Saturday, August 29, 2009

दोस्त दोस्त न रहा प्यार प्यार न रहा...पर मुकेश का आवाज़ न बदली न बदले उनके चाहने वाले



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 186

मुकेश के पसंदीदा गीतों में घूम फिर कर राज कपूर की फ़िल्मों के गानें शामिल होना कोई अचरज की बात नहीं है। राज साहब ने दिए भी तो हैं एक से एक बेहतर गीत मुकेश को गाने के लिए। शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन ने ये तमाम कालजयी गीतों की रचना की है। कल आप ने सुने थे राम गांगुली की बनाई धुन पर राज कपूर की पहली निर्मित व निर्देशित फ़िल्म 'आग' का गीत। इस फ़िल्म के बाद राज कपूर ने अपनी नई टीम बनायी थी और उपर्युक्त नाम उस टीम में शामिल हुए थे। इस टीम के नाम आज जो गीत हम कर रहे हैं वह है सन् १९६४ की फ़िल्म 'संगम' का। 'संगम' राज कपूर की फ़िल्मोग्राफ़ी का एक ज़रूरी नाम है, जिसने सफलता के कई झंडे गाढ़े। जहाँ तक फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार की बात है, इस फ़िल्म की नायिका वैजयंतीमाला को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला और राजेन्द्र कुमार को सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार। राज कपूर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वह पुरस्कार उस साल दिया गया था दिलीप कुमार को फ़िल्म 'लीडर' के लिए। दोस्तों, फ़िल्म 'संगम' का एक गीत जो राजेन्द्र कुमार पर फ़िल्माया गया था, हम ने आप को रफ़ी साहब पर केन्द्रित लघु शृंखला 'दस चेहरे और एक आवाज़' के तहत सुनवाया था। आज सुनिए राज कपूर पर फ़िल्माया और मुकेश जी की आवाज़ में "दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा, ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा"।

मुकेश का गाया और शैलेन्द्र का लिखा यह गीत एक कल्ट सोंग है जिसे प्यार में धोखा खानेवाले हर आशिक़ ने अपने दिल में गुनगुनाया होगा। आज भी कभी कभी मज़ाक में दोस्तों की टोली अपने किसी साथी के अपने महबूबा से ब्रेक-अप हो जाने पर उसे छेड़ते हुए यह गीत गा उठते हैं। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है इस गीत के असर का, इस गीत की लोकप्रियता का। गीत फ़िल्म में जिस सिचुयशन पर लिखा गया है, वह हमारी फ़िल्मों में बिल्कुल आम बात रही है। लेकिन महान गीतकार, संगीतकार और गायक वो हैं जो इस आम सिचुयशन को किसी असरदार गीत से बेहद ख़ास बना देते हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि ऐसे सिचुयशन पर अगर पुरअसर गीत न लिखे जायें, तो उसका परिणाम फ़िल्म के निर्माता के लिए बहुत अच्छा नहीं भी हो सकता है। गीतों में वह ताक़त होती है जो कहानी को और भी ज़्यादा सशक्त कर दे, लोगों को नायक या नायिका के चरित्र में, उनके मनोभाव और जज़्बातों में और गहराई से डूब जाने को मजबूर कर दे। शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन और मुकेश ने यही काम कर दिखाया था इस गीत में। प्यार में चोट खाए हुए नायक का पार्टी में पियानो पर बैठकर नायिका पर इल्ज़ाम पे इल्ज़ाम लगाए जाना और वो भी ऐसे कि सिर्फ़ नायिका को ही समझ में आए, यह हम ने दशकों से बहुत सारे फ़िल्मों में देखा है। यहाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर ही हम ने कम से कम इस तरह का एक गीत सुनवाया है फ़िल्म 'गैम्बलर' का "दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है"। इस तरह के गीतों की फ़ेहरिस्त लिखने बैठूँ तो बात बड़ी लम्बी हो जाएगी, इसलिए और ज़्यादा कुछ न कहते हुए सुनिए बेवफ़ाई का वह फ़ल्सफ़ा, जो मुकेश को था बेहद प्रिय। और आप से यह गुज़ारिश है कि नीचे टिप्पणी में ऐसे कुछ गीतों को लिस्ट डाउन करें जिनमें है पियानो, पार्टी, और प्यार में ठोकर खाया हुआ नायक जो अपने गीत के ज़रिए नायिका पर शब्दों से वार पे वार किए जा रहा हो। देखते हैं आप कितने ऐसे गीत ढ़ूंढ पाते हैं। तो सुनिए यह गीत और मुझे आज के लिए दीजिए इजाज़त, फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया तो!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस सुपरहिट में मुकेश का ये गीत अपने आप में एक मिसाल है.
२. ऋत्विक घटक ने इस फिल्म की रोचक कहानी लिखी थी और संवाद थे राजेंद्र सिंह बेदी के.
३. दूसरे अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"गोरी".

पिछली पहेली का परिणाम -
गलतियाँ इंसान से ही होती है, और एक गलती हमसे भी हुई, पाबला जी सही थे और पूर्वी जी आप भी. त्रुटी सुधार के लिए धन्येवाद...पाबला जी आप कुट्टी मत होईये :). रोहित जी ने गीत सही पहचान लिए थे और अंक भी उन्हें दिए जा चुके है, अब दी हुई चीज़ वापस लेना ठीक नहीं हा हा हा...अब कल की पहेली की बात, दरअसल ये गीत इतने मशहूर हैं कि ज़रा सा सीधा हिंट मिलते ही आप सब धुरंधर पहचान लेंगे, और हमें मज़ा तब आता है जब आपके दिमाग तो थोडी कसरत करनी पड़े, इसलिए ज़रा घुमा फिरा कर सूत्र देते हैं. अब दिशा जी ने आखिरकार गीत पहचान ही लिया है. दिलीप जी आपकी मेहनत व्यर्थ नहीं जायेगी :). चलिए अब चलते चलते दिशा जी को बधाई, अब स्कोर ये है कि दिशा जी, पूर्वी जी, रोहित जी और पराग जी सब से सब १७ अंकों पर हैं. वाह क्या मुकाबला है...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

नसीहतों का दफ्तर - मुंशी प्रेमचंद



सुनो कहानी: मुंशी प्रेमचंद की "नसीहतों का दफ्तर"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने नीलम मिश्रा की आवाज़ में प्रेमचंद की कहानी "बूढी काकी" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की कथा "नसीहतों का दफ्तर", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।
कहानी का कुल प्रसारण समय 22 मिनट है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।






मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी


एक रोज जब अक्षयकुमार कचहरी से आये तो सुन्दर और हँसमुख हेमवती ने एक रंगीन लिफाफा उनके हाथ में रख दिया। उन्होंने देखा तो अन्दर एक बहुत नफीस गुलाबी रंग का निमंत्रण था।
(प्रेमचंद की "नसीहतों का दफ्तर" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)







यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
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#Thirty fifth Story, Nasihaton ka daftar: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2009/29. Voice: Anurag Sharma

Friday, August 28, 2009

जिन्दा हूँ इस तरह कि गम-ए-जिंदगी नहीं....उफ़ कैसा दर्द है मुकेश के इन स्वरों में...



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 185

मुकेश का फ़िल्म जगत में दाख़िला तो सन् १९४१ में ही हो गया था, लेकिन सही मायने में उनके गानें मशहूर हुए थे सन् १९४८ में जब उन्होने फ़िल्म 'मेला', 'अनोखी अदा'और 'आग' में गानें गाये। जी हाँ, यह वही 'आग' है जिससे शुरुआत हुई थी राज कपूर और मुकेश के जोड़ी की। मुकेश ने राज साहब और उनके इस पहली पहली फ़िल्म के बारे में विस्तार से अमीन सायानी के एक इंटरव्यू में बताया था जिसे हमने आप तक पहुँचाया था 'राज कपूर विशेष' के अंतर्गत, लेकिन उस समय हमने आप को फ़िल्म 'आग' का कोई गीत नहीं सुनवाया था। तो आज वह दिन आ गया है कि हम आप तक पहुँचायें राज कपूर की पहली निर्मित व निर्देशित फ़िल्म 'आग' से मुकेश का गाया वह गीत जो मुकेश और राज कपूर की जोड़ी का पहला पहला गीत था। और पहले गीत में ही अपार कामयाबी हासिल हुई थी। "ज़िंदा हूँ इस तरह के ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं, जलता हुआ दीया हूँ मगर रोशनी नहीं"। शुरु शुरु में मुकेश सहगल साहब के अंदाज़ में गाया करते थे। यहाँ तक कि १९४५ की फ़िल्म 'पहली नज़र' में अनिल बिस्वास के संगीत निर्देशन में भी उनका गाया "दिल जलता है तो जलने दे" भी बिल्कुल सहगल साहब की स्टाइल में गाया गया था। फिर उसके बाद नौशाद साहब ने जब उन्हे 'मेला' और 'अनोखी अदा' में गवाया तो उनकी अपनी मौलिक अंदाज़ बाहर आया जिसे लोगों ने खुले दिल से स्वीकारा। फ़िल्म 'आग' के संगीतकार थे राम गांगुली, और उन्होने भी सहगल साहब के अंदाज़ को एक तरफ़ रखते हुए मुकेश को मुकेश के अंदाज़ में ही गवाया।

दोस्तों, संगीतकार राम गांगुली के बारे में आज थोड़ी सी चर्चा करते हैं। वो फ़िल्म संगीतकार बनने से पहले पृथ्वीराज कपूर के नाटकों के लिए संगीत रचना करते थे। आगे चलकर जब पृथ्वीराज कपूर के बेटे राज कपूर ने फ़िल्म निर्माण का संकल्प किया तो उन्हे ही संगीतकार के रूप में चुना। यह फ़िल्म थी 'आग' और इस फ़िल्म में राम गांगुली के सहायक थे शंकरसिंह रघुवंशी और जयकिशन पांचाल। वैसे तो बतौर फ़िल्म संगीतकार राम गांगुली को सही अर्थ में बड़ा ब्रेक दिया 'आग' ने, लेकिन इस फ़िल्म से पहले भी उन्होने दो फ़िल्मों में संगीत दिया था। पहली फ़िल्म थी सन् १९४६ में बनी जयंत देसाई की फ़िल्म 'महाराणा प्रताप', जिसके गानें ख़ुरशीद की आवाज़ में काफ़ी लोकप्रिय हुए थे। सन् १९४७ में राम गांगुली के संगीत से सँवरकर दूसरी फ़िल्म आयी 'महासती तुलसी वृंदा'। लेकिन इस फ़िल्म ने कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ी और न ही गांगुली के संगीत ने। लेकिन अगले ही साल 'आग' का संगीत चल पड़ा, जिसके बाद फ़िल्म उद्योग ने जैसे अपना द्वार खोल दिए राम गांगुली के लिए। एक के बाद एक कई फ़िल्मों में उन्होने फिर संगीत दिया। यह अलग बात है कि फ़िल्मो के ना चलने से उनका संगीत भी क्रमश: ढलान पर उतरता चला गया। आज अगर राम गांगुली को याद किया जाता है तो मुख्य रूप से फ़िल्म 'आग' के गीतों की वजह से ही। तो चलिए, सुनते हैं मुकेश की आवाज़ में राम गांगुली का संगीत, गीत लिखा है सरस्वती कुमार दीपक ने। दीपक जी के बारे में हम फिर कभी ज़रूर चर्चा करेंगे।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. राज कपूर के लिए ही गाया मुकेश का एक और गीत.
२. शंकर जयकिशन हैं संगीतकार.
३. अक्सर इस गीत की पहली पंक्ति का इस्तेमाल हम दोस्तों को चिढाने के लिए करते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
कल के सही जवाब के लिए रोहित जी और उससे पहले वाली पहेली के सही जवाब के लिए पूर्वी जी आप दोनों को बधाई, आप दोनों के अंक बढ़कर हो गए हैं १६. अब आप दोनों भी पराग जी के समतुल्य आ गए हैं. दिशा जी आप पिछड़ रही है. ज़रा दम ख़म दिखाईये...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

