Sunday, July 3, 2011

परदेस में जब घर-परिवार और सजनी की याद आई तब उपजा लोक संगीत "बिरहा"



सुर संगम - 27 - लोक गीत शैली -बिरहा

बिरहा गायन के मंचीय रूप में वाद्यों की संगति होती है| प्रमुख रूप से ढोलक, हारमोनियम और करताल की संगति होती है|

शास्त्रीय और लोक संगीत के साप्ताहिक स्तम्भ "सुर संगम" के इस नए अंक में आप सभी संगीत-प्रेमियों का, मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ| दोस्तों; भारतीय लोक संगीत में अनेक ऐसी शैलियाँ प्रचलित हैं जिनमें नायक से बिछड़ जाने या नायक से लम्बे समय तक दूर होने की स्थिति में विरह-व्यथा से व्याकुल नायिका लोकगीतों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करती है| देश के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में नायिका की विरह-व्यथा का प्रकटीकरण करते गीत बहुतेरे हैं, परन्तु विरह-पीड़ित नायक की अभिव्यक्ति देने वाले लोकगीत बहुत कम मिलते हैं| उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में लोक-संगीत की एक ऐसी विधा अत्यन्त लोकप्रिय है, जिसे "बिरहा" नाम से पहचाना जाता है|


चित्र परिचय
बिरहा गुरुओं का यह 1920 का दुर्लभ चित्र है; जिसके मध्य में बैठे हैं, बिरहा को एक प्रदर्शनकारी कला के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले गुरु बिहारी यादव, बाईं ओर है- रम्मन यादव तथा दाहिनी ओर हैं- गुरु पत्तू सरदार (यादव)|


इस लोक-संगीत की उत्पत्ति के सूत्र उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिलते हैं| ब्रिटिश शासनकाल में ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन कर महानगरों में मजदूरी करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी थी| ऐसे श्रमिकों को रोजी-रोटी के लिए लम्बी अवधि तक अपने घर-परिवार से दूर रहना पड़ता था| दिन भर के कठोर श्रम के बाद रात्रि में छोटे-छोटे समूह में यह लोग इसी लोक-विधा के गीतों का ऊँचे स्वरों में गायन किया करते थे| लगभग 55 वर्ष पहले वाराणसी के ठठेरी बाज़ार,चौखम्भा आदि व्यावसायिक क्षेत्रों में श्रमिकों को 'बिरहा' गाते हुए मैंने प्रत्यक्ष देखा-सुना है| प्रारम्भ में 'बिरहा' श्रम-मुक्त करने वाले लोकगीत के रूप में ही प्रचलित था| बिरहा गायन के आज दो प्रकार हमें मिलते हैं| पहले प्रकार को "खड़ी बिरहा" कहा जाता है| गायकी के इस प्रकार में वाद्यों की संगति नहीं होती, परन्तु गायक की लय एकदम पक्की होती है| पहले मुख्य गायक तार सप्तक के स्वरों में गीत का मुखड़ा आरम्भ करता है और फिर गायक दल उसमें सम्मिलित हो जाता है| बिरहा गायन का दूसरा रूप मंचीय है, परन्तु उसकी चर्चा से पहले आइए सुनते हैं "खड़ी विरहा" का एक उदाहरण-

खड़ी बिरहा : गायक - मन्नालाल यादव और साथी


कालान्तर में लोक-रंजन-गीत के रूप में इसका विकास हुआ| पर्वों-त्योहारों अथवा मांगलिक अवसरों पर 'बिरहा' गायन की परम्परा रही है| किसी विशेष पर्व पर मन्दिर के परिसरों में 'बिरहा दंगल' का प्रचलन भी है| बिरहा के दंगली स्वरुप में गायकों की दो टोलियाँ होती है और बारी-बारी से बिरहा गीतों का गायन करते हैं| ऐसी प्रस्तुतियों में गायक दल परस्पर सवाल-जवाब और एक दूसरे पर कटाक्ष भी करते हैं| इस प्रकार के गायन में आशुसर्जित लोक-गीतकार को प्रमुख स्थान मिलता है| 'बिरहा' के अखाड़े (गुरु घराना) भी होते है| विभिन्न अखाड़ों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का भाव रहता है| लगभग पाँच दशक पहले एक ऐसे ही अखाड़े के गुरु -पत्तू सरदार को मैं निकट से जानता था| वह बिरहा-गीतों के अनूठे रचनाकार और गायक थे| उनके अखाड़े के सैकड़ों शिष्य थे, जिन्हें समाज में लोक गायक के रूप में भरपूर सम्मान प्राप्त था| गुरु पत्तू सरदार निरक्षर थे| प्रायः वह शाम को अपने घर के छज्जे पर बैठ कर मेरे विद्यालय से लौटने की प्रतीक्षा किया करते थे, मैं उनके गीतों को लिपिबद्ध जो करता था| गुरु पत्तू वेदव्यास की तरह बोलते जाते थे और मैं गणेश की तरह लिखता जाता था| उनके रचे गए अनेक बिरहा-गीत आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित हैं| विरहा-गीतों के प्रसंग अधिकतर रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं| कभी-कभी लोकगीतकार सामयिक विषयों पर भी गीत रचते हैं| गुरु पत्तू सरदार ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय-गाथा को इन पंक्तियों में व्यक्त किया था -"चमके लालबहादुर रामनगरिया वाला, अयूब के मुह को काला कर दिया..."| इसी प्रकार टोकियो ओलम्पिक से स्वर्ण पदक जीत कर लौटे भारतीय हाकी दल के स्वागत के लिए भी उन्होंने विरहा गीत की रचना की थी| विगत चार-पाँच दशकों में अनेक बिरहा गायकों ने लोक संगीत की इस विधा को लोकप्रिय करने में अपना योगदान किया| इनमें से दो गायकों- वाराणसी के हीरालाल यादव और इलाहाबाद के राम कैलाश यादव के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं| आइए यहाँ रुक कर राम कैलाश यादव और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत विरहा का आनन्द लेते हैं| इस विरहा गीत में शिव विवाह का अत्यन्त रोचक प्रसंग है|

