Saturday, July 4, 2009

कहीं दूर जब जब दिन ढल जाए....ऐसे मधुर गीत होठों पे आये....



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 131

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप ने १९६१ में बनी फ़िल्म 'प्यासे पंछी' का गीत सुना था। आइये आज एक लम्बी छलांग लगा कर १० साल आगे को निकल आते हैं। यानी कि सन् १९७१ में। दोस्तों, यही वह साल था जिसमें बनी थी ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फ़िल्म 'आनंद'। इस फ़िल्म ने लोगों के दिलों पर कुछ इस क़दर छाप छोड़ी है कि आज लगभग ४ दशक बाद भी जब यह फ़िल्म टी.वी. पर आती है तो लोग उसे बड़े प्यार और भावुकता से देखते हैं। 'आनंद' कहानी है आनंद सहगल (राजेश खन्ना) की, जो एक कैंसर का मरीज़ हैं, और यह जानते हुए भी कि वह यहाँ पर चंद रोज़ का ही मेहमान है, न केवल अपनी बची हुई ज़िंदगी को पूरे जोश और आनंद से जीता है बल्कि दूसरों को भी उतना ही आनंद प्रदान करता है। ठीक विपरीत स्वभाव के हैं भास्कर बैनर्जी (अमिताभ बच्चन), जो उनके डौक्टर हैं, जो देश की दुरवस्था को देख कर हमेशा नाराज़ रहते हैं। आनंद से रोज़ रोज़ की मुलाक़ातें और नोंक-झोंक डा. भास्कर को ज़िंदगी के दुख तक़लीफ़ों के पीछे छुपी हुई ख़ुशियों के रंगों से अवगत कराती है। अपनी चारों तरफ़ ढेर सारी ख़ुशियाँ बिखेर कर, अपने आस पास के कई ज़िंदगियों को आबाद कर, आनंद इस दुनिया को छोड़ जाता है, जो डा. भास्कर को उस पर एक क़िताब लिखने की प्रेरणा देता है। 'आनंद' की मूल कहानी को लिखा था ख़ुद ऋषिकेश मुखर्जी ने, और फ़िल्म के लिये विस्तृत लेखन का काम किया था बिमल दत्त, डी. एन. मुखर्जी, बीरेन त्रिपाठी और गुलज़ार ने। फ़िल्म का निर्माण एन. सी. सिप्पी और ऋषि दा ने मिलकर किया था। फ़िल्म के संगीतकार थे सलिल दा, यानी कि सलिल चौधरी। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि इसमें ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं थी। ज़बरदस्ती अगर गानें डाले जाते तो वह फ़िल्म के हित में नहीं होते। इसलिए ऋषि दा ने फ़िल्म में केवल चार गानें रखे, और उल्लेखनीय बात यह है कि इन चारों गीतों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। ये चारों गानें ऐसे हैं कि इन्हे लोकप्रियता या गुणवत्ता की दृष्टि से क्रम नहीं दिया जा सकता। तो जनाब, आज के लिए हमें इस फ़िल्म का एक गीत चुनना था, तो हम ने चुना, उम्मीद है आप भी शायद इसी गीत को सुनना चाह रहे होंगे।

