Saturday, December 13, 2008

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'पूस की रात'



उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लघु कहानी 'पूस की रात'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना 'शादी की वजह' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की कहानी "पूस की रात", जिसको स्वर दिया है लन्दन निवासी कवयित्री शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 15 मिनट और 8 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

"हाथ ठिठुरे जाते थे। नगें पाँव गले जाते थे। और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था। इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा।" (प्रेमचंद की "पूस की रात" से एक अंश)


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#Seventeenth Story, Poos Ki Raat: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2008/16. Voice: Shanno Aggarwal

Friday, December 12, 2008

खिलखिलाती याद, मुस्कुराती याद, बिगड़ी हुई सी वो चिढ़ाती याद



दूसरे सत्र के २४वें गीत का विश्वव्यापी उद्घाटन


हिन्द-युग्म के १०वें गीत 'खुशमिज़ाज मिट्टी' के बोलों ने आवाज़ के श्रोताओं पर सर चढ़कर बोला। यह ज़ादू किया था गौरव सोलंकी के गीत ने। गौरव सोलंकी जो हिन्द-युग्म के दूसरे यूनिकवि और पाठकों के सबसे प्रिय कवि भी हैं। आज हम जो २४वाँ गीत 'चाँद का आँगन' लेकर आये हैं, उसके बोल भी गौरव ने लिखे हैं।

गीत को स्वरबद्ध किया है ग्वालियर निवासी कुमार आदित्य विक्रम ने। कुमार आदित्य विक्रम की आवाज़ में हमने इन्हीं के कवि पिता डॉ॰ महेन्द्र भटनागर की कविता का पॉडकास्ट प्रसारित किया था, तब ही आवाज़ की टीम ने यह जान लिया था कि इस संगीतकार-गायक के पास कविताओं को कम्पोज़ करने का हुनर है। इसलिए हमने सबसे पहले हमने इन्हें गौरव सोलंकी की कविता 'चाँद कला आँगन' कम्पोज करने के लिए दी। आइए सुनते हैं यह गीत-




कुमार आदित्य
गौरव सोलंकी
When Hind-Yugm released its this session 10th song 'Khushmizaz Mitti' , the lyrics of this song had rocked. This magic was of Hind-Yugm's famous writer and poet Gaurav Solanki's creation. Now this time, as our 24th song, we are releasing a fresh combo which lyrics are written by Gauarv Solanki again. By this composition, we are introducing a composer-cum-singer Gwaliaor borned artist Kumar Aditya Vikram whose first composition 'Geet Mein Tumane Sajaya' was very much appreciated by Aawaaz's team. Listen and give your feedback..



गीत के बोल-

चाँद का आँगन, चरखे की बुढ़िया
चाँदी की रातें, चन्दन की गुड़िया
मुस्काते सपने, खिलती सी निंदिया
तेरी वे बातें, खुशियों की पुड़िया
याद आती है, दिल जलाती है
बहते हैं आँसू, छोड़ जाती है

खिलखिलाती याद, मुस्कुराती याद
बिगड़ी हुई सी वो चिढ़ाती याद,
गूँजती रहती बिन बुलाई याद
किसने है भेजी, क्यों है आई याद


तेरी रातों की वो दीवाली याद
सर्द शामों की बर्फ़ीली याद
तेरे बालों की घुंघराली याद
चाय के कप की भाप वाली याद
याद आती है, दिल जलाती है
बहते हैं आँसू, छोड़ जाती है

खिलखिलाती याद, मुस्कुराती याद
बिगड़ी हुई सी वो चिढ़ाती याद,
उलझी हुई सी भटकी हुई याद
किसने है भेजी, क्यों है आई याद

तेरे हाथों का अमिया का पेड़
तेरे पैरों की खेत की वो मेड़
उस कड़वी सी कॉफ़ी वाली याद
वो चवन्नी की टॉफ़ी वाली याद
याद आती है, दिल जलाती है
बहते हैं आँसू, छोड़ जाती है

खिलखिलाती याद, मुस्कुराती याद
बिगड़ी हुई सी वो चिढ़ाती याद,
तेरे आँगन की वो तिपाई याद
किसने है भेजी, क्यों है आई याद

गीत पसंद आने पर इसे अपने मित्रों तक पहुँचायें। अपने ब्लॉग/वेबसाइट/ऑरकुट स्क्रैपबुक/माईस्पैस/फेसबुक में 'चाँद का आँगन' का पोस्टर लगाने के लिए पसंदीदा पोस्टर का कोड कॉपी करें।



SONG # 24, SEASON # 02, CHAND KA ANGAN, OPENED ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.


आम आदमी की रगों में दौड़ता एक कवि प्रदीप



11 दिसंबर को इनकी 10वीं पुण्यतिथि पर विशेष।

कविता, गीत या फिर लेखन की कोई और विधा हो, वो तभी मुकम्मल होती है जब वो सभी सरहदें लांघ कर एक देश से दूसरे देश और दूसरे देश से तीसरे देश तक जा पहुंचे। यद्यपि ऐसे रचनाकारों की गिनती बहुत कम है, लेकिन उन रचनाकारों में एक अग्रणी नाम प्रख्यात कवि और गीतकार प्रदीप का आता है। मध्य प्रदेश में जन्मा यह कवि 11 दिसंबर 1998 को हमें छोड़कर चला गया तो सबकी आंखें नम तो हुई लेकिन प्रदीप की रचनाएँ हर देशवासी और साहित्यप्रेमी की रगों में दौड़ती रही और यह रवानगी का सफर निरंतर चलते रहने वाला है। उनकी रचनाएं उस समय भी देशवासियों में वही जोश भर रही थी जब ताज पर कुछ आतंकियों ने खूनी खेल खेला था, जो जोश आज़ादी के समय अंग्रेज़ों के खिलाफ प्रदीप की रचनाओं ने भरा था।
प्रदीप के कुछ मशहूर गीत

आज हिमालय की चोटी (क़िस्मत)


