Saturday, February 26, 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - पियानो स्पर्श से महके फ़िल्मी गीतों सुनने के बाद आज मिलिए उभरते हुए पियानो वादक मास्टर बिक्रम मित्र से



नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शनिवार की विशेष प्रस्तुति के साथ हम फिर हाज़िर हैं। पिछले दिनों आपने इस स्तंभ में पियानो पर केन्द्रित लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' का आनंद लिया, जिसमें हमनें आपको न केवल पियानों साज़ के प्रयोग वाले १० लाजवाब गीत सुनवाये, बल्कि इस साज़ से जुड़ी बहुत सारी बातें भी बताई। और साथ ही कुछ पियानो वादकों का भी ज़िक्र किया। युवा पियानो वादकों की अगर हम बात करें तो कोलकाता निवासी, १७ वर्षीय मास्टर बिक्रम मित्र का नाम इस साज़ में रुचि रखने वाले बहुत से लोगों ने सुना होगा। स्वयं पंडित हरिप्रसाद चौरसिआ और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन जैसे महारथियों से प्रोत्साहन पाने वाले बिक्रम मित्र नें अपना संगीत सफ़र ७ वर्ष की आयु में शुरु किया, और एक सीन्थेसाइज़र के ज़रिए सीखना शुरु किया प्रसिद्ध वेस्टर्ण क्लासिकल टीचर श्री दीपांकर मिश्र से। उन्हीं की निगरानी में बिक्रम ने प्राचीन कला केन्द्र चण्डीगढ़ से संगीत में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की। अब बिक्रम 'इंद्रधनु स्कूल ऒफ़ म्युज़िक' के छात्र हैं जहाँ पर उनके गुरु हैं प्रसिद्ध हारमोनियम एक्स्पर्ट पंडित ज्योति गोहो। अपने शुरुआती दिनों में बिक्रम मित्र 'अंजली ऒर्केस्ट्रा' नामक ग्रूप से जुड़े रहे जहाँ पर उन्होंने दो वर्ष तक वोकलिस्ट की भूमिका अदा की। उसके बाद उनका रुझान गायन से हट कर साज़ों की तरफ़ होने लगा। उन्हें दुर्गा पूजा के उपलक्ष्य पर 'शारदीय सम्मान' से सम्मानित किया जा चुका है। सीन्थेसाइज़र पर उन्होंने जिन बैण्ड्स के साथ काम किया, उनमें शामिल हैं 'Hellstones', 'Touchwood', 'Crossghats' आदि। यह हमारा सौभाग्य है कि हमें बिक्रम मित्र के संस्पर्श में आने का अवसर प्राप्त हुआ और उनका यह बड़प्पन है कि इस इंटरव्यु के लिए तुरंत राज़ी हो गए। तो आइए आपको मिलवाते हैं इस युवा प्रतिभाशाली पियानिस्ट से।

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सुजॊय - बिक्रम, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'हिंद-युग्म' के इस मंच पर। यह वाक़ई संयोग की ही बात है कि इन दिनों हम इस मंच पर पियानो पर केन्द्रित एक शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें हम १० ऐसे फ़िल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जिनमें पियानो मुख्य साज़ के तौर पर प्रयोग हुआ है। ऐसे में आप से मुलाक़ात हो जाना वाक़ई हैरान कर देने वाली बात है।

बिक्रम - बहुत बहुत शुक्रिया आपका!

सुजॊय - बिक्रम, सब से पहले तो यह बताइए कि इतनी कम उम्र में पियानो जैसी साज़ में आपकी दिलचस्पी कैसे हुई?

बिक्रम - मुझे पियानो में दिलचस्पी सात वर्ष की आयु में होने लगी थी। एक दिन मेरे एक चाचा ने एक की-बोर्ड हमारे घर में ला कर रख दिया, एक 'यामाहा की-बोर्ड', और मैं उसे बजाने लग पड़ा था बिना कुछ सोचे समझे ही। बस कुछ छोटे छोटे पीसेस, लेकिन कहीं न कहीं मुझे मेलडी की समझ होने लगी थी। और वो पीसेस सुंदर सुनाई दे रहे थे, हालाँकि उनमें बहुत कुछ वाली बात नहीं थी। लेकिन यकायक मैंने ख़ुद को कहा कि मैं एक म्युज़िशियन ही बनना चाहता हूँ। और तब मैंने पियानो को अपना साज़ मान लिया, जो मेरे लिए बहुत बड़ी चीज़ बन गई, एक ऐसी चीज़ जो मुझे ख़ुशी देने लगी और जिसकी मैं पूजा करने लगा।

सुजॊय - वाह! बहुत ख़ूब बिक्रम! अच्छा यह बताइए कि आपने पहली बार घर से बाहर पियानो कब और कहाँ पर बजाया था?

बिक्रम - मेरा पहला इन्स्ट्रुमेण्टल प्रोग्राम मेरे स्कूल में ही था, जिसमें मैंने एक रबीन्द्र संगीत बजाया था।

सुजॊय - आपके अनुसार भारत में एक पियानिस्ट का भविष्य कैसा है? क्या एक भारतीय पियानिस्ट वही सम्मान और शोहरत हासिल कर सकता है जो एक पाश्चात्य पियानिस्ट को आमतौर पर मिलता है?

बिक्रम - इसमें कोई संदेह नहीं कि पियानो एक विदेशी साज़ है। और ख़ुद एक पियानिस्ट होने के कारण मैं यही कह सकता हूँ कि जब आप किसी पाश्चात्य साज़ पर भारतीय संगीत प्रस्तुत करते हैं तो आपका परिचय, आपकी आइडेण्टिटी बहुत ज़रूरी हो जाती है, क्योंकि आप दुनिया के सामने भारतीय शास्त्रीय संगीत पेश कर रहे होते हैं। पियानो एक बहुत ही सुरीला और महत्वपूर्ण साज़ है और मैं समझता हूँ कि भारतीय संगीत का पियानो की तरफ़ काफ़ी हद तक झुकाव है। यह आपकी सोच और सृजनात्मक्ता पर निर्भर करती है कि आप इस बात को किस तरह से समझें। और यह पूरी तरह से कलाकार पर डिपेण्ड करता है कि पियानो को किस तरह से वो अपना प्रोफ़ेशन बनाए और अपने आप को साबित कर दिखायें। लेकिन जो भी है भारत में पियानिस्ट का भविष्य उज्वल है और इसकी वजह है भारतीय शास्त्रीय संगीत।

सुजॊय - क्या बात है! बहुत ही अच्छा लगा आपके ऐसे विचार जान कर कि आप एक विदेशी साज़ के महारथी होते हुए भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को सब से उपर रखते हैं। अच्छा, आपके क्या क्या प्लैन्स हैं भविष्य के लिए?

बिक्रम - मेरे प्लैन्स? मैं चाहता हूँ कि मैं देशवासियों को यह समझाऊँ कि अपनी धरती का संगीत कितना महान है, और यह बात मैं मेरी पियानो के माध्यम से समझाना चाहता हूँ। एक युवा होते हुए जब मैं अपनी चारों तरफ़ युवाओं को देखता हूँ रॊक, पॊप और रैप जैसी शैलियों में डूबे रहते हुए, या पूरी तरह से पाश्चात्य अंदाज़ में रंगते हुए, तब मुझे कहीं न कहीं बहुत चोट पहुँचती है। मैं सोचने लगता हूँ कि हमारे संगीत में कहाँ ख़ामियाँ रह गईं जो आज की पीढ़ी इससे दूर होती जा रही है! इसलिए मेरा यह मिशन होगा कि मैं दुनिया को बताऊँ कि भारतीय संगीत क्या है?

