Monday, January 5, 2009

वो जिसने हिन्दी फ़िल्म संगीत की तस्वीर ही बदल दी...- ए आर रहमान.




बात १९९१ की है। तमिल फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन निर्देशक मणिरत्नम और बेहतरीन संगीतकार इल्लैया राजा की वर्षों पुरानी जोड़ी टूट चुकी थी। मणिरत्नम एक नए और फ्रेश संगीतकार की खोज में थे। हर साल की तरह उस साल भी मणिरत्नम का एक जानेमाने अवार्ड फंक्शन में जाना हुआ। समारोह शुरू होने से पहले वहाँ कुछ ऎड जिंगल्स (ad jingles) प्ले हो रहे थे। मणिरत्नम धुनों से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने उस संगीतकार के कुछ और गानों की फरमाईश की। धुनों का असर बढता गया। समारोह के बाद मणिरत्नम उस संगीतकार के म्युजिक रिकार्डिंग स्टुडियो भी गए। उस गुमनाम संगीतकार ने अपना एक पुराना गीत मणिरत्नम को सुनाया, जिसे उसने बरसों पहले "कावेरी विवाद" के सिलसिले में तैयार किया था। मणिरत्नम ने तनिक भी देर न करते हुए, अपनी नई फिल्म के लिए इस गीत की माँग कर दी और साथ हीं साथ इस नए-से संगीतकार को साईन भी कर लिया। वह मकबूल फिल्म थी "बालचंदर्स कवितालय" की "रोज़ा", वह गाना था "तमिज़ा तमिज़ा", जो हिंदी में अनुवादित होकर हुआ "भारत हमको जान से प्यारा है" और वह अनजाना सा संगीत-दिग्दर्शक था महज़ २४ साल का "अब्दुल रहमान",जिसे आज सारी दुनिया "ए०आर०रहमान" के नाम से जानती है। जानकारी के लिए बता दूँ कि "तमिज़ा तमिज़ा" दर-असल तमिलनाडु की गौरवशाली भूमि,इतिहास एवं वर्त्तमान का बखान है, जिसे जब हिंदी में बदला गया तो इससे किसी प्रदेश की बजाय पूरे हिन्दुस्तान की बात जुड़ गई। रही बात "अब्दुल रहमान" की तो फिल्म-इंडस्ट्री में इससे बड़ी और अनोखी इंट्री आज तक किसी भी फनकार की नहीं हुई। पहली हीं फिल्म "रोज़ा" के गानों के लिए "रहमान" को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया।

चलिए अब अतीत में चलते हैं। "अब्दुल रहमान"(धर्म परिवर्त्तन से पहले ए०एस० दिलीप कुमार)के पिता मलयालम फिल्मों में संगीत दिया करते थे। सलिल चौधरी जैसे संगीतकारों का उनके घर आना-जाना लगा रहता था। ऎसे हीं एक दिन संगीतकार सुदर्शनम मास्टर का रहमान के घर आना हुआ तो उन्होंने देखा कि एक चार साल का बच्चा हार्मोनियम पर एक धुन प्ले कर रहा था। सुदर्शनम साहब ने धुन की लिखी हुई प्रति छुपा दी ताकि बच्चे की तल्लीनता एवं कर्मठता भांप सकें। वही हुआ, जिसका अंदेशा था। बच्चा उसी तत्परता से धुन प्ले करने में लगा रहा,मालूम होता था मानो धुन जबानी याद हो। सुदर्शनम साहब ने तत्क्षण रहमान के पिता को मशवरा दे डाला कि इसे संगीत-साधना में लगाओ। इस तरह महज़ चार साल की उम्र में हीं "रहमान" संगीत की शिक्षा लेने लगे । रहमान जब नौ साल के थे, तो उनके पिता का देहांत हो गया। रहमान उस घटना को याद करते हुए कहते हैं -"मैं संगीत को कभी भी गंभीरता से नहीं लेता था, मैं कम्प्यूटर या इलेक्ट्रानिक इंजीनियर बनना चाहता था, लेकिन पिता की मौत ने मेरे सामने बस एक हीं रास्ता छोड़ा - संगीत। पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे हीं कंधे पर आ गई। पैसों की कमी थी, इसलिए पहले तो संगीत के साज़-औ-सामान की निलामी करनी पड़ी,लेकिन जब उससे भी काम न बना तो मैं इल्लैया राजा के ट्रुप में की-बोर्ड प्लेअर की तौर पर शामिल हो गया। गिटार बजाना भी वहीं सीखा।" और फिर यूँ संगीत की दुनिया को एक बेजोड़ हीरा मिला,जिसे वक्त ने तराशा था। इसे भी वक्त की विडम्बना कहिये कि जिस दिन उनके पिता की मृत्यु हुई उसी दिन उनका ख़ुद का स्वरबद्ध किया पहला गीत बाज़ार में आया था.

