Sunday, November 6, 2011

धीरे से आजा री अँखियन में...सी रामचंद्र रचित एक कालजयी लोरी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 781/2011/221

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी रसिक श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, ज़िन्दगी की शायद सबसे आनन्ददायक अनुभूति होती है माँ-बाप बनना। यह एक ऐसी ख़ुशी है जिसका शब्दों में बयान नहीं हो सकती। ईश्वर की परम कृपा से मुझे भी पिछले दिनों पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस नन्हे के आने से जैसे ज़िन्दगी की धारा ही बदल गई। रात-रात जाग कर बच्चे को सुलाना कुछ और ही आनन्द प्रदान करती है। पुराने ज़माने में मायें लोरियाँ गा कर अपने बच्चों को सुलाती थीं, पर अब यह प्रथा केवल माओं तक सीमित नहीं रही। पिता भी समान रूप से घर के काम-काज में योगदान देते हुए बच्चों को सुलाने तक में अपना योगदान देते हैं। दोस्तों, अब तक लोरियों की तरफ़ मेरा ज़्यादा ध्यान नहीं जाता था, पर अब तो जैसे रातों को लोरियाँ याद कर कर गाने को जी चाहता है। इसी से मुझे ख़याल आया कि क्यों न 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक ऐसी शृंखला चलाई जाए जिसमें पुरुष गायकों द्वारा गाई हुई लोरियों को शामिल किए जाएँ। गायिकाओं द्वारा गाई लोरियों की तो फ़िल्मों में कोई कमी नहीं है, पर गायकों की लोरियाँ फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा सुनने को नहीं मिला। तो आइए आज से प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी'। इस शृंखला में दस अलग अलग गायकों की आवाज़ों में आप सुनेंगे दस बेहतरीन फ़िल्मी लोरियाँ, जिन्हें सुनते हुए आप के अन्दर भी वात्सल्य रस का संचार होने लगेगा।

फ़िल्मों में पुरुष लोरियों की बात करें तो सबसे पुरानी और सुपरहिट लोरी जो याद आ रही है, वह है कुंदनलाल सहगल की गाई १९४० की फ़िल्म 'ज़िन्दगी' की लोरी "सो जा राजकुमारी सो जा, सो जा मैं बलिहारी सो जा"। सहगल साहब की मख़मली आवाज़ में इस लोरी की कुछ और ही अलग जगह है। इसके बाद १९४३ में अनिल बिस्वास के संगीत में अशोक कुमार नें फ़िल्म 'किस्मत' में गाई थी एक और कामयाब लोरी "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा"। ये दोनों ही लोरियाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम बजा चुके हैं। इसलिए हम सीधे आ जाते हैं ५० के दशक में। 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' की पहली कड़ी में प्रस्तुत है चितलकर की आवाज़ में १९५१ की फ़िल्म 'अलबेला' की लोरी "धीरे से आजा री अँखियन में निन्दिया आजा री आजा, धीरे से आजा"। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा गीत है और सी. रामचन्द्र का संगीत। इस लोरी के फ़िल्म में दो संस्करण हैं, एक लता जी की एकल आवाज़ में, और दूसरा एक डुएट था चितलकर और लता के युगल स्वरों में। रहमान और गीता बाली पर फ़िल्माई इस युगल लोरी का फ़िल्मांकन अलग हट के है। एक तरफ़ रहमान और गीता बाली कार में जाते हुए रहमान यह लोरी गाते हैं ख़ुश-मिज़ाज में और गीता बाली सुनते हुए सो जाती हैं। गीत के मध्य भाग में दूसरी तरफ़ बिमला कुमारी अपने पिता के साथ दिखती हैं दर्द भरे अंदाज़ में इस लोरी को गाती हुईं। इस तरह से एक ही लोरी में चितलकर ख़ुशी-ख़ुशी इसे गाते हैं जबकि लता जी वाला हिस्सा दर्दीला है। बहुत ही मशहूर लोरी है और सी. रामचन्द्र नें राग पीलू और दादरा ताल में कितना मीठा इसे कम्पोज़ किया है, आइए सुनते हैं इस कालजयी लोरी को।



अगला गीत पहचानें, हिंट ये है
तलत महमूद की मखमली आवाज़ में यह लोरी सज रही है उस अभिनेता पर जिन पर मन्ना डे की गाई हुई एक अन्य लोरी भी फ़िल्माई गई है। बताइए तलत महमूद की गाई यह कौन सी लोरी है?

पिछले अंक में

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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2 श्रोताओं का कहना है :

कृष्णमोहन का कहना है कि -

फिल्म ‘अलबेला’ के इस गीत में राग ‘पीलू’ के स्वरों का प्रयोग शुद्धता से हुआ है। एक विस्मृत गीत सुनवाने के लिए सुजॉय जी का आभार।

Amit का कहना है कि -

सो जा तू मेरे राजदुलारे.......
फिल्म: जवाब
अभिनेता: बलराज साहनी

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