शीशा-ए-मय में ढले सुबह के आग़ाज़ का रंग ....... फ़ैज़ के हर्फ़ों को आवाज़ के शीशे में उतारा आशा ताई ने



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४०

हफ़िल-ए-गज़ल की ३८वीं कड़ी में हुई अपनी गलती को सुधारने के लिए लीजिए हम हाज़िर हैं शरद जी की पसंद की आखिरी गज़ल लेकर। इस गज़ल के बारे में क्या कहें....सुनते हीं दिल में आशा ताई की मीठी आवाज़ उतर जाती है। आशा ताई हमारी महफ़िल में एक बार पहले भी आ चुकी हैं। उस समय आशा ताई के साथ थे सुर सम्राट ख़य्याम और गज़ल थी "चाहा था एक शख्स को जाने किधर चला गया।" उस वक्त हमें उस गज़ल के गज़लगो का नाम मालूम न था, लेकिन इस बार ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। आज की गज़ल के गज़लगो का ज़िक्र करना खुद में एक गर्व की बात है और हमारी यह खुशकिस्मती है कि आशा ताई की तरह हीं ये साहब भी हमारी महफ़िल में दूसरी बार तशरीफ़ ला रहे हैं। इससे पहले हमने इनकी लिखी एक नज़्म "गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम" सुनी थी, जिसे अपनी आवाज़ से सजाया था बेग़म आबिदा परवीन ने। उस कड़ी को हमने पूरी तरह से इन्हीं मोहतरम के हवाले कर दिया था और इनके बारे में ढेर सारी बातें की थीं। उसी अंदाज़ और उसी जोश-औ-जुनूं के साथ हम आज की कड़ी को भी इन्हीं के हवाले करते हैं। तो चलिए हम शुरू करते हैं चर्चाओं का सिलसिला बीसवीं सदी के "ग़ालिब" जनाब फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़" के साथ। फ़ैज़ को याद करते हुए मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली कहते हैं: फ़ैज़ को वर्तमान से अतीत बने वक़्त का एक बड़ा हिस्सा गुज़र चुका है. इस दौरान केवल आलमी रियासत ही तब्दील नहीं हुई है बल्कि इंसान की सोच भी काफ़ी तब्दील हो चुकी है. कोई 2600 बरस पहले महात्मा बुद्ध ने कहा था कि तब्दीली एक बड़ी हक़ीक़त है लेकिन इससे बड़ी एक हक़ीकत है और वह यह है कि तब्दीली भी तब्दील होती है. वक़्त के साथ बुलबुले भी बदलती हैं और उनके तराने भी. लेकिन इस बनने-बिगड़ने के बावजूद फ़ैज़ के कलाम और उसके एहतिराम में कोई कमी नहीं आई. अपनी ज़िंदगी में जैसे वह पढ़े और सुने जाते थे आज भी उसी तरह दोहराए जाते है, सुनाए जाते हैं और गाए जाते हैं. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने वही लिखा जो उनका अनुभव था. इस अनुभव की रौशनी ने न उनकी आवाज़ को नारा बनाया और न ही उन्होंने अपने दृष्टिकोण का शोर मचाया था. उन्होंने समाज के ग़मो-खुशी को पहले अपना बनाया और फिर उन्हें दूसरों को सुनाया.

मुंबई की एक महफ़िल में फ़ैज़ शरीक थे. फ़ैज़ के लिए सजाई गई उस महफ़िल में अमिताभ बच्चन, रामानंद सागर और दूसरी फ़िल्मी हस्तियों के साथ, सरदार जाफ़री, जज़्बी, जांनिसार अख़्तर, मजरूह सुल्तानपुरी वगैरह शरीक थे. ये सब फ़ैज़ की शोहरत, अजमत और शेरी-ज़हानत (काव्यदृष्टि) के कॉम्पलेक्स से पीड़ित थे. सब अलग-अलग टुकड़ियों में बँटे फ़ैज़ को चर्चा का विषय बनाए हुए थे. कोई कह रहा था कि फ़ैज़ ग़लत ज़ुबान लिखते हैं तो कोई बोल रहा था कि उन्हें यासर अराफ़ात की पत्रिका 'लोटस' ने शोहरत दी है. फ़ैज़ इन सब बातों को दूर-दूर से सुन रहे थे और जाम पर जाम चढ़ा रहे थे और सिगरेट पर सिगरेट सुलगा रहे थे. जब पढ़ने के लिए बुलाया गया तो उन्होंने फ़रमाया कि भाई दुकानें तो सबने एक साथ लगाई थीं. अब इसको क्या कहा जाए. कोई चल गई तो यह उसकी देन है जिसे परवरदिगार दे.


साहित्य-कुंज पर शीशों का मसीहा फ़ैज़ शीर्षक से लिखे अपने आलेख में चंद्र मौलेश्वर प्रसाद "फ़ैज़" का जीवन-वृतांत कुछ यूँ पेश करते हैं: अपने साम्यवादी विचारों के कारण ‘फ़ैज़’ को जेल की हवा भी खानी पडी़ थी। हुआ य़ूं कि १९५१ में, जब चौधरी लियाकत अली खां पाकिस्तान के प्रधान मंत्री थे, तब कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता और साहित्यकार सैय्यद सज्जाद ज़हीर को ‘फ़ैज़’ के साथ उस समय पाया गया जब ये दोनों अपने दो फ़ौजी मित्रों के साथ देखे गये। उन पर मुकदमा चलाया गया जो अब ‘रावलपिंडी कांस्पिरेसी केस’ के नाम से प्रसिद्ध है।‘फ़ैज़’ को चार वर्ष तक कैद में रखा गया था जिसमें तीन माह की कैदे-तन्हाई भी शामिल है। तब उन्होंने कहा था-

मता-ए-लौहो-कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खूने-दिल में डुबो ली है उंगलियां मैंने
जबां पे मुहर लगी है तो क्या रख दी है
हर एक हल्का-ए-ज़ंजीर में ज़ुबां मैंने॥..
कोई पुकारो कि उम्र होने आई है
फ़लक को का़फ़िला-ए-रोज़ो शाम ठहराए
सबा ने फिर दरे-ज़िंदां पे आके दी दस्तक
सहर करीब है दिल से कहो न घबराए॥

इसी कैद के दौरान ‘फ़ैज़’ ने कई रचनाएं लिखी जिन्हें ‘दस्ते-सबा’ के नाम से प्रकाशित किया गया है। इस दौरान इतनी राजनैतिक उथल-पुथल होती रही कि सरकारें तेज़ी से बदलीं। नतीजा यह हुआ कि मुकदमा पूरा हुए बगैर ही २० अप्रेल १९५५ के दिन ‘फ़ैज़’ को रिहाई दे दी गई। अपने साम्यवादी विचारों के कारण ‘फ़ैज़’ को १९५८ में फिर एक बार ‘सुरक्षा एक्ट’ के तहत गिरफ़्तार किया गया परंतु अप्रैल १९५९ में रिहा कर दिया गया। इस राजनैतिक उहापोह से तंग आकर ‘फ़ैज़’ लंदन चले गए। जब ग़म की शाम गुज़र गई और उम्मीद की सुबह नज़र आई तो ‘फ़ैज़’ फिर अपनी मातृभूमि को लौट आए। अपने बुढा़पे के दिनों में ‘फ़ैज़’ को दमे का रोग इस कदर सताने लगा कि वे वापिस लाहौर लौट आए। रोग हद से ज़्यादा बढ़ गया और सांस लेने में दिक्कत होने लगी। ‘फ़ैज़’ को लाहौर के मेयो अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने २० नवम्बर १९८५ के दिन इस संसार को अलविदा कहा।
फ़ैज़ हमेशा से हीं एक संवेदनशील कवि रहे हैं। तभी तो जब उनके मित्र हैदराबाद के सुप्रसिद्ध जनकवि मख़दूम मुहीउद्दीन, जिन्होंने तेलंगाना आंदोलन मे भाग लिया था, की मौत हो गई तो फ़ैज़ ने उनको समर्पित करते हुए यह कहा था:

आप की याद आती रही रात भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर


शायद आपको याद होगा कि महफ़िल-ए-गज़ल के एक अंक में हमने छाया गांगुली की गाई हुई एक गज़ल का जिक्र किया था, जिसे फिल्म "गमन" से लिया गया था। उस गज़ल के शुरूआती बोल थे:

आप की याद आती रही रात भर
चांदनी जगमगाती रही रात भर


तो इन दो शेरों में साम्य इसलिए दिख रहा है, क्योंकि उपरोक्त शेर जनाब मख़दूम मुहीउद्दीन द्वारा रचित है। जहाँ मखदूम साहब ने चाँदनी को रात भर जगमगाता पाया है, वहीं उनकी मौत के बाद "फ़ैज़" ने उसी चाँदनी को शरारों-सा जलता हुआ महसूस किया है। दर्द की पराकाष्ठा है ये। यह तो हुई दर्द की बात...अब बारी है खुशियों की। तो पेश है मदहोशी से भरी आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज का रंग,
यूँ फ़ज़ा महकी कि बदला मेरे हमराज़ का रंग

साया-ए-चश्म में हैराँ रुख़-ए-रौशन का जमाल
सुर्ख़ी-ए-लब पे परेशाँ तेरी आवाज़ का रंग

बेपिये हों कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब
शीशा-ए-मय में ढले सुबह के आग़ाज़ का रंग

चंगो-नय रंग पे थे अपने लहू के दम से
दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज़ का रंग

इक सुख़न और कि फिर रंग-ए-तकल्लुम तेरा
हर्फ़-ए-सादा को इनायत करे एजाज़ का रंग




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

___ ऐसे भी होंगें ये कभी सोचा न था,
सामने भी था मेरे और वो मेरा न था...


आपके विकल्प हैं -
a) फासले, b) दूरियां, c) अजनबी, d) बेगाने

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "तजुर्बा" और शेर कुछ यूं था -

क्यों डरें ज़िंदगी में क्या होगा,
कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा....

इस शब्द को सबसे पहले सही पहचाना नीरज जी ने और उन्होंने इस शब्द पर क़तील शिफ़ाई साहब का एक भी पेश किया:

ले मेरे तजुर्बों से सबक ऐ मेरे रकीब,
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं...

खुबसूरत हैं आँखें तेरी...गज़ल से जुड़ी अपनी यादें शेयर करने के लिए नीरज जी का आभार!