सुजॊय - वाह! बहुत ख़ूब!

बिक्रम - चाहे ग़ज़ल हो, ख़याल हो, या कोई साधारण हिंदी फ़िल्मी गीत के ज़रिये ही क्यों न हो!

सुजॊय - जी बिल्कुल!

बिक्रम - मैं फ़िल्में भी बनाना चाहता हूँ जिनमें मैं अपनी संगीत को भी उस तरह से पेश करना चाहता हूँ जैसा मुझे पसंद है। और फिर मैं एक इन्स्ट्रुमेण्टल बैण्ड भी बनाना चाहता हूँ क्योंकि आख़िर में मैं यही चाहूँगा कि जब मैं स्टेज पर से उतरूँ तो सभी मुस्कुरायें।

सुजॊय - बहुत ही ख़ूबसूरत विचार हैं आपके बिक्रम, बहुत ही अच्छा लगा, और हमें पूरी उम्मीद है कि आज की युवा पीढ़ी के जितने भी संगीत में रुचि रखने वाले लोग आपकी इन बातों को इस वक़्त पढ़ रहे होंगे, वो बहुत ही मुतासिर हो रहे होंगे। अच्छा बिक्रम, जैसा कि हमने आपको बताया था कि पियानो पर आधारित फ़िल्मी गीतों से सजी लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' हमने पिछले दिनों प्रस्तुत किया था, जिसमें हमनें ३० के दशक से लेकर ९० के दशक तक के १० हिट गीत सुनवाये गये थे। हम आप से यह पूछना चाहेंगे कि पियानो पर आधारित किस फ़िल्मी गीत को आप सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं पियानो के इस्तमाल की दृष्टि से?

बिक्रम - ऐसा कोई एक गीत तो नहीं है जिसका मैं नाम ले सकूँ, मुझे अपने पियानो पर पुराने गानें बजाने में बहुत अच्छा लगता है। मुझे किशोर कुमार बहुत पसंद है। मुझे आर.डी. बर्मन बहुत पसंद है।

सुजॊय - किशोर कुमार और आर.डी. बर्मन की जोड़ी का एक बहुत ही ख़ूबसूरत पियानो वाला गीत "जीवन के दिन छोटे सही हम भी बड़े दिलवाले" उस शृंखला में हमनें शामिल किया था।

बिक्रम - मोहम्मद रफ़ी साहब मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं। मैं इन सब के गानें बजाता हूँ। और आपको यह जानकर शायद हैरानी हो कि मुझे हर तरह के गानें पियानो पर बजाने में अच्छा लगता है, यहाँ तक कि मैं 'दबंग' के गानें भी बजा चुका हूँ। और सॊफ़्ट रोमांटिक नंबर्स भी।

सुजॊय - आप ने रफ़ी साहब का नाम लिया, तो आइए चलते चलते रफ़ी साहब की आवाज़ में फ़िल्म 'बहारें फिर भी आयेंगी' से "आप की हसीन रुख़ पे आज नया नूर है", यह गीत सुनते हैं, जिसमें पियानो का लाजवाब इस्तेमाल हुआ है। वैसे तो संगीत ओ.पी. नय्यर साहब का है, लेकिन इस गीत में पियानो बजाया है रॊबर्ट कोरीया नें जो उस ज़माने के एक जाने माने पियानिस्ट थे जिन्होंने अनगिनत फ़िल्मी गीतों के लिए पियानो बजाये, ख़ास कर संगीतकार शंकर-जयकिशन के लिए।

बिक्रम - ज़रूर सुनवाइए!

सुजॊय - इस गीत को लिखा है गीतकार अंजान नें, आइए सुनते हैं...

गीत - आप की हसीन रुख़ पे आज नया नूर है (बहारें फिर भी आयेंगी)

सुजॊय - बिक्रम, बहुत अच्छा लगा आप से बातें कर के, मैं अपनी तरफ़ से, हमारी तमाम पाठकों की तरफ़ से, और पूरे 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से आपको ढेरों शुभकामनाएँ देता हूँ, कि आप इतनी कम आयु में जिस महान कार्य का सपना देख रहे हैं, यानी कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को पियानो के ज़रिये पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करना, इसमें ईश्वर आपको कामयाबी दें, आप एक महान पियानिस्ट बन कर उभरें। आपको एक उज्वल भविष्य के लिए हम सब की तरफ़ से बहुत सारी शुभकामनाएँ।

बिक्रम - सुजॊय, आपका बहुत बहुत शुक्रिया इस ख़ूबसूरत मुलाक़ात के लिए, मुझे भी बहुत अच्छा लगा। आपके मैगज़ीन पर इसे पढ़कर भी मुझे उतना ही आनंद आयेगा।

सुजॊय - शुक्रिया बहुत बहुत!

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तो दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आज हमनें आपका परिचय एक युवा-प्रतिभा से करवाया, एक उभरते पियानिस्ट मास्टर बिक्रम मित्र से। आशा है आपको अच्छा लगा होगा। अगले हफ़्ते 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के साथ वापस आयेंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिए, और हाँ, कल सुबह 'सुर-संगम' में पधारना न भूलिएगा, क्योंकि कल से यह स्तंभ पेश होगा हमारे एक नये साथी की तरफ़ से। आज बस इतना ही, नमस्कार!

सुनो कहानी: नीरज बसलियाल की फेरी वाला



नीरज बसलियाल की कहानी फेरी वाला

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में जयशंकर प्रसाद की कहानी 'विजया' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं नीरज बसलियाल की कहानी "फेरी वाला", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 7 मिनट 6 सेकंड।

इस कथा का टेक्स्ट काँव काँव पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।


पौड़ी की सर्दियाँ बहुत खूबसूरत होती हैं, और उससे भी ज्यादा खूबसूरत उस पहाड़ी कसबे की ओंस से भीगी सड़कें।
~ नीरज बसलियाल

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

पता नहीं कितने सालों से, शायद जब से पैदा हुआ यही काम किया, ख्वाब बेचा।
(नीरज बसलियाल की "फेरी वाला" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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#120th Story, Feri Vala: Neeraj Basliyal/Hindi Audio Book/2011/3. Voice: Anurag Sharma

Thursday, February 24, 2011

धडकन जरा रुक गयी है....सुरेश वाडकर के गाये एल पी के इस गीत को सुनकर एक पल को धडकन थम ही जाती है