रहमान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे धुनों पर अपनी छाप छोड़ना जानते हैं। चाहे धुन कितने भी पारंपरिक क्यूँ न हों, रहमान उसे अपने अलहदा अंदाज में लिखते हैं और अंततोगत्वा वही धुन कुछ नया हीं होकर निकलता है। उनके साउंड रिकार्डिस्ट "श्रीधर" रहमान की इस खूबी के बारे में कहते हैं- "उन्हें अपने हर गाने की खास जरूरत मालूम होती है। मसलन बांसूरी से बस कलरव करती हवा की आवाज़........" । आप रोज़ा का "रोज़ा जानेमन ...." सुने, वहाँ अंतरा के दो छंदों के मध्य आपको बांसुरी का बड़ा हीं मनोरम एवं अनूठा प्रयोग सुनाई देगा। रहमान की यही विशेषता है, जो उन्हें औरों से जुदा करती है।

सुनिए "रोजा जाने मन.." फ़िल्म रोजा से-



अमिताभ बच्चन कार्पोरेशन लिमिटेड(ए०बी०सी०एल०) के तहत आई मणिरत्नम की फिल्म "बम्बे" ने ए०आर०रहमान० के कैरियर को एक अलग हीं ऊँचाई दी। फिल्म हिंदी में डब हुई और सारे गाने बेहद लोकप्रिय हुए। रहमान के लिए बालीवुड के रास्ते खुल गए। राम गोपाल वर्मा ने "रंगीला" के गाने "रहमान" से तैयार करवाए और "रहमान" के संगीत का जादू देखिए कि फिल्म "म्युजिकल" नहीं होकर भी बहुत बड़ी "म्युजिकल हिट" साबित हुई। "रंगीला" के "हाय रामा" गाने को कौन भूल सकता है। हरिहरन की आवाज़ का संतुलन और स्वर्णलता का मदहोश कर देने वाला स्वर बड़ी हीं बारीकी से दिल में उतरता है। भारतीय एवं पाश्चात्य वाद्य-यंत्रों का एक साथ ऎसा प्रयोग भला और कौन संगीतकार कर सकता था। "प्यार ये जाने कैसा है" में सुरेश वाडेकर एवं कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ एवं शास्त्रीय संगीत की स्वर-लहरियाँ रहमान की प्रतिभा का एक नया आयाम दर्शाती हैं । बारीकी से देखें तो यकीनी तौर पर यह कहा जा सकता है कि इस फिल्म के सभी गाने एक-दूसरे से बेहद अलहदा थे।

सुनिए "प्यार ये जाने कैसा है..." फ़िल्म रंगीला से-



रंगीला के बाद आई रहमान को पहला ब्रेक देने वाले मणिरत्नम की फिल्म "दिल से" और इस फिल्म ने साबित कर दिया कि रहमान कितना दिल से काम करते हैं। "दिल से" के गाने "छैंया छैंया" में रहमान ने "सुखविंदर सिंह" को मौका दिया और इस मौके ने पूरे हिन्दी-फिल्म एवं संगीत जगत को दिया एक नया सितारा। "सुखविंदर" आज भी अपनी कामयाबी का पूरा श्रेय रहमान को हीं देते हैं। फिल्म में रहमान ने एक गाना "दिल से" को अपनी आवाज़ दी और देखते हीं देखते रहमान की आवाज़ कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैल गई। सारे संगीत प्रेमी उस सीधी एवं सुलझी हुई आवाज़ के कायल हो गए। यूँ तो रहमान को "हिंदी" की ज्यादा जानकारी नहीं है,लेकिन उनकी आवाज़ सुनकर ऎसा तनिक भी महसूस नहीं होता।