ऐ मेरे वतन के लोगो


आओ बच्चे तुम्हें दिखाएँ (जागृति)


हम लाये हैं तूफान से(जागृति)


साबरमती के संत तूने (जागृति)


ऊपर गगन विशाल (मशाल)


कितना बदल गया इंसान (नास्तिक)


छोटी सी उम्र में लिखने का शौक प्रदीप को ऐसा चढ़ा कि उनका गीत "हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो दुनिया वालो ये हिंदोस्तान हमारा है"। फिल्म 'किस्मत' में शुमार कर लिया गया। इस गाने के बाद मानो प्रदीप की किस्मत जाग उठी। बाद में ये गीत आजादी की लड़ाई में देशभक्तों में जोश भरने वाला टॉनिक बन गया। अंग्रेज़ों की तिलमिलाहट तब स्पष्ट झलकी जब इस गीत पर प्रदीप के खिलाफ अंग्रेज़ों ने गिरफ्तारी वॉरंट जारी कर दिया।
इस कवि की लेखनी में जो कशिश थी, उसी ने पंडित नेहरू की आँखें उस समय छलका दीं जब प्रदीप का गाना "ऐ मेरे वतन के लोगो, तू खूब लगा लो नारा" नेहरू ने सुना। इस गीत को सुनकर आज भी देश भाव विभोर हो उठता है और यह गीत आज भी उतना ही सटीक है, जितना लिखे जाने के समय था, इसी को लेखक की जीवंतता कहा जा सकता। बड़े–बड़े नामी लेखक और बड़ी-बड़ी रचनाएं आईं मगर इस गीत के आगे सभी देशभकित गीत फीके नज़र आते हैं। प्रदीप की लेखनी में एक ख़ासियत ये थी कि उनकी रचनाएं किसी वर्ग विशेष या फिर किसी रजतनीतिक विचारधारा से ओत–प्रोत नहीं थी। यही कारण था कि प्रदीप की रचनाएं छोटे-छोटे फेरबदल के साथ पाकिस्तान ने भी प्रयोग की। उनके कुछ उदाहरण देखिए :-

‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड़ग बिना ढाल’ ये गीत पाकिस्तान को इतना भाया कि पाकिस्तान की फिल्मों में ये ऐसे आया, ‘यूं दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान, ए कायदे आज़म तेरा एहसान है एहसान’। इसी प्रकार ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दोस्तान की’, गीत को पाकिस्तान में कुछ ऐसे गाया गया:- ‘ आओ बच्चो सैर कराएं तुमको पाकिस्तान की’
दाल, चावल और सादा जीवन व्यतीत करने वाले कवि प्रदीप ने यह लिखकर दिया कि ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत से मिलने वाली रॉयलटी की राशि शहीद सैनिकों की विधवा पत्नियों को दी जाए, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रदीप कवि के साथ एक उदार और सच्ची देशभक्त लेखक भी थे।
लेखक निदा फाज़ली उन्हें एक अच्छा लेखक होने के साथ एक बेहतर गीतकार भी मानते हैं। शायद निदा फाज़ली साहब का यह विचार है भी सचमुच पुष्ट, इसीलिये प्रदीप को ‘दादा साहेब फालके’ पुरस्कार से भी अलंकृत किया गया। यह प्रदीप की सशक्त लेखनी ही है कि पाकिस्तान ने प्रभावित होकर हिन्दी फिल्म ‘जागृति’ का रीमेक ‘ बेदारी’ बना डाला जो वहां पर आज भी लोकप्रिय है।
राम किशोर द्विवेदी से कवि प्रदीप तक का यह सफ़र आज 11 दिसंवर 2008 को उनकी 10वीं पुण्यतिथि पर जहां उनकी याद दिलाता है, वहीं नम आंखों से पूरा देश उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है----
नियति को कौन टाल पाया है लेकिन प्रदीप के नग़्में उन्हें जन्म-जन्म तक ज़ीवित रखेंगे।

प्रस्तुति- प्रकाश बादल

Thursday, December 11, 2008

एक प्यार का नग्मा है...कुछ यादें जो साथ रह गई...




सितम्बर ३, १९४० को गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में जन्में प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जोड़ी के) का बचपन बेहद संघर्षभरा रहा. उनका माँ का देहांत छोटी उम्र में ही हो गया था. उनके पिता पंडित रामप्रसाद जी ट्रम्पेट बजाते थे और चाहते थे कि प्यारेलाल वोयलिन सीखे. पिता के आर्थिक हालात ठीक नही थे, वे घर घर जाते थे जब भी कहीं उन्हें बजाने का मौका मिलता था और साथ में प्यारे को भी ले जाते. उनका मासूम चेहरा सबको आकर्षित करता था. एक बार पंडित जी उन्हें लता जी के घर लेकर गए. लता जी प्यारे के वोयलिन वादन से इतनी खुश हुई कि उन्होंने प्यारे को ५०० रुपए इनाम में दिए जो उस जमाने में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. वो घंटों वोयलिन का रीयाज़ करते. अपनी मेहनत के दम पर उन्हें मुंबई के रंजीत स्टूडियो के ओर्केस्ट्रा में नौकरी मिल गई जहाँ उन्हें ८५ रुपए मासिक वेतन मिलता था. अब उनके परिवार का पालन इन्हीं पैसों से होने लगा. उन्होंने एक रात्रि स्कूल में सातवें ग्रेड की पढाई के लिए दाखिला लिया पर ३ रुपये की मासिक फीस उठा पाने की असमर्थता के चलते छोड़ना पड़ा. मुश्किल हालातों ने भी उनके हौसले कम नही किए, वो बहुत महत्वकांक्षी थे, अपने संगीत के दम पर अपने लिए नाम कमाना और देश विदेश की यात्रा करना उनका सपना था.

जानते हैं स्वयं प्यारेलाल जी से, उनके इस जीरो से सुपर हीरो बनने की लम्बी कहानी के संक्षिप्त अंश.