इनके बाद महफ़िल में नज़र आए शामिख साहब। उनके साथ थी जावेद अख्तर साहब की लिखी वह गज़ल जिससे यह शेर लिया गया है। इसके बाद उन्होंने कुछ "फ़िराक़ गोरखपुरी" के तो कुछ अनाम के शेर महफ़िल के सुपूर्द किए। बानगी देखिएगा:

हमारा ये तजुर्बा कि खुश होना मोहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता, कभी आसान नहीं होता

मेरा अपना तजुर्बा है इसे सबको बता देना
हिदायत से तो अच्छा है किसी को मशवरा देना।

शरद जी शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं है...एक गलती आपने की और एक गलती हमने...लेकिन गलती का फल तो अच्छा हीं हुआ..इसी बहाने हमें एक बेहद खुबसूरत गज़ल सुनने को मिल गई। वैसे "तर्जुबा" पर आपके शेर कहाँ है? अहा..मिल गए, थोड़े अंतराल के बाद थे:

इस तरह सौदा किया है आदमी से वक़्त ने
तज़ुर्बे दे कर वो कुछ उसकी जवानी ले गया ।

शन्नो जी ...सदियों बाद आपका स्वागत है :) कहाँ थीं आप...महफ़िल अधुरी थी आपके बिना...खैर अब आ गई हैं तो मत जाईयेगा....आपने तो महफ़िल में आपके तजुर्बे पर हीं दो शेर कह डाले। अच्छा लगा पढकर:

लिखने की तमन्ना है मुझे मगर तजुर्बा ही नहीं
मेरे शेर सुनते ही लोग महफ़िल से भाग जाते हैं.

अगर फरमाइश कहीं से होती मेरी शायरी के लिए
तो शायद सुनने वालों का भी अपना ही तजुर्बा होता.

एक यह भी:
तजुर्बा रहा है हिचकियों से की किसी ने मुझे याद किया
क्या आवाज़ पर भी किसी ने दस्तक दी है आज मुझे.

मंजु जी हर बार की तरह इस बार भी स्वरचित शेर के साथ महफ़िल में नज़र आईं:

तजुर्बा जिन्दगी का कहानियों में बोलता .
दोस्तों ! कोई हंसता तो कोई रोता ,

और अंत में रचना जी के दो शेर:

तजुर्बा अपनों का कुछ इस कदर हुआ मुझे
काटों ने ही नहीं फूलों ने भी दगा दिया मुझे

क्या है माँ की दुआ दोस्तों
मौत टली तो तजुर्बा हुआ दोस्तों

सुमित जी..आप आए अच्छा लगा...बस कोई नया शेर डाल देते तो मज़ा आ जाता... :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, August 27, 2009

जीना यहाँ मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ....वो आवाज़ जिसने दी हर दिल को धड़कने की वजह- मुकेश



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 184

"कल खेल में हम हों न हों गर्दिश में तारे रहेंगे सदा, भूलोगे तुम भूलेंगे वो, पर हम तुम्हारे रहेंगे सदा"। वाक़ई मुकेश जी के गानें हमारे साथ सदा रहे हैं, और आनेवाले समय में भी ये हमारे साथ साथ चलेंगे, हमारे सुख और दुख के साथी बनकर, क्योंकि इसी गीत के मुखड़े में उन्होने ही कहा है कि "जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ, जी चाहे जब हमको आवाज़ दो, हम हैं वहीं हम थे जहाँ"। मुकेश जी को गये ३५ साल हो गए हैं ज़रूर लेकिन उनके गानें जिस तरह से हर रोज़ कहीं न कहीं से सुनाई दे जाते हैं, इससे एक बात साफ़ है कि मुकेश जी कहीं नहीं गए हैं, वो तो हमारे साथ हैं हमेशा हमेशा से। दोस्तों, आज है २७ अगस्त, यानी कि मुकेश जी का स्मृति दिवस। इस अवसर पर हम 'हिंद युग्म' की तरफ़ से उन्हे दे रहे हैं भावभीनी श्रद्धांजली। '१० गीत जो मुकेश को थे प्रिय' लघु शृंखला के अंतर्गत इन दिनों आप मुकेश जी के पसंदीदा १० गीत सुन रहे हैं। आज जैसा कि आप को पता चल ही गया है कि हम सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' से "जीना यहाँ मरना यहाँ"। दोस्तों, आप को याद होगा कि 'राज कपूर विशेष' के दौरान कुल ७ गीतों में से ४ गानें मुकेश की आवाज़ में थे। राज कपूर और मुकेश, ये दो नाम एक दूसरे के साथ इस क़दर जुड़े हुए हैं कि इन्हे एक दूजे से अलग नहीं किया जा सकता। जिस तरह से 'राज कपूर विशेष' में मुकेश के गीतों की भरमार थी, वैसे ही मुकेश के पसंदीदा गीतों में राज साहब की फ़िल्मों के गीतों की भरमार है। यूं तो मुकेश ने बहुत सारे नायकों और संगीतकारों के लिए गाए है, लेकिन उनके पसंदीदा गीतों में राज कपूर और शंकर जयकिशन ही छाये हुए हैं। 'मेरा नाम जोकर' संबंधित कई बातें हम आप को 'राज कपूर विशेष' में बता चुके हैं। आज चलिए कुछ और बातें करते हैं।

अपने पिता को श्रद्धांजली स्वरूप जो 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम नितिन मुकेश ने विविध भारती पर प्रस्तुत किया था, उसमें उन्होने राज कपूर के साथ मुकेश जी के रिश्ते को किस तरह से पेश किया था, ज़रा पढिए यहाँ पर। नितिन मुकेश "इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल" की धुन गुनगुनाते हैं और कहते हैं, "फ़ौजी भा‍इयों, आप समझ गए होंगे कि अब मैं किसका ज़िक्र करने जा रहा हूँ। वो जिनका और मुकेश जी का शरीर और आत्मा का संबंध था। राज कपूर ने अंत तक अपनी दोस्ती निभायी। मुझे याद है १९७५ का वो दिन जब मुकेश जी मौरिशस गए हुए थे एक प्रोग्राम के लिए। वहाँ के एक टीवी साक्षात्कार में जब उनकी और राज कपूर जी की दोस्ती के बारे में पूछा गया तो मुकेश जी मुस्कुराए और कहा कि 'It was love at first sight'।" तो दोस्तों, आइए अब आज का गीत सुना जाए, लगे हाथों आप को यह भी बता दें कि इस गीत को शैलेन्द्र पूरा लिखने से पहले ही इस दुनिया से चले गए थे और उनके देहान्त के बाद इस गीत को पूरा किया था उन्ही के बेटे शैली शैलेन्द्र ने। गीत का तीसरा अंतरा उनका लिखा हुआ है और इसी गीत के साथ शैली शैलेन्द्र की एंट्री हुई थी फ़िल्म जगत में बतौर गीतकार। और फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' के संगीत के लिए शंकर जयकिशन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार मिला था उस साल। गानें के और्केस्ट्रेशन में शंकर जयकिशन का सुपरिचित हस्ताक्षर है, accordion साज़ गाने की रीद्‍म का आधार है। ज़िंदगी का फ़लसफ़ा बयाँ करता यह गीत जब कभी हम सुनते हैं, मुकेश और राज कपूर की यादें झट से दिल-ओ-दिमाग़ पर छा जाते हैं। आज मुकेश जी की पुण्य तिथि पर इस गीत को सुनते हुए दिल और आँखें, दोनों भर आ रही हैं।

"ये मेरा गीत जीवन संगीत कल भी कोई दोहराएगा,
जग को हँसाने बहरुपिया रूप बदल फिर आएगा,
स्वर्ग यहीं नर्क यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ,
जी चाहे जब हमको आवाज़ दो, हम हैं वहीं हम थे जहाँ।
"



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. संगीतकार राम गांगुली के लिए गया था मुकेश ने ये गीत.
२. गीतकार है सरस्वती कुमार दीपक.
३. गीतकार ने इस गीत में अपने नाम का पर्याय देकर बात कही है.

पिछली पहेली का परिणाम -
अक्सर ऐसा होता है कि हमारे श्रोता मुश्किल से मुश्किल गीत को पहचान लेते हैं पर इतने मशहूर इतने आसान गीत को कल नहीं पहचान पाए. पूर्वी जी का जवाब गलत था ये हिंट तो मैंने कल ही दे दिया था (पाबला जी माफ़ कीजियेगा जल्दी में फिल्म का नाम धरम करम की जगह कल आज और कल लिखा गया), पर धरम करम या फिर दीवाना जैसी फिल्म के गीत (दिशा जी के जवाब अनुसार) ओल्ड इस गोल्ड का हिस्सा नहीं बना है अब तक. आप यदि कोई पुरानी पोस्ट ढूंढ़ना चाहें तो आवाज़ के मुख्य पृष्ठ पर खोज का विकल्प है....खैर...आज तो हम बस यही कहेंगे कि आप सब इस महान गीत को सुनकर उस महान गायक को श्रद्धाजंली दें जिसने अपनी आवाज़ से हमें जीवन के ढेरों अनमोल पल दिए हैं.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

चांदन में मैं तकूँ जी...तेरा सोना मुखडा.....प्यार से पुकारा कैलाश खेर ने "आओ जी..."



ताजा सुर ताल (17)

ताजा सुर ताल में आज जिक्र एक गैर फ़िल्मी एल्बम के गीत की

सुजॉय -आज ताज़ा सुर ताल में हम जिस गायक की बात कर रहे हैं उनके बारे में हम बस यही कह सकते हैं कि "सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह", ठीक वैसे ही जैसे कि उस गायक ने ये कहा था फ़िल्म 'फ़ना' के उस गीत में। जी हाँ हम बात कर रहे हैं कैलाश खेर साहब की, और मेरे साथ हैं मेरे को-होस्ट और मेरे साथी सजीव सारथी.

सजीव - यानी कि जिक्र है एक बार फिर कैलाश खेर की अल्बम "चांदन में", हमारे श्रोताओं को याद होगा इस अल्बम का और अन्य गीत हमने कुछ दिन पहले सुनवाया था जिसके बोल थे -"भीग गया मेरा मन..."

सुजॉय - ज़मीन से उठ कर जब कोई ज़र्रा सितारा बन जाए तो सभी को हैरत होती है। सीधे सादे ज़मीन से जुड़े कैलाश खेर के साथ भी यही हुआ। जो भी हुआ उनके साथ, मंगलमय ही हुआ, यहाँ भी मुझे उन्ही का गाया मंगल पाण्डेय का गीत याद आ रहा है "मंगल मंगल हो"।

सजीव - हाँ और यही वो गीत थे जिसमें उनके साथ थे सुखविंदर और संगीतकार थे रहमान, यही हमारे पिछले अंक का सवाल भी था, पर अफ़सोस किसी भी श्रोता ने सही जवाब नहीं दिया. लगता है नए संगीत के प्रति हमारे श्रोता अभी अधिक जगुरुक नहीं हैं.

