Sunday, August 7, 2011

सुर संगम में आज - जारी है लोक संगीत शैली कजरी पे चर्चा



सुर संगम - 32 -लोक संगीत शैली "कजरी" (अंतिम भाग)

कजरी गीतों में प्रकृति का चित्रण, लौकिक सम्बन्ध, श्रृंगार और विरह भाव का वर्णन ही नहीं होता; बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं का चित्रण भी प्रायः मिलता है|
"केतने पीसत होइहें जेहल में चकरिया..." - कजरी गीतों के जरिए स्वतंत्रता का संघर्ष

शास्त्रीय और लोक संगीत के इस साप्ताहिक स्तम्भ "सुर संगम" के आज के अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत प्रेमियों का स्वागत करता हूँ| पिछले अंक में हमने आपसे देश के पूर्वांचल की अत्यन्त लोकप्रिय लोक-संगीत-शैली "कजरी" के बारे में कुछ जानकारी बाँटी थी| आज दूसरे भाग में हम उस चर्चा को आगे बढ़ाते हैं| पिछले अंक में हमने "कजरी" के वर्ण्य विषय और महिलाओं द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली कजरियों के विभिन्न प्रकार की जानकारी आपसे बाँटी थी| मूलतः "कजरी" महिला प्रधान गायकी ही है| "कजरी" गीतों में कोमल भावों और लोक-जीवन की जैसी अभिव्यक्ति होती है उससे यह महिला प्रधान गायन शैली के रूप में ही स्थापित है| परन्तु ब्रज के सखि सम्प्रदाय के प्रभाव और उन्नीसवीं शताब्दी में उपशास्त्रीय संगीत का हिस्सा बन जाने के कारण पुरुष वर्ग द्वारा भी अपना लिया गया| बनारस (अब वाराणसी) के जिन संगीतज्ञों का ठुमरी के विकास में योगदान रहा है, उन्होंने "कजरी" को भी उप्शास्त्रीयता का रंग दिया| "कजरी" को प्रतिष्ठित करने में बनारस के उच्चकोटि के संगीतज्ञ बड़े रामदास जी का योगदान अविस्मरणीय है| इन्ही बड़े रामदास जी के प्रपौत्र पण्डित विद्याधर मिश्र ने उपशास्त्रीय अंग में कजरी गायन की परम्परा को जारी रखा है| (बड़े रामदास जी के पौत्र और विद्याधर मिश्र के पिता पं. गणेशप्रसाद मिश्र के स्वरों में आप "सुर संगम" के 28 वें अंक में टप्पा गायन सुन चुके हैं) आइए; यहाँ थोड़ा रुक कर, बड़े रामदास जी की कजरी रचना -"बरसन लागी बदरिया रूमझूम के..." उपशास्त्रीय अन्दाज़ में सुनते हैं; स्वर पण्डित विद्याधर मिश्र का है-

कजरी - "बरसन लागी बदरिया रूमझूम के..." गायक - विद्याधर मिश्र

सुनिए यहाँ

कजरी गीतों में प्रकृति का चित्रण, लौकिक सम्बन्ध, श्रृंगार और विरह भाव का वर्णन ही नहीं होता; बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं का चित्रण भी प्रायः मिलता है| ब्रिटिश शासनकाल में राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत अनेक कजरी गीतों की रचना की गई| बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में पूरे देश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-चेतना का जो विस्तार हुआ उससे "कजरी" शैली भी अछूती नहीं रही| अनेक लोकगीतकारों ने ऐसी अनेक राष्ट्रवादी कजरियों की रचना की जिनसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार भयभीत हुई और ऐसे अनेक लोक गीतों को प्रतिबन्धित कर दिया| इन लोकगीतों के रचनाकारों और गायकों को ब्रिटिश सरकार ने कठोर यातनाएँ भी दीं| परन्तु प्रतिबन्ध के बावजूद लोक परम्पराएँ जन-जन तक पहुँचती रहीं| इन विषयों पर रची गईं अनेक कजरियों में महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया| ऐसी ही एक कजरी की पंक्तियाँ देखें -"चरखा कातो, मानो गाँधी जी की बतियाँ, विपतिया कटि जइहें ननदी..."| कुछ कजरियों में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर प्रहार किया गया| ऐसी ही एक कजरी आज हम आपको सुनवाते हैं| इस कजरी की स्थायी की पंक्तियाँ बिल्कुल सामान्य कजरी की भाँति है, किन्तु एक अन्तरे में लोकगीतकार ने अंगेजों की दमनात्मक नीतियों को रेखांकित किया है| मूल गीत की पंक्तियाँ हैं -"कैसे खेले जईबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी..."| इन पंक्तियों में काले बादलों का घिरना, गुलामी के प्रतीक रूप में चित्रित हुआ है| अन्तरे की पंक्तियाँ हैं -

"केतनो लाठी गोली खईलें, केतनो डामन फाँसी चढ़ीलें,
केतनों पीसत होइहें जेहल में चकरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी..."|