"कहीं दूर जब दिन ढल जाये, चाँद सी दुल्हन बदन चुराये चुपके से आये"। मुकेश की आवाज़ में यह गीत लिखा था गीतकार योगेश ने। शुद्ध हिंदी में गीत लिखने में माहिर गीतकारों की बात करें तो जो परम्परा कवि प्रदीप, पं. नरेन्द्र शर्मा, जी. एस. नेपाली और भरत व्यास जैसे गीतकारों ने शुरु की थी, आगे चलकर योगेश ने भी वही राह अपनाई। वैसे 'आनंद' फ़िल्म के जो दो गीत उन्होने लिखे (दूसरा गीत था "ना जिया लागे ना"), उनमें शुद्ध हिंदी का क्यों प्रयोग हुआ, वह बात योगेश जी ने विविध भारती के एक पुराने कार्यक्रम में कहा था, उन्ही के शब्दों में पढ़िये - "सलिल दा के जो काम्पोसिशन्स होते थे, उनमें उर्दू के शब्दों की गुंजाइश नहीं होती थी। उनकी धुनें ऐसी होती थीं कि उर्दू के शब्द उसमें फ़िट नहीं हो सकते। पहले वहाँ शैलेन्द्र जी लिखते थे, जो सीधे सरल शब्दों में गहरी बात कह जाते थे। एक और बात, मैं तो सलिल दा से यह कह चुका हूँ कि अगर वे संगीत के बजाये लेखन की तरफ़ ध्यान देते तो रबींद्रनाथ ठाकुर के बाद उन्ही की कवितायें जगह जगह गूँजते।" दोस्तों, प्रस्तुत गीत भी किसी ख़ूबसूरत कविता से कम नहीं है। इसके बारे में और ज़्यादा कुछ कहने से बेहतर यही है कि इसे तुरंत सुना जाये!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. गिनी चुनी महिला संगीतकारों में से एक उषा खन्ना का स्वरबद्ध है ये गीत.
2. बहुत खूबसूरत लिखा है इसे जावेद अनवर ने.
3. एक अंतरे की पहली चार पंक्तियों में ये दो शब्द हैं - "तस्कीन" और "जिन्दगी".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी 34 अंकों के लिए एक बार फिर बधाई. एकदम सही जवाब. स्वप्न जी बस जरा सा पीछे रह गयी. आज महिला संगीतकार की बात है आज देखते हैं कौन बाज़ी मारता है. मुकाबला बहुत दिलचस्प हो चुका है. दिशा जी, पराग जी, संगीता जी, और मनु जी आप सब को भी बधाईयाँ.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सुनो कहानी: वैराग्य - मुंशी प्रेमचंद



मुंशी प्रेमचंद की "वैराग्य"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानी "पहेली" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की कहानी "वैराग्य", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 13 मिनट 16 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

छि:छि:। तुम्हारे ऊपर निहोरा कौन कर सकता है? कैसी बात मुख से निकालती है? ऋण लेने में कोई लाज नहीं है। कौन रईस है जिस पर लाख दो-लाख का ऋण न हो?
(प्रेमचंद की "वैराग्य" से एक अंश)


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#Twenty-eighth Story, Vairagya: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2009/23. Voice: Anurag Sharma

Friday, July 3, 2009

तुम ही मेरे मीत हो, तुम ही मेरी प्रीत हो - हेमंत कुमार और सुमन कल्याणपुर का बेहद रूमानी गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 130