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 600/2010/300

मस्कार! पिछली नौ कड़ियों से आप इस महफ़िल में सुनते आ रहे हैं फ़िल्म जगत के सुनहरे दौर के कुछ ऐसे नग़में जिनमें पियानो मुख्य साज़ के रूप में प्रयोग हुआ है। 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला की आज दसवीं और अंतिम कड़ी में आज हम चर्चा करेंगे कुछ भारतीय पियानिस्ट्स की। पहला नाम हम लेना चाहेंगे स्टीफ़ेन देवासी का। कल ही इनका जन्मदिन था। २३ फ़रवरी १९८१ को प्लक्कड, केरल में जन्में स्टीफ़ेन ने १० वर्ष की आयु से पियानो सीखना शुरु किया लेज़ली पीटर से। उसके बाद त्रिसूर में चेतना म्युज़िक अकादमी में फ़्र. थॊमस ने उनका पियानो से परिचय करवाया, जहाँ पर उन्होंने त्रिनिती कॊलेज ऒफ़ म्युज़िक लंदन द्वारा आयोजित आठवी ग्रेड की परीक्षा उत्तीर्ण की। १८ वर्ष की आयु में उन्होंने जॊनी सागरिका की ऐल्बम 'इश्टमन्नु' में कुल ६ गीतों का ऒर्केस्ट्रेशन किया। उसके बाद वो गायक हरिहरण के साथ यूरोप की टूर पर गये। वायलिन मेस्ट्रो एल. सुब्रह्मण्यम के साथ उन्होंने लक्ष्मीनारायण ग्लोबल म्युज़िक फ़ेस्टिवल में पर्फ़ॊर्म किया। १९ वर्ष की उम्र में स्टीफ़ेन ने एक म्युज़िक बैण्ड का गठन किया 'सेवेन' के नाम से, जिसमें शामिल थे फ़ायक फ़्रांको सायमन और संगीत। इस बैण्ड ने 'ये ज़िंदगानी' शीर्षक से एक ऐल्बम भी जारी किया था। 'मजा', 'थम्बी', 'नम्मल', 'अज़ागिया थमीज़ मगन' जैसी फ़िल्मों और हरिहरण के ऐल्बम 'वक़्त पर बोलना' का संगीत निर्देशन भी किया। स्टीफ़ेन के बाद अगला नाम है करिश्मा फ़ेलफ़ेली का। करिश्मा का जन्म पूना में हुआ था एक पर्शियन ज़ोरोस्ट्रियन परिवार में, जिनका संगीत से कोई ताल्लुख़ नहीं था। वो एक रेडियो ब्रॊडकास्टर होने के साथ साथ एक पियानिस् और वोकलिस्ट भी हैं; डबलिन सिटी एफ़.एम पर वो शास्त्रीय संगीत पर आधारित रेडियो प्रोग्राम को प्रस्तुत करती हैं। करिश्मा कनाडियन पियानिस्ट ग्लेन गोल्ड को अपना म्युज़िकल आइचन मानती हैं। १२ वर्ष की उम्र में जब करिश्मा ने पहली बार गोल्ड को भारत में किसी रेकॊर्डिंग पर सुना तो उनसे बहुत ज़्यादा प्रभावित हुईं। एक सफल पर्फ़ॊर्मिंग आर्टिस्ट होने के साथ साथ करिश्मा ने संगीत शिक्षा के प्रचार प्रसार में भी गहरी दिलचस्पी दिखाई और इस ओर अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं। 'पियानिस्ट मैगज़ीन' में करिश्मा संगीत शिक्षा, ऐमेचर पियानिस्ट्स और ऒल्टर्नेट करीयर जैसी विषयों पर लेख भी लिखा है। अपने रेडियो प्रोग्राम के लिए उन्होंने कई बड़े बड़े संगीत शिल्पियों का साक्षात्कार ले चुकी हैं। करिश्मा फ़ेलफ़ेली के बाद अब बारी है उत्सव लाल के बारे में जानने की। १८ अगस्त १९९२ को जन्में उत्सव लाल ने केवल ९ वर्ष की आयु में दिल्ली में अपना पहला सोलो पियानो कन्सर्ट प्रस्तुत किया। वर्तमान में वो डबलिन में रहते हैं, जहाँ पर वो एक जानेमाने वेस्टर्ण क्लासिकल और जैज़ पियानिस्ट हैं। उत्सव को मशहूर पियानो कंपनी स्टीनवे ऐण्ड सन्स ने "Young Steinway Artist" के ख़िताब से सम्मानित किया है। भारतीय शास्त्रीय रागों में गहरी दिलचस्पी होने के कारण उत्सव ने इन रागों पर पियानो पर शोध करते हैं। उनके इस प्रयास में टाइम्स म्युज़िक ने २००८ में उनका भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित ऐल्बम जारी किया 'Piano Moods of Indian Ragas'। उत्सव का नाम लिम्का बूक ऒफ़ रेकॊर्ड्स में दर्ज हुआ है और इतनी छोटी उम्र में ही बहुत सारे पुरस्कारों से नवाज़े जा चुके हैं। कुछ और भारतीय मूल के पियानिस्ट्स हैं नीसिअ मजोली, अनिल श्रीनिवासन और एब्राहम मजुमदार। इनके बारे में भी आप इंटरनेट पर मालूमात हासिल कर सकते हैं।

अब तक इस शृंखला में हमने ३० से लेकर ८० के दशक तक के ९ हिट गीत सुनवाये जिनमें जो एक बात कॊमन थी, वह था इनमें इस्तेमाल होने वाला मुख्य साज़ पियानो। दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की रवायत है कि इसमें हम ८० के दशक तक के ही गीत शामिल करते हैं, लेकिन आज इस रवायत को तोड़ने का मन कर रहा है। दरअसल १९९१ में एक ऐसी फ़िल्म आयी थी जिसमें एक ऐसा पियानो बेस्ड गाना था जिसे सुनवाना बेहद ज़रूरी बन पड़ा है। इस गीत को सुनवाये बग़ैर इस शृंखला को समाप्त करने का मन नहीं कर रहा। जी हाँ, फ़िल्म 'प्रहार' का सुरेश वाडकर का गाया "धड़कन ज़रा रुक गई है"; मंगेश कुल्कर्णी का लिखा गीत और संगीत एक बार फिर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का। 'प्रहार' पूर्णत: नाना पाटेकर की फ़िल्म थी। उन्होंने न केवल फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण किरदार निभाया, बल्कि फ़िल्म को निर्देशित भी किया और फ़िल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले भी लिखे सुजीत सेन के साथ मिलकर। संवाद थे हृदय लानी के। फ़िल्म के अन्य कलाकार थे डिम्पल कपाडिया, माधुरी दीक्षित, म्करंद देशपाण्डे, गौतम जोगलेकर, अच्युत पोद्दार, विश्वजीत प्रधान प्रमुख। सुधाकर बोकाडे ने इस असाधारण फ़िल्म का निर्माण कर हिंदी सिनेमा के धरोहर को समृद्ध किया। जहाँ मंगेश जी ने बेहद ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं, वहीं वाल्ट्ज़ रिदम पर आधारित इस गीत का संगीत संयोजन भी लाजवाब है। पियानो के साथ साथ वायलिन्स, माउथ ऒर्गन आदि पश्चिमी साज़ों का भी सुंदर प्रयोग इस गीत में महसूस किया जा सकता है। गीत के आख़िर में एक लम्बे पियानो पीस ने गीत की ख़ूबसूरती को चार चाँद लगा दिया है। तो आइए सुनते हैं यह गीत, और इसी के साथ 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला का भी समापन होता है। और साथ ही पूरा हो रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का ६००-वाँ अंक। बस युंही हमारे साथ बने रहिए, हम भी युंही दिलकश नग़में आप पर लुटाते रहेंगे। नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि पियानो में १२००० से ज़्यादा पुर्ज़ें होते है, जिनमें १०,००० मूवेबल (movable) होते हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 01/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -गीतकार हैं गुलज़ार साहब.