सुजॉय - हाँ, खैर सजीव, कहते है ज़िंदगी का दूसरा नाम संघर्ष है और हमारे कैलाश खेर भी संघर्ष के पर्यायवाची है। बालावस्था में वो अपने घर मेरठ से भाग कर एक गुरु की तलाश में दिल्ली आ पहुँचे। १५ गुरुओं से मिलने के बाद वो आख़िर कार मुंबई आ पहुँचे। मुंबई में आने के बाद उन्होने अंधेरी रेल्वे स्टेशन पर तमाम रातें गुज़ारी। सूफ़ियाना गायक कैलाश खेर करता संघर्ष उम्र भर और उनको इसका सिला भी मिला। फ़िल्म 'वैसा भी होता है' में उनका गाया गीत "अल्लाह के बंदे" ने रातों रात उनकी ज़िंदगी बदल डाली।

सजीव - कैलाश खेर ने शुरु शुरु में कई विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाए हैं, जिनमें से कई बेहद लोकप्रिय भी हुए हैं। हमारी फ़िल्मों मे हीरो के प्लेबैक के लिए जिस तरह क्की आवाज़ें ली जाती हैं, कैलाश खेर की आवाज़ शायद वैसी नहीं है। लेकिन जब भी किसी फ़िल्म में किसी चरित्र के लिए कुछ अलग आवाज़ की ज़रूरत पड़ती है, तो संगीतकार उन्ही के पास जाते हैं। यही बात हमें याद दिलाते हैं ७० और ८० के दशक के गायक नरेन्द्र चंचल की। गायक कैलाश खेर की आवाज़ में इस मिट्टी की ख़ुशबू है, जिस वजह से वो जो भी गीत गाते हैं दिल को छू जाते हैं।

सुजॉय - अब ज़रा आप को कुछ ऐसे फ़िल्मों के नाम गिनाते हैं जिनमें कैलाश खेर ने अपनी आवाज़ दी है। ये फ़िल्में हैं स्वदेस, वक़्त, खोंसला का घोंसला, मंगल पाण्डेय, काल, फ़ना, अंदाज़, वैसा भी होता है, ख़ाकी, देव, बरसात, चॉकलेट, क्योंकि, एक अजनबी, दोस्ती, ज़िंदा, अलग, आप की ख़ातिर, नक्शा, और भी न जाने कितने। अभी हाल ही में फ़िल्म 'चांदनी चौक टू चायना' और आजकल 'कमीने' के लिए उनके गाए गीत भी ख़ूब बजे और बज रहे हैं। कैलाश खेर ने "कैलासा" नाम से एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम बनाई है जिसे लोगों ने हाथों हाथ ग्रहण किया। कैलासा बैंड में कैलाश खेर के साथी रहे हैं नरेश कामत और परेश कामत, जो कामत ब्रदर्स के नाम से भी जाने जाते हैं। इस टीम का जिक्र हम पहले ही कर चुके हैं. अपनी ताजा अल्बम "चांदन में" कैलाश की ये टीम अपने पिछले कामों के मुकाबले और निखर कर लौटी है.

सजीव - हाँ तो सुजॉय आज आप कौन सा गीत सुनवा रहे हैं इस अल्बम से

सुजॉय- ये अल्बम का शीर्षक गीत है -"आओ जी..." जिसका विडियो भी इन दिनों काफी चर्चित हो रहा है. इस गीत की खासियत यह है कि इसमें फ़्युज़न का प्रयोग हुआ है। एक तरफ़ कैलाश की मिट्टी की सुगंध लिए लोक शैली की गायकी, और दूसरी तरफ़ संगीत में है पाश्चात्य रंग, जिसका श्रेय जाता है कामत ब्रदर्स को। यानी कि हम इस गीत के लिए यह कह सकते हैं कि "गीत अपना और धुन पराई"। कैलाश की गायकी सूफ़ियाना ढंग की है। ऊँचे सुर उनके उतने ही अच्छे लगते है जितने कि उनके नर्म-ओ-नाज़ुक लोवर नोट्स। जो सुक्ष्म हरकतें वो करते हैं अपने गीतों में, जो केवल अच्छे रियाज़ और साफ़ दिलवाले ही कर सकते हैं। जितने सीदे सादे वो ख़ुद निजी ज़िंदगी में हैं, वही सादगी उनकी गायकी, उनके गाए गीतों में भी साफ़ झलकती है। उनके गाए गीतों के ज़रिए ऐसा लगता है जैसे कि सीधे ईश्वर से कोई संबंध हो रहा हो! एक आध्यात्मिक जगत में ले जाते हैं कैलाश खेर की आवाज़ और इस नये ऐल्बम के गीतों को सुनते हुए भी हम ऐसे ही एक जगत में पहुँच जाते हैं।

सजीव - बिलकुल सुजॉय, खासकर इस गीत में जब वो अंतरा उठाते हैं दोनों बार दिल में एक हूक सी उठा जाते हैं...अब आपने इतना कुछ कह ही दिया है तो हमारे श्रोता भी बैचैन होंगे गीत को सुनने के लिए. सुविधा के लिए बोल हम प्रस्तुत कर देते हैं.

राह बुहारूं, पग पखारूँ, तुम्हें निहारूं जी,
प्राण वारूँ, बैयाँ डारूं , मैं न हारूँ जी,
हो आये जी मारे चतर सुजान, लीजो पहचान,
कहे भरमाओ जी, आओ जी, आओ जी...आओ जी....

चांदन में, मैं तकूँ जी, तेरा सोना मुखडा,
प्यारा प्यारा मुखडा,
आँचल में मैं रखूं री.
चंदा का टुकडा,
ओ जी प्यारा मुखडा...
तू धरे जहाँ पाँव तो मुस्काये ये धरती,
सैयां ...सैयां...
मारी बिनती सुन लो आन, मारे भगवान्,
हमें न सताओ जी....आओ जी, आओ जी...आओ जी...

सर्प डसे सुन्ना सुन्ना, कैसा मीठा सा जहर,
दर्द बढे दूना दूना, उठे हिया में लहर,
उठे ह्रदय में लहर...
मैं करूँ श्रृगार तो शर्माए ये दर्पण,
सैयां...सैयां...
ऊंची चढ़ के देऊ अजान, न बनो अनजान,
पर्दा हटाओ जी...आओ जी आओ जी....आओ जी...


और अब सुनिए ये गीत -



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.संगीतकार प्रीतम ने "धूम २" की सफलता के बाद यश राज फिल्म्स की किस ताज़ा तरीन फिल्म के लिए संगीत तैयार किया है, कौन सी है वो जल्द आने वाली फिल्म? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब हम उपर दे ही चुके हैं. हमारे श्रोता पिछले गीत की समीक्षा में इतने उलझ गए कि पहेली की बात भूल गए. पर हमें शिकायत नहीं है क्योंकि आप सब की रेटिंग जो अधिक जरूरी है वो हमें प्राप्त हो रही है....एक बार फिर सभी का आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Wednesday, August 26, 2009

मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो....दर्द और मुकेश की आवाज़ का था एक गहरा नाता



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 183

'१० गीत जो थे मुकेश को प्रिय' लघु शृंखला के अंतर्गत आप सुन रहे हैं मुकेश की गाए हुए उन गीतों को जो उनके दिल के बहुत करीब थे। इसमे कोई दोराय नहीं कि ये गानें सिर्फ़ उन्ही को नहीं, हम सभी को अत्यंत प्रिय हैं, और तभी तो इतने दशकों बाद भी लोगों की ज़ुबाँ पर अक्सर चढ़े हुए मिलते हैं। विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के शब्दों में, "मुकेश के स्वर में नैस्वर्गिक मिठास थी, सोज़ और मधुरता तो थी ही, साधना और लगन से उन्होने उसमें और निखार ले आए थे। चाहे शृंगार रस हो या मस्ती भरा कोई गीत, या फिर टूटे हुए दिल की सिसकियाँ, हर मूड को बख़ूबी पेश करने की क्षमता रखते थे मुकेश। लेकिन सच तो यही है कि मुकेश ने प्रेम से ज़्यादा विरह और वेदना के गीत गाए हैं। एक ज़माना था जब प्रेम निवेदन मे एक शालीनता हुआ करती थी। और प्यार में नाकामी में भी कुछ ऐसी ही बात थी। ऐसे ही टूटे हुए किसी दिल की दुनिया में ले जाते हैं मुकेश की आवाज़। रात के गभीर सन्नाटे मे जब ये आवाज़ हौले हौले गूँजती है तो बेचैन कर देती है मन को।" एक ऐसा ही बेचैन कर देने वाला गीत अज पेश-ए-ख़िदमत है फ़िल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' से। "मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो, जिसकी आवाज़ रुलाए मुझे वो साज़ न दो"।

'दिल भी तेरा हम भी तेरे' सन् १९६० की फ़िल्म थी। कन्वर कला मंदिर के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के निर्देशक थे अर्जुन हिंगोरानी और मुख्य चरित्रों में थे धर्मेन्द्र, उषा किरण, बलराज साहनी और कुमकुम। धर्मेन्द्र भी नए थे, फ़िल्म कम बजट की थी, और बतौर संगीतकार भी नए नए फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने वाले कल्याणजी-आनंदजी को लिया गया था। इस गीत को लिखा था शायर शमिम जयपुरी साहब ने। फ़िल्म भले ही ज़्यादा न चली हो, लेकिन फ़िल्म के प्रस्तुत गीत ने वह कमाल दिखाया जो फ़िल्म के किसी दूसरे क्षेत्र ने नहीं दिखा पाया। इस गीत को याद करते हुए आनंदजी 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहते हैं, "इससे पहले, कमलजी, दो चार बहुत अच्छे गानें हैं जो सुनाने हैं लोगों को, ये शुरु की पिक्चरें चली नहीं, हमारी पिक्चर चली २५-वे पिक्चर से, 'जब जब फूल खिले', जब कलर का एरा आया। लेकिन हर पिक्चर के गानें चल गए थे। 'सम्राट चंद्रगुप्त' में "चाहे पास हो चाहे दूर हो", "भर भर आए अखियाँ", "नैना हैं जादू भरे", "क़ैद में है बुलबुल सैयाद मुस्कुराये"। उसके बाद एक नया ट्रेंड भाईसाहब (कल्यानजी) ने बहुत अच्छा काम्पोज़ किया था, "मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो", म्युज़िक का एक नया दौर, एक नई स्टाइल में उन्होने बनाया था। मैने उनसे कहा कि 'बहुत अच्छा काम्पोज़ किया'। बोले 'क्या किया? हो गया'। ग़ज़ल को एक नए अंदाज़ में पेश किया गया है, तो वह गाना चल गया। उसके बाद "नींद न मुझको आए", 'सट्टा बाज़ार' के गानें चले, "तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे", उपरवाला इतना मेहरबान था हम पे कि हर पिक्चर के दो तीन गानें चल जाते थे।" तो दोस्तों, आइए, शमिम जयपुरी के असरदार बोलों, कल्याणजी-आनंदजी के दिल छू लेनेवाले संगीत और मुकेश की सोज़ भरी आवाज़ में सुनते हैं आज का सुनहरा नग़मा।



गीत के बोल (सौजन्य बी एस पाबला)

मुझ को इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो
जिसकी आवाज़ रुला दे मुझे वो साज़ न दो
आवाज़ न दो...

मैंने अब तुम से न मिलने की कसम खाई है
क्या खबर तुमको मेरी जान पे बन आई है
मैं बहक जाऊँ कसम खाके तुम ऐसा न करो
आवाज़ न दो...

दिल मेरा डूब गया आस मेरी टूट गई
मेरे हाथों ही से पतवार मेरी छूट गई
अब मैं तूफ़ान में हूँ साहिल से इशारा न करो
आवाज़ न दो...

रौशनी हो न सकी लाख जलाया हमने
तुझको भूला ही नहीं लाख भुलाया हमने
मैं परेशां हूँ मुझे और परेशां न करो
आवाज़ न दो...

किस कदर रोज़ किया मुझसे किनारा तुमने
कोई भटकेगा अकेला ये न सोचा तुमने
छुप गए हो तो कभी याद ही आया न करो
आवाज़ न दो...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. राज कपूर की आवाज़ ही नहीं उनकी आत्मा थे मुकेश.
२. मुखड़े में शब्द है -"अपने".
३. इस फिल्म का एक अन्य हिट गीत पहले ही इस शृंखला का हिस्सा बन चुका है.