"दिल से" के बाद रहमान ने और भी कई हिंदी फिल्मों में संगीत दिया, मसलन "दौड़", "कभी न कभी", "शिखर" ,"लव यू हमेशा" ,"१९४७-अर्थ' , लेकिन रहमान को बालीवुड में सही पहचान मिली फिल्म "ताल" की सफलता के बाद। "ताल" के बाद हीं उन्हें बालीवुड संगीतकारों की फेहरिश्त में शामिल किया जाने लगा। "अर्थ" के दो गाने "रूत आ गई रे" और "ईश्वर अल्लाह" ने भी खासा नाम किया था ,लेकिन फिल्म के बाकी गाने कुछ ज्यादा प्रभाव नहीं दिखा सके। "रूत आ गई रे" को सुखविदंर अब भी अपना सबसे पसंदीदा गाना मानते हैं ...इस गाने में है हीं ऎसी बात कि जो भी सुन ले,वो खो जाए। "ईश्वर अल्लाह" में रहमान के संगीत के साथ-साथ जावेद अख्तर के बोल भी बेहद हृदय-स्पर्शी हैं।

सुनिए "रुत आ गई रे..." फ़िल्म १९४७ - अर्थ से रहमान का गीत -



चित्र में उपर - रहमान पत्नी सैरा बानो के साथ, (याद कीजिये फ़िल्म बॉम्बे में नायिका का भी यही नाम था...)

देखिये रहमान का शायद सबसे पहला इंटरव्यू जो उन्होंने दूरदर्शन के सुरभि कार्यक्रम के लिए दिया था. तब उनकी पहली फ़िल्म "रोजा" प्रर्दशित हुई ही थी.




प्रस्तुति - विश्व दीपक "तन्हा"
(जारी....)

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5 श्रोताओं का कहना है :

सजीव सारथी का कहना है कि -

मुझे याद है जब मैंने रोजा देखी थी तब इसका संगीत सुनकर दंग रह गया था. हर note हर सुर नया और ताज़ा. तमिल फ़िल्म जेंटलमैन का संगीत भी मुझे बहुत पसंद है. ख़ास कर एक गीत में जो चलती रेल का ट्रैक था कमाल का था, कुछ फिल्में उनकी कम चली पर उनके गीत भी कुछ कम नही थे, फ़िल्म हमसे है मुकाबला में कुछ नाच के गीत अधिक चले थे पर "प्यार के संगीत में.." जैसे गीत मुझे आजतक पसंद है. मेरे ख्याल से दिल से में उनका संगीत अपने चरम पर पहुँचा....जहाँ उन्हें गुलज़ार के बोलों का साथ मिला, पर गजब ये है कि दिल से के इतने सालों बाद भी उन्होंने ख़ुद को चरम पर बनाये रखा हुआ है. आपने बहुत सी पुरानी बातें याद दिला दी...बहुत बढ़िया लिखा है

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन का कहना है कि -

रहमान का सुरभि वाला इंटरव्यू देखकर तो ऐसा लगा मानो समय वापस लौट आया हो. बहुत सुंदर प्रस्तुति - धन्यवाद!

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

विश्व दीपक जी,

आपने ए॰ आर॰ रहमान पर इस तरह से जानकारी देकर हम जैसे संगीतप्रेमियों पर उपकार किया है।

मुझे आज भी याद है, जब मैं कक्षा ६-७ में पढ़ता था। शॉर्टवेब पर आकाशवाणी के पंचरंगी कार्यक्रम विविधभारती की सुबह की सेवा में सुबह 8:15 बजे से नए फिल्मी गीतों का कार्यक्रम प्रसारित होता था 'चित्रलोक' (अब भी होता है, लेकिन अब उसमें वो रंग नहीं जो उस समय था)। उस समय नये फिल्मी गीतों को विज्ञापन के रूप में (प्रोमो के रूप में) प्रसारित किया जाता था।

उस समय 'हम से है मुक़ाबला' का गाना 'उर्वशी-उर्वशी, टेक-इट-इजी उर्वशी, उँगली जैसी दुबली को नहीं चाहिए फॉर्मेसी' बजता था, मज़ा आ जाता था। पी॰के॰ मिश्रा ने बोलों के साथ कितना सामयिक और सुंदर प्रयोग किया था ए॰ आर॰ रहमान ने। इसी फिल्म का एक और गीत-"सुन री सखी, मेरी प्यारी सखी रे, दिल यहीं खोया है मेरा।' फिर क्या था, मेरी उम्र के मेरे सभी दोस्त ए॰ आर॰ रहमान की धुन को पहचान लिया करते थे, क्योंकि शुरू से ही रहमान की धुने अलग होती थीं। अब देखिए ना, 'तू ही मेरा दिल' के इस गाने धुन 'सुन ले ओ जाना, मैं हूँ परमशिवम, तू है पार्वती मिलना जनम-जनम, सुन ले मीनाक्षी, तू ही मेरा दिल'। कोई और संगीतकार इस तरह की धुन बना सकता था क्या!