सवाल १ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - किस अभिनेत्री पर फिल्माया गया है ये गीत - ३ अंक
सवाल ३ - गायिका बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
लीजिए एक बाज़ी और अमित जी के नाम रही...यानी कि अब वो तीन बार विजय हासिल कर चुके हैं, पर हम खास बधाई अंजाना जी को भी देंगे जिन्होंने जम कर मुलाबाला किया और विजय जी भी इस बार काफी बढ़िया साबित हुए, नयी शृंखला के लिए सभी को शुभकामनाएँ, शरद जी कमर कस लें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 23, 2011

जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है....जबरदस्त सकारात्मक ऊर्जा है इस गीत में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 599/2010/299

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और फिर एक बार स्वागत है इस महफ़िल में जिसमें हम इन दिनों पियानो की बातें कर रहे हैं। आइए आज पियानो का वैज्ञानिक पक्ष आज़माया जाए। सीधे सरल शब्दों में जब भी किसी 'की' पर वार होता है, एक चेन रीऐक्शन होता है जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है। पहले 'की' 'विपेन' को उपर उठाता है, जो 'जैक' को 'हैमर रोलर' पर वार करवाता है। उसके बाद हैमर रोलर लीवर को उपर उठाता है। 'की' 'डैम्पर' को भी उपर की तरफ़ उठाता है, और जैसे ही 'हैमर' 'वायर' को स्ट्राइक करके ही वापस अपनी जगह चला जाता है और वायर में वाइब्रेशन होने लगती है, रेज़ोनेट होने लगता है। जब 'की' को छोड़ दिया जाता है, तो डैम्पर वापस स्ट्रिंग्स पर आ जाता है जिससे कि वायर का वाइब्रेशन बंद हो जाता है। वाइब्रेटिंग पियानो स्ट्रिंग्स से उत्पन्न ध्वनियाँ इतनी ज़ोरदार नहीं होती कि सुनाई दे, इसलिए इस वाइब्रेशन को एक बड़े साउण्ड-बोर्ड में पहुँचा दिया जाता है जो हवा को हिलाती है, और इस तरह से उर्जा ध्वनि तरंगों में परिवर्तित हो जाती हैं। अब बात आती है कि ये ध्वनि तरंगें किस तरह की होंगी, कितनी ऊँची पट्टी होगी। तीन चीज़ें हैं जो उस वाइब्रेशन के पिच पर असर करती हैं। ये हैं लम्बाई (वायर जितनी छोती होगी, पिच उतना ऊँचा होगा), चौड़ाई (वायर जितनी पतली होगी, पिच उतना ऊँचा होगा), और टेन्शन (वायर जितनी टाइट होगी, पिच उतना ऊँचा होगा)। एक वाइब्रेटिंग वायर अपने आप को कई छोटे वायरों में बाँट लेती है। और प्रत्येक भाग एक अपना अलग पिच उत्पन्न करती है, जिसे 'पार्शियल' (partial) कहते हैं। किसी वाइब्रेटिंग स्ट्रिंग में एक फ़ण्डमेण्टल होता है और पार्शियल्स का एक पूरा सीरीज़ होता है। इस विज्ञान को अगर और ज़्यादा गहराई से जानना हो तो आप किसी भी कॊलेज फ़िज़िक्स पुस्तक के 'साउण्ड' अध्याय को रेफ़र कर सकते हैं।

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला में कल आपने ८० के दशक का एक गीत सुना था और आज भी हम इसी दशक में रहेंगे, और कल के और आज के गाने में एक और समानता यह है कि इन दोनों गानों में कुछ हद तक जीवन दर्शन की बातें छुपी हुईं हैं। "जीवन के दिन छोटे सही हम भी बड़े दिलवाले" के बाद आज बारी है "ज़िंदगी हर क़दम एक नई जंग है, जीत जाएँगे हम तू अगर संग है"। जी हाँ, १९८५ की ब्लॊकबस्टर फ़िल्म 'मेरी जंग' का सब से उल्लेखनीय यह गीत है हमारे आज के अंक का गीत। यह गीत भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ था और फ़िल्म की कहानी के साथ भी सीधी सीधी जुड़ी हुई है। फ़िल्म की शुरुआत में नूतन और गिरिश करनाड अपने बच्चों के साथ इस गीत को गाते हुए नज़र आते हैं (लता और नितिन मुकेश की आवाज़ों में)। एक ग़लत केस में गिरिश करनाड फँस जाते हैं और उन्हें फाँसी हो जाती है, जिसे नूतन सह नहीं पातीं और मानसिक संतुलन खो बैठती हैं। उनका बेटा अनिल कपूर अपनी माँ और बहन की देखभाल करता है, और कोशिश करता रहता है कि अपनी माँ की याद्दाश्त वापस ला सके। और इस प्रयास में उनका सहारा बनता है वही गीत, और बार बार वो इस गीत को गाते रहते हैं। इस तरह से इस गीत के दो और वर्ज़न है फ़िल्म में, एक शब्बीर कुमार का एकल और एक में शब्बीर कुमार के साथ लता जी भी हैं, जो फ़िल्माया गया है अनिल कपूर और उनकी नायिका मीनाक्षी शेषाद्री पर। और आख़िरकार यही गीत नूतन की याद्दाश्त वापस लाता है। एन.एन. सिप्पी निर्मित और सुभाष घई निर्देशित इस फ़िल्म को लोगों ने हाथों हाथ लिया, और फ़िल्मफ़ेयर में इस फ़िल्म में जानदार अभिनय के लिए नूतन और अमरीश पुरी, दोनों को ही सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री और सह-अभिनेता के पुरस्कार मिले। 'मेरी जंग' के गीतकार थे आनंद बक्शी और संगीतकार थे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। इस गीत में पियानो का इस्तेमाल जितना सुंदर है, उतने ही शानदार हैं इसके बोल। पूर्णत: आशावादी स्वर में लिखे इस गीत को जब भी हम सुनते हैं, दिल में जैसे एक जोश उत्पन्न हो जाता है ज़िंदगी को एक चैलेंज की तरह स्वीकार करने का। और अगर आप मायूस हैं, टेन्शन में है, दुखी हैं, तो यकीन मानिये, यह गीत किसी दवा से कम कारगर नहीं है। आज़माके देखिएगा कभी! तो आइए इस ख़ूबसूरत गीत को सुना जाये, पहले लता मंगेशकर और नितिन मुकेश की आवाज़ों में और उसके बाद शब्बीर कुमार और लता मंगेशकर की आवाज़ों में। इस गीत में आप मेरी पसंद भी शामिल कर लीजिए, बचपन से लेकर आज तक यह मेरे फ़ेवरिट गीतों में से एक रहा है। और दोस्तों, आज चलते चलते 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तरफ़ से हम भी आप से यही कहना चाहेंगे कि जीत जाएँगे हम आप अगर हमारे संग है। तो अपना साथ युंही बनाये रखिएगा, हमेशा।





क्या आप जानते हैं...
कि यामाहा पियानो कंपनी ने एक नई तरह का पियानो बनाया है जिसकी कीमत कुछ ३३३,००० अमरीकी डॊलर्स है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - १९९१ में प्रदर्शित हुई थी ये फिल्म.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक की ये पहली फिल्म थी, और वो मुख्यता अभिनय तक सीमित रहते हैं, कौन हैं ये - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्माता कौन थे - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
कल तो अंजाना जी जल्दबाजी में बुरी तरह चूक गए, और ये चूक उन्हें भारी पड़ सकती है....यानी आज फैसला मैच की अंतिम गेंद पर होगा...अंजाना जी आपसे ऐसी शिकायत की उम्मीद नहीं थी...ये तो गुगली है बीच बीच में नहीं पड़े तो सपाट पिच में गेम का मज़ा नहीं रहता...इसे स्पोर्ट्समैन शिप के साथ लीजिए...मौसम क्रिकेट का है इसलिए हम भी जरा उसी भाषा में बतिया रहे हैं....वैसे विजय जी आपको भी कुछ शिकायत थी...कुछ हद तक दूर हुई या नहीं...:)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 22, 2011

जीवन के दिन छोटे सही, हम भी बड़े दिलवाले....किशोर दा समझा रहे हैं जीने का ढंग...