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई, १४ अंकों के साथ आप रोहित जी और दिशा जी के बराबर आ चुकी हैं. अब बस आपसे २ अंक आगे पराग जी हैं. दिलीप जी, शमिख जी, मनु जी, वाणी जी, अदा जी, विनोद जी और पाबला जी का विशेष आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, August 25, 2009

झूमती चली हवा याद आ गया कोई...संगीतकार एस एन त्रिपाठी के लिए भी गाये मुकेश ने कुछ बेहरतीन गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 182

'१० गीत जो थे मुकेश को प्रिय', इस शृंखला की दूसरी कड़ी में मुकेश और शैलेन्द्र की जोड़ी तो बरकरार है, लेकिन आज के गीत के संगीतकार हैं एस. एन. त्रिपाठी, जिनका नाम ऐतिहासिक और पौराणिक फ़िल्मों में सफल संगीत देने के लिए श्रद्धा से लिया जाता है फ़िल्म जगत में। त्रिपाठी जी के अनुसार, "मुकेश जी ने मेरे गीत बहुत ही कम गाए हैं, मुश्किल से १५ या २०, बस! मगर यह बात देखने लायक है कि उन्होने मेरे लिए जो भी गीत गाये हैं, वो सब 'हिट' हुए हैं, जैसे "नैन का चैन चुराकर ले गई" (चंद्रमुखी), "आ लौट के आजा मेरे मीत" (रानी रूपमती), "झूमती चली हवा याद आ गया कोई" (संगीत सम्राट तानसेन), इत्यादि इत्यादि।" दोस्तों, इन्ही में से फ़िल्म 'संगीत सम्राट तानसेन' का गीत आज हम आप को सुनवा रहे हैं, जो मुकेश जी को भी अत्यंत प्रिय था। १९६२ के इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन स्वयं एस. एन. त्रिपाठी ने ही किया था। बैनर का नाम था 'सुर सिंगार चित्र'। भारत भूषण और अनीता गुहा अभिनीत यह फ़िल्म अपने गीत संगीत की वजह से आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। शास्त्रीय रागों का व्यापक इस्तेमाल फ़िल्म के हर एक गीत में त्रिपाठी जी ने किया है। प्रस्तुत गीत आधारित है राग सोहानी पर। एस. एन. त्रिपाठी के संगीत की खासियत यह थी कि पीरियड और पौराणिक फ़िल्मों में वो इस तरह से संगीत देते थे कि वह ज़माना जीवंत हो उठता था उनके संगीत के माध्यम से। हमारी संस्कृति, हमारे इतिहास को अपने फ़िल्मों में सही तरीके से दर्शाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है और अपने इस काम के साथ उन्होने पूरा पूरा न्याय भी किया है। जहाँ तक प्रस्तुत गीत में मुकेश की आवाज़ का ताल्लुख़ है, क्या ख़ूब उभारा है उन्होने विरह की वेदना को!

और अब आइए दोबारा मुड़ते हैं मुकेश के सुपुत्र नितिन मुकेश के उस जयमाला कार्यक्रम पर जिसमें उन्होने अपने पिता से जुड़ी कई बातें बताई थी. "मेरे बहुत से दोस्त मुझसे प्रश्न करते हैं कि क्या मुकेश जी मेरे गुरु थे? क्या उन्होने मुझे गाना सीखाया? तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि यूं तो वो मेरे आदर्श रहे हैं, लेकिन उन्होने कभी मुझे गाना सिखाया नहीं। मैने उन्हे सुन सुन के गाना सीखा है। वो तो चाहते ही नहीं थे कि मैं गायक बनूँ। उन्होने एक बार मुझसे कहा था कि 'Singing is a beautiful hobby but a painful profession'. यह उनकी मेरे लिए एक चेतावनी थी। उन्हे डर था कि क्या मैं संघर्ष कर पाऊंगा? उन्होने मुझे पढ़ने के लिए लंदन भेजा, पर मैं वहाँ से भी लौट कर वापस आ गया क्योंकि मेरा मन तो गीत संगीत में ही था। मैं ९ वर्ष की आयु से ही उनके साथ हर शो पर जाता था और उनके साथ गाने की भी ज़िद करता। और जब कभी मुझे औडिएन्स की तरफ़ से वाह वाह मिलती, वो तो मुझे कुछ नहीं कहते, पर रात को मेरी माँ को टेलीफ़ोन पर मेरी ख़ूब तारीफ़ करते। आज मेरी माँ कहती है कि वो हमेशा चाहते थे कि मैं एक सिंगर बन जाऊं।" दोस्तों, अपने पिता के नक्श-ए-क़दम पर चलते हुए नितिन मुकेश तो एक अच्छे गायक बन गये, अब मुकेश जी के पोते नील नितिन मुकेश भी जवाँ दिलों पर राज कर रहे हैं। और अब यह भी सुनने में आया है कि नील अपनी अगली फ़िल्म में गीत भी गाने वाले हैं। तो चलिए, याद करते हैं मुकेश जी का गाया यह रूहानी गीत "झूमती चली हवा याद आ गया कोई, बुझती बुझती आग को फिर जला गया कोई"।



हमारे एक श्रोता बी एस पाबला जी ने गीत के बोल हमें भेजे हैं...आप भी आनंद लें -

झूमती चली हवा, याद आ गया कोई
बुझती बुझती आग को, फिर जला गया कोई
झूमती चली हवा ...

खो गई हैं मंज़िलें, मिट गये हैं रास्ते
गर्दिशें ही गर्दिशें, अब हैं मेरे वास्ते
अब हैं मेरे वास्ते
और ऐसे में मुझे, फिर बुला गया कोई
झूमती चली हवा ...

चुप हैं चाँद चाँदनी, चुप ये आसमान है
मीठी मीठी नींद में, सो रहा जहान है
सो रहा जहान है
आज आधी रात को, क्यों जगा गया कोई
झूमती चली हवा ...

एक हूक सी उठी, मैं सिहर के रह गया
दिल को अपना थाम के आह भर के रह गया
चाँदनी की ओट से मुस्कुरा गया कोई
झूमती चली हवा...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मुकेश की पसंद का अगला गीत है ये.
२. गीतकार हैं शमीम जयपुरी साहब.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में आपके इस प्रिय ब्लॉग का नाम है :)

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई १२ अंक हुए आपके. पाबला जी आशा है आज आप बाज़ी मारेंगें. आपने पूरे गीत के बोल जो दिए हैं वो हमने सभी श्रोताओं के लिए पेश कर दिया है. यदि आप ये काम नियमित रूप से कर पायें तो बहुत बढ़िया रहेगा. मनु जी के मार्फ़त पता लगा की स्वप्न जी का जन्मदिन था कल, भई देर से ही सही हमारी तरफ (समस्त आवाज़ परिवार) से भी संगीतमय शुभकामनाएँ. पराग जी आपकी अदा दिल छू गयी. विनोद जी आपका भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

खुद-बखुद नींद आ जाएगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे...... तलत अज़ीज़ साहब की एक और फ़रियाद



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३९

ज का अंक शुरू करने से पहले हम पिछले अंक में की गई एक गलती के लिए माफ़ी माँगना चाहेंगे। यह माफ़ी सिर्फ़ एक इंसान से है और उस इंसान का नाम है "शरद जी"। दर-असल पिछले अंक में हमने आपको जनाब अतर नफ़ीस की लिखी जो नज़्म सुनाई थी, वह है तो यूँ बड़ी हीं खुबसूरत, लेकिन उसकी फ़रमाईश शरद जी ने नहीं की थी। हुआ यूँ कि शरद जी की पसंद की तीन गज़लें/नज़्में और "आज जाने की ज़िद न करो" एक हीं जगह संजो कर रखी हुई थी, अब उस फ़ेहरिश्त से दो गज़लें हम आपको पहले हीं सुना चुके थे तो तीसरे के रूप में हमारी नज़र "आज जाने की ज़िद न करो" पर पड़ी और जल्दीबाजी में आलेख उसी पर तैयार हो गया। चलिए माना कि हमने इस नाम से नज़्म पोस्ट कर दी कि यह शरद जी की पसंद की है, लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि खुद शरद जी ने इस गलती की शिकायत नहीं की। शायद वो कहीं अन्यत्र व्यस्त थे या फिर वो खुद हीं भूल चुके थे कि उन्होंने किन गज़लों की फ़रमाईश की थी। जो भी हो, लेकिन यह गलती हमारी नज़र से छिप नहीं सकी और इसलिए हमने यह फ़ैसला किया है कि महफ़िल-ए-गज़ल की ४०वीं कड़ी (जो यूँ भी फ़रमाईश की गज़लों की अंतिम कड़ी होनी थी) में हम शरद जी की पसंद की अंतिम गज़ल/नज़्म पेश करेंगे। तो यह तो हुई पिछली और अगली कड़ी की बात, अब हम आज की कड़ी की ओर रूख करते हैं। आज की कड़ी सुपूर्द है दिशा जी की पसंद की आखिरी गज़ल के। आज हम जो गज़ल लेकर यहाँ पेश हुए हैं,उसे इस गज़ल के फ़नकार अपनी श्रेष्ठ १६ गज़लों में स्थान देते हैं। उस गज़ल की बात करने से पहले हम उस एलबम की बात करते हैं जिसमें "तलत अज़ीज़" साहब(जी हाँ, आज की गज़ल को अपनी सुमधुर आवाज़ और दिलकश संगीत से इन्होंने हीं सजाया है) की श्रेष्ठ १६ गज़लों का समावेश किया गया है। उस एलबम का नाम है "इरशाद" । हम यहाँ इस एलबम की सारी गज़लों के नाम तो पेश नहीं कर सकते लेकिन दो गज़लें ऐसी हैं, जिसके साथ तलत साहब की कुछ विशे्ष यादें जुड़ी हीं, वो बातें हम आपके साथ जरूर शेयर करना चाहेंगे।

उसमें से पहली गज़ल है क़तील शिफ़ाई साहब की लिखी हुई "बरसात की भींगी रातों में"। खुद तलत साहब के शब्दों में: १९८३ की बात है, मैं एक प्राईवेट पार्टी में यह गज़ल गा रहा था। जब मेरा गाना खत्म हुआ तो एक शख्स मेरे पास आए और मुझसे लिपट कर रोने लगे। इस गाने ने उनके अंदर छुपे शायद किसी दर्द को छु लिया था। जब वो चले गए तो मैने किसी से उनके बारे में पूछा तो पता चला कि वो चर्चित फिल्म निर्देशक महेश भट्ट थे। उस घटना के कुछ दिनों बाद हम एक फ़्लाईट में मिलें तो उन्होंने बताया कि यह उनकी बेहद पसंदीदा गज़ल है। उसके बाद हमारा रिश्ता कुछ ऐसा बन गया कि उन्होंने हीं मेरी होम प्रोडक्शन फिल्म "धुन" डाइरेक्ट की और उनकी फिल्म "डैडी" का मैं एकमात्र मेल सिंगर था। मैने उनके लिए "गुमराह" में भी गाया है। इस गज़ल के बाद चलिए अब बात करते हैं आज की गज़ल की। आज की गज़ल के बारे में तलत साहब की राय इसलिए भी लाजिमी हो जाती है क्योंकि उनके कुछ वाक्यों के अलावा इस गज़ल के गज़लगो के बारे में कहीं भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। तलत साहब अपने इन वाक्यों के सहारे हमें उस शख्स से रूबरू कराते हैं जो उनका फ़ैन भी है तो एक शायर भी, फ़ैन शायद बहुत बड़ा है, लेकिन शायर छोटा-मोटा। आप खुद देखिए कि तलत साहब क्या कहते हैं। यह गज़ल "खुबसूरत हैं आँखें तेरी" मेरी एलबम "शाहकार" के माध्यम से लोगों के सामने पहली मर्तबा हाज़िर हुई थी। अदब, अदीबों और नवाबों के शहर लखनऊ का एक बांका छोरा था, जिसका नाम था "हसन काज़मी" और जो अपने आप को मेरा बहुत बड़ा फ़ैन कहता था, शौकिया शायरी भी किया करता था। जब भी मैं लखनऊ किसी मुशायरे के लिए जाता तो वह वहाँ जरूर मौजूद होता था, मुझसे मिलता भी था और कभी-कभार अपनी लिखी नज़्मों और गज़लों को मुझे सुना जाता। मैने उसकी गज़ल "खुबसूरत हैं आँखें तेरी" के लिए एक धुन भी तैयार की थी लेकिन आगे चलकर यह बात मेरे जहन से उतर गई थी। कई साल बाद जब हम "शाहकार" पर काम कर रहे थे तो मैने "वीनस" के "चंपक जी" से इस गज़ल का जिक्र किया। "चंपक जी" को यह गज़ल बेहद पसंद आई और उन्होंने इस गज़ल को न सिर्फ़ लीड में रखने का फ़ैसला किया बल्कि इस गज़ल का विडियो भी तैयार किया गया। इस तरह यह गज़ल मेरे पसंदीदा गज़लों में शुमार हो गई।