दोस्तो, कल ही हम बात कर रहे थे दो गीतों में शाब्दिक और सांगीतिक समानता की। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज जो गीत हम लेकर आये हैं उस गीत में आप को फ़िल्म 'ख़ानदान' के गीत "तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा" से कुछ निकटता नज़र आयेगी। 'ख़ानदान' फ़िल्म 1965 में आयी थी जिसके संगीतकार थे रवि। और आज जिस गीत को हम लेकर आये हैं वह है फ़िल्म 'प्यासे पंछी' का, जो आयी थी सन् 1961 में। इसका अर्थ यह है कि 'प्यासे पंछी' फ़िल्म का यह गीत 'ख़ानदान' के गीत से पहले बना था, लेकिन लोकप्रियता की दृष्टि से फ़िल्म 'ख़ानदान' के गीत को ज़्यादा सफलता मिली। संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने 'प्यासे पंछी' में संगीत दिया था और लक्ष्मीकांत इस फ़िल्म में उनके सहायक थे। सुमन कल्याणपुर और हेमन्त कुमार की आवाज़ों में यह गीत है "तुम ही मेरे मीत हो, तुम ही मेरी प्रीत हो, तुम ही मेरी आरज़ू का पहला पहला गीत हो"। उन दिनों सुमन जी की आवाज़ लता जी की आवाज़ से इस क़दर मिलती थी कि कई बार तो बड़े-बड़े दिग्गज और फ़िल्म संगीत के बड़े जानकार भी धोखा खा जाते थे। इस गीत को सुनते हुए भी यही आभास होता है कि कहीं लता जी तो नहीं गा रहीं। सुमन कल्याणपुर के लिये यह वरदान भी था और अभिशाप भी कि उनकी आवाज़ लताजी से मिलती-जुलती थी। लेकिन सरगम के अथाह सागर में डूबकर मोती तलाश करनेवालों को सुमन जी के गाये गानों की अहमीयत का अंदाज़ा है। उनकी आवाज़ का अल्हड़पन और शोख़ी सुननेवालों को लुभाते हैं। उन दिनों लताजी की गायिकी का असर इतना विशाल था कि हर फ़िल्मकार उनसे गानें गवाना चाहते थे। लेकिन कम बजट की फ़िल्मों के निर्माताओं के लिए चूँकि लताजी महंगी साबित होतीं, इसलिए उन फ़िल्मों में सुमन कल्याणपुर से गवाया जाता था। सुमन जी को 'गरीबों की लता' कहा जाने भी लगा था। ये तो थी सुमन जी की कुछ बातें, हेमन्त दा के बारे में कुछ बातें हम पहले बता चुके हैं, कुछ आगे भी बतायेंगे, फ़िल्हाल बस इतना ही कहेंगे कि कल्याणजी-आनंदजी ने हेमन्त दा से कई ख़ूबसूरत गाने गवाये हैं, जिनमें से कुछ लता जी के साथ युगल गीत हैं। सुमन जी के साथ उनका गाया हुआ यह गीत सब से ज़्यादा मशहूर हुआ था।

1961 में बनी 'प्यासे पंछी' का निर्माण श्री प्रकाश पिक्चर्स ने किया था और इस का निर्देशन किया था हरसुख भट्ट ने। अभी हाल ही में हम ने आप को 'रेशमी रूमाल' फ़िल्म का एक गीत सुनवाया था, उस फ़िल्म के निर्देशक भी हरसुख भट्ट साहब ही थे। 'प्यासे पंछी' के मुख्य कलाकार थे महमूद और अमीता। प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म में मुकेश के गाये कई गीत प्रसिद्ध हुए थे, ख़ास कर फ़िल्म का शीर्षक गीत "प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाये"। इस फ़िल्म में कुल 10 गीत थे जिनमें से 3 मुकेश ने गाये, 2 लता, 1 मुकेश-लता, 1 रफ़ी-बलबीर-शमशाद बेग़म, 1 गीता दत्त-मन्ना डे, 1 रफ़ी-सुमन कल्याणपुर और सुमन-हेमन्त का गाया प्रस्तुत गीत। यह फ़िल्म कल्याणजी-आनंदजी की शुरू-शुरू की फ़िल्मों में से एक है। फ़िल्म तो बहुत ज़्यादा नहीं चली थी, लेकिन इस प्रतिभाशाली संगीतकार जोड़ी के काम को काफ़ी सराहना मिली थी इस फ़िल्म से।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. योगेश का लिखा गीत।
2. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन डॉक्टर की भूमिका में हैं।
3. मुखड़े में शब्द है 'चुपके'।

पिछली पहेली का परिणाम-
इस बार हमारी दिग्गज़ मात खा गईं। हमने इस बार क्लू थोड़े कम दिये, शायद इसलिए भी स्वप्न मंजूषा कंफ्यूज़ हो गईं। शरद जी ने बिलकुल सही जवाब दिया। बधाई। शरद जी ने 32 अंक हो गये। पराग जी आपका धन्यवाद

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

वो इश्क जो हमसे रूठ गया........महफ़िल-ए-जाविदा और "फ़रीदा"