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 598/2010/298

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप इस लघु शृंखला का आनंद ले रहे हैं। विश्व के जाने माने पियानिस्ट्स में से दस पियानिस्ट्स के बारे में हम इस शृंखला में जानकारी दे रहे हैं। पाँच नाम शामिल हो चुके हैं, आइए आज की कड़ी में बाकी के पाँच नामों का ज़िक्र करें। शुरुआत कर रहे हैं महान संगीत-शिल्पी मोज़ार्ट से। वूल्फ़गैंग मोज़ार्ट भी एक आश्चर्य बालक थे, जिसे अंग्रेज़ी में हम child prodigy कहते हैं। केवल तीन वर्ष की उम्र में उनके हाथों की नाज़ुक उंगलियाँ पियानो के की-बोर्ड पर फिरती हुई देखी गई, और पाँच वर्ष के होते होते वो गानें कम्पोज़ करने लग गये, और पता है ये गानें किनके लिखे होते थे? उनके पिता के लिखे हुए। और बहुत ही छोटी उम्र से वो स्टेज-कॊण्सर्ट्स भी करने लगे, और आगे चलकर एक महान संगीतकार बन कर संगीताकाश में चमके। उन्हीं की सिम्फ़नी को आधार बना कर संगीतकार सलिल चौधरी ने फ़िल्म 'छाया' का वह गीत कम्पोज़ किया था, "इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा..."। ख़ैर, आगे बढ़ते हैं, और अब जो नाम मैं लेना चाहता हूँ, वह है फ़्रान्ज़ लिस्ज़्ट का। अगर आप ने इस शृंखला को ग़ौर से पढ़ा है तो आपको याद आ गया होगा कि इनका ज़िक्र पहले भी आ चुका है। इस हंगरियन पियानिस्ट ने भी अपना करीयर बहुत ही छोटे उम्र में शुरु किया। उनके जीवन से जुड़ी बहुत कम तथ्य उपलब्ध है। उल्लेखनीय बात यह है कि केवल पियानो ही नहीं, वो कई और साज़ भी बहुत अच्छा बजा लेते थे, जिनमें चेलो (cello) भी शामिल है। एक और जानेमाने पियानिस्ट हुए हैं वाल्टर विल्हेम गीसेकिंग्। यह भी एक हैरतंगेज़ संगीतकार रहे इस बात के लिए कि इन्होंने कभी भी पियानो पर बैठकर कुछ कम्पोज़ नहीं किया; बल्कि वे घण्टों चुपचाप बैठे रहते थे और अपने गीतों को मन ही में कम्पोज़ करते और बजाते जाते थे। उसके बाद पियानो पर बैठकर बिना कोई ग़लती किए हू-ब-हू वैसा बजा जाते जैसा कि उन्होंने मन में सोच रखा था। आर्तुरो बेनेदेत्ती माइकेलैंजेली भी पूरे पर्फ़ेक्शन के साथ बजाते थे, जिनकी रेखोडिंग्स बिना एडिटिंग किए भी पर्फ़ेक्ट हुआ करती थी। उनका काफ़ी बदनाम भी था इस बात के लिए कि वो कॊण्सर्ट्स जब तब कैन्सल कर देते थे और आयोजकों को ग़लत परिस्थिति में डाल देते थे। एक और पियानिस्ट जिनका उल्लेख होना चाहिए, वो हैं ऐल्फ़्रेड कॊर्टोट। उन्हें जाना जाता है उनके आश्चर्यजनक रेकॊर्डिंग्स के लिए, तथा चॊपिन, ब्र्हाम्स, लिस्ज़्ट व अन्य कम्पोज़र्स जैसी वेरिएशन्स के लिए। उन्होंने अपने ख़ुद के वेरिएशन्स भी इसमें जोड़े और साधारण कम्पोज़िशन्स में ऐसे ऐसे बदलाव लाये जो वाक़ई आश्चर्यजनक थे।

७० के दशक के बाद आज ८० के दशक की बारी। आज का प्रस्तुत गीत है साल १९८३ की फ़िल्म 'बड़े दिलवाला' से। एक बार फिर आज किशोर कुमार की आवाज़ गूंजेंगी, लेकिन गीतकार और संगीतकार बदल गये हैं। मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और राहुल देव बर्मन का स्वरबद्ध किया हुआ यह आशावादी गीत है "जीवन के दिन छोटे सही हम भी बड़े दिलवाले, कल की हमें फ़ुर्सत कहाँ सोचें जो हम मतवाले"। सच ही तो है, हमें आज को पूरे जोश और उल्लास के साथ जीना चाहिए, क्या पता कल ये आलम रहे ना रहे! ख़ैर, 'बड़े दिलवाला' फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन किया था भप्पी सोनी ने। उपन्यासकार गुल्शन नंदा की कहानी पर संवाद लिखे डॊ. राही मासूम रज़ा नें और फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं ऋषी कपूर, टिना मुनीम, सारिका, अरुणा इरानी, जगदीप, मदन पुरी, कल्पना अय्यर, अम्जद ख़ान और प्राण साहब नें। आज का यह गीत तो ऋषी कपूर पियानो पर बैठ कर गा रहे होते हैं, लेकिन इसी गीत का एक अन्य वर्ज़न भी है जिसे उदित नारायण और लता मंगेशकर ने गाया है और जो फ़िल्माया गया है प्राण और सारिका पर। फ़िल्म के संगीत विभाग में योगदान दिया था बासु देव चक्रवर्ती, मनोहारी सिंह, और मारुति राव नें, जो पंचम दा के सहायक रहे। और गीतों को रेकॊर्ड किया कौशिक साहब नें। जहाँ तक इस गाने में पियानो का सवाल है, तो प्रिल्युड में बहुत ख़ूबसूरत और साफ़ पियानो बजाया है, और गीत के मुखड़े की धुन भी पियानो से ही शुरु होकर किशोर दा की आवाज़ में "ला ला ला..." में जाकर मर्ज हो जाती है। बड़ा ही सुंदर संगीत संयोजन इस गीत का रहा, और इसीलिए पंचम के साथ साथ हमने उनके सहायकों का भी नाम लिया। लेकिन सटीक रूप से हम यह आपको बता नहीं सकते कि किस साज़िंदे ने इस गीत में पियानो बजाया होगा। लेकिन जिन्होंने भी बजाया है, उनको हम सलाम करना चाहेंगे। वैसे आपको यह बात बता दें कि एक पियानिस्ट जिन्होंने राहुल देव बर्मन के कई गीतों में पियानो बजाया है, वो हैं माइक मचाडो (Mike Machado)| तो आइए इस ख़ूबसूरत गीत को सुना जाये, और इस गीत के बोलों को अगर हम अपने अपने जीवन में थोड़ा तवज्जो दें तो मेरा ख़याल है कि इससे जीवन बेहतर ही बनेगा। इस गीत का भाव यही है कि हम अपना शिकायती स्वभाव को छोड़ कर उपरवाले का शुक्रिया अदा कर ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करें।
"यह ज़िंदगी दर्द भी है, यह ज़िंदगी है दवा भी,
दिल तोड़ना ही न जाने, जाने यह दिल जोड़ना भी,
इस ज़िंदगी का शुक्रिया सदके मैं उपरवाले,
कल की हमें फ़ुर्सत कहाँ सोचें जो हम मतवाले।"



