सुर संगम - 15 - चैत्र मास की चैती
इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं|
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नमस्कार! सुर-संगम के इस साप्ताहिक स्तंभ में मैं, सुमित चक्रवर्ती आपका अभिनंदन करता हूँ और साथ ही आप सब को नवरात्रों की हार्दिक शुभ-कामनाएँ भी देता हूँ। पिछ्ली कड़ी में हमनें पारंपरिक लोक व शास्त्रीय कला 'चैती' के बारे में चर्चा की। 'चैती' चैत्र मास के नवरात्रों के दिनों में प्रस्तुत की जाने वाली लोक एवं शास्त्रीय कला है। आइये इस कला के लोक पक्ष की चर्चा आगे बढ़ाते हुए हम बात करें इसके शास्त्रीय पक्ष के बारे में भी।
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं| प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि का ग्रन्थ- 'नाट्यशास्त्र' पंचम वेद माना जाता है| नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक ५७ में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है | श्लोक का अर्थ है- "इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं|" चैती गीतों के लोक स्वरुप में ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उप-शास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका| लोक परम्परा में चैती १४ मात्राओं के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में ताल कहरवा का प्रयोग होता है| पूरब अंग के बोल बनाव की ठुमरी भी १४ मात्राओं के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है| सम्भवतः चैती के इस गुण ने ही उप-शास्त्रीय गायकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा| आइए चैती के लोक स्वरुप का अनुभव 1908 के एक दुर्लभ रिकार्ड के माध्यम से करते हैं| इस रिकार्ड में अच्छन बाई की आवाज़ है|
अरे फुलेला फुल्वा - अच्छनबाई
लोक कला जब शास्त्रीय स्वरुप ग्रहण करता है तो उसमें गुणात्मक वृद्धि होती है| चैती गीत इसका एक ग्राह्य उदाहरण है| चैती के लोक और उप-शास्त्रीय स्वरुप का समग्र अनुभव करने के लिए आप उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई वादन की यह प्रस्तुति सुनें।
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ - चैती धुन
और अब अन्त में चर्चा- 'फिल्म संगीत में चैती' की| हिन्दी फ़िल्मों की जहाँ बात आती है, इनमें चैती गीतों का बहुत ज़्यादा प्रयोग नहीं हुआ है। केवल कुछ ही फ़िल्में ऐसी हैं जिनमें चैती का उल्लेखनीय प्रयोग किया गया हो।| वर्ष १९६३ में बनी फिल्म 'गोदान' में पंडित रविशंकर के संगीत निर्देशन में मुकेश ने चैती- 'हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा' गाया था| यह लोक शैली में गाया चैती गीत है| ठुमरी अंग में आशा भोसले ने फिल्म 'नमकीन' में चैती गाया है जिसके बोल हैं- 'बड़ी देर से मेघा बरसा हो रामा, जली कितनी रतियाँ' | जैसा कि हमने पिछ्ली कड़ी में आपको बताया था कि चैती गीत मुख्यतः राग बिलावल अथवा राग यमनी बिलावल पर आधारित होते हैं परन्तु इस गीत में आपको राग तिलक कामोद का आनंद भी मिलेगा| लीजिए प्रस्तुत हैं ये दोनों फ़िल्मी चैती गीत।
हिया जरत रहत दिन रैन, हो रामा - मुकेश(फ़िल्म - गोदान)
बड़ी देर से मेघा बरसा, हो रामा - आशा भोसले(फ़िल्म - नमकीन)
और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।
सुनिए और पहचानिए कि यह किस सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक की आवाज़ है?
पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी ने पुन: सही उत्तर देकर ५ अंक प्राप्त कर लिये हैं, बधाई! क्या कोई और इन्हें चुनौति देना चाहेगा?
तो यह थी प्रसिद्ध लोक व शास्त्रीय शैली - चैती पर आधारित हमारी अंतिम कड़ी। आशा है आपको पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। हम एक बार पुनः आभार व्यक्त करेंगे लखनऊ के श्री कृष्णमोहन मिश्र का जिन्होंने इस कला के बारे में अपने असीम ज्ञान को हमसे बाँटा तथा इस प्रस्तुति में हमारा सहयोग दिया। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| शाम ६:३० बजे अपने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!
खोज व आलेख - कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती
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3 श्रोताओं का कहना है :
जिया जरत सुन कर तो मज़ा आ गया....शुक्रिया सुमित और कृष्णमोहन जी, बहुत ही अनमोल जानकारियां है ये
Pandit Jasraj
Mrs. Kshiti Tiwari
Indore
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