वो शुरूआती दिन
"मैंने संगीत सीखने के लिए एक संगीत ग्रुप (मद्रिगल सिंगर) जोइन किया, पर वहां मुझे हिंदू होने के कारण स्टेज आदि पर परफोर्म करने का मौका नही मिलता था. वो लोग पारसी और इसाई वादकों को अधिक बढ़ावा देते थे. पर मुझे सीखना था तो मैं सब कुछ सह कर भी टिका रहा. पर मेरे पिता ये सब अधिक बर्दाश्त नही कर पाते थे. उन्होंने ख़ुद गरीब बच्चों को मुफ्त में सिखाने का जिम्मा उठाया और वो उन्हें संगीतकार नौशाद साहब के घर भी ले जाया करते थे. करीब १५०० बच्चों को मेरे पिता ने तालीम दी"


लक्ष्मीकांत से मुलाकात
"लक्ष्मीकांत पंडित हुस्नलाल भगतराम के साथ काम करते थे उन दिनों. वो मुझसे ३ साल बड़े थे उम्र में. धीरे धीरे हम एक दूसरे के घर आने जाने लगे. साथ बजाते और कभी कभी क्रिकेट खेलते और संगीत पर लम्बी चर्चाएँ करते. हमारे शौक और सपने एक जैसे होने के कारण हम बहुत जल्दी अच्छे दोस्त बन गए."

पहला बड़ा काम
"श्रीरामचंद जी ने एक बार मुझे बुला कर कहा कि मैं तुम्हें एक बड़ा काम देने वाला हूँ. वो लक्ष्मी से पहले ही इस बारे में बात कर चुके थे. चेन्नई में हमने ढाई साल साथ काम किया फ़िल्म थी "देवता" कलाकार थे जेमिनी गणेशन, वैजन्ती माला, और सावित्री. जिसके हमें ६००० रुपए मिले थे. ये पहली बार था जब मैंने इतने पैसे एक साथ देखे. मैंने इन पैसों से अपने पिता के लिए एक सोने की अंगूठी खरीदी जिसकी कीमत १२०० रुपए थी."

कैसे करते थे साथ में काम
"हम दोनों अलग अलग बैठ कर धुन बनाते थे और मिलने पर जो बेहतर लगती उसे चुन लेते थे, कभी कभी साथ में बैठकर भी काम करते थे. कई बार ऐसा भी हुआ कि हमने अलग अलग बैठ कर धुन बनाई फ़िर भी एक जैसी बन गयी. हमारे बीच भी मतभेद होते थे पर हमने उन्हें कभी जग जाहिर नही किया. वो मुझसे बेहतर समझ रखते थे व्यवसाय की. मैं अपने पिता की तरह बहुत तुनकमिजाज़ हुआ करता था पर वो बहुत संयम से काम करते थे. हम अपने झगडे अक्सर युहीं सुलटा लेते थे. मुझे लगता है कि फ़िल्म "शोर" का गीत "एक प्यार का नग्मा है..." हमारे ही जीवन की कहानी कहता है. हमारे नाम एक दूजे से इस कदर जुड़े हुए थे कि अक्सर लोगों को एक नाम होने की ग़लतफ़हमी हो जाती थी. जब मेरी शादी होने जा रही थी तो मेरी होने वाली पत्नी के रिश्तेदारों को लगता था कि उनकी लड़की की शादी किसी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल नाम के आदमी से होने जा रही है. (हँसते हुए) प्यारेलाल नाम लक्ष्मीकांत के बिना आज भी अधूरा ही है."

"मैं येहुदी मेनुहिन का जबरदस्त फेन था. मेरा सपना था कि हिन्दुस्तान को हमेशा के लिए छोड़ कर विदेश में जाकर बसने का और किसी अँगरेज़ लड़की से शादी कर वहां सेटल होने का. पर लक्ष्मी जी ने मुझे दोस्ती का वास्ता देकर रोक लिया. राज साहब (राज कपूर) अक्सर कहा करते थे लक्ष्मी जी से - "तुमने दो अच्छे काम किए हैं जीवन में, एक अच्छा संगीत दिया और दूसरा प्यारे को विदेश जाने से रोक लिया". राज साहब मुझे बहुत स्नेह देते थे."

"अक्सर लोग सोचते हैं कि "पारसमणी" हमारी पहली फ़िल्म थी. पर वो पहली प्रर्दशित फ़िल्म थी, उससे पहले हमने ४ फिल्मों के लिए काम किया जो कभी प्रर्दशित ही नही हो पायी. पहली अप्रदर्शित फ़िल्म हमारी "हम तुम और वोह" थी. पांचवीं फ़िल्म "पारसमणी" में हमारे काम कि प्रशंसा हुई. पर "दोस्ती" ने हमें कमियाबी दी."

लता जी के बारे में -
"लता जी हरफनमौला थी, आप उन्हें जो भी दें गाने को वो उनमें जिंदगी डाल देती थी. उन्होंने कभी भी हमें डेट देने में आनाकानी नही की. उन्होंने हमारी लो बजेट फिल्म्स के लिए भी कम पैसों में गीत गाये. जब काम से देर हो जाया करती तो मैं अक्सर उनके यहाँ रुक जाता और लिविंग रूम के सोफे पर सोता. हृदयनाथ मंगेशकर जिन्हें हम बालासाहेब कहते थे मेरे बहुत करीबी मित्र रहे हमेशा."