१९९६ में आई फिल्म 'हिन्दुस्तानी' के गाने- 'लटका लगा दिया हमने' और 'टेलीफोन धुन में हँसने वाली'। क्या गाने थे!!!
मैं तो कहूँगा कि श्रोताओं को ये सब गीत भी सुनने चाहिए। शायद सभी को याद हो १९९७ में आई फिल्म 'दुनिया दिलवालों की' का यह गाना कितना लोकप्रिय हुआ था 'हैलो डॉक्टर, दिल की चोरी हो गई॰॰॰' और इससे भी अधिक इसका यह गाना 'मुस्तफ़ा-मुस्तफ़ा डोन्ट वरी मुस्तफा, हम हैं तुम्हारे मुस्तफ़ा'। सच बताऊँ तो मैं उस दौर यह गाने दिन भर में कम से कम १० बार गुनगुनाता था।

१९९८ में आई फिल्म 'जीन्स'। इसके गाने तो कालजयी हैं।
'कोल्मबस-कोल्मबस, छुट्टी है आई, आओ कोई नया मुल्क ढूँढे मिल के भाई। छुट्टी-छुट्टी, कोई लहर दिल में उट्ठी।' इसी साल आई फिल्म 'सपने' के गाने। 'आवारा भँवरा' और 'एक बगिया में रहती है एक मैना'।
दौड़ का गाना-
'ओ भँवरे! देखो हम दीवानों को, मस्ती में मस्तानों को, अपनी ही धुन में चले हैं, दुनिया से क्या लेना है।' या फिर '

और एक बहुत लोकप्रिय हुआ गाना ' कोई यहाँ भानुमती, कोई यहाँ रूपमती॰॰॰॰" जी हाँ 'प्रियंका' का गाना।

बहुत से गाने हैं। मुझे लगा कि आप 'ताल' पर बहुत जल्दी पहुँच गये। ताल से पहले तो 'डोली सजा के रखना' के कालजयी गीत की भी चर्चा होनी चाहिए थी। क्या पता आप आगे चर्चा करें क्योंकि अभी तो यह 'शृंखला' ज़ारी है:)

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

शैलेश जी , टिप्पणी के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया। आपने जो बातें बताई हैं, वे बहुत हीं उपयोगी हैं और मैं मानता हूँ कि मैं जल्द हीं "ताल" तक पहुँच गया। दर-असल आलेख लिखने समय मेरी यह कोशिश थी कि कुछ मज़ेदार बातें श्रोताओं के सामने लाऊँ। इसलिए ये सारे गाने छूट गए। लेकिन आपने मेरा काम आसान कर दिया। मुश्किल तो यह है कि रहमान के बारे में जितना लिखा जाए कम है। बस "तीन" आलेखों में उनकी उपलब्धि को समेटा नहीं जा सकता।

दूसरा आलेख जो कुछ हीं देर में आवाज़ पर आने वाला है,उसमें भी रहमान से जुड़ी कुछ मज़ेदार कहानियाँ हैं।

आप ऎसे हीं आनंद लेते रहें। हाँ, दूसरे आलेख में भी कम हीं गाने हैं,लेकिन तब भी आपको विश्वास दिलाता हूँ,कि जिन किस्सों का मैने जिक्र किया है या करने वाला हूँ, वे आपको भाएँगे।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

hotmail sign in का कहना है कि -

चलिए अब अतीत में चलते हैं। "अब्दुल रहमान"(धर्म परिवर्त्तन से पहले ए०एस० दिलीप कुमार)के पिता मलयालम फिल्मों में संगीत दिया करते थे। सलिल चौधरी जैसे संगीतकारों का उनके घर आना-जाना लगा रहता था। ऎसे हीं एक दिन संगीतकार सुदर्शनम मास्टर का रहमान के घर आना हुआ तो उन्होंने देखा कि एक चार साल का बच्चा हार्मोनियम पर एक धुन प्ले कर रहा था। सुदर्शनम साहब ने धुन की लिखी हुई प्रति छुपा दी ताकि बच्चे की तल्लीनता एवं कर्मठता भांप सकें। वही हुआ,

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