वैसे तो हमने आपसे यह कहा था कि "इरशाद" एलबम से ली गई दो गज़लों से जुड़ी मजेदार बातें आपसे शेयर करेंगे लेकिन अगर तीसरी की भी बात हो जाए तो क्या बुरा है। हाँ तो जिस तीसरी गज़ल की हम बात कर रहे हैं उसे संगीत से सजाया है खैय्याम साहब ने। गज़ल के बोल हैं "ज़िंदगी जब भी"। इस गज़ल के बारे में तलत साहब कहते हैं: खैय्याम साहब एक पर्फ़ेंक्शनिस्ट हैं। यह गज़ल जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, वह उमराव जान फिल्म की बड़ी हीं मासूम गज़ल है। इस गाने की एक पंक्ति "सुर्ख फूलों से महक उठती हुई" में खैय्याम साहब खालिस लखनवी अंदाज की तलब रखते थे और मैं ठहरा हैदराबादी। नहीं चाहते हुए भी हर बार "फूलों" हैदराबादी अंदाज़ में ही आ रहा था। बड़ी कोशिशों के बाद मैं लखनवी अंदाज हासिल कर पाया। फिर भी आज तक मुझे इस गज़ल में अपनी गायकी अपने स्तर से कम की लगती है, जबकि खैय्याम साहब कहते हैं कि कोई गड़बड़ नहीं है। खैय्याम साहब यूँ हीं तो यकीं नहीं रखते, कुछ तो है इस गज़ल में कि आज भी यह गज़ल बड़ी हीं प्रचलित है और लोगों के जुबान पर ठहरी हुई है। जानकारी के लिए बता दूँ कि खैय्याम साहब का १९९० में निधन हो चला है। और इससे यह भी जाहिर होता है जो भी बातें हमने यहाँ पेश की है, वो सब बीसियों साल पुरानी है। चूँकि हमारे पास आज की गज़ल के गज़लगो के बारे में कोई भी खास जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए उनका लिखा कोई दूसरा शेर (जो इस गज़ल में मौजूद न हो) हम पेश नहीं कर सकते। इसलिए अच्छा यह होगा कि हम सीधे आपको आज की गज़ल से मुखातिब करा दें। तो लीजिए पेश है आज की गज़ल.....सुनिए और डूब जाईये शब्दों की मदहोशी में। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

खुबसूरत हैं आँखें तेरी, रात को जागना छोड़ दे,
खुद-बखुद नींद आ जाएगी, तू मुझे सोचना छोड़ दे।

तेरी आँखों से कलियाँ खिलीं, तेरी आँचल से बादल उड़ें,
देख ले जो तेरी चाल को, मोर भी नाचना छोड़ दे।

तेरी अंगड़ाईयों से मिलीं जहन-ओ-दिल को नई रोशनी,
तेरे जलवों से मेरी नज़र किस तरह खेलना छोड़ दे?

तेरी आँखों से छलकी हुई जो भी एक बार पी ले अगर,
फिर वो मैखार ऐ साकिया, जाम हीं माँगना छोड़ दे।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

क्यों डरें ज़िंदगी में क्या होगा,
कुछ न होगा तो ______ होगा....


आपके विकल्प हैं -
a) करिश्मा, b) तजुर्बा, c) क्या मज़ा, d) बेमज़ा

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "गिलास" और शेर कुछ यूं था -

मुझे पिला रहे थे वो कि खुद ही शम्मा बुझ गयी,
गिलास गुम, शराब गुम, बड़ी हसीन रात थी....

इस शेर को सबसे पहले सही पहचना सीमा जी ने और उन्होंने कुछ शेर भी पेश किए:

जो रंग भरदो उसी रंग मे नज़र आए
ये ज़िंदगी न हुई काँच का गिलास हुआ

ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें
चटके हुए गिलास को ज्यादा न दाबिए।

यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम करे दे

छिलेगा हाथ तुम्हारा ज़रा-सी ग़फ़लत पर
कि घर में काँच का टूटा गिलास मत रखना.

शामिख साहब हर बार की तरह उस गज़ल को ढूँढ लाए जिससे यह शेर लिया हुआ था। उसके बाद उन्होंने "गिलास" शब्द से जुड़े कई सारे शेर पेश किए। बानगी देखिए:

जो रंग भरदो उसी रंग मे नज़र आए
ये ज़िंदगी न हुई काँच का गिलास हुआ

यहाँ लिबास, की क़मीत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

मैखाने की मस्ती में हम डूबते कैसे
नज़रों के नशे से भरा गिलास नहीं था

एक त्रिवेणी भी:
धौंकते सीनो से, पेशानी के पसीनो से
लड़ -लड़कर सूरज से जो जमा किया था

एक गिलास मे भरकर पी गया पूरा दिन।

मंजु जी स्वरचित दो शेरों के साथ महफ़िल में हाज़िर हुईं। उनके शेर कुछ यूँ थे:

१-मधुशाला में जब टकराते गिलास .
सारा जमाना होता कदमों के पास .
२-जब पिए थे गिलास भुला दिया था तुझे .
झूम रहा था मयखाना अफसाना बने .

नीलम जी ने जहाँ शामिख साहब की टिप्पणी से उठाकर शेर पेश किया तो वहीं सुमित जी थोड़े पशोपेश में नज़र आए। कोई बात नहीं महफ़िल में आप दोनों की उपस्थिति हीं पर्याप्त है।
चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, August 24, 2009

सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है...शायद ये गीत काफी करीब था मुकेश की खुद की सोच से



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 181

"हम छोड़ चले हैं महफ़िल को, याद आए कभी तो मत रोना,
इस दिल को तसल्ली दे लेना, घबराए कभी तो मत रोना।"

आज से लगभग ३५ साल पहले, २७ अगस्त १९७६ को, दुनिया की इस महफ़िल को हमेशा के लिए छोड़ गए थे फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व गायक और एक बेहतरीन इंसान मुकेश। मुकेश उस आवाज़ का नाम है जिसमें है दर्द, मोहब्बत, और मस्ती भी। आज उनके गए ३५ साल हो गए हैं, लेकिन उनके गाए अनगिनत नग़में आज भी वही ताज़गी लिए हुए है, समय असर नहीं कर पाया है मुकेश के गीतों पर। मुकेश का नाम ज़हन में आते ही सुर लहरियों की पंखुड़ियाँ ख़ुद ब ख़ुद मचलने लग जाती हैं, दुनिया की फिजाओं में ख़ुशबू बिखर जाती है। २७ अगस्त को मुकेश की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य पर आज से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम शुरु कर रहे हैं मुकेश को समर्पित १० विशेषांकों की एक ख़ास लघु शृंखला '१० गीत जो थे मुकेश को प्रिय'। जी हाँ, ये वो १० गीत हैं, जो मुकेश को बहुत पसंद थे और जिन्हे वो अपने हर शो में गाते थे। इस शृंखला की शुरुआत हम कर रहे हैं जीवन दर्शन पर आधारित फ़िल्म 'तीसरी क़सम' के एक मशहूर गीत से - "सजन रे झूठ मत बोलो, ख़ुदा के पास जाना है, न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है"। गीत यही सिखाता है कि हर इंसान का अंजाम एक ही है, चाहे वो राजा हो या भिखारी, इसलिए सांसारिक सुख दुख एक तरफ़ रख कर अपने जीवन काल में दुनिया का भला करें, समाज की सेवा करें, भलाई की राह पर चलें। "लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया, बुढ़ापा देख कर रोया, वही क़िस्सा पुराना है"। कितनी अच्छी सीख इस पंक्ति में शैलेन्द्र जी ने दी है कि हमें अपना मूल्यवान जीवन व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए, कुछ ऐसा करें ताकि हमारे जाने के बाद भी हमारे काम से दुनिया लाभांवित होती रहे।

गीतकार शैलेन्द्र द्वारा निर्मित एवं और बासु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित इस क्लासिक फ़िल्म 'तीसरी क़सम' के बारे में तफ़सील से हम आप को कुछ रोज़ पहले बता ही चुके हैं। उसी में हम ने आप को शैलेन्द्र के बेटे मनोज शैलेन्द्र से ली गई साक्षात्कार का एक अंश भी प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होने इस फ़िल्म से जुड़ी बाते कहे थे। क्योंकि यह विशेष शृंखला है गायक मुकेश पर केन्द्रित, इसलिए इसमें ज़्यादा बातें हम मुकेश की ही करेंगे। राज कपूर, मुकेश, शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन की टीम के इस सदाबहार गीत को सुनने से पहले पेश है मुकेश के बेटे नितिन मुकेश के कुछ शब्द अपने पिता के बारे में जो उन्होने कहे थे मुकेश को श्रद्धांजली स्वरूप विशेष जयमाला कार्यक्रम में विविध भारती पर। इसका प्रसारण हुआ था २७ अगस्त २००५ के दिन। "दोस्तों, मैं प्रोग्राम अक्सर करता रहता हूँ, देश विदेश में जाता रहता हूँ, और मैने देखा है कि हर उम्र के लोग मुकेश जी के गानें बेहद पसंद करते हैं। मुझे याद है एक बार अहमदाबाद में एक १६-१७ साल के एक लड़के ने मुकेश जी के गाए एक गीत की फ़रमाइश की जो ४३ वर्ष पुराना गाना था। मैने उससे पूछा कि यह तो बहुत पुराना गाना है, जब यह गाना रिकार्ड हुया था तब शायद आप के पिताजी का भी जन्म नहीं हुआ होगा, आप को यह गाना कैसे इतना पसंद है? तो उसने कहा कि 'uncle, please dont mind, पर आप क्या समझते हैं? Do you know that Mukeshji was a national property?" यह सुनकर पहले तो मुझे अजीब सा लगा कि इस लड़के ने मुझे ऐसे जवाब दे दिया, पर दूसरे ही पल मुझे खुशी भी हुई। मुकेश जी पहले आप के, इस देश के चहेते हैं, उसके बाद मेरे पिता हैं।"



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मुकेश की पसंद का दूसरा गीत.
२. संगीत एस एन त्रिपाठी का है.
३. मुखड़े की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"आग".

पिछली पहेली का परिणाम -
मंजू जी आपको २ मिलेंगें, और इसी के साथ आपका खता खुल गया है बधाई...पर पराग जी की तरह हम भी स्वप्न जी से गुजारिश करेंगें कि इतने साफ़ साफ़ हिंट न दिया करें....जरा प्रतिभागियों को अपने जेहन की कसरत करें दें. पाबला जी आप भी दौड़ में शामिल हा जाएँ...पर जितनी जल्दी आ सकें उतना अच्छा, सुमित जी अच्छा मौका है आपके लिए अगले दस गीत मुकेश के होंगे...जम जाईये...शरद जी सूत्र में दूसरी पंक्ति ही लिखा है आप क्यों पसोपेश में आ गए पता नहीं :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

पतवार पहन जाना... ये आग का दरिया है....गीत संगीत के माध्यम से चेता रहे हैं विशाल और गुलज़ार.



