Saturday, November 14, 2009

नन्हा मुन्ना राही हूँ...देश का सिपाही हूँ....बोलो मेरे संग जय हिंद....जय हिंद के नन्हे शहजादे



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 262

ज है १४ नवंबर, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु जी की जयंती, जिसे पूरे देश भर में 'बाल दिवस' के रूप में मनाया जाता है। पं. नेहरु के बच्चों से लगाव इतना ज़्यादा था, बच्चे उन्हे इतने ज़्यादा प्यारे थे कि बच्चे उन्हे प्यार से 'चाचा नेहरु' कहकर बुलाते थे। इसलिए १९६३ में उनकी मृत्यु के बाद आज का यह दिन 'बाल दिवस' के रूप में मनाया जाता है, और आज के दिन सरकार की तरफ़ से बच्चों के विकास के लिए तमाम योजनाओं का शुभारंभ किया जाता है। आज का यह दिन जहाँ एक तरफ़ उस पीढ़ी को समर्पित है जिसे कल इस देश की बागडोर संभालनी है, वहीं दूसरी ओर यह उस नेता को याद करने का भी दिन है जिन्होने इस देश को नींद से जगाकर एक विश्व शक्ति में परिवर्तित करने का ना केवल सपना देखा बल्कि उस सपने को सच करने के लिए कई कारगर क़दम भी उठाए। बच्चों के साथ पंडित जी के अंतरंग लगाव के प्रमाण के तौर पर उनकी बहुत सारी ऐसी तस्वीरें देखी जा सकती है जिनमें वो बच्चों से घिरे हुए हैं। कहा जाता है कि एक बार किसी बच्चे ने उनकी जैकेट में लाल रंग का गुलाब लगा दिया था, और तभी से उनकी यह आदत बन जई अपने जैकेट में लाल गुलाब लगाने की। पंडित जी के सम्मान में National Children's Center को 'जवाहर बाल भवन' का नाम दिया गया है। पंडित जी का हमेशा यह मानना था कि कोई भी देश तभी विकास के पथ पर आगे बढ़ सकता है जब उस देश के बच्चों का सही तरीके से विकास हो, क्योंकि आज का बचपन जैसा होगा, कल की जवानी वैसी ही होगी। जब तक भीत मज़बूत नहीं होगी, तब तक उस पर बनने वाला मकान मज़बूत नहीं हो सकता। तो दोस्तों, इसी 'बाल दिवस' को केन्द्र में रखते हुए इन दिनों हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं बच्चों वाले गीतों की एक ख़ास लघु शृंखला 'बचपन के दिन भुला ना देना'। आज का यह एपिसोड बच्चों के साथ साथ समर्पित है देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु जी की स्मृति को!

आज जिस गीत को हमने चुना है वह बड़ा ही उपयुक्त है आज के दिन के लिए। जहाँ एक तरफ़ यह गीत बच्चे पर फ़िल्माया गया है और एक बच्ची ने ही गाया है, वहीं दूसरी ओर देश भक्ति की भावना भी कूट कूट कर भरी हुई है इस गाने में। कल के गीत की ही तरह यह गीत भी एक सदाबहार बच्चों वाला गीत है जिसे आज भी हर बच्चा फ़ंक्शन्स में गाता है, हर स्कूल में गूंजते रहते हैं। अपनी तरह का एकमात्र गीत है यह-"नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ, बोलो मेरे संग जय हिंद जय हिंद जय हिंद"। शांति माथुर की आवाज़ में यह फ़िल्म 'सन ऑफ़ इंडिया' का गीत है। इसी फ़िल्म का और शांति माथुर का ही गाया हुआ एक अन्य गीत "आज की ताज़ा ख़बर" आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन चुके हैं। उस गीत की तरह यह गीत भी साजिद ख़ान पर फ़िल्माया गया था जो कि महबूब ख़ान साहब के बेटे हैं। शांति माथुर और साजिद ख़ान से जुड़ी जितनी भी बातें हम बटोर सके थे हम उसी कड़ी में आप को बता चुके थे। १९६२ में मेहबूब ख़ान द्वारा निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म के दूसरे मुख्य कलाकार थे कमलजीत और सिमी गरेवाल। महबूब साहब को इस फ़िल्म के निर्देशन के लिए उस साल के 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' के लिए नॊमिनेट किया गया था। शक़ील और नौशाद के गीत संगीत गूंजे इस फ़िल्म में। युं तो शक़ील और नौशाद साहब के गानें बड़े ही दूसरे किस्म के होते हैं, लेकिन इस बाल-गीत को जिस तरह की ट्रीटमेंट चाहिए थी, बिल्कुल वैसा कर दिखाया इन दोनों ने। जहाँ एक तरफ़ शब्दों में पूरे जोश के साथ इस देश के सुनहरे भविष्य के सपने हैं, वही दूसरी तरफ़ संगीत भी ऐसा जोशीला लेकिन मासूम कि स्थान, काल, पात्र, हर पक्ष को पूरा पूरा न्याय करे। इस गीत में पंडित नेहरु का सपना भी शामिल है जब शक़ील साहब लिखते हैं कि "नया है ज़माना मेरी नई है डगर, देश को बनाऊँगा मशीनों का नगर, भारत किसी से रहेगा नहीं कम, आगे ही आगे बढ़ाउँगा क़दम"। यही तो था नेहरु जी का सपना! शांति माथुर की आवाज़ में "दाहिने बाएँ दाहिने बाएँ थम" तो जैसे इस गीत का पंच लाइन है। माउथ ऒर्गैन का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है, इस गीत का रीदम ऐसा है कि इसे स्कूलों में मार्च-पास्ट सॉन्ग के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। दोस्तों, पेश-ए-ख़िदमत है एक और कालजयी बाल गीत, और चलते चलते हिंद युग्म की तरफ़ से चाचा नेहरु को श्रद्धा सुमन!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत फिल्माया गया था बेबी सोनिया पर जो आगे चल कर एक मशहूर अभिनेत्री बनी.
२. बोल लिखे साहिर ने.
३. एक अंतरे में शब्द है -"झगडा".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी मात्र एक जवाब दूर हैं दूसरी बार विजेता का ताज पहनने से बहुत बहुत बधाई. नीलम जी धन्येवाद....अपने बच्चों की (बाल उधान के) हजारी लगाईये अब यहाँ अगले दस दिनों तक....निर्मला जी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मुक्तिबोध की कहानी "पक्षी और दीमक"



सुनो कहानी: मुक्तिबोध की "पक्षी और दीमक"
'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद की हृदयस्पर्शी कहानी "सभ्यता का रहस्य" का पॉडकास्ट सुना था। मानवमात्र की अस्मिता, संघर्ष और राजनीतिक चेतना के साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध के जन्मदिन के अवसर पर आज हम उन्ही की एक कहानी "पक्षी और दीमक" सुना रहे हैं, जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 5 मिनट 22 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




मुझको डर लगता है कहीं मैं भी तो सफलता के चन्द्र की छाया में घुग्घू या सियार या भूत न कहीं बन जाऊँ।
~ गजानन माधव मुक्तिबोध (१३ नवंबर १९१७ - ११ सितंबर १९६४)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

बेवकूफ, मैं दीमक के बदले पंख लेता हूं। पंख के बदले दीमक नहीं।
(मुक्तिबोध की "पक्षी और दीमक" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Fourty Sixth Story, Pakshi Aur Dimak: Muktibodh/Hindi Audio Book/2009/40. Voice: Anurag Sharma

Friday, November 13, 2009

नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए.....आज भी बच्चे इस गीत को सुन मुस्कुरा देते हैं



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 261

"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो युं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए"। दोस्तों, किसी ने ठीक ही कहा है कि रोते हुए किसी बच्चे को हँसाने में और ख़ुदा की इबादत में कोई फ़र्क नहीं है। बच्चे इतने निष्पाप और मासूम होते हैं कि भगवान स्वयम् ही उनमें निवास करते हैं। बच्चों की इसी मासूमियत और भोलेपन में वह जादू होता है जो कठोर से कठोर इंसान का भी दिल पिघला दे। और यह कहते भी हैं कि वह व्यक्ति किसी का ख़ून भी कर सकता है जिसे बच्चे पसंद नहीं। तो दोस्तों, आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर अगले १० दिनों तक आप सुनेंगे बच्चों की इन्ही मासूमीयत और नटखट शरारतों में लिपटे हुए १० सदाबहार गीत जिन्हे बाल कलाकारों पर फ़िल्माए गए हैं और हमारे लिए जितना संभव हो सका है हमने ऐसे गानें चुनने की कोशिश की है जिन्हे बाल गायक गायिकाओं ने ही गाए हैं, चाहे मुख्य रूप से हों या फिर कोरस में। तो दोस्तों, अब अगले १० दिनों के लिए आप भी हमारे संग बच्चे बन जाइए और खो जाइए अपने बचपन की उस सजीली, रंग बिरंगी, सपनों भरी दुनिया में। आपकी ख़िदमत में ये है लघु शृंखला 'बचपन के दिन भुला ना देना'। इस शृंखला की शुरुआत हम कर रहे हैं एक ऐसे गीत से जिसके बनने के बाद से लेकर आज तक हर बच्चा अपने बचपन में यह गीत गाता आया है, जिसे स्कूल के फ़ंक्शन्स पर बच्चे अक्सर गाते हैं, जिसे अगर हिंदी का नर्सरी राइम भी कहा जाए तो शायद बहुत ग़लत ना होगा। याद है ना आपको "नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए, बाकी जो बचा था कल चोर ले गए"? १९६० की फ़िल्म 'मासूम' का यह गीत याद करते ही दो नाम जो सब से पहले ज़हन में आते हैं, उनमें से एक तो हैं इस गीत की गायिका रानू मुखर्जी और दूसरी, फ़िल्म के पर्दे पर इस गीत को निभाती हुई छोटी सी नन्ही सी हनी इरानी। जी हाँ, ये वही हनी इरानी हैं जिन्होने बहुत सारी फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार काम किया है, और हाल के कुछ सालों में दादी नानी के किरदारों में छोटे पर्दे पर नज़र आईं थीं। समय तो रुका नहीं रहता लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड और फ़िल्मों के द्वारा जिन लम्हों को हमने क़ैद कर रखा है उनका बार बार आनंद हम उठाते रहे हैं। इस गीत से जुड़ी ये दोनों बच्चियाँ आज अपने छठे दशक को छू रहीं होंगी, लेकिन पर्दे पर, रिकार्ड पर, और लोगों के दिलों पर यह गीत कालजयी बन कर रह गया है।