वो खट्टी मीठी यादें -
बुरे दिनों में एक बार मेरे पिताजी ने रफी साहब और लता जी से से कुछ पैसे उधार लिए थे, जब रफी साहब और लता जी एक बार साथ में "ये दिल तुम बिन..." गीत की रिकॉर्डिंग पर आए तो मुझे अचानक याद आया उन पैसों के बारे में पर जब मैंने उन्हें वापस करना चाहा तो दोनों ने लेने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि इसे हमारा आशीर्वाद समझ कर रखिये. किशोर कुमार भी बहुत प्रतिभाशाली थे जब भी स्टूडियो आते गाते हुए आते "हल्लो लक्ष्मीकानतम प्यारेलालम..." (हँसतें हुए). आर डी (बर्मन) के साथ में हमारे रिश्ते हमेशा दोस्ताना रहे बेशक हमारे बीच एक संगीतमय प्रतिस्पर्धा हमेशा चलती रहती थी. जब आर डी को पता चला कि हम फ़िल्म "फ़र्ज़" के लिए जेम्स बोंड की धुन का इस्तेमाल करने जा रहे हैं तो उन्होंने हमें कॉल किया क्योंकि वो भी "जेवेल थीफ" के लिए कुछ वैसी ही धुन बना रहे थे, और ये जानने पर कि हमारी फ़िल्म की ६-७ रीलें उस धुन पर तैयार हो चुकी हैं उन्होंने अपनी फ़िल्म से उस धुन को हटा लिया."

"मुझे याद है बात उनके आकस्मिक मौत से कुछ पहले की है. एक शादी में हमारी उनसे मुलाकात हुई, उन्होंने पूछा मुझसे कि व्हिस्की है क्या तुम्हारे पास तो मैंने कहा कि गाड़ी में रखी है, और हम तीनों पूरी रात गाड़ी में घूमते रहे और पीते रहे, उन दिनों मैं और लक्ष्मी बिल्कुल खाली थे, तब आर डी ने बताया कि वो एक नई फ़िल्म कर रहे हैं "१९४२- अ लव स्टोरी" और ये भी कहा कि तुम लोग सुनोगे तो तुम्हें भी ज़रूर पसंद आएगा. पर वो फ़िल्म रेलीस होने से पहले ही हम सब को छोड़ कर चला गया. अभी भी उस फ़िल्म के गाने सुनता हूँ तो आंख भर आती है."

संगीत की चोरी -
"बॉलीवुड में हर संगीतकार बहुत से दबाबों में काम करता है. निर्माता निर्देशक और एक्टर सभी की बात रखनी पड़ती है कई बार, उदहारण के लिए फ़िल्म हम का "जुम्मा चुम्मा" हमने सिर्फ़ अमित जी के दबाब में किया था. पर फ़िर भी हम इन सब से बचने की हमेशा कोशिश करते रहे हैं, हमारे ५०० फिल्मों के संगीत सफर में आपको गिनती के ५० गीत भी नही मिलेंगे ऐसे जिसमें हमें विदेशी धुनों की नक़ल करनी पड़ी हो, कभी कभार व्यवसायिक दबाबों के आगे झुकना पड़ता है."

दोस्तों, प्यारेलाल जी अपने सांझीदार लक्ष्मीकांत के जाने के बाद ६ सालों तक बीमार और अस्वस्थ रहे. पर अब धीरे धीरे स्वस्थ लाभ पा रहे हैं, और शराब और तम्बाकू से भी निजात पा चुके हैं. उम्मीद है कि जल्दी ही वो सक्रिय होकर काम करेंगे और इस नई पीढी को भी अपने जादू भरे संगीत से परिचित होने का मौका अवश्य देंगे. चलते चलते सुनते हैं एल पी के कुछ और यादगार नग्में. (यदि धुन की मधुरता चखनी हो तो सुनियेगा "तुम गगन के चंद्रमा हो..." और यदि संगीत संयोजन की उत्कृष्टता सुननी हो तो ध्यान से सुनियेगा इसी गुलदस्ते में से फ़िल्म तेजाब का "सो गया ये जहाँ..." गीत)

आनंद लें -


Wednesday, December 10, 2008

वो जब याद आए बहुत याद आए...



जब सोनू निगम ने जलाए गीतों के दीप एल पी के लिए

हिन्दी फ़िल्म संगीत के सबसे सफलतम संगीत जोड़ी के लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल का एक साधारण स्तर से उठ कर इतने बड़े मुकाम तक पहुँचने की दास्तान भी कम दिलचस्प नही है. दोनों लगभग १०-१२ साल के रहे होंगे जब मंगेशकर परिवार द्वारा बच्चों के लिए चलाये जाने वाले संगीत संस्थान, सुरील कला केन्द्र में वो पहली बार एक दूसरे के करीब आए (हालांकि वो एक स्टूडियो में पहले भी मिल चुके थे). दरअसल लक्ष्मीकांत को एक कंसर्ट में मँडोलिन बजाते देख प्रभावित हुई लता दी ने ही उन्हें इस संस्था में दाखिल करवाया था. वहीँ प्यारेलाल ने अपने गुरु पंडित राम प्रसाद शर्मा से trumpet और गोवा के अन्थोनी गोंसाल्विस (जी हाँ ये वही हैं जिनके लिए उन्होंने फ़िल्म अमर अकबर एंथोनी का वो यादगार गीत समर्पित किया था) से वोयालिन बजाना सीखा वो भी मात्र ८ साल की उम्र में. वोयालिन के लिए उनका जनून इस हद तक था कि वो दिन में ८ से १२ घंटे इसका रियाज़ करते थे. दोनों बहुत जल्दी दोस्त बन गए दोनों का जनून संगीत था और दोनों के पारिवारिक और वित्तीय हालात भी लगभग एक जैसे थे. लता जी ने उन्हें नौशाद साहब, एस डी बर्मन, और सी रामचंद्र जैसे संगीतकारों के लिए बजाने का काम दिलवा दिया. दोनों घंटों साथ स्टूडियो में समय बिताते, एक दूसरे के लिए काम की तलाश करते, और यदि मौका लगे तो एक साथ बजाते. उनके मित्रों में अब जुबिन मेहता, शिव कुमार शर्मा और हरी प्रसाद चौरसिया भी थे. प्यारेलाल ने जुबिन के साथ विदेश पलायन करने का मन बना लिया. पर दोस्ती ने उन्हें भारत में ही रोक लिया. उन्होंने लक्ष्मीकांत के साथ जोड़ी बनाई और किस्मत ने उन्हें संगीतकार जोड़ी कल्यानजी आनंद जी का सहायक बना दिया.