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२६

ब कुछ आपकी उम्मीद के जैसा हो, लेकिन ज्यादा कुछ आपकी उम्मीद से परे, तो किंकर्तव्यविमुढ होना लाज़िमी है। ऐसा हीं कुछ हमारे साथ हो रहा है। इस बात का हमें फ़ख्र है कि हम महफ़िल-ए-गज़ल में उन फ़नकारों की बातें करते हैं,जिनका मक़बूल होना उनका और हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और यही कारण है कि हमें अपने पाठकों और श्रोताओं से ढेर सारी उम्मीदें थीं और अभी भी हैं। और इन्हीं उम्मीदों के दम पर महफ़िल-ए-गज़ल की यह रौनक है। हमने सवालों का दौर यह सोचकर शुरू किया था कि पढने वालों की याददाश्त मांजने में हम सफल हो पाएँगे। पिछली कड़ी से शुरू की गई इस मुहिम का रंग-रूप देखकर कुछ खुशी हो रही है तो थोड़ा बुरा भी लग रहा है। खुशी का सबसे बड़ा सबब हैं "शरद जी" । जब तक उन्हें "एपिसोड" वाली कहानी समझ नहीं आई, तब तक उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हर बार जवाबों का पिटारा लेकर हीं हाज़िर हुए। हमें यह बात बताने में बड़ी खुशी हो रही है कि शरद जी ने पहली बार में हीं सही जवाब दे दिया और ४ अंकों के हक़दार हुए। चूँकि इनके अलावा कोई भी शख्स मैदान में नहीं उतरा इसलिए ३ अंक और २ अंकों वाले स्थान खाली हीं रहे। और यही बात है जो थोड़ी विचारणीय है। आखिर क्या कारण है कि हमारे पाठक फूर्ति नहीं दिखा रहे। भाई! कम से कम गज़लों को सुनने के बहाने हीं पिछली कड़ियों का एक चक्कर लगा लिया करें। कुछ भूली-बिसरी जानकारियाँ मिल जाएँगी और आपको इन सवालों का जवाब भी मिल जाएगा। इसी उम्मीद के साथ कि इस बार ज़्यादा लोग रूचि दिखाएँगे, आज की प्रक्रिया शुरू करते हैं। २५ वें से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) गुलज़ार के प्रिय एक फ़नकार जिन्होंने पंचम दा के लिए "दम मारो दम" और "चुरा लिया है" में गिटार बजाकर अपनी संगीत-यात्रा की शुरूआत की।
२) गुमनाम, क़ातिल, सरफ़रोश जैसी पाकिस्तानी फ़िल्मों में अपनी गायकी का हुनर दिखाने वाली इस फ़नकारा ने ज़नरल ज़िया उल हक़ के शासन के दौरान "फ़ैज़" के कई सारे क्रांतिकारी कलाम गाए।