फ़िल्म 'मासूम' के मुख्य कलाकर थे अशोक कुमार, सुरेश इरानी और मास्टर निसार। युं तो फ़िल्म के ज़्यादातर गीतों के गीतकार थे राजा मेहंदी अली ख़ान और संगीतकार थे रॊबिन बैनर्जी, लेकिन प्रस्तुत गीत को (उपलब्ध जानकारी के अनुसार) शैलेन्द्र ने लिखा था और इसकी धुन बनाई थी हेमन्त कुमार ने। इस गीत को गाने वाली छोटी सी बच्ची रानू मुखर्जी हेमन्त दा की ही सुपुत्री हैं। इस गीत की ख़ास बात यह है कि उन दिनों पार्श्व गायिकाएँ ही बच्चों के लिए प्लेबैक किया करती थीं। यह गीत एक तरह से ऐसा पहला गीत है कि जिसमें किसी बाल गयिका ने किसी बाल अभिनेत्री का पार्श्वगायन किया हो। और यह बताना भी ज़रूरी है कि यह गीत शायद सब से कम उम्र के किसी बच्चे के द्वारा गाए जानेवाला गीत रहा होगा। कितनी उम्र रही होगी रानूकी उस वक़्त, यही कोई ३ या ४ साल! सलिल चौधरी की सुपुत्री अंतरा चौधरी की तरह रानू भी आगे चलकर हिंदी फ़िल्म संगीत में सक्रीय नहीं हुईं, लेकिन इस एक गीत ने उनका नाम मोटे अक्षरों में हिंदी फ़िल्म संगीत के इतिहास में दर्ज करवा दिया। रानू मुखर्जी के बारे में ज़्यादा जानकारियाँ उपलब्ध नहीं है, गूगल में ढ़ूंढें तो "रानू" के बदले "रानी" मुखर्जी के ही तथ्य सामने आते हैं। तो आइए, सुनते हैं इस कालजयी गीत को, यह गीत किसी को पसंद ना आए, और गीत को सुनते हुए चेहरे पर मुस्कुराहट ना खिले, यह असंभव है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म में बाल कलाकारों का साथ दिया था कमलजीत और सिमी गरेवाल ने.
२. इस फिल्म के लिए निर्देशक को फिल्म फेयर में नामांकन मिला था.
३. मुखड़े की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"देश".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी ४६ अंकों के साथ मंजिल के करीब हैं अब....बधाई. निशांत जी आपकी पसंद का गीत भी जल्द ही सुनवायेंगें...धन्येवाद

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, November 12, 2009

हमने खायी है मोहब्बत में जवानी की क़सम....ज्ञान साहब का संगीतबद्ध एक दुर्लभ गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 260

फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर हम झाँकें तो ऐसे कई कई नाम ज़हन में आते हैं, जिन नामों पर जैसे वक़्त की धूल सी चढ़ गई है, और रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में जिन्हे हम आज बड़ी मुश्किल से याद करते हैं। लेकिन एक वक़्त ऐसा था जब ये फ़नकार, कम ही सही, लेकिन अपनी प्रतिभा के जौहर से फ़िल्म संगीत के विशाल ख़ज़ाने को अपने अपने अनूठे ढंग से समृद्ध किया था। इनमें शामिल हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के कई बड़े बड़े संगीतकार भी, जिन्हे आज की पीढ़ी लगभग भुला ही चुकी है। लेकिन संगीत के सच्चे रसिक आज भी उन्हे याद करते हैं, सम्मान करते हैं। और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' एक ऐसा मंच है जो फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों के हर दौर के कलाकारों को समर्पित है। आज एक ऐसे ही गुणी संगीतकार का ज़िक्र कर रहे हैं, आप हैं फ़िल्म संगीत के पहली पीढ़ी के संगीतकार ज्ञान दत्त। ज्ञान दत्त जी का नाम याद आते ही याद आते हैं सहगल साहब के गाए फ़िल्म 'भक्त सूरदास' के तमाम भजन। 'भक्त सूरदास' और ज्ञान दत्त जैसे एक दूसरे के पर्याय बन गए थे। यह ४० का दौर था। फिर धीरे धीरे बदलते दौर के साथ साथ ज्ञान दत्त भी पीछे पड़ते गए और सन् १९५० में उनकी अंतिम "चर्चित" फ़िल्म आई 'दिलरुबा'। हालाँकि इसके बाद भी उन्होने कुछ फ़िल्मों में संगीत दिए लेकिन वो नहीं चले। आज हम सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दिलरुबा' का एक युगल गीत जिसे गाया है गीता रॉय और जी. एम. दुर्रानी ने। इस फ़िल्म में ज्ञान दत्त के स्वरबद्ध गीतों को लिखे डी. एन. मधोक, बूटाराम शर्मा, नीलकंठ तिवारी, एस. एच, बिहारी और राजेन्द्र कृष्ण जैसे गीतकारों ने। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गानें गीता रॉय की आवाज़ में थे, लेकिन दो दुर्लभ युगलगानें भी शामिल है। दुर्लभ इसलिए कि इन गीतों में बहुत ही रेयर आवाज़ें मौजूद हैं। गीता जी ने ये दोनों गानें प्रमोदिनी देसाई और जी. एम. दुर्रनी के साथ गाया है। दुर्रनी साहब वाला गीत आज आपकी नज़र कर रहे हैं जिसके बोल हैं "हमने खाई है मोहब्बत में जवानी की क़सम, न कभी होंगे जुदा हम"।

'दिलरुबा' द्वारका खोसला की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे देव आनंद और रेहाना। आज के प्रस्तुत गीत को लिखा था एस. एच. बिहारी ने। बिहारी साहब का पदार्पण फ़िल्म जगत में १९४९ में हुई थी जब अनिल बिस्वास ने उनसे लिखवाया था फ़िल्म 'लाडली' का एक गीत "मैं एक छोटी सी चिंगारी"। मीना कपूर की आवाज़ में इस गीत को फ़िल्म के खलनायिका पर फ़िल्माया गया था। उसके बाद सन् '५० में ज्ञान दत्त ने उनसे 'दिलरुबा' में यह गीत लिखवाया था। बिहारी साहब ने इसी फ़िल्म में एक और गीत भी लिखा था जिसे शमशाद बेग़म, प्रमोदिनी, गी. एम. दुर्रनी और साथियों ने गाया था और इस गाने की अवधि थी कुल ७ मिनट और ४० सेकन्ड्स। ख़ैर, बात करते हैं आज के प्रस्तुत गीत की। पाश्चात्य संगीत संयोजन से समृद्ध इस हल्के फुल्के युगल गीत में उस ज़माने की पीढ़ी का रोमांस दर्शाया गया है। इस भाव पर असंख्य गानें समय समय पर बने हैं। कुछ बातें हमारे समाज की कभी नहीं बदलती है चाहे उसका अंदाज़ बदल जाए। प्यार में क़समें खाने की परंपरा सदियों पहले भी थी, इस फ़िल्म के समय भी थी, और आज भी है। लेकिन अंदाज़ ज़रूर बदल गया है। कहाँ है वह मासूमियत जो प्यार में हुआ करती थी उस ज़माने में! आज सब कुछ इतना खुला खुला सा हो गया है कि वह शोख़ी, वह नाज़ुकी, वह मासूमियत कहीं ग़ायब हो गई है। लेकिन हम उसी मासूमियत भरे अंदाज़ का मज़ा आज लेंगे इस गीत को सुनते हुए।

इस गीत को सुनने के बाद आपको एक काम यह करना है कि ५० और ६० के दशकों से कम से कम १० गीत ऐसे चुनने हैं जिसमें प्यार में क़सम खाने की बात कही गई है। हो सकता है कि सब से पहले जवाब देने वाले को हम कोई इनाम भी दे दें, तो ज़रूर कोशिश कीजिएगा, और फिलहाल मुझे आज्ञा दीजिए, नमस्कार!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी नन्हे मुन्ने बच्चों को समर्पित श्रृंखला -"बचपन के दिन भुला न देना".
२. शैलेन्द्र ने लिखा था इस गीत को.
३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"रेल".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी लगता है बाकी सब पीछे हट गए हैं, क्योंकि शेर तो एक ही सकता है जंगल में....बधाई आप ४४ अंकों पर आ चुके हैं...अरे भाई कोई तो इन्हें टक्कर दो....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, November 11, 2009