संघर्ष के इन दिनों में एस डी बर्मन के सुपुत्र आर डी बर्मन से उनकी दोस्ती हुई. वो भी अपने लिए एक बड़े ब्रेक का इंतज़ार कर रहे थे. आर डी को जब पहली फ़िल्म मिली "छोटे नवाब" तो उन्होंने संगीत संयोजन का काम सौंपा एल पी को. इससे पहले एल पी ने एस डी फ़िल्म "जिद्दी" का भी संगीत संयोजन किया था. कहते हैं एस डी ने परखने के लिए इस फ़िल्म के एक गीत का अंतरा एल पी और आर डी को अलग अलग दिया बनाने के लिए और अंत में उन्होंने वही मुखडा फ़िल्म में रखा जो एल पी ने बनाया था. इस बीच एक बी ग्रेड फ़िल्म मिली जो प्रर्दशित नही हो पायी. ५०० धुनों का खजाना था एल पी के पास जब उन्हें उनकी पहली प्रर्दशित नॉन स्टारर फ़िल्म "पारसमणि" मिली. आर डी ने उन्हें हिदायत दी कि इस फ़िल्म को न करें, ये उनके कैरिअर को बुरी शुरआत दे सकता है, पर एल पी हाथ आए इस सुनहरे मौके को नही छोड़ना चाहते थे. आज भी इस फ़िल्म को सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके सुपर हिट संगीत के लिए याद किया जाता है. लता और कमल बारोट का गाया "हँसता हुआ नूरानी चेहरा", रफी साहब का गाया "सलामत रहो" और "वो जब याद आए" जैसे गीतों ने धूम मचा दी. अगली बड़ी फ़िल्म थी राजश्री की "दोस्ती". इंडस्ट्री के सभी बड़े संगीतकारों ने इस नए बिल्कुल अनजान कलाकारों को लेकर बनाई जाने वाली फ़िल्म को ठुकरा दिया तो फ़िल्म एल पी की झोली में गिरी. गीतकार थे मजरूह सुल्तानपुरी. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना. फ़िल्म ने ८ फ़िल्म फेयर और सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का रास्ट्रीय पुरस्कार जीता. कौन भूल सकता है - "जाने वालों जरा", "चाहूँगा मैं तुझे" और "राही मनवा" जैसे अमर गीत.

प्रसाद प्रोडक्शन की फ़िल्म "मिलन" के लिए जब मुकेश की आवाज़ में "मैं तो दीवाना" रिकॉर्ड हुआ निर्देशक कुछ ख़ास प्रभावित नही लगे. पर जब अगला गाना "सवान का महीना" रिकॉर्ड हुआ तो जैसे स्टूडियो में बहार आ गयी. इस गीत के गीतकार आनंद बख्शी बताते हैं कि जब वो एक रेल यात्रा के दौरान किसी स्टेशन पर उतरे और वहां उन्होंने एक बेहद गरीब और साधारण से रिक्शा चालक को ये गीत गुनगुनाते हुए सुना तो उन्हें समझ आ गया कि उनका काम सार्थक हुआ है. लक्ष्मी प्यारे अब घर घर में पहचाने जाने लगे थे. यहीं से उन्हें मिला गीतकार आनंद बख्शी साहब का साथ. जो लगभग 250फिल्मों का रहा. हिन्दी फ़िल्म संगीत में गीतकार संगीतकार की ये सबसे सफल जोड़ी है अब तक.

व्यवसायिक रूप से आमने सामने होकर भी आर डी और उनकी दोस्ती में खलल नही पड़ा. फ़िल्म "दोस्ती" में जहाँ आर डी ने उनके लिए "माउथ ओरगन" बजाया तो लक्ष्मीकांत ने आर डी की फ़िल्म "तेरी कसम" के गीत "दिल की बात" में बतौर संगीतकार अतिथि रोल किया.पर बाद में जब फ़िल्म "देशप्रेमी" के लिए आर डी से गाने की गुजारिश की एल पी ने तो आर डी ने कुछ मजबूरियों के चलते मना कर दिया, ये गीत तब लक्ष्मीकांत के ख़ुद गाया अपनी आवाज़ में. पर तमाम व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते भी दोनों महान संगीतकारों के रिश्ते अन्तिम समय तक भी दोस्ताना रहे.२५-०५-१९९८ को जोडीदार लक्ष्मीकांत को खोने के बाद प्यारेलाल ने थोड़ा बहुत काम ज़रूर किया पर फ़िर बहुत अधिक सक्रिय नही रह पाये. प्यारेलाल जी ने एक ख़ास इंटरव्यू में बहुत सी नई बातों का खुलासा किया. ये इंटरव्यू हम आपके लिए लेकर आयेंगें इस शृंखला की अन्तिम कड़ी में. फिलहाल देखिये इस विडियो में,आज के सबसे सफल गायक सोनू निगम द्वारा संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को दिया गया ये संगीत भरा तोहफा.



Tuesday, December 9, 2008

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे..और आज के एल पी तक...एक सुनहरा अध्याय




३७ लंबे वर्षों तक श्रोताओं को दीवाना बनाकर रखने वाले इस संगीत जोड़ी को अचानक ही हाशिये पर कर दिया गया. आखिर ऐसा क्यों हुआ. ५०० से भी अधिक फिल्में, अनगिनत सुपरहिट गीत, पर फ़िर भी संगीत कंपनियों ने और मिडिया ने उन्हें नई पीढी के सामने उस रूप में नही रखा जिस रूप में कुछ अन्य संगीतकारों को रखा गया. गायक महेंद्र कपूर ने एक बार इस मुद्दे पर अपनी राय कुछ यूँ रखी थी- "उनका संगीत पूरी तरह से भारतीय था, जहाँ लाइव वाद्यों का भरपूर प्रयोग होता था. चूँकि उनके अधिकतर गीत मेलोडी प्रधान हैं उनका रीमिक्स किया जाना बेहद मुश्किल है और संगीत कंपनियाँ अपने फायदे के लिए केवल उन्हीं को "मार्केट" करती हैं जिनके गीतों में ये "खूबी" होती है." ये बात काफ़ी हद तक सही प्रतीत होती है. पर अगर हम बात करें हिट्स की तो किसी भी सच्चे हिन्दी फ़िल्म संगीत के प्रेमी को जो थोड़ा बहुत भी बीते सालों पर अपनी नज़र डालने की जेहमत करें वो बेझिझक एल पी के बारे में यह कह सकेगा - "बॉस" कौन था मालूम है जी...