क्या आप जानते हैं...
कि विश्व का सब से बड़ा पियानो का नाम है Challen Concert Grand, जो ११ फ़ीट लम्बा और १०० किलो से ज़्यादा है, और जिसका कुल स्ट्रिंग टेन्शन ३० टन से भी ज़्यादा है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म में किस सीनियर अदाकारा ने अहम् भूमिका निभायी है - २ अंक
सवाल २ - फिल्म में अपनी भूमिका के लिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता का फिल्म फेयर मिला, कौन हैं ये - ३ अंक
सवाल ३ - लता जी के साथ किन दो नए दौर के गायकों ने इसे गाया है - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अंजाना जी और अमित जी मौके पर खरे उतरे....कौन जीतेगा ये बाज़ी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, February 21, 2011

गीत गाता हूँ मैं, गुनगुनाता हूँ मैं....एक दर्द में डूबी शाम, किशोर दा की आवाज़ और पियानो का साथ



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 597/2010/297

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला की सातवीं कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के महफ़िल की शमा जलाने को। कल की कड़ी में हमने दुनिया भर से पाँच बेहद नामचीन पियानिस्ट्स का ज़िक्र किया था और आप से यह वादा भी किया था कि आगे किसी अंक में और पाँच नामों को शामिल करेंगे। हम अपने वादे पे ज़रूर कायम हैं, लेकिन वह अंक आज का अंक नहीं है। आज के अंक में तो हम एक फ़िल्मी पियानिस्ट की बात करेंगे जिन्होंने संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के लिए बेशुमार गीतों में पियानो बजाया है। हम जिस पियानिस्ट की बात कर रहे हैं, उनका नाम है रॊबर्ट कोर्रिया (Robert Correa)| दोस्तों, जैसे ही मुझे अपने किसी मित्र से यह पता चला कि रॊबर्ट कोर्रिया एस.जे. के लिए बजाते थे, तो मैं इस म्युज़िशियन के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश में जुट गया। और इसी खोजबीन के दौरान मुझे रॊबर्ट कोरीया के बेटे युजीन कोर्रिया के बारे में पता चला किसी ब्लॊग में लिखे उनकी टिप्पणी के ज़रिए। दरअसल उस ब्लॊग में शंकर जयकिशन पर एक लेख पोस्ट हुआ था, और उसकी टिप्पणी में युजीन कोरीया ने यह लिखा - "Thank you for your wonderful appreciation of the music directors Shankar-Jaikishan. I would like to mention that my father, Mr. Robert Correa use to play the piano for the music directors. Thanks. Eugene Correa/Canada." आगे फिर किसी के पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरे स्वर्गीय पिता ने शंकर-जयकिशन की सभी फ़िल्मों में पियानो बजाया, बस उनकी पहली फ़िल्म 'बरसात' को छोड़ कर। वह इसलिए कि वो उस वक़्त बम्बई में नहीं थे। उस ज़माने में वो कलकत्ते में रहा करते थे और वहाँ के प्रसिद्ध होटल 'दि ग्रेट ईस्टर्ण होटल' में पियानिस्ट थे। एक और उल्लेखनीय बात यह कि राज कपूर की फ़िल्म 'संगम' के थीम म्युज़िक में जो एक नहीं बल्कि दो दो पियानो की आवाज़ें सुनाई देती हैं, उनमें एक तो रॊबर्ट कोर्रिया ने ही बजाया था, दूसरा पता है किन्होंने बजाया था? खुद शंकर साहब ने। ओ. पी. नय्यर साहब की धुन पर "आपके हसीं रुख़ पे आज नया नूर है" गीत में भी जो असाधारण पियानो बजा है, उसे भी रॊबर्ट कोर्रिया ने ही बजाया था। दोस्तों, आज जब एस.जे. की जोड़ी की बात चल ही पड़ी है, तो क्यों ना उन्हीं का एक गीत हो जाये!

जहाँ तक पियानो आधारित फ़िल्मी गीतों की बात है, हमने इस शृंखला में अब तक ३० और ४० के दशकों से एक एक गीत तथा ५० व ६० के दशकों से दो दो गीत सुन चुके हैं। आज हम क़दम रखते हैं ७० के दशक में। इस दशक का बस एक ही गीत हम सुनेंगे और इस दशक के पियानो गीतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जिस गीत को चुना है, वह है किशोर कुमार का गाया १९७१ की फ़िल्म 'लाल पत्थर' का सदाबहार गीत "गीत गाता हूँ मैं, गुनगुनाता हूँ मैं, मैंने हँसने का वादा किया था कभी, इसलिए अब सदा मुस्कुरता हूँ मैं"। गीत के बोलों से ही पता चलता है कि किस तरह का विरोधाभास छुपा हुआ है गाने में। भले ही शब्द आशावादी प्रतीत हो रहे हैं, लेकिन मूड, सिचुएशन और कम्पोज़िशन से साफ़ ज़ाहिर है कि एक टूटे हुए दिल की पुकार है यह गीत, जिसे किशोर दा ने क्या ख़ूब अंजाम दिया है। फ़िल्म में यह गीत विनोद मेहरा पर फ़िल्माया गया है और कैमरे के रेंज में राज कुमार, राखी और हेमा मालिनी को भी देखा जा सकता है। 'लाल पत्थर' का एक गीत "रे मन सुर में गा" हमने आशा भोसले के युगल गीतों से सजी लघु शृंखला 'दस गायक और एक आपकी आशा' में सुनवाया था। आज के प्रस्तुत गीत को लिखा है देव कोहली साहब ने और यह उनका लिखा हुआ पहला फ़िल्मी गीत है। देव साहब ने विविध भारती के किसी इंटरव्यु में इसके बारे में कहा था - "ज़िंदगी है तो घटनाएँ भी यकीनन होंगी। मेरे जीवन की भी कुछ मुक्तलिफ़ घटनाएँ हैं, क़िस्से हैं। एक अहम क़िस्सा सुनाता हूँ। जब मैं नया नया गीतकार बनने यहाँ पर आया था, तो एक बार शंकर-जयकिशन, जो उस समय बहुत ही कामयाब और महान संगीतकारों में से थे, उन्होंने मुझे बुलाया और एक फ़िल्म के लिए सिचुएशन बता दी, और कहा कि आपको इस पर एक गीत लिखना है। मैंने युंही गीत लिख दिया, वह गीत इतना हिट हुआ कि मैंने सोचा भी न था। मैंने यह महसूस किया कि इतनी दाद का मैं हक़दार नहीं हूँ। इस गीत ने मेरे अंदर एक कैफ़ीयत पैदा की, ऐसी कौन सी शक्ति थी जिसने मुझसे यह गीत लिखवाया? वो अल्फ़ाज़ कहाँ से आये? फिर मुझे ऐसा लगा कि यह हो जाता है। उसके बाद से मैं आध्यात्मिक्ता की तरफ़ झुका और आध्यात्म की किताबें पढ़ने लगा। यह मेरा पहला गीत था फ़िल्म 'लाल पत्थर' का, गीत गाता हूँ मैं गुनगुनाता हूँ मैं।" तो लीजिए देव कोहली साहब का लिखा पहला गाना सुनते हैं किशोर दा की पुर-असर आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि पियानो के एक स्टैण्डर्ड की-बोर्ड में कुल ८८ कीज़ होते हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजाना जी लंबी छलांग लगा कर आगे निकल आये हैं...वाह क्या मुकाबला है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, February 20, 2011

दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर....जब दर्द को ऊंचे सुरों में ढाला रफ़ी साहब ने एस जे की धुन पर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 596/2010/296

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर एक नए सप्ताह के साथ हम वापस हाज़िर हैं और आप सभी का फिर एक बार बहुत बहुत स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में। इन दिनों आप सुन और पढ रहे हैं पियानो साज़ पर केन्द्रित हमारी लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़'। जैसा कि शीर्षक से ही प्रतीत हो रहा है कि इसमें हम कुछ ऐसे फ़िल्मी गीत सुनवा रहे हैं जिनमें पियानो मुख्य साज़ के तौर पर प्रयोग हुआ है; लेकिन साथ ही साथ हम पियानो संबंधित तमाम जानकारियाँ भी आप तक पहुँचाने की पूरी पूरी कोशिश कर रहे हैं। पिछली पाँच कड़ियों में हमने जाना कि पियानो का विकास किस तरह से हुआ और पियानो के शुरु से लेकर अब तक के कैसे कैसे प्रकार आये हैं। आज से अगली पाँच कड़ियों में हम चर्चा करेंगे कुछ मशहूर पियानो वादकों की, और उनमें कुछ ऐसे नाम भी आयेंगे जिन्होंने फ़िल्मी गीतों में पियानो बजाया है। दुनिया भर की बात करें तो पियानो के आविष्कार से लेकर अब तक करीब करीब ५०० पियानिस्ट्स हुए हैं, जिनमें से गिने चुने पियानिस्ट्स ही लोकप्रियता के चरम शिखर तक पहुँच सके हैं। और जो पहुँचे हैं, उन सब ने बहुत ही कम उम्र से पियानो बजाना और सीखना शुरु किया था, जिससे कि आगे चलकर उन्हें इस साज़ पर दक्षता हासिल हो गई। हम दुनिया भर से दस पियानिस्ट्स का ज़िक्र करेंगे। आज की कड़ी में आयेंगे पाँच नाम, और आने वाली किसी कड़ी में बाकी के पाँच। पहला नाम है सर्गेइ राचमैनिनोफ़ (Sergei Rachmaninoff) का, जिनके हाथ नामचीन पियानिस्ट्स में सब से बड़े थे। तभी तो वो एक पल में १४ नोट्स तक बजा लेते थे। उन्होंने अपनी इस दक्षता का इसतमाल अपने कम्पोज़िशन्स में किए जैसे कि Rhapsody on a Theme of Paganini, 8 Preludes, आदि। दूसरा नाम जै जोसेफ़ हॊफ़मैन (Josef Hoffman) का। इस युवा प्रतिभा ने ६ वर्ष की आयु में ही कॊन्सर्ट्स में पियानो बजाने लगे और मात्र १२ वर्ष की आयु में वो पहले रेकॊर्डेड म्युज़िशियन बन गये। म्युज़िकल रेकॊर्डिंग्स के लिए उन्होंने थॊमस एडिसन के साथ काम किया। तीसरा नाम एक बहुत ही मशहूर नाम है, लुदविग वान बीथोवेन (Ludwig Van Beethoven)। इस जर्मन कम्पोज़र और पियानिस्ट ने बहुत शोहरत हासिल की, और सब से हैरत की बात यह थी बीथोवेन के बारे में, कि वो २६ वर्ष की उम्र में बधीर हो जाने के बावजूद ना केवल पियानो बजाते रहे, बल्कि कम्पोज़ भी करते रहे। बीथोवेन के बाद हम नाम लेना चाहेंगे व्लादिमिर होरोविट्ज़ (Vladimir Horowitz) का, जो बीसवीं शताब्दी के एक बेहद जाने माने पोइयानिस्ट थे। उन्होंने फ़ेलिक्स ब्लुमेनफ़ेल्ड और सर्गेइ तार्नोवस्की से पियानो का अध्ययन किया, और उनकी ख़ासीयत थी भारीभरमकम पीसेस को भी बहुत ही रचनात्मक्ता के साथ बजाना। आजे के अंक का पाँचवाँ और अंतिम नाम है फ़्रेडरिक चॊपिन (Fredric Chopin) का। चॊपिन एक ऐसे कम्पोज़र थे जिनकी कम्पोज़िशन्स युवा पियानो स्टुडेण्ट्स बजाते हैं। चॊपिन ख़ुद भी बालावस्था में एक आश्चर्य-बालक थे, और उनकी तुलना मोज़ार्ट जैसे महान संगीतकार से की जाती है।

जैसा कि कल के अंक में हमने आपको बताया था कि हम ६० के दशक से भी दो गीत सुनेंगे, तो आइए आज सुना जाये रफ़ी साहब की आवाज़ में १९६८ की फ़िल्म 'ब्रह्मचारी' का एक बेहद लोकप्रिय गीत "दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर, यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर, रखूँगा मैं दिल के पास, मत हो मेरी जाँ उदास"। हसरत जयपुरी का गीत और शंकर-जयकिशन का संगीत। शम्मी कपूर, मोहम्मद रफ़ी और शंकर-जयकिशन वह तिक़ड़ी है जिसने ६० के दशक में जैसे हंगामा कर दिया था, फ़िल्मी गीतों की प्रचलित धारा को मोड़ कर उसमें बहुत ज़्यादा ग्लैमर और ऒर्केस्ट्रेशन लेकर आये थे। अभी हाल ही में मेरी किसी संगीतकार से बातचीत हुई थी, जिन्होंने यह अफ़सोस ज़ाहिर किया था कि क्या ज़रूरत थी शंकर जयकिशन को इतने ऊँचे पट्टे के गानें बनाने की, इतनी लाउडनेस लाने की, इतनी शोर पैदा करने की। दिल के ज़ख़्म या फिर किसी भी जज़्बात को पैदा करने के लिए जज़्बात और शब्दों की ज़रूरत होती है, अर्थक साज़ों की नहीं। ख़ैर, पसंद अपनी अपनी, ख़याल अपना अपना। हक़ीक़त यही है कि एस.जे. रचित यह गीत एक बेहद कामयाब और सुपर-डुपर हिट गाना है, और हसरत साहब ने भी क्या ख़ूब बोल पिरोये हैं इस गीत में। "अब भी तेरे सुर्ख़ होठों के प्याले, मेरे तसव्वुर में साक़ी बने हैं, अब भी तेरी ज़ुल्फ़ के मस्त साये, बिरहा की धूप में साथी बने हैं"। दरअसल इस गीत की सिचुएशन बिल्कुल वह सिचुएशन है जिसमें नायक को लगता है कि नायिका किसी और की होने वाली है, पार्टी चल रही है, सामने पियानो रखा है, उसे गीत गाना है, और ऐसा गीत जिसके बोल नायिका के दिल पर शूल की तरह चुभें लेकिन दूसरों को भनक भी ना पड़े कि नायिका के लिए गीत गाया जा रहा है। इस फ़िल्म में नायक शम्मी कपूर अपनी नायिका राजेश्री के लिए यह गीत गाते हैं जो प्राण साहब की होने वाली हैं। तो लीजिए सुनिए और महसूस कीजिए रफ़ी साहब के गले के रेंज को।