मन धीरे धीरे गाए रे, मालूम नहीं क्यों ...तलत और सुरैया का रेशमी अंदाज़



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 259

१९५८ में गायक तलत महमूद कुल तीन फ़िल्मों में बतौर अभिनेता नज़र आए थे। ये फ़िल्में थीं 'सोने की चिड़िया', 'लाला रुख़' और 'मालिक'। जहाँ पहली दो फ़िल्में 'फ़िल्म इंडिया कॊर्पोरेशन' की प्रस्तुति थीं, 'मालिक' फ़िल्म का निर्माण किया था एस. एम युसूफ़ ने अपनी 'सनी आर्ट प्रोडक्शन्स' के बैनर तले। फ़िल्म की नायिका थीं सुरैया। दोस्तों, १९५८ तक पार्श्वगायन पूरी तरह से अपनी शबाब पर था। ३० और ४० के दशकों के 'सिंगिंग्‍ स्टार्स' फ़िल्म जगत के आसमान से ग़ायब हो चुके थे, कुछ देश विभाजन की वजह से, कुछ बदलते दौर और तकनीक की वजह से। लेकिन कुछ ऐसे कलाकार जिनकी गायन प्रतिभा उनके अभिनय की तरह ही पुख़्ता थी, वो ५० के दशक में भी लोकप्रिय बने रहे। इसका सीधा सीधा उदाहरण है तलत महमूद और सुरैया। ये सच है कि तलत साहब एक गायक के रूप में ही जाने जाते हैं, लेकिन अभिनय में रुचि और नायक जैसे दिखने की वजह से वो चंद फ़िल्मों में बतौर नायक काम किया था। और सुरैया के तो क्या कहने! अभिनय और गायन, दोनों में लाजवाब! लेकिन दूसरी अभिनेत्रियों के लिए पार्श्वगायन ना करने की सोच ने उन्हे पीछे धकेल दिया था ५० के दशक में। ज़्यादातर फ़िल्मकार उनसे गीत गवाना चाहते थे लेकिन दूसरी अभिनेत्रियों के लिए, जो उन्हे कतई मंज़ूर नहीं था। १९५८ की फ़िल्म 'मालिक' में ये दोनों कलाकार एक साथ नज़र आए और इस तरह से इस फ़िल्म को मिले दो 'सिंगिंग्‍ स्टार्स'। अब ज़ाहिर सी बात है कि इन दोनों ने ही इस फ़िल्म के गाने गाए होंगे। आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा रहे हैं इस फ़िल्म से एक बहुत ही प्यारा युगल गीत "मन धीरे धीरे गाए रे, मालूम नहीं क्यों"। फ़िल्म तो बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हुई लेकिन तलत साहब और सुरैया के गाए और गीतकार शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को ख़ूब सुना गया।

'मालिक' के संगीतकार थे ग़ुलाम मोहम्मद। ऐए आज ग़ुलाम साहब की कुछ बातें की जाए। उन्हे संगीत विरासत में ही मिली थी। उनके पिता नवीबक्श एक तबला वादक थे। अपने पिता के साथ वो भी जलसों में जाया करते थे। ऐल्बर्ट थियटर में ये जलसे हुआ करते थे। तबले के साथ साथ ग़ुलाम मोहम्मद का अभिनय में भी रुचि थी। २५ रुपय प्रति माह के वेतन पर वे ऐल्बर्ट थियटर में शामिल हो गए। कुछ समय तक वहाँ रहे, लेकिन जब थियटर की माली हालात ख़राब हो गई तो उन्हे दूसरे दरवाज़ों पर दस्तक देनी पड़ी। काफ़ी जद्दोजहद के बाद एक कंपनी में उन्हे ४ आने प्रति रोज़ के वेतन पर रख लिया गया। वह कंपनी घूमते घामते जब जुनागढ़ पहुँची तो वहाँ जलसे में एक नामी मंत्री महोदय भी दर्शकों में शामिल थे। ग़ुलाम साहब की कला से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्हे एक रत्न जड़ित तलवार भेंट में दे दी। १९२४ में वे बंबई आए और ८ सालों तक संघर्ष करते रहे। १९३२ में सरोज मूवीटोन में उन्हे बतौर तबला वादक रख लिया गया। 'राजा भार्थहरि' फ़िल्म में उनके तबले की बहुत तारीफ़ हुई। उसके बाद उन्होने संगीतकार अनिल बिस्वास और नौशाद के साथ काम किया। नौशाद साहब के साथ उनकी अच्छी ट्युनिंग्‍ जमती थी। फिर तो नौशाद साहब के गीतों में उनके तबले और ढोलक के ठेके एक ख़ासीयत बन गई। स्वतंत्र संगीतकार बनने के बाद भी ग़ुलाम साहब के ठेके बरक़रार रहे जिसका एक अच्छा उदाहरण है आज का प्रस्तुत गीत। इस गीत का रीदम मुख्य तौर पर मटके के ठेकों पर ही आधारित है। आइए सुनते हैं गुज़रे ज़माने के इस अनमोल गीत को।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये उन संगीतकार का गीत है जिन्होंने ने सहगल से सूरदास के भजन गवा कर इतिहास रचा था.
२. इस युगल गीत में पुरुष स्वर है जी एम् दुर्रानी का.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"कसम".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी आपका क्या कहना.....बस कमाल है, दूसरी बार भी आप ४० के अन्कदें तक पहुच गए हैं, लगता है बाकी सब लोग हथियार डाल चुके हैं, रोहित राजपूत और दिलीप जी सब कहाँ है भाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है....कैफ़ इरफ़ानी के शब्दों में दिल का हाल कहा मुकेश ने



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५९

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शरद जी की पसंद की दूसरी नज़्म लेकर। इस नज़्म में जिसने आवाज़ दी है, उसके गुजर जाने के बाद बालीवुड के पहले शो-मैन राज कपूर साहब ने कहा था कि "मुकेश के जाने से मेरी आवाज और आत्मा,दोनों चली गई"। जी हाँ, आज की महफ़िल मुकेश साहब यानि कि "मुकेश चंद माथुर" को समर्पित है। यह देखिए कि शरद जी की बदौलत पिछली बार हमें मन्ना दा का एक गीत सुनना नसीब हुआ था और आज संगीत के दूसरे सुरमा मुकेश साहब का साथ हमें मिल रहा है। तो आज हम मुकेश साहब के बारे में, उनके पहले सफ़ल गीत, अनिल विश्वास साहब और नौशाद साहब से उनकी मुलाकात और सबसे बड़ी बात राज कपूर साहब से उनकी मुलाकात के बारे में विस्तार से जानेंगे।(साभार:लाइव हिन्दुस्तान) मुकेश चंद माथुर का जन्म २२ जुलाई १९२३ को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता लाला जोरावर चंद माथुर एक इंजीनियर थे और वह चाहते थे कि मुकेश उनके नक्शे कदम पर चलें. लेकिन वह अपने जमाने के प्रसिद्ध गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल के प्रशंसक थे और उन्हीं की तरह गायक अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे। लालाजी ने मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को संगीत की शिक्षा देने के लिए एक शिक्षक रखा था। जब भी वह उनकी बहन को संगीत सिखाने घर आया करते थे, मुकेश पास के कमरे में बैठकर सुना करते थे और स्कूल में सहगल के अंदाज में गीत गाकर अपने साथियों का मनोरंजन किया करते थे। इस दौरान मशहूर संगीतकार रोशन हारमोनियम पर उनका साथ दिया करते थे। गीत-संगीत में रमे मुकेश ने किसी तरह दसवीं तक पढाई करने के बाद स्कूल छोड दिया और दिल्ली लोक निर्माण विभाग में सहायक सर्वेयर की नौकरी कर ली. जहां उन्होंने सात महीने तक काम किया। इसी दौरान अपनी बहन की शादी में गीत गाते समय उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और प्रभावित होकर वह उन्हें १९४० में बम्बई ले आए और उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी प्रबंध किया। इसी दौरान खूबसूरत मुकेश को एक हिन्दी फिल्म निर्दोष(१९४१) में अभिनेता बनने का मौका मिल गया, जिसमें उन्होंने अभिनेता-गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन मेंअपना पहला गीत.दिल ही बुझ हुआ हो तो.भी गाया। इस फिल्म में उनकी नायिका नलिनी जयवंत थीं, जिनके साथ उन्होंने दो युगल गीत भी गाए। यह फिल्म फ्लाप हो गई और मुकेश के अभिनेता-गायक बनने की उम्मीदों को तगडा झटका लगा।