ताजा सुर ताल (16)

ताजा सुर ताल में आज पेश है फिल्म "कमीने" का एक थीम आधारित गीत.

सजीव - मैं सजीव स्वागत करता हूँ ताजा सुर ताल के इस नए अंक में अपने साथी सुजॉय के साथ आप सब का...

सुजॉय - सजीव क्या आप जानते हैं कि संगीतकार विशाल भारद्वाज के पिता राम भारद्वाज किसी समय गीतकार हुआ करते थे। जुर्म और सज़ा, ज़िंदगी और तूफ़ान, जैसी फ़िल्मों में उन्होने गानें लिखे थे..

सजीव - अच्छा...आश्चर्य हुआ सुनकर....

सुजॉय - हाँ और सुनिए... विशाल का ज़िंदगी में सब से बड़ा सपना था एक क्रिकेटर बनने का। उन्होप्ने 'अंडर-१९' में अपने राज्य को रीप्रेज़ेंट भी किया था। हालाँकि उनके पिता चाहते थे कि विशाल एक संगीतकार बने, उन्होने अपने बेटे को क्रिकेट खेलने से नहीं रोका।

सजीव - ठीक है सुजॉय मैं समझ गया कि आज आप विशाल की ताजा फिल्म "कमीने" से कोई गीत श्रोताओं को सुनायेंगें, तभी आप उनके बारे में गूगली सवाल कर रहे हैं मुझसे....चलिए इसी बहाने हमारे श्रोता भी अपने इस प्रिय संगीतकार को करीब से जान पायेंगें...आप और बताएं ...

सुजॉय - जी सजीव, जाने माने गायक और सुर साधक सुरेश वाडकर ने विशाल भारद्वाज को फ़िल्मकार गुलज़ार से मिलवाया। गुलज़ार साहब उन दिनों अपनी नई फ़िल्म 'माचिस' पर काम कर रहे थे। सोना सोने को पहचान ही लेता है, और गुलज़ार साहब ने भी विशाल के प्रतिभा को पहचान लिया और उन्हे 'माचिस' के संगीत का भार दे दिया। "छोड़ आए हम वो गलियाँ", "चप्पा चप्पा चरखा चले" तथा "पानी पानी रे" जैसे इस फ़िल्म के गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की, और विशाल भारद्वाज रातों रात सुर्खियों में आ गए।

सजीव - कहते हैं ना कि जब तक कोई सफल नहीं हो जाता, उसे कोई नहीं पूछता। 'फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड' मिलने से पहले तक हर कोई विशाल भारद्वाज से मुँह फेरते रहे और जैसे उन्हे अवार्ड मिला, वही लोग शुभकामनायों के साथ गुल्दस्ते भेजने लगे। ख़ैर, ये तो दुनिया का नियम है, और इसलिए विशाल ने भी इसे अपने दिल पे नहीं लिया बिल्कुल अपने ही बनाए उस गीत की तरह "दिल पे मत ले यार"। पर यही चुभन जोश बन कर विशाल भारद्वाज में पनपने लगी, और कुछ कर दिखाने की चाहत सदा उनके मन में रहने लगी। 'माचिस' के अद्‍भुत संगीत से प्रभावित हो कर कमल हासन ने उन्हे 'चाची ४२०' के संगीत का दायित्व दे दिया। उपरवाला जब देता है तब छप्पड़ फाड़ के देता है। राम गोपाल वर्मा ने विशाल को दिया 'सत्या' का संगीत और गुलज़ार ने एक बार फिर अपनी फ़िल्म 'हु तु तु' के संगीत की ज़िम्मीदारी उन्हे सौंपी। और इस तरह से विशाल भारद्वाज का संगीत जलधारा की तरह बहने लगी "छई छपा छई छप्पाक छई" करती हुई।

सुजॉय - हाँ और विशाल भारद्वाज की ताजातरीन प्रस्तुति है फिल्म 'कमीने' का संगीत, जो इन दिनों ख़ूब पसंद किए जा रहा हैं। आज 'ताज़ा सुरताल' में इसी फ़िल्म का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण गीत आप को सुनवा रहे हैं। विशाल की यह फ़िल्म है, ज़ाहिर है संगीत भी उन्ही का है और गानें लिखे हैं उनके चहेते गीतकार गुलज़ार साहब ने। कमाल की बात देखिए, कभी गुलज़ार ने अपनी बनायी फ़िल्म 'माचिस' में विशाल को ब्रेक दिया था, आज वही विशाल जब एक सुप्रतिष्ठित फ़िल्मकार व संगीतकार बन गए हैं, तो उनकी निर्मित फ़िल्म में वही गुलज़ार साहब गानें लिख रहे हैं। तो हाँ, 'कमीने' के जिस गीत की हम आज बात कर रहे हैं उसे इन दिनों आप हर चैनल पर देख और सुन रहे होंगे, "फ़टाक"। सुखविंदर सिंह, कैलाश खेर और साथियों के गाए इस गीत में आज की एक ज्वलंत समस्या और उसके हल की तरह हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है। HIV virus को काले भंवरे का रूप दे कर इससे होने वाली जान लेवा बिमारी AIDS की रोक थाम के लिए ज़रूरी प्रयासों की बात की गई है इस गीत में। भले ही गीत के फ़िल्मांकन में रेड लाइट अरिया को दर्शाया गया है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी जिस खुले विचारों से यौन संबंधों में बंध रही है, यह गीत सिर्फ़ वेश्यालयो के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए समान मायने रखता है।

सजीव - अगर मैं अपने विचार रखूं, तो इस एल्बम का सबसे उत्कृष्ट गीत है, जहाँ शब्द गायिकी और संगीत सभी कुछ परफेक्ट है. सबसे अच्छी बात है ये है कि ये एक सामान्य प्रेम गीत आदि न होकर आज के सबसे ज्वलंत मुद्दे को केंद्र में रख कर बनाया गया है. मेरे ख्याल से इस गीत एक बहुत बढ़िया माध्यम बनाया जा सकता है AIDS के प्रति लोगों को जगुरुक बनाने में. गुलज़ार साहब के क्या कहने, ग़ालिब के मशहूर शेर "ये इश्क नहीं आसाँ..." का इस्तेमाल गुलज़ार साहब ने शानदार तरीके से किया है कि बस मुँह से वाह वाह ही निकलती है -

"ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी AIDS का खतरा है,
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है...
."

गीत के बोल यदि इस गीत की जान है तो गायक सुखविंदर और कैलाश ने इतना बढ़िया गाया है जिससे गीत को एक अलग ही स्तर मिल गया है, ये दोनों ही आज के सबसे हरफनमौला गायकों में हैं जो सिर्फ गले से नहीं दिल से गाते हैं.(सुखविंदर जब कहते हैं "कि आया रात का जाया रे ..." सुनियेगा) और विशाल के संगीत की भी जितनी तारीफ की जाए कम है..."फाटक" शब्द को जिस खूबी से इस्तेमाल किया है वो गीत में आम आदमी की रूचि को बरकरार रखता है साथ ही ये एक प्रतीक भी है इस बिमारी से शरीर और मन पर होने वाली मार का (जैसे ध्वनि हों कोडों की). गीत का फिल्माकन भी भी बेहद शानदार है, एक बार फिर विशाल और उनके नृत्य संयोजक बधाई के पात्र हैं. आपका क्या ख्याल है सुजॉय...

सुजॉय - दोस्तों, आप ने फ़िल्म 'मनचली' का वो गीत तो सुना होगा ना, लता जी की आवाज़ में, "कली कली चूमे, गली गली घूमें, भँवरा बे-इमान, कभी इस बाग़ में, कभी उस बाग़ में"। बे-इमान भँवरे की इसी स्वभाव को बड़ी ही चतुराई से गुलज़ार साहब ने यह संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया है कि भँवरे की तरह फूल फूल पे मत न मंडराओ, यानी कि एकाधिक यौन संबंध मत रखो, और अगर रखो तो सुरक्षा को ध्यान में रख कर। दोस्तों, अब आगे इससे ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, आप गीत सुनिए। दहेज, शोषण, बाल मज़दूरी, आदि तमाम सामाजिक मुद्दों पर कई गानें बने हैं, लेकिन आज की इस ज्वलंत समस्या पर पहली बार किसी फ़िल्मकार ने बीड़ा उठाया है, जिसकी तारीफ़ किए बिना हम नहीं रह सकते। विशाल भारद्वाज और गुलज़ार साहब को थ्री चीयर्स!!! गीत के बोल कुछ यूं है -

भवंरा भवंरा आया रे,
गुनगुन करता आया रे,
फटाक फटाक.....
सुन सुन करता गलियों से अब तक कोई न भाया रे
सौदा करे सहेली का,
सर पे तेल चमेली का,
कान में इतर का भाया रे....
फटाक फटाक...

गिनती न करना इसकी यारों में,
आवारा घूमे गलियारों में
चिपकू हमेशा सताएगा,
ये जायेगा फिर लौटा आएगा,
फूल के सारे कतरे हैं,
जान के सारे खतरे हैं...
कि आया रता का जाया रे...
फटाक फटाक.....

जितना भी झूठ बोले थोडा है,
कीडों की बस्ती का मकौड़ा है,
ये रातों का बिच्छू है कटेगा,
ये जहरीला है जहर चाटेगा...
दरवाजों पे कुंडे दो,
दफा करो ये गुंडे,
ये शैतान का साया रे....
फटाक फटाक...

ये इश्क नहीं आसाँ,
अजी AIDS का खतरा है,
पतवार पहन जाना,
ये आग का दरिया है...
ये नैया डूबे न
ये भंवरा काटे न.....

और अब सुनिए ये गीत -




आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 4.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.सुखविंदर और कैलाश खेर ने इस गीत से पहले रहमान के संगीत निर्देशन के एक मशहूर दोगाना गाया है, जानते हैं कौन सा है वो गीत ? बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया नीलम जी ने बधाई...शमिख जी, शैलेश जी, नीलम जी और मंजू जी सभी ने रेटिंग देकर हौंसला बढाया आभार.


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, August 23, 2009

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों....साहिर ने लिखा यह यादगार गीत.