क्या आप जानते हैं...
कि जापान में पियानो का निर्माण करने वाली पहली कंपनी थी 'यामाहा' और वह वर्ष था १८८७।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेता पर है ये गीत फिल्माया - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अमित जी और अंजाना जी की टक्कर जारी है....शरद जी और इंदु जी लग रहा है जैसे अब वरिष्ठों की श्रेणी में आ गए हैं :) हा हा हा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - बीन का लहरा और इस वाध्य से जुडी कुछ बातें



सुर संगम - 08

पुंगी या बीन के चाहे कितने भी अलग अलग नाम क्यों न हो, इस साज़ का जो गठन है, वह लगभग एक जैसा ही है। इसकी लम्बाई करीब एक से दो फ़ूट की होती है। पारम्परिक तौर पर पुंगी एक सूखी लौकी से बनाया जाता है, जिसका इस्तमाल एयर रिज़र्वर के लिए किया जाता है। इसके साथ बांस के पाइप्स लगाये जाते हैं जिन्हें जिवाला कहा जाता है।


सुप्रभात! 'सुर संगम' की आठवीं कड़ी में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। दोस्तों, पिछले सात अंकों में आप ने इस स्तंभ में या तो शास्त्रीय गायकों के गायन सुनें या फिर भारतीय शास्त्रीय यंत्रों का वादन, जैसे कि सितार, शहनाई, सरोद, और विचित्र वीणा। आज भी हम एक वादन ही सुनने जा रहे हैं, लेकिन यह कोई शास्त्रीय साज़ नहीं है, बल्कि इसे हम लोक साज़ कह सकते हैं, क्योंकि इसका प्रयोग लोक संगीत मे होता है, या कोई समुदाय विशेष इसका प्रयोग अपनी जीविका उपार्जन के लिए करता है। आज हम बात कर रहे हैं बीन की। जी हाँ, वही बीन, जिसे हम अक्सर सपेरों और सांपों से जोड़ते हैं। बीन पूरे भारतवर्ष में अलग अलग इलाकों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। उत्तर और पूर्व भारत में इसे पुंगी, तुम्बी, नागासर, और सपेरा बांसुरी के नामों से पुकारा जाता है, तो दक्षिण में नागस्वरम, महुदी, पुंगी और पमबत्ती कुज़ल नाम प्रचलित है। पुंगी या बीन को सपेरे की पत्नी का दर्जा दिया जाता है और इस साज़ का विकास शुरु शुरु में लोक संगीत के लिए किया गया था।

पुंगी या बीन के चाहे कितने भी अलग अलग नाम क्यों न हो, इस साज़ का जो गठन है, वह लगभग एक जैसा ही है। इसकी लम्बाई करीब एक से दो फ़ूट की होती है। पारम्परिक तौर पर पुंगी एक सूखी लौकी से बनाया जाता है, जिसका इस्तेमाल एयर रिज़र्वर के लिए किया जाता है। इसके साथ बांस के पाइप्स लगाये जाते हैं जिन्हें जिवाला कहा जाता है। इनमें से एक पाइप मेलडी के लिए और दूसरा ड्रोन ईफ़ेक्ट के लिए है। सब से उपर एक ट्युब डाला जाता है लौकी के अंदर, जो एक बांसुरी की तरह है जिसमें सपेरा फूंक मारता है बजाने के लिए। लौकी के अंदर हवा भरता है और नीचे के हिस्से में लगे दो पाइपों से बाहर निकल जाता है। इन दोनों पाइपों में एक 'बीटिंग रीड' होता है जो ध्वनि उत्पन्न करता है। और जैसा कि बताया, एक पर मेलडी बजती है और दूसरे से ड्रोन ईफ़ेक्ट आता है। आधुनिक संस्करण में बांस के दो पाइपों के अलावा एक लम्बे मेटलिक ट्युब का इस्तमाल होता है। यह ड्रोन का भी काम करता है। पुंगी या बीन बजते वक़्त कोई पौज़ मुमकिन नहीं है। इसलिए इसे बजाने का जो सब से प्रचलित तरीका है, वह है गोलाकार तरीके से सांस लेने का, जिसे हम अंग्रेज़ी में 'सर्कुलर ब्रीदिंग' कहते हैं।

पुंगी या बीन साज़ का इस्तेमाल करने वालों में कालबेलिया सम्प्रदाय एक मुख्य नाम है। कालबेलिया जाति एक बंजारा जाति है जो प्राचीन काल से ही एक जगह से दूसरे जगह पर निरंतर घूमती रहती है। जीविका उपार्जन के लिए ये लोग सांपों को पकड़ते हैं और उनके ज़हर का व्यापार करते हैं। और शायद इसी वजह से इनका जो लोक नृत्य है और जो पोशाक है, उनमें भी सर्पों की विशेषताएँ देखी जा सकती हैं। कालबेलिया जाति को सपेरा, जोगिरा, और जोगी भी कहते हैं और इनका धर्म हिंदु है। इनके पूर्वज कांलिपार हैं, जो गुरु गोरखनाथ के १२-वें उत्तराधिकारी थे। कालबेलिया सब से ज़्यादा राजस्थान के पाली, अजमेर, चित्तौड़गढ़ और उदयपुर ज़िलों में पाये जाते हैं। कालबेलिया नृत्य इनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसमें पुरुष संगीत का पक्ष संभालते हैं। और इस पक्ष को संभालने के लिए जिन साज़ों का वे सहारा लेते हैं, उनमें शामिल हैं पुंगी, डफ़ली, बीन, खंजरी, मोरचंग, खुरालिओ और ढोलक, जिनसे नर्तकियों के लिए रीदम उत्पन्न की जाती है। जैसे जैसे नृत्य आगे बढ़ता है, रिदम और तेज़ होती जाती है। इन नर्तकियों का शरीर इतना लचीला होता है कि देख कर ऐसा लगता है जैसे रबर के बनें हैं। जिस तरह से बीन बजाकर सांपों को आकर्षित और वश में किया जाता है, कालबेलिया की नर्तकियाँ भी उसी अंदाज़ में बीन और ढोलक के इर्द गिर्द लहरा कर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। तो आइए किसी संगीत समारोह से प्राप्त एक विडिओ देखें और सुनें जिसमें वादक बीन बजा रहे हैं और साथ में ढोलक है संगत के रूप में।

बीन की धुन


बीन का इस्तमाल बहुत से हिंदी फ़िल्मी गीतों में होता आया है। और जब भी कभी सांप के विषय पर फ़िल्म बनी तो बीन के पीसेस बहुतायत में शामिल हुए। कभी हारमोनियम और क्लेविओलिन से बीन की ध्वनि उत्पन्न की गई, कभी कोई और सीन्थेसाइज़र से। क्योंकि मूल बीन बहुत ज़्यादा सुरीला या कर्णप्रिय नहीं होता है, इसलिए किसी और साज़ के इस्तमाल से बीन का ईफ़ेक्ट लाया गया है ज़्यादातर गीतों में। आइए फ़िल्म 'नगीना' का शीर्षक गीत सुनते हैं लता मंगेशकर की आवाज़ में; आनंद बक्शी के बोल और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत। गीत की शुरुआत में एक लम्बा पीस है बीन का, और यह पीस बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुई थी और आज भी अगर किसी संदर्भ में बीन के धुन की ज़रूरत पड़ती है, तो इसी पीस का सहारा लिया जाता है।

मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा (नगीना)


सुर-संगम में आज बस इतना ही, अगले हफ़्ते फिर कुछ और लेकर हम हाज़िर होंगे, अनुमति दीजिये, नमस्कार!

प्रस्तुति-सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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