मुकेश का कैरियर जब डगमगाने लगा था, तभी मोतीलाल प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास के पास उन्हें लेकर गए और उनसे अनुरोध किया कि वह अपनी फिल्म में मुकेश से कोई गीत गवाएं। मुकेश को कामयाबी मिली निर्माता मजहर खान की फिल्म पहली नजर(१९४५) के गीत "दिल जलता है तो जलने दे" से जो संयोग से मोतीलाल पर ही फिल्माया गया था। अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में डा.सफदर सीतापुरी की इस गजल को मुकेश ने सहगल की शैली में ऐसी पुरकशिश आवाज में गाया कि लोगों को भ्रम हो जाता था कि इसके गायक सहगल हैं। और तो और खुद सहगल ने भी इस गजल को सुनने के बाद कहा था अजीब बात है। मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी यह गीत गाया है । इसी गीत को सुनने के बाद सहगल ने मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हालांकि इस गीत ने मुकेश को गायक के रूप में पहचान दिलाई लेकिन उन्हें यह कामयाबी इतनी आसानी से नहीं मिली। फिल्म जब रिलीज के लिए तैयार थी तब वितरकों और समालोचकों ने इसे देखने के बाद कहा कि गीत हीरो की छवि पर फिट नहीं बैठता है। उन्होंने इस गीत को फिल्म से हटाने का सुझाव दिया। यह सुनकर मुकेश की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने निर्माता मजहर खान से ही कोई सुझाव देने का अनुरोध किया। इस पर मजहर खान ने कहा कि यह गीत सिर्फ पहले शो के लिए फिल्म में रखा जाएगा। इस बारे अंतिम निर्णय दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने के बाद ही लिया जाएगा। दर्शकों से इस गाने को जब जबरदस्त तारीफ मिली और लोग यह गीत गाते हुए सिनेमाघर से निकलने लगे तब मजहर खान ने कहा मेरी बात याद रखना। एक दिन आएगा जब कोई मेरी फिल्म को याद नहीं रखेगा लेकिन तुम्हारा गीत हमेशा याद रखा जाएगा।
यह बात सच साबित हुई और आज देखिए भले हीं किसी को "पहली नज़र" की जानकारी हो या नहीं हो लेकिन "दिल जलता है तो जलने दे" हर किसी के दिल में जगह बनाए हुए है। और यह भी सच है कि आज ९०% लोग यही सोचते हैं कि इस गाने को खुद सहगल साहब ने गाया था। शायद यही कारण था कि मुकेश साहब अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे। अब इस प्रक्रिया में उनका साथ अनिल विश्वास साहब ने दिया या फिर नौशाद साहब ने, इसमें भयंकर मतभेद है। इसलिए हम दोनों का मत देख लते हैं।

बकौल अनिल विश्वास: मुकेश दूसरा कुंदनलाल सहगल बनने की चाह लिए मेरे पास आया था। उसने सहगल की आवाज में नौशाद का रिकार्ड सुना था, जो शाहजहां फिल्म का गीत "जब दिल ही टूट गया" था। इसलिए मैंने उससे पहली नजर में "दिल जलता है तो जलने दे" सहगल के अंदाज में गवाया। फिर मैंने मुकेश से कहा कि हमने यह बात साबित कर दी है कि हम एक और सहगल बना सकते हैं। पर अब यह साबित करना है कि मुकेश वास्तविक मुकेश है, सहगल की नकल भर नहीं है। मैंने मुकेश को सहगल के रूप में पेश किया और मैंने ही "अनोखा प्यार" में उसकी विशिष्ट आवाज में "जीवन सपना टूट गया" और "अब याद न कर भूल जा ऐ दिल वो फसाना" गवाकर उसे सहगल के प्रभाव से बाहर निकाला।

और नौशाद साहब की यह दलील थी:: मैंने दिलीप कुमार के लिए मेला और अंदाज में मुकेश से पहले-पहल उनकी विशिष्ट शैली में गवाया था। गायक बनने के प्रारंभिक दौर में मुकेश को शराब पीने की बडी हीं बुरी लत थी। एक दिन मैंने उन्हें कारदार स्टूडियो में दिन के समय नशे की हालत में पकड लिया। मैंने उनसे कहा मुकेशचंद तुम "दिल जलता है" से साबित कर चुके हो कि तुम सहगल बन सकते हो लेकिन अब क्या तुम साबित करना चाहते हो कि तुम पीने के मामले में भी सहगल को पछाड सकते हो। यह सुनकर मुकेश की आंखों में आंसू आ गए। मैंने कहा तुम्हारी अपनी अनूठी आवाज है तुम्हें अपनी गायकी को साबित करने के लिए सहगल या किसी दूसरे गायक की आवाज की नकल करने की जरूरत नहीं है।

अब चाहे इस बात का श्रेय जिसे भी मिले, लेकिन यह अच्छा हुआ कि हमें अनोखा एक मुकेश मिल गया जिसकी आवाज़ सुनकर हम आज भी कहीं खो-से जाते हैं, जो दूसरे गायकों को सुनकर कम हीं होता है। वैसे राजकपूर से मुकेश की मुलाकात की कहानी भी बड़ी हीं दिलचस्प है। १९४३ की बात है। उस समय राजकपूर सहायक निर्देशक हुआ करते थे। रंजीत स्टूडियो में जयंत देसाई की फिल्म "बंसरी" के सेट पर एक खूबसूरत नौजवान किन्हीं खयालों में खोया हुआ पियानो पर एक गीत गा रहा था। वहां से गुजर रहे राजकपूर उस गीत को सुनकर कुछ देर के लिए ठिठक गए। पूछने पर पता लगा कि वह युवक मुकेश है। आगे चलकर दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता हो गई और मुकेश आखिरी दम तक राजकपूर की आवाज बने रहे।

चलते-चलते हम मुकेश साहब के बारे में सलिल दा के ख़्यालात जान लेते हैं: जिस क्षण मैंने "सुहाना सफर" की रिकार्डिंग की, उसी समय मैं जान गया था कि मुकेश के स्वर ने "मधुमती" के इस गीत के अल्हड भाव को आत्मसात कर लिया है। मैं "जागते रहो" के "जिंदगी ख्वाब है" और "चार दीवारी" के "कैसे मनाऊं पियवा" को भी इस गीत से कमतर नहीं मानता हूं। बाद के वर्षों में मुकेश ने "आनन्द" के "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में भावनाओं की असीम गहराई को अपने मधुर स्वर से अभिव्यक्ति दी थी। इस गीत को मैं मुकेश के गाए गीतों में सर्वश्रेष्ठ मानता हूं। मुकेश साहब के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी बातें कभी दूसरे आलेख में करेंगे।

आज की नज़्म के रचनाकार कैफ़ इरफ़ानी साहब के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल नहीं हो पाई है। हाँ इतना मालूम हुआ है कि उन्होंने ५०-६० के दशक में बीस से भी ज्यादा फिल्मों में गीत लिखे थे। उनमें से कुछ फिल्मों की फेहरिश्त लगे हाथों पेश किए देता हूँ: आगोश, डाकू की लड़की, धुन, गुल सनोबर, जल तरंग, मल्हार, मिस-५८, नाच, राग-रंग, राजपूत, सरदार, शान, शीशम, शेरू, तराना, तूफ़ान। इन्हीं फिल्मों में से एक "डाकू की लड़की" के एक गीत की कुछ पंक्तियाँ हमारे दिल को छू गई, इसलिए आप सबके सामने उसे लाना लाज़िमी है:

नज़रों से छुप गया है तक़दीर का सवेरा
गिरता है जो भी आँसू लेता है नाम तेरा


दिल में कोई कसक महसूस हुई या नहीं। हुई ना! तो इस कसक को हजार-गुणा करने के लिए दर्द से लबरेज आज की नज़्म पेश-ए-खिदमत है। मुकेश साहब की आवाज़ में छुपी टीस का पान करने के लिए तैयार हो जाईये:

जियेंगे मगर मुस्कुरा ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है
लबों पे ____ अब आ ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

बहारें चमन में जब आया करेंगी,
नज़ारों की महफ़िल सजाया करेंगी
नज़ारें भी हमको हँसा ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

जवानी जो लायेगी सावन की रातें,
ज़माना करेगा मोहब्बत की बातें
मगर हम ये सावन मना ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मुकद्दर" और शेर कुछ यूं था -

ये जानके चुपचाप हैं मेरे मुकद्दर की तरह,
हमने तो इनके सामने खोला था दिल के राज को...

महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुए शरद कोकास साहब...शरद जी, आपका बहुत-बहुत स्वागत है। यह नज़्म है हीं कुछ ऐसी कि पसंद न आने का सवाल हीं नहीं उठता।

हालांकि महफ़िल की शुरूआत हो चुकी थी, लेकिन महफ़िल की विधिवत शुरूआत (शेर पेश करके) कुलदीप जी ने की। आपने साकी अमरोही साहब का यह शेर पेश किया:

काम आपने मुकद्दर का अँधेरा नहीं होता
सूरज तो निकलता है सवेरा नहीं होता। (साकी साहब के बारे में हमें अंतर्जाल पर कुछ नहीं मिला, आप अगर कुछ जानकारी मुहैया कराएँगे तो अच्छा होगा)

अंजुम साहब के बाद महफ़िल में नज़र आए शामिख जी। ये रहे आपके कुछ शेर:

ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी (निदा फ़ाज़ली)

हाथ में जाम जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जायेगा क़िस्मत का लिखा, जाम उठा (बशीर बद्र)

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
रेखाओं से मात खा रहे हो (कैफ़ी आज़मी)

राज जी, आपके जैसे अगर कला के कद्रदान हों तो कोई खुद को अकेला कैसे महसूस कर सकता है। हौसला-आफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। आप इसी तरह महफ़िल में आते रहें और महफ़िल में चार चाँद लगाते रहें,यही आरजू है हमारी।

मंजु जी, क्या बात है!! वाह, बहुत उम्दा स्वरचित कहा है आपने:

मुकद्दर ने ही संघषों की अमावस्या - सी काली रात को ,
दीये की रोशनी की तरह जीवन में उजाला भर दिया है।

सीमा जी, देर हुई- कोई बात नहीं। शेर कहने से नहीं चूके आप, यह देखकर अच्छा लगा। यह रही आपकी पेशकश:

पेशानियों पे लिखे मुक़द्दर नहीं मिले,
दस्तार कहाँ मिलेंगे जहाँ सर नहीं मिले (राहत इन्दौरी)

क़फ़स में खींच ले जाये मुक़द्दर या नशेमन में।
हमें परवाज़ से मतलब है, चलती हो हवा कोई॥ (सीमाब अकबराबादी)

वाणी जी, आपको नज़्म पसंद आई, इसके लिए एक हीं आदमी हैं, जिनका शुक्रिया अदा करना चाहिए - शरद जी। लेकिन यह देखिए महफ़िल जिसके कारण मुमकिन हो पाई, वही नदारद हैं। कहाँ हैं शरद जी????