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 180

रद तैलंग जी के फ़रमाइशी गीतों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं उनकी पसंद के पाँचवे और अंतिम गीत पर, और साथ ही हम छू रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के १८०-वे अंक को। आज का गीत है निर्माता-निर्देशक बी. आर चोपड़ा की फ़िल्म 'गुमराह' का "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनो", जिसे महेन्द्र कपूर ने गाया है। इससे पहले भी हम ने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इसी फ़िल्म का एक और गीत आप को सुनवाया था महेन्द्र कपूर साहब का ही गाया हुआ, "आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया"। इस फ़िल्म के बारे में तमाम जानकारी आप उस आलेख में पढ़ सकते हैं। आज चलिए बात करते हैं महेन्द्र कपूर की। अभी पिछले ही साल २७ सितंबर के दिन महेन्द्र कपूर का देहावसान हो गया। वो एक ऐसे गायक रहे हैं जिनकी गायकी के कई अलग अलग आयाम हैं। एक तरफ़ अगर ख़ून को देश भक्ति के जुनून से गर्म कर देनेवाले देशभक्ति के गीत हैं, तो दूसरी तरफ़ शायराना अंदाज़ लिए नरम-ओ-नाज़ुक प्रेम गीत, एक तरफ़ जीवन दर्शन और आशावादी विचारों से ओत-प्रोत नग़में हैं तो दूसरी तरफ़ ग़मगीन टूटे दिल की सदा भी उनकी आवाज़ में ढलकर कुछ इस क़दर बाहर आयी है कि सीधे दिल पे असर कर गई। "तुम्हे भी कोई उलझन रोकती है पेश कदमी से, मुझे भी लोग कहते हैं के ये जलवे पराये हैं, मेरे हमराह भी रुसवाइयाँ हैं मेरे माज़ी की, तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं"। साहिर लुधियानवी के बोल और रवि का संगीत था इस फ़िल्म में।

महेन्द्र कपूर के साथ संगीतकार रवि का एक बहुत लम्बा साथ रहा। वजह शायद यही कि ये दोनों चोपड़ा कैम्प के नियमित सदस्य थे। ऐसा भी कह सकते है कि रवि के संगीत निर्देशन में महेन्द्र कपूर ने बहुत से लोकप्रिय गीत गाए हैं। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में महेन्द्र कपूर ने रवि साहब के बारे में कहा था - "रवि जी एक बहुत बड़े संगीतकार हैं, जो 'पोएट्री' समझते हैं, और धुन बनाते वक़्त 'पोएट्री' को 'डिस्टर्ब' नहीं करते। वो हर गाने पर बहुत मेहनत करते हैं। हर गीत के २ से ४ अलग अलग धुनें बनाते हैं और फिर पार्श्व गायक और दूसरे लोगों से सब से अच्छी वाली धुन चुनने के लिए कहते हैं। और तब जाके 'फ़ाइनल ट्युन' निर्धारित होती है।" ९ जनवरी १९३४ को अमृतसर मे जन्मे महेन्द्र कपूर अपने ४० दिन की आयु में ही बम्बई आ गए। ५ वर्ष की आयु में उन्होने गाना शुरु किया। १२ वर्ष की आयु में वे पहुँच गए अपने आदर्श मोहम्मद रफ़ी साहब के पास। रफ़ी साहब ने उन्हे समझाया कि अगर एक अच्छा गायक बनना है तो पहले शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। और हर गायक का अपना एक मौलिक 'स्टाइल' होना चाहिए। १९५७ में जब वे कालेज में पढ़ रहे थे तब 'All India Metro Murphy competition' में उन्होने हिस्सा लिया जिसका विषय था हिंदी फ़िल्मों में पार्श्व गायन का मोहरा। हालाँकि महेन्द्र कपूर ने १९५३ में वी. बल्सारा की फ़िल्म 'मदमस्त' में गा चुके थे, पर इस प्रतियोगिता ने उनके लिए पार्श्व गायन का द्वार खोल दिया। इस प्रतियोगिता में जज थे नौशाद और सी. रामचन्द्र। इस प्रतियोगिता को जीतने के बाद नौशाद और सी. रामचन्द्र, दोनों ने महेन्द्र कपूर से गाने गवाए (नौशाद -सोहनी महिवाल, सी. रामचन्द्र - नवरंग)। फिर उसके बाद महेन्द्र कपूर को कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। तो दोस्तों, ये तो थी महेन्द्र कपूर की कुछ बातें, आइए अब 'गुमराह' फ़िल्म के उस गीत को सुना जाए जिसकी फ़रमाइश हमें लिख कर भेजी है शरद तैलंग साहब ने।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मुकेश के गाये गीतों में से ऐसे गीत जो उन्हें खुद हैं सबसे प्रिय, कल है इस शृंखला का पहला गीत.
२. शैलेन्द्र हैं गीतकार.
३. मुखड़े की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"खुदा".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी फिलहाल के लिए रेस में आप आगे निकल आये १६ अंकों के लिए बधाई....शमिख जी पूरे गीत के लिए धन्येवाद. और मंजूषा जी, आपकी महफिल भी खूब जमी हुई है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और एक फीचर्ड एल्बम पर बात दीपाली "दिशा" के साथ



सफलता और शोहरत किसी उम्र की मोहताज नहीं होती. अगर हमारी मेहनत और प्रयास सच्चे व सही दिशा में हों तो व्यक्ति किसी भी उम्र में सफलता और शोहरत की बुलंदियों को छू सकता है. सोनू निगम एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने सफलता के कई पायदान पार किये हैं. उन्होंने अपने बहुमुखी व्यक्तित्व को प्रर्दशित किया है. गायन के साथ-साथ सोनू निगम ने अभिनय व माडलिंग भी की है. यद्यपि अभिनय में उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली, किन्तु गायन के क्षेत्र में वह शिखर पर विराजित हैं. उन्होंने गायकी छोड़ी नहीं है. वो आज भी संगीतकारों की पहली पसंद हैं. उनकी आवाज में कशिश व गहराई है. वह कई बार गाने के मूड के हिसाब से अपनी आवाज में बदलाव भी लाते हैं जो उनके हरफनमौला गायक होने का परिचय देता है. अपनी पहली एल्बम 'तू' के जरिये वो युवा दिलों के सरताज बन गए थे. उसके बाद उनकी एल्बम 'दीवाना' और 'यादें' आयीं, जिनके गीतों और गायकी की छाप आज भी हमारे जहन में है. अगर सोनू निगम द्वारा गाये गीतों की सूची बनाएं तो पायेंगे कि उन्होंने अपने बेहतरीन अंदाज से सभी गीतों में जान डाल दी है. ऐसा लगता है कि वो गीत सोनू की आवाज के लिए ही बने थे. एक-एक गीत उनकी गायन प्रतिभा को दर्शाता है, और सफलतम गीतों की श्रेणी में अंकित हैं. सोनू की आवाज में 'दर्द, रोमांस, जोश' आदि सभी तत्व मिलते हैं. उनकी आवाज में शास्त्रीय शैली की झलक भी मिलती है. उनकी शास्त्रीय गायन की प्रतिभा को प्रदर्शित करती एक नयी एल्बम आ रही है जिसका नाम है "क्लासिकली माइल्ड" . क्लासिकली माइल्ड रागों पर आधारित एल्बम है. हालांकि सोनू जी का कहना है कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत में कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली है. अगर हम इस बात को ध्यान में रखें तो यह बहुत ही बढ़िया और मधुर एल्बम है जो सोनू की प्रतिभा को बखूबी दर्शाती है. इस एल्बम में आठ गीत है और सभी के बोल बहुत अच्छे हैं. अजय जिन्गारान हैं एल्बम के गीतकार और संगीत तैयार किया है दीपक पंडित ने.

सोचता हूँ मैं
यह एल्बम का पहला गीत है और राग सिंध भैरवी पर आधारित है. इस गाने में फिलोसिफी नजर आती है. बहुत ही सरल शब्दों में गायक ने जीवन से जुड़े प्रश्नों को कहा है 'तन पर उम्र का घेरा क्यों है? सदियों से यह राज छुपा है.' जो सभी को सोचने के लिए विवश करते हैं. ड्रम्स, गिटार तथा पियानो का प्रयोग शास्त्रीय संगीत को आधुनिक ढंग से प्रस्तुत करते है.


भीगे भीगे
यह गाना बहुत ही परम्परागत लगता है. इसमें सोनू निगम ने कई स्थान पर आलाप लिए है जो बहुत ही अच्छे सुनाई देते है. यह एक सुन्दर रोमांटिक गाना है जो राग अहीर भैरव, पुरिया धनश्री और ललित पर आधारित है. पूरे गीत में गिटार और पियानो का प्रयोग है बीच में हारमोनियम का प्रयोग इसे और आकर्षक बना देता है.


सूना सूना
एक बहुत ही भावपूर्ण गीत जो देश से दूर गए व्यक्ति को लौट आने का सन्देश देता है. कहता है की देश की हवाएं, मिटटी सब तुझे बुला रही है तेरे बिना सब कुछ सूना है. पहली बार सुनने में शायद यह गीत किसी को न भाये लेकिन दो या तीन बार में जब भाव समझ आने लगता है तो गीत दिल के करीब लगता है. यह गीत राग देश, जैजैवंती और मिश्र पटदीप के मिश्रित रूप पर आधारित है. इस गीत में ड्रम के साथ मृदंग का प्रयोग भी किया गया है. अपने आप में जिंदगी से भरा हुआ गीत लगता है.


सुरतिया मतवाली
यह गीत राग काफी पर आधारित है. इस गीत में गायकी, संगीत, बोल आदि सभी कुछ बहुत बढ़िया है. यह गाना एक भाव उत्पन्न करता है. सभी वाद्य यंत्रों का बहुत सुन्दरता से प्रयोग किया गया है. पियानो और बांसुरी की जुगलबंदी मधुर सुनाई देती है.


छलकी छलकी
यह एक बहुत ही रोमांटिक गीत है साथ ही एक सुन्दर कल्पना को जन्म देता हुआ प्रतीत होता है. बेमिसाल गायकी का प्रदर्शन है. सोनू निगम ने एक ही लाइन को अलग जगह पर अलग तरह से गाया है जो उनके प्रतिभाशाली होने का सबूत है. गीत के बोल 'छलकी छलकी चांदनी में, गाती है दीवानगी. बीते जो बाँहों में तेरे, वोह पल है जिंदगी' मन के तारों को छेड़ जाते हैं उस पर सोनू की गायकी का अंदाज गीत की कल्पना और रोमांस को और बड़ा देता है. यह गीत राग मिश्र सारंग, मिश्र खमाज और बिहाग पर आधारित है. गीत के बोल परंपरागत होते हुए भी आधुनिक संगीत और संसार से जुड़े दिखते हैं.


धन्य धन्य
यह एक बहुत ही मधुर और भावपूर्ण गीत है. इस गीत द्वारा नारी के विभिन्न रूपों को को तथा उसके त्याग को प्रस्तुत किया गया है. बोल और संगीत दोनों ही बेजोड़ हैं. इस गीत को सुन शायद सभी नारियां भावुक हो जाएँ. यह गीत राग मांड पर आधारित है. गाने की शुरुवात और अंत में शहनाई का प्रयोग बेमिसाल है.


लम्हा लम्हा
इस गीत को भी हम मधुर और मन को छूने वाले गीतों में शामिल कर सकते हैं. गीत सन्देश पूर्ण है जो जीने की राह दिखाता है. इसके बोल 'आओ यह पल महकाएं और जीवन को जीना सिखलाएँ' उपदेशात्मक से लगते हैं. यह गीत राग बिलावल पर पर आधारित है और इसमें हिन्दुस्तानी तथा कर्नाटक शैली की मिश्रित झलक दिखती है.


ऐ दिल मत रो
इस गीत के बोल से ही पता लगता है की यह एक दुख भरा गीत है. सोनू की आवाज में दर्द साफ झलकता है. यह गीत राग लोग कौंस पर आधारित है और ग़ज़ल का एहसास भी देता है. सोनू की गायकी बढ़िया है.


सोनू निगम की यह खासियत है की वो अपनी आवाज के साथ प्रयोग करते है और सफल भी होते है. हो सकता है 'क्लासिकली माइल्ड' एल्बम उन लोगों को कम समझ आये जिन्हें शास्त्रीय संगीत का ज्ञान नहीं या जिन्होनें सोनू को सिर्फ रोमांटिक और लाइट गीत गाते सुना है. वैसे यह एल्बम पूरी तरह शास्त्रीय संगीत पर आधारित नहीं है. इसमें हम शास्त्रीय और आधुनिक दोनों संगीतों का सुन्दर समायोजन पायेंगे. यह एल्बम पहली बार सुनने में आपको न छू पाए लेकिन दो बार, तीन बार सुनने पर इसका असर शुरू होता है जो गहरा है.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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