चलिए इस बात को कुछ तथ्यों के आधार पर परखें -

हिन्दी फिल्मों कि स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने एल पी के संगीत निर्देशन में सबसे अधिक (करीब ७००) गीत गाये. कुछ ऐसा था ये गठबंधन कि जैसे एल पी जानते हो कि क्या जचेगा लता जी की आवाज़ में और लता दी भी समझती हों कि क्या है एल पी के किसी ख़ास गीत के गहरे छुपे भाव. तभी तो इस टीम ने सालों साल एक से बढ़कर एक गीत दिए, वो भी विविधता से भरे हुए, बानगी देखिये "अखियों को रहने दे" (बॉबी), "एक प्यार का नग्मा है" (शोर), "जाने क्यों लोग.."(महबूब की मेहंदी), "चलो सजना" (मेरे हमदम मेरे दोस्त), गुडिया (दोस्ती)....ये सूची बहुत बहुत लम्बी है. बहरहाल तर्क ये है कि लता दी की आवाज़ का हर रंग हर रूप देखा दुनिया ने, एल पी के निर्देशन में.

गायक/गायिका की मार्केट पोजीशन से अलग हट कर वो ये देखते थे कि उनके गीतों पर किसकी आवाज़ जचेगी. रफी साहब एक "सूखे" दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उन्हें "अमर अकबर अन्थोनी" का सुपर हिट गीत "परदा है परदा" दिया. इसी फ़िल्म में उन्होंने हिन्दी फिल्मों के चार सबसे बड़े गायकों को एक साथ गवाया. "हम को तुमसे..." गीत में लता के साथ स्वर मिलाया रफी साहब, किशोर दा और मुकेश के स्वरों ने. मुकेश साहब भी अपने कैरियर के मुश्किल दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उनसे "मिलन" के गीत गवाए, जिसके लिए उन्हें फ़िल्म के निर्माता -निर्देशक को बहुत समझाना-मनाना भी पड़ा था.

फ़िल्म फेयर पुरस्कारों की बात करें तो एल पी ने ये सम्मान ७ बार जीता. जिसमें ४ बार लगातार (१९७७ से १९८० तक) इस सम्मान के विजेता होने का रिकॉर्ड भी है. बहुत सी "बी" ग्रेड और गैर सितारों से सजी फिल्मों को भी उन्होंने अपने संगीत के दम पर उंचाईयां दी. यहाँ तक कि इंडस्ट्री के दो बड़े गायकों (मोहम्मद रफी और किशोर कुमार) पर बिना निर्भर रहे भी उन्होंने "रोटी कपड़ा और मकान","बॉबी", "एक दूजे के लिए", "हीरो", "उत्सव", और "सुर संगम" जैसी फिल्मों में ढेरों हिट गीत दिए. पर बड़े गायकों में भी उन्होंने एक सामंजस्य बनाये रखा गीतों की संख्या के मामले में रफी साहब ने लगभग ३७० गीत गाये तो किशोर दा ने करीब ३९९ गीतों को आवाज़ दी उनके संगीत निर्देशन में. आशा जी ने २५० गीत गाये तो मुकेश ने ८० गीतों में योगदान दिया. हेमंत कुमार, मन्ना डे, तलत महमूद, महेंद्र कपूर से लेकर सुरेश वाडकर, मनहर उधास, पंकज उधास, सुदेश भोंसले, सोनू निगम, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति, अलका याग्निक, साधना सरगम, अनुराधा पौडवाल, सुखविंदर, अलीशा, उदित नारायण, रूप कुमार राठोड.... कौन सा ऐसा गायक है जिसे उन्होंने मौका नही दिया और जिसने उनके संगीत निर्देशन में गाकर ख़ुद को खुशकिस्मत न महसूस किया हो.

एल पी की कमियाबी का सबसे बड़ा राज़ था, उत्कृष्ट आपसी समन्वय, काम का उचित बंटवारा, एक दूसरे के काम में दखल न देने की आदत, सरल और गुनगुनाने लायक धुन, अकॉस्टिक वाद्यों का अधिक इस्तेमाल, इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों का भी सही मात्र में उपयोग, और इन सब से बढ़कर दोनों की भारतीय और पाश्चात्य संगीत की और वाद्यों की विशाल और विस्तृत जानकारी. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे और लक्ष्मी प्यारे से एल पी, संगीत का एक विशाल अध्याय है ये सफर जिसकी शुरूआती कहानी भी कम दिलचस्प नही है, जिसका जिक्र हम करेंगें कल साथ ही आपको मिलवायेंगें प्यारेलाल जी से,फिलहाल सुनते हैं एल पी के कुछ और यादगार नग्में.






Monday, December 8, 2008

निर्माता-निर्देशकों के लिए सफलता की गैरंटी था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत




बात होती है सदी के नायक की, नायिका की, पर अगर हम बात करें बीती सदी के सबसे सफलतम संगीतकार की, तो बिना शक जो नाम जेहन में आता है वो है - संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का. १९६३ में फ़िल्म "पारसमणी" से शुरू हुआ संगीत सफर बिना रुके चला अगले चार दशकों तक. बदलते समय के साथ ख़ुद को बदलकर हर पीढी के मिजाज़ को ध्यान में रख ये संगीत के महारथी चलते रहे अनथक और लिखते रहे निरंतर कमियाबी की नयी इबारतें. पल पल रंग बदलती, हर नए शुक्रवार नए रूप में ढलती फ़िल्म इंडस्ट्री में इतने लंबे समय तक चोटी पर अपनी जगह बनाये रखने की ये मिसाल लगभग असंभव सी ही प्रतीत होती है. और किस संगीतकार की झोली में आपको मिलेंगी इतनी विविधता. शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत, लोक गीतों में ढले ठेठ भारतीय गीत, पाश्चात्य संगीत में बसे गीत, भजन, मुजरा, डिस्को -जैसा मूड वैसा संगीत, और वो भी सरल, सुमधुर, "कैची" और "क्लास".परफेक्शन ऐसा कि कोई ढूंढें भी तो कोई कमी न मिले. आम आदमी की जुबान पर तो उनके गीत यूँ चढ़ जाते थे जैसे बस उन्हीं के मन की धुन हो कोई. मेलोडी ही उनके गीतों की आत्मा रही. सहज धुन में सरल सी बात और संयोजन (जो अमूमन प्यारेलाल जी का होता था) सौ प्रतिशत बेजोड़.