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, November 10, 2009

हम दोनों मिलके कागज़ पे दिल के चिट्टी लिखेंगें जवाब आएगा...चिट्टी पत्री के दिनों में लौटें क्या फिर से



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 258

दोस्तों, यह बताइए कि आख़िरी बार आपने किसी को काग़ज़ पर चिट्ठी कब लिखी थी? हाँ हाँ याद कीजिए, दिमाग़ पर और थोड़ा सा ज़ोर लगाइए। मुझे पूरा विश्वास है कि आप में से अधिकतर लोग काग़ज़ पर पत्र लिखना छोड़ चुके होंगे। ई-मेल, मोबाइल, और एस.एम.एस की रफ़्तार ने और ज़िंदगी की तेज़ गति ने पारम्परिक चिट्ठी पत्री के रिवाज़ पर गहरा चोट की है। हम नए टेक्नोलोजी के ख़िलाफ़ नहीं है, लेकिन काग़ज़ पर चिट्ठी लिखने में जो अहसासात ज़हन में उभरते हैं, वो अहसासात ई-मेल या एस.एम.एस नहीं पैदा कर सकती। किसी ने ठीक ही कहा है कि विज्ञान ने हमें दिया है वेग, लेकिन हमसे छीन लिया है हमारा आवेग! दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि आज मैं ऐसे फ़ंडे क्यों दे रहा हूँ। तो कारण एक ही है, कि आज का जो गीत हमने चुना है वह चिट्ठी लिखने पर आधारित है। लेकिन यह चिट्ठी किसी आम काग़ज़ पर नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि दो प्यार करने वाले इसे लिख रहे हैं अपने दिलों के काग़ज़ पर, और जिसका दिल से ही जवाब आना है। आशा भोसले और मुकेश की युगल आवाज़ों में यह सुंदर गीत है ७० के दशक के आख़िर का। यानी कि १९७८ में यह फ़िल्म जब रिलीज़ हुई थी तब मुकेश इस दुनिया में मौजूद नहीं थे। फ़िल्म 'तुम्हारी क़सम' का यह गीत है "हम दोनों मिलके, काग़ज़ पे दिल के, चिट्ठी लिखेंगे, जवाब अएगा"।

'तुम्हारी क़सम' का निर्माण किया था सी. वी. के शास्त्री ने, सह-निर्माता थे आर. एन. कुमार। रवि चोपड़ा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे जीतेन्द्र, मौसमी चटर्जी, नवीन निश्चल और पद्मिनी कपिला। इस फ़िल्म के संगीतकार थे राजेश रोशन और गानें लिखे गीतकार आनंद बक्शी साहब ने। राजेश रोशन एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिन्होने वक़्त के साथ साथ अपने आप को साबित करके दिखाया है। नहीं तो साधारणतः क्या होता है कि बदलते दौर के साथ साथ संगीतकार अपने आप को ढाल नहीं पाते और नई पीढ़ी टेक-ओवर कर लेती है। लेकिन राजेश रोशन के साथ ऐसा नहीं हुआ। ७० के दशक में वे हिट गानें दिए और आज २००० के दशक में भी वो सुपर डुपर हिट गानें दे रहे हैं। अपने पिता रोशन की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया राजेश ने, और यह तब शुरु हुई जब गीतकार आनंद बक्शी ने उन्हे मिलवाया था संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से। राजेश बने एल.पी के सहायक और उनसे बहुत कुछ सीखा। बतौर स्वतंत्र संगीतकार राजेश रोशन को पहला ब्रेक दिया महमूद ने अपनी फ़िल्म 'कुंवारा बाप' में। आर. डी. बर्मन को भी महमूद जी ने ही पहला ब्रेक दिया था 'छोटे नवाब' और 'भूत बंगला' जैसी फ़िल्मों में। राजेश रोशन एक प्रयोग धर्मी संगीतकार रहे हैं। जहाँ एक तरफ़ उन्होने बेहद नाज़ुक-ओ-तरीन गानें दिए हैं, वहीं दूसरी ओर ज़बरदस्त टेक्नो धुनों में भी महारथ हासिल की है। आज का गीत एक रोमांटिक सीधा सरल गीत है। आम बोलचाल की भाषा में लिखा बक्शी साहब का यह गीत जल्द ही दिल में उतर जाता है और होठों पर गुनगुनाहट बन कर सजा रहता है देर तक। आप भी सुनिए, मुझे उम्मीद है कि एक लम्बे अरसे से इस गीत को आप ने नहीं सुना होगा, तभी तो आज यह गीत 'आवाज़' पर बज रहा है ख़ास आप के लिए। मैं आप से गुज़ारिश करूँगा कि आज इस गीत को सुनने के बाद आप अपने किसी प्रिय आत्मीय, परिजन, या किसी निकट के मित्र को एक सफ़ेद काग़ज़ पर एक ख़त ज़रूर लिखेंगे और ज़रा अंदाज़ा लगाइए कि जब आपका ख़त उन तक पहुँचेगा तो कितना बड़ा सर्प्राइज़ उन्हे मिलेगा और कितनी ख़ुशी उन्हे मिलेगी। है ना?



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत को परदे पर जिन नायक-नायिका पर फिल्माया गया था, खुद उन्होंने ही अपना पार्श्वगायन किया था.
२. गीतकार शकील बदायुनीं साहब हैं यहाँ.
३. मुखड़े में शब्द है -"मालूम".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी आपका क्या कहना.....बस कमाल है, दूसरी बार भी आप ४० के अन्कदें तक पहुच गए हैं, लगता है बाकी सब लोग हथियार डाल चुके हैं, रोहित राजपूत और दिलीप जी सब कहाँ है भाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, November 9, 2009

आ मोहब्बत की बस्ती बसाएँगे हम....पहली बार ओल्ड इस गोल्ड पर लता किशोर एक साथ



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 257

दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की २५७ वी कड़ी है। पता नहीं आपने कभी ग़ौर किया होगा या नहीं कि अब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक भी लता-किशोर डुएट नहीं बजा है जब कि युगल गीतों के इतिहास में लता-किशोर की जोड़ी एक बहुत ही महत्वपूर्ण और लोकप्रिय जोड़ी रही है। अगर ऒल-टाइम एवरग्रीन डुएट्स के जोड़ियों का ज़िक्र छेड़ा जाए तो यकीनन लता-किशोर की जोड़ी का नाम प्रथम पाँच में ज़रूर होगी। हमने कई कई बार ऐसे फ़िल्मों के गानें बजाए हैं जिनमें लता-किशोर के युगल गीत रहे हैं, लेकिन हर बार हम उन फ़िल्मो के किसी और ही गीत को बजा बैठे हैं। जैसे कि 'जुवेल थीफ़', 'मिस्टर एक्स इन बॊम्बे', 'गैम्बलर', 'चाचा ज़िंदाबाद', 'हरे रामा हरे कॄष्णा', 'आराधना', 'प्रेम पुजारी', 'जुली', और 'शर्मिली'। इन सभी फ़िल्मों में लोकप्रिय लता-किशोर डुएट्स मौजूद हैं। दरसल सब से ज़्यादा हिट युगल गीत इस जोड़ी की रही है ६० के दशक आख़िर से लेकर ८० के दशक के शुरुआती सालों तक। लेकिन आज हम सुनने जा रहे हैं लता जी और किशोर दा का गाया एक बहुत ही पुराना युगल गीत जो आई थी फ़िल्म 'फ़रेब' में सन् १९५३ में। 'फ़रेब' फ़िल्मकार शाहीद लतीफ़ और उनकी लेखिका पत्नी इस्मत चुग्तई की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे किशोर कुमार और शकुंतला। फ़िल्म में संगीत दिया अनिल बिस्वास ने और गीत लिखे मजरूह सुल्तानपुरी ने। इससे पहले मजरूह साहब ने अनिल दा के साथ १९५० की फ़िल्म 'आरज़ू' में काम कर चुके थे। १९५३ के आसपास का दौर वह दौर था जब मजरूह साहब तेज़ी से लोकप्रियता के पायदान पर क्रमशः उपर की तरफ़ बढ़ते चले जा रहे थे। 'फ़रेब' से पहले और अनिल बिस्वास के अलावा उन्होने नौशाद साहब के साथ 'शाहजहाँ' ('४६) और 'अंदाज़' ('४९), ग़ुलाम मोहम्मद के साथ 'हँसते आँसू' ('५०) और बुलो सी. रानी के साथ 'प्यार की बातें' ('५१) जैसी फ़िल्मों में काम कर चुके थे। फ़िल्म 'फ़रेब' का लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया प्रस्तुत युगल गीत "आ मोहब्बत की बस्ती बसाएँगे हम, इस ज़मीं से अलग आसमानों से दूर" बहुत मशहूर हुआ था। यह मजरूह साहब का लिखा हुआ पहला लता-किशोर डुएट था। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहली बार लता जी और किशोर दा ने एक साथ जो युगल गीत गाया था वह थी १९४८ की फ़िल्म 'ज़िद्दी' में संगीतकार खेमचंद प्रकाश के लिए, और गीत के बोल थे "ये कौन आया रे करके सोलह सिंगार"। फ़िल्म 'ज़िद्दी' किशोर दा की पहली फ़िल्म भी थी बतौर एकल पार्श्व गायक।

