दा के सहायक रहे बासु दा को बहुत पसंद था. इसी दौरान उन्होंने बासु दा से फणीश्वर नाथ रेणू की अमर कहानी "मारे गए गुलफाम" पर चर्चा की. बाद में शैलेन्द्र के फ़िल्म निर्माण की पहली और एकलौती कोशिश "तीसरी कसम" जो इसी कहानी पर आधारित थी, को बासु दा ने ही निर्देशित किया. कहते हैं कि इस फ़िल्म की असफलता ही आखिरकार मात्र ४२ साल की उम्र में उनकी मौत का कारण बनी. फ़िल्म की असफलता ने उन कर क़र्ज़ का भार चढ़ा दिया. पर उससे भी बढ़कर उन लोगों से मिले व्यवहार ने उन्हें तोड़ दिया, जिन्हें वो अपना समझते थे. अन्तिम दिनों में वो शराब के आदी हो गए थे. जब उन्हें अस्पताल में भरती करवाया गया तो उन्होंने राज साहब से वादा किया कि वो उनकी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" का अधूरा गीत "जीना यहाँ मरना यहाँ" को अवश्य पूरा करेंगें लौट कर. पर ये न हो सका. राज साहब ने इस गीत को उनके सुपुत्र शैली शैलेन्द्र से पूरा करवाया. हालाँकि "तीसरी कसम' व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही पर आज भी सिनेमा प्रेमी इस फ़िल्म की कसमें खाते हैं, और कोई भी संगीत प्रेमी इस फ़िल्म में उनके लिखे गीतों को कभी भी भुला नहीं पायेगा. बाद में इस फ़िल्म को मोस्को अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में भारत की अधिकारिक प्रविष्ठी होने का गौरव भी मिला, पर अफ़सोस शैलेन्द्र नहीं रुके इस सफलता को देखने के लिए भी.

उनके बेटे दिनेश उन्हें याद करते हुए बताते हैं कि - "वो मात्र १० साल के रहे होंगें जब पिता की मौत हुई. पर उन्हें याद है कि वो कभी भी घर पर काम लेकर नहीं आते थे, हर शाम वो हम सब बच्चों को लेकर समुद्र किनारे जाते और हम सब दो घंटे वहीं बिताते थे. पिताजी अक्सर ऊँचे पत्थरों पर बैठकर लिखते रहते थे, वापसी में हम जुहू होटल से चाय पीते हुए आते थे, उन्हें क्रोस्वर्ड खेलना बहुत पसंद था और रोटी और अरहड़ की दाल उनका पसंदीदा खाना हुआ करता था. माँ सख्त हुआ करती थी तो हम सब बच्चे पिताजी को ही अपनी ढाल बनाये रखते थे. दरअसल उनकी मौत के बाद जब अखबारों में बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ आई तब जाकर हमें उनकी विशालता का एहसास हुआ था, वरना तब तक तो राज कपूर, एस डी बर्मन, मुकेश. शंकर-जयकिशन, सलिल चौधरी जैसी बड़ी हस्तियां भी हमें सबके घरों में आने-जाने वाले मेहमानों से ही लगते थे". दिनेश आगे बताते हैं कि- "अपनी बेटी की मौत के बाद उन्होंने ईश्वर पर विश्वास करना छोड़ दिया था.. उससे पहले वो हर गीत की शुरूआत ईश्वर के नाम से करते थे पर १९४६ में जब हमारी बहन गुजर गयी तब से उन्होंने ऐसा करना छोड़ दिया. पर उन्होंने इस सोच को हममे से किसी पर लादा नहीं. माँ चूँकि बहुत धार्मिक थी, और वो उनके साथ हर धार्मिक पूजा पाठ में शामिल हो जाया करते थे, फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ बेहतरीन भजन लिखे हैं."

अपने पिता की कुछ और खूबियों का जिक्र करते हुए दिनेश बताते हैं कि -"वो डफली बहुत बढ़िया बजाते थे एक ज़माने में वह शिव मन्दिर के समारोहों में वो ऐसा नियमित करते थे, राज साहब को भी डफली पकड़ना और बजाना उन्हीं ने सिखाया. शंकर-जयकिशन की जोड़ी में भी वो संगीतकार शंकर के अधिक करीब थे. बतौर कवि वो कबीर और टैगोर की दार्शनिकता से बहुत अधिक प्रभावित रहे, और उनके गीतों में उत्तर प्रदेश के लोक गीतों का प्रभाव भी साफ़ देखा जा सकता है." फ़िल्म तीसरी कसम में उन्होंने "चलत मुसाफिर.." "लाली लाली..." जैसे मिटटी की खुशबू वाले गीत लिखे तो मशहूर "नाच" गीतों को भी उन्होंने बेहद सटीक अंदाज़ में "मारे गए गुलफाम..", 'हाय गजब...", और "पान खाए सैया हमार ऽहो..." जैसे गीतों में पेश किया ये वही फ़िल्म है जिसमें उन्होंने "सजन रे झूठ मत बोलो...", "दुनिया बनाने वाले..." और "आ आ भी जा..." जैसे गीत भी लिखे. ये कहना भी अन्याय होगा कि उनका बेहतरीन काम एस जे और राज साहब के साथ आया. एड सी और सलिल दा के साथ भी उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत रचे. संगीतकार गुलाम मोहम्मद और रोशन उनके सबसे करीबी मित्रों में से थे. संगीतकार रवि और एस एन त्रिपाठी के आलावा उन्होंने चित्रगुप्त के साथ एक बेहद कामियाब भोजपुरी फ़िल्म के लिए भी काम किया. कल्यानजी आनंदजी (सट्टा बाज़ार) और आर डी बर्मन (छोटे नवाब) ने अपना संगीत सफर उन्हीं के साथ शुरू किया. एल पी के साथ उन्हें "धरती कहे पुकार के" करनी थी, पर फ़िल्म लॉन्च होने से पहले उनका जीवन काल समाप्त हो गया, और सुनने वाले बस यही सुनते रह गए -

"कि मर के भी किसी को याद आएंगें,
किसी की आंसुओं में मुस्कुरायेंगें,
कहेगा फूल हर कली से बार बार-
जीना इसी का नाम है..."

बहुत मुश्किल है शैलेन्द्र के विशाल खजाने से चंद गीतों को चुनना फ़िर भी एक कोशिश है आज उनकी पुण्य तिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने की..सुनते हैं शब्दों के अमर शिल्पी शैलेन्द्र के कुछ यादगार गीत-


छोटी सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं फिर कहीं तो मिलोगे (फिल्म- रंगोली)
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सजन रे! झूठ मत बोलो (फिल्म- तीसरी कसम)
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तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूँद के प्यासे हम (फिल्म- सीमा)
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रमय्या वस्ता वैया (फिल्म- श्री ४२०)
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दिल तड़प-तड़प के दे रहा है ये सदा ( फिल्म- मधुमती)
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