३७ सालों तक उनका नाम रजत पटल पर इस शान से आता था जैसे उनका संगीत ही फ़िल्म का तुरुप का इक्का हो, कभी कभी तो फ़िल्म के निर्माता नायक नायिका से बढ़कर इस बात का प्रचार करते थे कि फ़िल्म में संगीत एल पी का है. वो एक ऐसा नाम थे जो सफलता की गैरंटी का काम करते थे. तभी तो हर नए पुराने निर्माता निर्देशकों की वो पहली पसंद हुआ करते थे. शायद ही कोई ऐसा बड़ा बैनर हो फ़िल्म जगत में जिनके साथ उनका रिश्ता न जुडा हो. राजश्री फ़िल्म, राज खोंसला, राज कपूर, सुभाष घई, जे ओम् प्रकाश, मनमोहन देसाई, मोहन कुमार, मनोज कुमार आदि केवल कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनके साथ एल पी का बेहद लंबा और बेहद कामियाब रिश्ता रहा है. अब ज़रा इस सूची में शामिल निर्देशकों की फिल्मों पर एक नज़र डालते हैं -

राज खोंसला ने एस डी, ओ पी नय्यर और रवि के साथ काम करने के बाद फ़िल्म "अनीता" में पहले बार एल पी को आजमाया. सामाजिक विषयों पर फ़िल्म बनाने वाले राज ने "मेरा गाँव मेरा देश", "मैं तुलसी तेरे आंगन की", "दो रास्ते" और "दोस्ताना" जैसी फिल्में बनायीं जिनके लिए एल पी तुम बिन जीवन, सोना ले जा रे, हाय शरमाऊं, ये रेशमी जुल्फें, बिंदिया चमकेगी, दिल्लगी ने दी हवा, जैसे सरल और मिटटी से जुड़े गीत दिए. राज खोंसला ने एक बार एक सभा में कहा था कि यदि आपके पास एल पी है तो आपको और कुछ नही चाहिए. सदी के सबसे बड़े शो मैन कहे जाने वाले राज कपूर ने शंकर जयकिशन के साथ बहुत लंबा सफर तय किया. पर एक समय ऐसा भी आया जब राज साहब की महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की असफलता के बाद पहली बार राज साहब अपनी नई फ़िल्म "बॉबी" को लेकर शंकित थे. फ़िल्म नई पीढी को टारगेट कर बनाई जानी थी तो संगीत में भी उस समय का "फील" मिलना चाहिए था. राज साहब ने चुनाव किया एल पी का, जो उनका सबसे बढ़िया निर्णय साबित हुआ. फ़िल्म का एक एक गीत श्रोताओं के दिलो जहेन पर छा गया. ज़रा गौर फरमायें फ़िल्म इन गीतों में बसे मुक्तलिफ़ रंगों की. एक ही फ़िल्म में बुल्ले शाह का सूफी अंदाज़ "मैं नई बोलना", मस्ती भरा शोख "हम तुम एक कमरे में बंद हो", युवाओं की बोलचाल वाला "मुझे कुछ कहना है", गोवा के संगीत का जायका "गे गे गे साहिबा", पहली मोहब्बत का पहला सरूर "मै शायर तो नही" और टूटे दिल की दर्द भरी सदा "अखियों को रहने दे". क्या नही दिया उस फ़िल्म में एल पी ने. राज साहब के साथ फ़िर आई "सत्यम शिवम् सुन्दरम" और "प्रेम रोग" दोनों ही बेहद अलग कैनवस की फ़िल्म थी और देखिये वहां भी बाज़ी मार गए एल पी हर बार की तरह.

फ़िल्म "दोस्ती" से शुरू हुआ राजश्री फिल्म्स के साथ उनका सफर ८ सालों तक चला. कुछ लोग मानते हैं कि इस बैनर के साथ एल पी हमेशा अपना "सर्वश्रेष्ट" काम दिया. जे ओम् प्रकाश की रोमांटिक फिल्मों के लिए उन्होंने ऐसा समां बांधा कि आज भी संगीत प्रेमी उन फिल्मों में लता रफी के गाये दोगानों के असर से मुक्त नही हो पाये. मनोज कुमार की देशभक्ति और भावनाओं से ओत प्रेत फिल्मों (शोर, रोटी कपड़ा और मकान, और क्रांति) के लिए एल पी ने एक प्यार का नग्मा, पानी रे पानी, महंगाई मार गई, जिन्दगी की न टूटे लड़ी जैसे आम आदमी के मन को छूने वाले गीत दिए. तो वहीँ सुभाष घई की फिल्में जो बहुत बड़े स्तर पर निर्मित होती थी और जहाँ संगीत में मेलोडी की गुंजाईश बहुत होती थी वहां भी एल पी अपना भरपूर जलवा दिखाया. "हीरो", "मेरी ज़ंग", और "खलनायक" में उनका फॉर्म जबरदस्त रहा तो वहीँ "क़र्ज़" में घई को आर डी के फ्लेवर का संगीत चाहिए था और उन्हें शक था कि क्या एल पी एक पॉप सिंगर के जीवन पर आधारित इस विषय में जहाँ संगीत का सबसे अहम् रोल था, न्याय कर पायेंगें या नही. पर एल पी सारे कयासों को एक तरफ़ कर "ओम् शान्ति ओम्", "पैसा ये पैसा", जैसे थिरकते गीत दिए तो रफी साहब के गाये "दर्दे दिल" के साथ पहली बार उन्होंने ग़ज़ल को पाश्चात्य फॉर्म में ढाल कर दुनिया के सामने रखा. "एक हसीना थी..." (ख़ास तौर पर वो गीटार का पीस)को क्या कोई संगीत प्रेमी कभी भूल सकता है. इस मूल गीत को आज भी सुनें तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. (किशोर दा को भी सलाम).