लता जी और किशोर दा के गाए ७० के दशक के जिस तरह के युगल गीत हम अक्सर सुनते हैं, उन सब से बहुत ही अलग है यह गीत। इसमें ४० के दशक की ख़ुशबू साफ़ महसूस की जा सकती है। किशोर दा ने भले ही सहगल साहब को अपनी आवाज़ से अलग कर दिया था लेकिन उनकी ख़ुद की स्टाइल में भी उसी ज़माने का असर था, और लता जी की आवाज़ भी उन दिनों बेहद पतली हुआ करती थी। अमीन सायानी अपने हिट रेडियो प्रोग्राम 'संगीत के सितारों की महफ़िल' में अनिल बिस्वास पर कार्यक्रम पेश करते हुए इस गीत को बजाते हुए कहा था - "कितनी सुरीली थी वो मोहब्बत की बस्ती, मीठे मधुर गीतों से गूंजती हुई, उल्झनों से परे, झुंझलाहटों से दूर! वो मोहब्बत की बस्ती जो फ़िल्म संगीत जगत के भीष्म पितामह संगीतकार अनिल बिस्वास ने बसाई थी। बड़े भाग्यवान थे वो सभी गायक और गायिकाएँ, वो सभी संगीत प्रेमी, जिनकी जवानियों में अनिल बिस्वास के संगीत ने प्रेम का प्रकाश फैलाया।" तो दोस्तों, आइए हम भी आज उसी मोहब्बत की बस्ती की सैर करें फ़िल्म जगत के पहले लता-किशोर डुएट के ज़रिए, आइये सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. रवि चोपडा के निर्देशन में बनी थी ये फिल्म.
२. संगीतकार हैं राजेश रोशन.
३. इस युगल गीत के मुखड़े में शब्द है -"चिट्टी".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी आप दूसरी बार विजेता बनने की डगर पे हैं, ३८ अंकों तक पहुँचने की बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ताजा सुर ताल - दूर पहाडों से आती कोई सदा, कोई खुशबू जैसे...मोहित चौहान के नए एल्बम "फितूर" में है ताजगी



ताजा सुर ताल TST (34)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में सीमा जी ३२ अंकों के साथ लगभग ऐसी लीड ले चुकी है जिसे पार पाना अब अन्य प्रतिभागियों के लिए असंभव प्रतीत हो रहा है. सीमा जी बधाई

सजीव - सुजॉय, 'ताज़ा सुर ताल' के बदले हुए रूप में पिछले सोमवार को हमने 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' के संवाद लेखक आर. डी. तैलंग से एक मुलाक़ात अपने पाठकों तक पहुंचाई थी और साथ ही इस फ़िल्म के कुछ गानें भी सुनवाए जो आज कल काफ़ी चर्चा में हैं। तो इस हफ़्ते, यानी आज क्यों ना ग़ैर-फ़िल्मी जगत से कुछ सुर तालों को पेश किया जाए।

सुजॉय - बहुत अच्छा विचार है। फ़िल्म संगीत के साथ साथ क़दम मिलाकर चलने की कोशिश करता है ग़ैर-फ़िल्मी संगीत। फ़िल्मी गीतों का एक निर्दिष्ट स्वरूप होता है, लेकिन ग़ैर फ़िल्म संगीत का कोई दायरा नहीं होता, इसलिए संगीतकार, गीतकार और गायक इसमें अलग अलग तरीके के प्रयोग कर सकते हैं और विविधता ला सकते हैं।

सजीव - ठीक कहा तुमने, लेकिन ग़ैर फ़िल्म संगीत एक विशाल क्षेत्र है, जिसमें सुगम संगीत से लेकर पॉप संगीत और सुफ़ीयाना अंदाज़ के गानें भी शामिल हैं। बहुत ही व्यापक है यह जगत। अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो ग़ैर फ़िल्म संगीत का इतिहास भी लगभग उतना ही पुराना है जितना कि फ़िल्म संगीत का। यानी कि ३० के दशक से ही बनने लगे थे ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं के ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स, जिनमें भजन, ग़ज़ल, सुगम संगीत, क़व्वालियाँ आदि हुआ करती थीं।

सुजॉय - बिल्कुल सही कहा। उन दिनों जो कलाकार फ़िल्म संगीत से जुड़े हुए थे, वही लोग नॉन-फ़िल्म म्युज़िक में भी अपना योगदान दिया। आगे चलकर ७० के दशक के आख़िर के समय से ग़ैर-फ़िल्म संगीत ने अपनी एक अलग पहचान जिसे कह सकते हैं वह बनाई। यह वह दौर था जब ग़ज़लें बहुत लोकप्रिय हुआ करती थीं, कई बड़े बड़े गायक आए इस क्षेत्र में और बहुत सारे ऐल्बम्स बनें।

सजीव - अच्छा सुजॉय, यह बता सकते हो कि सही मायने में पहला पॉप ऐल्बम किस कलाकार का आया था ?

सुजॉय - मैं १००% यकीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन हाल ही में विविध भारती पर एक मुलाक़ात में गायिका शारदा ने कहा था कि उन्होने ही पहला पॉप ऐल्बम लौंच किया था। ८० के दशक में कई पॉप सिंगर्स उभरे जैसे कि नाज़िया हसन, ज़ोहेब हसन, शरण प्रभाकर, अलिशा चिनॊय, उत्तरा केलकर, हसन जहांगीर, बाबा सहगल आदि।

सजीव - इसी तरह से ९० के दशक में आए जोजो, कमाल ख़ान, फाल्गुनी पाठक, देवांग पटेल, अनामिका, रागेश्वरी, अल्ताफ़ राजा, और इनके साथ साथ फ़िल्मी गायक गायिकाएँ भी अपने अपने प्राइवेट ऐल्बम निकालने में जुट गए। और आज के दौर में इस क्षेत्र में जो प्रमुख नाम हैं वो हैं कैलाश खेर, पलाश सेन, आतिफ़ अस्लम, अभिजीत सावंत, मोहित चौहान आदि।

सुजॉय - मोहित चौहान से याद आया सजीव कि उनका एक तरो ताज़ा ऐल्बम आया है 'फ़ितूर' शीर्षक से। आज क्यों ना इस ऐल्बम की बातें की जाए और इस ऐल्बम के कुछ गीत अपने श्रोताओं को सुनवाया जाए। क्या ख़याल है?

सजीव - बहुत अच्छा ख़याल है। कहते हैं ना कि आदमी अपने आप को अपनी जड़ों से कभी अलग नहीं कर सकता, अब देखो ना, मोहित चौहन ने शुरुआत की थी ग़ैर फ़िल्म जगत से ही। वो मशहूर बैंड 'सिल्क रूट' के 'लीड वोकलिस्ट' हुआ करते थे। इस बैंड का 'बूँदें' ऐल्बम का "डूबा डूबा रहता है आँखों में तेरी" इस क़दर हिट हुआ था कि आज भी लोग इसे याद करते हैं। इस बैंड का दूसरा अल्बम आया था 'पहचान', जिसे उतनी कामयाबी नहीं मिली। और दुर्भाग्यवश इसके बाद यह बैंड भी टूट गया।

सुजॉय - फिर मोहित का पदार्पण हुआ फ़िल्म जगत में और काफ़ी जद्दोजहद के बाद इन दिनों मोहित कामयाबी की चोटी पर विराजमान हैं। "मसक्कली", "ना है यह पाना ना खोना ही है", "पहली बार मोहब्बत की है", "कहीं ना लागे मन", "कुछ ख़ास है", तथा "ये दूरियाँ" जैसे सुपरहिट गीतों के बाद अब वो एक बार फिर से लौटे हैं अपनी उस पुराने जनून की तरफ़, मेरा मतलब है पॉप म्युज़िक की तरफ़।

सजीव - तकरीबन ८ साल के इस फ़ासले के बाद वो लेकर आए हैं अपना सोलो ऐल्बम 'फ़ितूर'। इस ऐल्बम में कुल १० गानें हैं जिन्हे ख़ुद मोहित ने ही लिखे हैं, उन्होने ही संगीतबद्ध किए हैं और आवाज़ तो उनकी है ही। 'फ़ितूर' में भी आप 'सिल्क रूट' वाले फ़्लेवर का आनंद उठा सकते हैं।

सुजॉय - तो चलिए, बहुत सी बातें हो गई, पहले एक गीत सुन लिया जाए, फिर इन गीतों की चर्चा को हम आगे बढ़ाएँगे।

गीत - फ़ितूर


सजीव - 'फ़ितूर' का शीर्षक गीत हमने सुना, जो इस ऐल्बम का पहला गीत भी है। बतौर गीतकार मोहित ने बहुत ही सराहनीय काम किया है। आज के दौर के किसी भी गीतकार से कम नहीं लगे उनके लिखे बोल इस गीत में।

सुजॉय - सही बात है! "देर से आए, देर से जाए, छाए बन के सुरूर", यह गीत का सुरूर भी धीरे धीरे छाने लगता है जो काफ़ी देर तक ज़हन में रहता है सुनने के बाद। अच्छा सजीव, 'फ़ितूर' शब्द का अर्थ क्या है आपको पता है?