कजरी का यह अन्तरा गाते समय बड़ी चतुराई से अन्य सामान्य भाव वाले अन्तरों के बीच जोड़ दिया जाता था| ऐसा माना जाता है कि मूल कजरी की रचना जहाँगीर नामक लोकगीतकार ने की थी; किन्तु इसके प्रतिबन्धित अन्तरे के रचनाकार का नाम अज्ञात ही है| यह कजरी स्वतंत्रता से पूर्व विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग क्षेरीय बोलियों में प्रचलित थी| हम आपको इस कजरी के दो संस्करण सुनवाते है| पहला संस्करण लोकगायक मोहम्मद कलीम के स्वरों में है| इसे कजरी का पछाहीं संस्करण कहा जाता है| दूसरा संस्करण मीरजापुरी कजरी के रूप में है|

कजरी : "कैसे खेलन जइयो सावन मा कजरिया, बदरिया घिरी आई गोरिया..." : स्वर - मोहम्मद कलीम

कजरी : "कैसे खेलै जाबे सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी..." : समूह स्वर

वर्तमान समय में लोकगीतों का प्रचलन धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है| ऐसे में पूर्वांचल की अन्य लोक शैलियों की तुलना में "कजरी" की स्थिति कुछ बेहतर है| नई पीढी को इस सशक्त लोक गायन शैली से परिचित कराने में कुछेक संस्थाएँ और कुछ कलाकार आज भी सलग्न हैं| राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय सांस्कृतिक संगठन संस्कार भारती ने कुछ वर्ष पूर्व मीरजापुर में "कजरी महोत्सव" का आयोजन किया था| यह संगठन समय-समय पर नई पीढी के लिए कजरी प्रशिक्षण की कार्यशालाएँ भी आयोजित करता है| उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ओर से भी विदुषी कमला श्रीवास्तव के निर्देशन में कार्यशालाएँ आयोजित होती रहती है| मीरजापुर की सुप्रसिद्ध कजरी गायिका उर्मिला श्रीवास्तव ने गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत नई पीढी के कई गायक-गायिकाओं को तैयार किया है और आज भी इस कार्य में संलग्न हैं| आइए अब हम उर्मिला श्रीवास्तव के स्वरों में सुनते हैं एक परम्परागत कजरी -

कजरी : "हमके सावन में झुलनी गढ़ाई दे पिया..." : स्वर - उर्मिला श्रीवास्तव

पारम्परिक कजरियों की धुनें और उनके टेक निर्धारित होते हैं| आमतौर पर कजरियाँ जैतसार, ढुनमुनियाँ, खेमटा, बनारसी और मीरजापुरी धुनों के नाम से पहचानी जाती हैं| कजरियों की पहचान उनके टेक के शब्दों से भी होती है| कजरी के टेक होते हैं- 'रामा', 'रे हरि', 'बलमू', 'साँवर गोरिया', 'ललना', 'ननदी' आदि| आइए हम एक बार फिर फिल्म संगीत में "कजरी" के प्रयोग पर चर्चा करते हैं| पिछले भाग में हमने आपको भोजपुरी फिल्म "विदेसिया" से महिलाओं द्वारा समूह में गायी जाने वाली मीरजापुरी कजरी का रसास्वादन कराया था| आज की फ़िल्मी कजरी भी भोजपुरी फिल्म से ही है| 1964 में प्रदर्शित फिल्म "नैहर छुटल जाय" में गायक मन्ना डे ने एक परम्परागत बनारसी कजरी का गायन किया था| इसके संगीतकार जयदेव ने कजरी की परम्परागत धुन में बिना कोई काट-छाँट किये प्रस्तुत किया था| आप सुनिए श्रृंगार रस से अभिसिंचित यह फ़िल्मी कजरी और मैं कृष्णमोहन मिश्र आपसे यहीं विराम लेने की अनुमति चाहता हूँ| आपके सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी|

कजरी : "अरे रामा रिमझिम बरसेला पनियाँ..." : फिल्म - नैहर छुटल जाए : स्वर : मन्ना डे

सुर-संगम का आगामी अंक होगा ख़ास, इसलिए हमने सोचा है की उस अंक के बारे में कोई पहेली नहीं पूछी जाएगी| आगामी अंक में हम श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे महान कविगुरू श्री रबींद्रनाथ ठाकुर को जिनकी श्रावण माह की २२वीं तिथि यानी कल ८ अगस्त को पुण्यतिथि है|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी को एक बार फिर से बधाई!!!
अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!


प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

फेसबुक-श्रोता यहाँ टिप्पणी करें
अन्य पाठक नीचे के लिंक से टिप्पणी करें-

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

2 श्रोताओं का कहना है :

अमित तिवारी का कहना है कि -

मोहम्मद कलीम जी का गाया हुआ 'कैसे खेलन जइयो सावन मा कजरिया', फिल्म 'मदर इंडिया' के 'होरी आयी रे कन्हाई रंग बरसे' गाने की याद दिलाता है.
यह है तो 'होरी' पर इसकी धुन 'कजरी' की है.

बहुत बढ़िया लेख है. कृष्णमोहन मिश्र जी साधुवाद !!!

Guru का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर प्रयास .....जीतनी भी प्रशंशा की जाय कम है ....मैंने तो खूब कजली सुनी ...सुन्दर ...अतिसुन्दर

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

संग्रहालय

25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

भेंट-मुलाक़ात-Interviews

संडे स्पेशल

ताजा कहानी-पॉडकास्ट

ताज़ा पॉडकास्ट कवि सम्मेलन