बिरहा - शिव विवाह भाग - 1 : गायक - राम कैलाश यादव और साथी


बिरहा - शिव विवाह भाग - 2 : गायक - राम कैलाश यादव और साथी


बिरहा गायन के मंचीय रूप में वाद्यों की संगति होती है| प्रमुख रूप से ढोलक, हारमोनियम और करताल की संगति होती है| करताल गुल्ली के आकार में लगभग 8 -9 इंच लम्बे स्टील के दो टुकड़े होते हैं, जिसे गायक अपनी दोनों हथेलियों के बीच रख कर आपस में टकराते हुए बजाते हैं| बिरहा लोकगीत का फिल्मों में प्रायः नहीं के बराबर उपयोग हुआ है| आश्चर्यजनक रूप से 1955 की फिल्म "मुनीमजी" में "बिरहा" का अत्यन्त मौलिक रूप में प्रयोग किया गया है| देवानन्द और नलिनी जयवन्त अभिनीत इस फिल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन हैं तथा हेमन्त कुमार और साथियों के स्वरों में इस बिरहा का गायन किया गया है| इस बिरहा में भी शिव विवाह का ही प्रसंग है| गीत की अन्तिम पंक्तियों में दो नाम लिये गए है - पहले "बरसाती" और फिर "दुखहरण" | पहला नाम अखाड़े के गुरु का और दूसरा नाम गायक का है| यह गीत बरसाती यादव अखाड़े का है और इसे किसी दुखहरण नामक गायक ने गाया था| आइए सुनते हैं लोकगीत "बिरहा" का यह फ़िल्मी रूप -

बिरहा गीत -"शिवजी बियाहने चले पालकी सजाय के..." : फिल्म - मुनीमजी : गायक - हेमन्त कुमार और साथी


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: शास्त्रीय गायन की यह शैली पंजाब में उपजी तथा यही शैली बंगाल में जाकर 'पुरातनी' के नाम से प्रसिद्ध हुई|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी यह क्या? आपने तो हथियार ही डाल दिये!!! खैर, क्षिती जी ने पुनः सटीक उत्तर दे कर ५ और अंक अर्जित कर लिये है, बधाई!

इसी के साथ 'सुर-संगम' के आज के इस अंक को यहीं पर विराम देते हैं| आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे हमारे प्रिय सुजॉय चटर्जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

आलेख -कृष्ण मोहन मिश्र
प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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8 श्रोताओं का कहना है :

Kshiti का कहना है कि -

Bengali sugam sangeet jis par TAPPA aur THUMRI ka asar hai.

सजीव सारथी का कहना है कि -

बहुत बढ़िया कृष्ण मोहन जी, शिवजी बियाहने चले अरसों बाद सुना :)

abhishek mishra का कहना है कि -

its a nice step to acknowledge the rich past of INDIAN FOLK to our youth...
i read it first time and coincidentaly my city is a part of it...

vivek का कहना है कि -

bahut achche... main iski srahna karta hu... agle ank ki pratikha me...

soumya agrawal का कहना है कि -

Really appreciating way of promoting our culture , tradition and religion...

संजीव का कहना है कि -

अभी कुछ दिनों पूर्व चर्चित गीत 'महगाई डायन..'भी कुछ बिरहानुमा था.
शानदार प्रस्तुति हेत

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन का कहना है कि -

लाजवाब पोस्ट! आवाज़ के पन्नों पर संस्कृति सुरक्षित रखने का प्रयास बहुत अच्छा लगा। कृष्णमोहन मिश्र जी का हार्दिक धन्यवाद!

AVADH का कहना है कि -

अत्युत्तम प्रस्तुति. जैसा कि अन्य मित्रों भी कहा है कि लोक संगीत को पुनः लोकप्रिय करने में यह प्रयास बेहद महत्वपूर्ण है.
बिहार और उत्तर प्रदेश पूर्वांचल में तो बिरहा संगीत समारोह और दंगल प्रायः होते हैं. अभी कुछ दिन पूर्व तक लखनऊ में भी अक्सर बिरहा का आयोजन होता था. यहाँ तक कि मैंने बम्बई(मुंबई) में भी हाल ही में दो या और गायकदलों के बीच जवाबी या बिरहा दंगल होते देखा है.
अवध लाल

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