सजीव - 'फ़ितूर' का मतलब है कोई विकार या दोष या फिर रोग...या फिर बेकार का कोई जूनून....

सुजॉय - इस गीत में आपने इलेक्ट्रोनिक और ऐकोस्टिक, दोनों तरह के साज़ों का संगम अनुभव किय होंगे! गीत का रीदम भी धीरे धीरे रफ़्तार पकड़ती है। कुल मिलाकर यह गीत तो मुझे कर्णप्रिय लगा। और अब दूसरे गीत की बारी।

सजीव - हाँ, अब जो गीत हम सुनेंगे उसे सुनते हुए हम पहुँच जाएँगे सुदूर किसी पहाड़ियों पर। पहले गीत का मज़ा लेते हैं, फिर आगे बात करेंगे। सुनते हैं "सजना शाम हुई"।

गीत - सजना


सुजॉय - आपने बिल्कुल सही कहा था, इस गीत में पहाड़ी संगीत का प्रभाव साफ़ महसूस किया जा सकता है। हालाँकि रीदम पाश्चात्य है, लेकिन बीच बीच में बांसुरी की तानें हमें ले जाती हैं पहाड़ों की शांत वादियों में।

सजीव - सिर्फ़ बांसुरी की तानें ही क्यों, पूरे गीत का संगीत और बोल कुछ ऐसे हैं कि जो एक अजीब सी शांति और सुकून का एहसास कराती है। संयोजन भी बहुत नर्म और सुकूनदायी है। मोहित चौहान ख़ुद भी पहाड़ों के ही रहने वाले हैं, इसलिए उनसे बेहतर पहड़ों के संगीत को और कौन भला ज़्यादा अच्छे तरीके से पेश कर सकता है!

सुजॉय - अब इस गीत के बाद एक और गीत जिसमें है पहाड़ों का ज़िक्र, "माई नि मेरिये", यहाँ पे हम सुनेंगे। इअ गीत की खासियत यही है कि गीत सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे कोई बातचीत चल रही हो! मोहित चौहान जिस प्रदेश से ताल्लुख़ रखते हैं वह है हिमाचल प्रदेश। और इस गीत में हिमाचल के तमाम पर्वतीय स्थलों का उल्लेख है।

सजीव - "माई नि मेरिये शिमले दी राहें चंबा कितनी दूर"। जहाँ तक मुझे समझ में आया है इस गीत में शिमला और कसौली वासियों से चंबा जाने की गुज़ारिश की जा रही है। गीत के बोल हिमाचली लोक भाषा में है और सगीत तो है ही हिमाचल का। बहुत ही सुकून दायक होता है पहाड़ों का संगीत।

गीत - माई नि मेरिये


सुजॉय - सचमुच बहुत अच्छा गीत था! सजीव, पिछले साल मैं हिमाचल के कुछ पर्वतीय स्थानों की सैर पर गया था जैसे कि शिमला, कसौली, कुल्लू और मनाली। इस गीत ने मेरी वो सारी यादें एक बार फिर से ताज़ा कर दिए। लेकिन उससे भी ज़्यादा इस गीत को सुनने के बाद दिल में इच्छा जाग उठी है चंबा जाने की। हिमाचल को देवभूमी भी कहा गया है। इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो वही जान सकता है जिसने हिमाचल में क़दम रखा हो। एक दैवीय वातावरण छाया रहता है पहाड़ों पर। अच्छा सजीव, अब किस गीत की तरफ़ बढ़ने का इरादा है?

सजीव - इस ऐल्बम में एक गीत है "बाबाजी"। इसमें जहाँ एक तरफ़ लोक संगीत का अंग है, वहीं अंग्रेज़ी शब्द भी हैं, पाश्चात्य संगीत भी है, एक तरह से एक अच्छा फ़्युज़न सुनने को मिलता है इस गीत में।

सुजॉय - माउथ ऒर्गैन की ध्वनियों का अच्छा इस्तेमाल हुआ है। तो सजीव, कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि 'फ़ितूर' एक बहुत ही अलग किस्म का, जिसे कि हम कह सकते हैं बहुत दिनों के बाद एक रिफ़्रेशिंग् ऐल्बम आया है, जिसे लोग ख़ूब पसंद करेंगे, जैसा कि हमने किया है।

सजीव - ऐसा ही कुछ उम्मीद कर सकते हैं। तो आओ इस गीत को सुनते हैं और मोहित चौहान को शुभकामनाएँ देते हैं कि वो और ज़्यादा तरक्की करें, और इसी तरह से अच्छा संगीत अपने चाहनेवालों को हमेशा देते रहें।

गीत - बाबाजी


और अब मोहित चौहान से जुड़े तीन सवाल!

TST ट्रिविया #26 हिमाचल की पहाड़ियों से उतरकर और मायानगरी मुंबई पहुँचने से पहले मोहित चौहान १० साल तक भारत के किस शहर में रहे?

TST ट्रिविया #27 मनोज बाजपयी और मोहित चौहान को आप किस गीत के ज़रिए आपस में जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया #28 मोहित चौहान का गाया वह कौन सा गीत है जिसके शुरुआती बोलों से मोहम्मद रफ़ी और गीता दत्त का गाया एक बहुत ही मशहूर गीत शुरु होता है?

फितूर अल्बम को आवाज़ रेटिंग ****

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, November 8, 2009

हाँ दीवाना हूँ मैं...माना था मुकेश ने सरदार मलिक के निर्देशन में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 256

ल्ड इज़ गोल्ड' में जहाँ एक तरफ़ मशहूर और लोकप्रिय संगीतकारों की रचनाएँ हम सुनवाते रहते हैं, समय समय पर हम ऐसे फ़नकारों को भी याद करते रहते हैं जिन्होने बहुत लम्बी पारी तो नहीं खेली लेकिन सृजनशीलता और रचनात्मक्ता में ये कमचर्चित फ़नकार किसी से कम नहीं थे। आज हम एक ऐसे ही संगीतकार को पहली बार 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में याद कर रहे हैं। और ये सुरीले मौसीकार हैं सरदार मलिक साहब। इनका नाम याद आते ही एकाएक जिस फ़िल्म का ध्यान आता है, उस फ़िल्म का नाम है 'सारंगा'। युं तो सरदार मलिक का पहला हिट गीत फ़िल्म 'ठोकर' का था, जिसके बोल थे "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ", पर उनको सही मायने में कामयाबी और शोहरत हासिल हुई फ़िल्म 'सारंगा' के गीतों के लिए। बदक़िस्मती से 'सारंगा' बॊक्स ऒफ़िस पर नाकामयाब रही, पर इसके गानें बेहद लोकप्रिय हुए और लोगों के ज़ुबान पर ऐसे चढ़े कि आज भी लोग इन्हे गुनगुनाते रहते हैं। आज सुनिए इस फ़िल्म से मुकेश की आवाज़ में "हाँ दीवाना हूँ मैं, ग़म का मारा हुआ एक बेगाना हूँ मैं"। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस तरह के गीतों के लिए मुकेश की आवाज़ का कोई सानी नहीं था। भरत व्यास की गीत रचना है, और सरदार साहब ने इस गीत में अरबी संगीत का नमूना पेश किया है, जो सुनने में कुछ कुछ सज्जाद हुसैन साहब के संगीत से मिलता जुलता प्रतीत होता है। इस गीत को सुनकर आप समझ जाएँगे कि मेरे कहने का क्या आशय है। 'सारंगा' सन् १९६० में बनी थी, जिसका निर्माण व निर्देशन किया था धीरूभाई देसाई ने तथा इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सूदेश कुमार व जयश्री गडकर।

विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में फ़ौजी भा‍इयों से मुख़ातिब सरदार मलिक साहब ने इस गीत के संबंध में ये कहा था - "मेरा जनम कपूरथला में हुआ था। उदय शंकर कल्चरल सेन्टर में मुझे भेजा गया डान्स सीखने के लिए। उदय शंकर जैसा डान्सर हमारे देश में आज तक फिर पैदा नहीं हुआ है। वहीं पर मैं महान कवि सुमित्रानंदन पंत से मिला। अल्लाउद्दिन ख़ान साहब, जो पंडित रविशंकर के गुरु हैं, उन्होने मुझसे कहा कि तुम डान्स बहुत अच्छा करते हो, पर मेरा ख़याल है कि थोड़ा समय अगर म्युज़िक में भी दो तो एक अच्छा कॊम्पोज़र बन सकते हो। उनकी नज़र वहाँ तक थी। मुझे डान्स सीखने से संगीत में काफ़ी मदद मिली। फ़िल्म 'सारंगा' का गीत "हाँ दीवाना हूँ मैं", इसमें मैने चार रीदम्स एक ही साथ में इस्तेमाल किया है और ऐसा मैं कर सका हूँ अपनी डान्स की शिक्षा की वजह से।" सरदार मलिक साहब से जुड़ी और भी बहुत सी बातें हैं जो उन्होने उसी कार्यक्रम में कहे थे, जिन पर से हम पर्दा उठाएँगे धीरे धीरे, जैसे जैसे मलिक साहब के गानें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बजते जाएँगे। तो लीजिए अब वक़्त हो चला है गीत सुनने का। मुकेश की दर्दभरी आवाज़ में बह जाइए कुछ देर के लिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये पहला युगल गीत होगा लता किशोर की आवाज़ में जो ओल्ड इस गोल्ड पर.
२. संगीत अनिल बिस्वास का है.
३. मुखड़े में शब्द है -"बस्ती".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी बधाई...३६ अंक हुए आपके....मनु जी हैट्रिक से चूक गए. दिलीप जी आपकी बात ध्यान में रख ली गयी है...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और अमिताभ बच्चन की पसंद के गीत (२०)