फार्मूला फिल्मों के शिल्पी मनमोहन देसाई की नाटकीय फिल्मों में भी एल पी का संगीत पूरे शबाब पर दिखा. तो मोहन कुमार की फिल्में तो कह सकते हैं कि उनके संगीत के बल पर ही आज तक याद की जाती हैं. इसके अलावा भी एल पी ने महेश भट्ट, रामानंद सागर, यश चोपडा, बी आर चोपडा, फिरोज खान, जे पी दत्ता, जैसे निर्देशकों के साथ भी लाजावाब काम किया. दक्षिण के निर्देशकों की भी वही पहली पसंद रहे हमेशा. एल वी प्रसाद से लेकर टी रामाराओ तक जिस किसी ने भी उनका साथ थामा वो उन्ही के होके रह गए...ऐसा कौन सा जादू था एल पी के संगीत में, ये हम आपको बताएँगे इस शृंखला की अगली कड़ी में. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इन यादगार नग्मों की बाँहों में.





Sunday, December 7, 2008

कलाकार की कोई पार्टी नही होती - दलेर मेहंदी



सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (६)

टेलंट शो कितने कारगर

एक ज़माने में हुए एक बड़ी "प्रतिभा खोज" के फलस्वरूप हमें मिले थे महेंद्र कपूर, सुरेश वाडकर जिनका हमने पिछले दिनों आवाज़ पर जिक्र किया था वो भी इसी रास्ते से फ़िल्म इंडस्ट्री में आए. १९९६ में "मेरी आवाज़ सुनो" की विजेता थी हम सब की प्रिय सुनिधी चौहान. इसी प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर रही वैशाली सावंत मानती है कि टेलंट शो मात्र आपको दुनिया के सामने प्रस्तुत कर देते हैं असली संघर्ष तो उसके बाद ही शुरू होता है. ख़ुद वैशाली को सात साल लगे प्रतियोगिता के बाद "आइका दाजिबा" तक का सफर तय करने में. रॉक ऑन ने गायन की शुरुआत करने वाली गायिका केरालिसा मोंटेरियो भी मानती हैं कि "आज भी बहुत से नए कलाकार पारंपरिक तरीके से शुरुआत करना पसंद करते हैं. अनुभव आपको इसी से मिलता है कि आप संगीतकारों से मिलें, बात करें और गानों के बनने की प्रक्रिया और उसका मर्म समझें. अक्सर इन प्रतियोगिताओं के विजेता ये मान बैठते हैं कि बस अब मंजिल मिल गई. पर ऐसा नही होता. एक बार शो खत्म होने के बाद उन्हें राह दिखाने वाला कोई नही होता." जो भी हो पर इतना तो तय है कि विभिन्न चैनलों पर चलने वाले इन प्रतियोगिताओं ने नई प्रतिभाओं के प्रति लोगों की सोच अवश्य ही बदली है. अब हर कोई सुनिधी या अभिजीत सावंत जैसा भाग्यशाली भी तो नही हो सकता न...


कलाकार की कोई पार्टी नही होती - दलेर मेहंदी

पिछले दिनों मीडिया ने दिखाया कि अपने दलेर मेहंदी साहब कहीं एक जगह किसी एक पार्टी विशेष का प्रचार कर रहे थे तो कुछ दिनों बाद वो दिखे एक विरोधी पार्टी का गुणगान गाते. ऐसा कैसे और क्यों दिलेर साहब.? पूछने पर दिलेर साहब ने संशय का निवारण किया. "रैली में जिन्हें मीडिया ने दलेर कह कर जनता को बरगलाया वो मेरा भाई शमशेर था, जो एक पार्टी विशेष से टिकट लेकर चुनाव लड़ रहे हैं, ये ठीक है कि बिल्कुल मेरे जैसे लगते हैं और मेरे अंदाज़ के कपड़े पहनते हैं पर रैली में कई बार उनके नाम की उद्घोषणा हुई पर मीडिया ने जान कर मुद्दे को तूल दिया और शमशेर का मायावती जी के पैर छूने की क्लिप्पिंग बार बार ये कह कर दिखाते रहे कि ये दलेर है." तो क्या दलेर साहब अब अपने भाई के उस पार्टी विशेष का प्रचार भी करेंगे. जवाब सुनिए ख़ुद उन्हीं की जुबानी - "कलाकार और डॉक्टर की कोई पार्टी या जात नही होती. मेरा सहयोग अच्छे उम्मीदवार के साथ रहेगा उनकी पार्टी से मुझे कुछ लेना देना नही". अच्छे विचार हैं दलेर जी...


वार्षिक गीतमाला आवाज़ पर

साल खत्म होने को है, इस वर्ष बाज़ार में आए तमाम फिल्मी और गैर फिल्मी गीतों की लम्बी फेहरिस्त में से शीर्ष ५० गीतों को क्रमबद्ध रूप से आपके लिए लेकर आयेंगे हम आवाज़ पर, दिसम्बर २७ तारिख से ३१ तक. आप भी अपने पसंदीदा गीतों की सूची podcast.hindyugm@gmail.com पर हमें भेज सकते हैं. कोशिश करें कि चुराए हुए धुनों पर आधारित गानों को पीछे रख अच्छे और ओरिजनल गीतों को हम इस गीतमाला में स्थान दें. इस सम्बन्ध में और अधिक जानकारी हम जल्द ही आपको उपलब्ध करवायेंगे.

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