आज से ठीक ४० साल पहले एक फिल्म प्रर्दशित हुई थी जिसक नाम था -"सात हिन्दुस्तानी". बेशक ये फिल्म व्यवसायिक मापदंडों पर विफल रही थी, पर इसे आज भी याद किया जाता है और शायद हमेशा याद किया जायेगा सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म के रूप में. अमिताभ ने इस फिल्म में एक मुस्लिम शायर की भूमिका निभाई थी. फिल्म का निर्देशन किया विख्यात ख्वाजा अहमद अब्बास ने (इनके बारे फिर कभी विस्तार से), संगीत जे पी कौशिक का था, जो लीक से हट कर बनने वाली फिल्मों में संगीत देने के लिए जाने जाते हैं. शशि कपूर की जूनून में भी इन्हीं का संगीत था, गीत लिखे कैफी आज़मी ने जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय सम्मान भी हासिल हुआ, गीत था महेंद्र कपूर का गाया "आंधी आये कि तूफ़ान कोई....". अमिताभ ने भी इस फिल्म के के लिए "सर्वश्रेष्ठ युवा (पहली फिल्म) का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता. मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि आज भी बच्चन साहब ने (जो अब तक शायद सैकडों सम्मान प्राप्त कर चुके होंगें) इस सम्मान को बेहद सहेज कर रखा होगा....इस फिल्म "सात हिन्दुस्तानी" के बारे में कुछ और बातें करेंगे अगले रविवार... फिलहाल आपके कानों को सुपुर्द करते हैं एक बार फिर दीपाली जी के हाथों में, जो आपको महानायक के 7 पसंदीदा गीतों के सफ़र पर उन्हीं के अनुभवों को आपके साथ बाँट रही हैं. आज सुनिए 4 गीत, बाकी 3 अगले रविवार....


सदी का महानायक कहें या शहंशाह, एंथानी गोन्सालविस या फिर बिग बी कुछ भी कहिये, लेकिन एक ही चेहरा और एक ही आवाज दिखाई-सुनाई देती है और वो नाम है अमिताभ बच्चन का. कहते है कि कोइ-कोइ विरले ही होते है जो इतना मान तथा सम्मान पाते हैं, अमिताभ बच्चन उन्हीं विरलों में से एक हैं जिन्होंने हिन्दी सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अपना नाम अंकित किया है. प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन के पुत्र अमिताभ ने अपने नाम को सही मायनों में चरित्रार्थ किया है. अमिताभ ने फिल्म जगत में जब कदम रखा था तो कभी सोचा भी न होगा कि उनका ये सफर इतना लम्बा, यादगार तथा कभी खत्म ना होने वाला सफर होगा. आज हम आपके लिये उनके इस यादगार सफर के कुछ जाने-अनजाने पहलू लेकर आये है उम्मींद है आपको ये लम्हे पसंद आयेंगे. तो चलिये हम ले चलते है आपको अमिताभ बच्चन के साथ यादों के सफर पर ...........बकौल अमिताभ

नीला आसमां सो गया-दिल्ली

यश जी को यह गाना मैने ही सुझाया था.उन्हे फिल्म के लिये एक साफ्ट और मेलोडियस गाना चाहिये था. मैं आपको इस गाने से जुडी बात बताता हूँ. मैने शम्मी कपूर जी के साथ कई फिल्में की इसलिये वो मेरे करीबी हैं. उन्हें संगीत का बहुत शौक है मैं जब भी उनके घर जाता तो वो अक्सर एक पहाडी धुन गुनगुनाते थे. बाद में उस धुन को इस गाने का रूप दिया था. मैने इस गाने को यश जी को बताया तो वो राजी हो गये. हमने इस गाने के लिये शम्मी जी की इजाजत ली. संगीतकार हरिजी व शिवजी को ये गाना पसंद आया. उन्होंने मुझसे गाने को कहा लेकिन मैं कोइ गायक नही था फिर भी मैने इस गीत को गाया. मेरे परिवार तथा दोस्तों ने मुझसे कहा कि मैं फिर कभी दुबारा न गाऊँ. फिल्म की ज्यादातर शूटिंग दिल्ली और कश्मीर में की गयी. यह गाना रात में दिल्ली के एक फार्म हाउस में शूट किया गया.



कभी-कभी मेरे दिल में-श्रीनगर

हम यश जी और पूरी स्टार टीम के साथ एक महीना श्रीनगर में रुके थे. जब मन किया तो शूट किया और जब मन किया तो बोटिंग और पिकनिक की. सभी स्टारकास्ट अपनी फैमिली के साथ आयी थी. हर दिन किसी ना किसी परिवार का सदस्य कोइ ना कोइ खाना बनाता. हमने पूरी फिल्म एक पारिवारिक माहौल में शूट की जो कि फिल्म में भी दिखाई देता है. गाने के बोल शाहिर लुधियानवी जी ने लिखे थे. मुझे और यश जी को शक था कि फिल्म लोगों द्वारा स्वीकार की जायेगी भी या नहीं. उन्हीं दिनों मैंने दीवार.शोले और जंजीर जैसी फिल्मों में एन्ग्रीयंगमैन की भूमिकायें निभायी थी. जनता भी ताज्जुब में थी कि एन्ग्रीयंगमैन ने रोमांटिक किरदार कैसे निभाया. लेकिन यशजी फिल्म में और मारधाड़ नहीं चाहते थे, उन्हें केवल रोमांस चाहिये था. उनका विश्वास सही निकला सभी ने फिल्म को पसंद किया.



ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे-रामनगरम.

फिल्म का ज्यादातर भाग बैंगलौर के निकट रामनगरम में फिल्माया गया है. यह गीत बाइक और साइड कार में फिल्माया गया है. बाइक के साथ साइड कार में यह दृश्य फिल्माना कठिन था.रमेश सिप्पी जी एक सीन में चाहते थे कि धर्मेंद्र मेरे कंधे पर बैठे और साइड कार को अलग करके बाद में दुबारा बाइक से मिलाना था. कैमरा कार में लोड किया गया और उसी के साथ घूमते हुए हमें बाइक चलानी थी. यह भी आइडिया नहीं था कि हम कैसे निश्चित जगह पर एक साथ मिलेगे. हम नहीं जानते थे कि ये कैसे होगा लेकिन हमने ये एक ही टेक में किया.



सारा जमाना.....याराना-कोलकाता

फिल्म के प्रड्यूसर हबीब नाडियावाला को इस गाने का आइडिया मैने दिया. मैने पहले भी कोलकाता में कई फिल्में जैसे- 'दो अन्जाने' की थी. मुझे लगा कि अगर हम कोलकाता में शूट करेंगे तो बहुत लोग शूटिंग देखने आयेंगे. इस तरह नेचुरल भीड़ का इन्तजाम हो जायेगा. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्टेडियम तभी बना था और फिल्म के गाने के लिये वो जगह अच्छी थी. इसी बीच मुझे राबर्ट रेडफोर्ड की फिल्म का पोस्टर देखने को मिला जिसमें वो एक चमकीला आउटफिट पहनकर घोड़े पर राइड कर रहे थे. तब मैने सोचा क्यों ना एक ऐसी ड्रेस पहनी जाये जिसमें बल्ब लगे हों. हमने ये काम मेरे कपड़े सिलने वाले अकबर मियां को बताया और उन्होंने इस गीत के किये यह ड्रेस तैयार की. उन दिनों बैटरी का सिस्टम नही था. टेलर ने कपडो में ही इलेक्ट्रिक वायर फिट करके ड्रेस तैयार की. जब मैने उसे ऐसे ही चलाना शुरु किया तो वायर में कुछ प्राब्लम हो गयी और मुझे करंट लग गया.

इसके अलावा दूसरा चेलेंज जनता को कंट्रोल करना था. पुलिस आयी मारपीट हुए जिस वजह से हमें सब कुछ लपेटना पड़ा.हमने बाकी का पार्ट रात में शूट करने का फैसला किया. लोगों को दिखाने के बजाय किसी को रात में १२०००-१३००० मोमबत्ती जलाने को कहा गया. फिर हमने शाम की फ्लाइट पकड़ी और गाने को पूरा किया.



कहते हैं की परदे के पीछे की कहानी कुछ और ही होती है. अमिताभ जी ने जिन बातों को हमें बताया उससे हमें परदे के पीछे की कई दिलचस्प बातों का पता चलता है. ये बातें एक तरफ हमें नई चीजों से रुबरु कराती हैं वहीं घटनाओं की सच्चाई रोंगटे भी खड़े कर देती है. खैर बातचीत का ये सफर हम अपने अगले अंक में भी जारी रखेंगे. तब तक के लिये दीजिये इजाजत.

साभार -टाईम्स ऑफ़ इंडिया
दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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