इन सवालों के बाद अब आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की गज़ल और गज़ल से जुड़ी फ़नकारा मानो एक दूसरे के पूरक हैं। जहाँ भी इस गज़ल का ज़िक्र होता है, वहाँ अनकहे हीं इन फ़नकारा का नाम ज़ाहिर हो जाता है और जहाँ भी इन फ़नकारा का नाम लिया जाता है, वहाँ इनके नाम को मुकम्मल करने के लिए इस गज़ल की चर्चा लाज़िमी हो जाती है। यूँ तो इन फ़नकारा का सबसे मक़बूल कलाम है "आज जाने की ज़िद्द ना करो" ,लेकिन अगर गज़ल की बात करें तो आज की गज़ल इनकी गज़लों की फ़ेहरिश्त में सबसे ऊपर आएगी। "बुलबुल-ए-पंजाब" मुख्तार बेगम की छोटी बहन "फ़रीदा खानुम" को अगर "मल्लिका-ए-गज़ल" कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। और यकीं मानिए यह उपाधि कोई हमने यूँ हीं बातों-बातों में नहीं दे दी है, बल्कि हुनर-पसंद दुनिया इन्हें इसी नाम से जानती है। इनकी गज़ल-गायकी का अंदाज़ औरों से काफ़ी अलग है,इनकी आवाज़ में एक हल्का-सा भारीपन गज़लों के असर को कई गुना बढा देता है। यूँ तो गज़लें इनकी प्राथमिकता हैं, लेकिन गज़लों के अलावा भी इन्होंने कई सारे पंजाबी लोकगीत गाए हैं। कुछ गीत जो खासे चर्चित हुए,उनमें "बल्ले-बल्ले तोर पंजाबन दी" और "मैंने पाँव में पायल पहने हीं नहीं" ऊपर आते हैं। इन्होंने न सिर्फ़ उर्दू और पंजाबी में गज़लें गाई हैं, बल्कि "फारसी" और "पस्तो" भाषाओं पर भी इनका बराबर अधिकार रहा है। जहाँ तक पुरस्कारों की बात है तो हिन्दुस्तान में क्लासिकल और सेमि-क्लासिकल गानों वालों के लिए दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार "हाफ़िज़ अली खां अवार्ड" आज तक बस दो हीं पाकिस्तानियों के हिस्से में आया है। १९९६ में इस पुरस्कार से बाबा नुसरत फतेह अली खान को नवाज़ा गया था और सन् २००५ में "फ़रीदा खानुम" को इस पुरस्कार के लिए चुना गया , संयोग देखिए कि उसी साल जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के हाथों इन्हें "हिलाल-ए-इम्तियाज़" से नवाज़ा गया, जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा "सिविलियन" सम्मान है। "अमृतसर" में जन्मी, "कलकत्ता" में पली-बढी(कहीं-कहीं यह क्रम उल्टा भी दर्ज़ है, इसलिए यकीनन नहीं कह सकता) और बंटवारे के बाद "रावलपिंडी" में संगीत का नाम रौशन करने वाली इस मल्लिका ने विवाहोपरांत "लाहौर" को अपने घर के रूप में चुना और आज तक वहीं हैं। संगीत की साधना अभी भी जारी है। खुदा से यही दुआ है कि यह "रियाज़" कभी बंद न हो! आमीन!

यह तो हुई "फ़नकारा" की बात, अब ज़रा "शायर" से मुखातिब हुआ जाए। कभी-कभी कुछ ऐसे शायर हो जाते हैं(या फिर ज्यादातर ऐसे हीं होते हैं), जो भले हीं अपना नाम न कर पाए हों,लेकिन उनकी कोई न कोई गज़ल लोगों के जुबान पर जम हीं जाती है। आज के शायर की हक़ीक़त भी कुछ ऐसी हीं है। अंतर्जाल पर इनके बारे में ज्यादा सामग्री नहीं है और जो भी है वह बस इनके गज़लों की फ़ेहरिश्त मात्र है। "कभी साया है, कभी धूप मुकद्दर मेरा", "लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ", "सोचते और जागते साँसों का एक दरिया हूँ मैं", "इतने दिनों के बाद तू आया है आज" और "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" -बस इतनी हीं गज़लें हैं जो इनके नाम के साथ दर्ज़ हैं। आज हम इन्हीं गज़लों में से एक "वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया" सुनाने जा रहे हैं। इस गज़ल के गज़लगो हैं जनाब "अतर नफ़ीस"। मुझे नहीं मालूम कि पाकिस्तान में इनका कैसा रूतबा है, लेकिन इस बात का यकीन दिला सकता हूँ कि इनकी इस गज़ल की मक़बूलियत कमाल की है। ज़रा इस गज़ल के बोलों पर ध्यान देंगे -" वो इश्क जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या, कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं , फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।" इस मतले में "महबूब" से जो शिकायत की गई है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। जनाब इस बात का शोक मना रहे हैं कि उनका इश्क उनसे रूठ गया है और इसलिए हाल बताने लायक कुछ बचा नहीं। लेकिन जब उनसे कोई इस बात की दरख्वास्त करता है कि इसी बात पर कोई शेर सुना दिया जाए, तो वो कहते हैं कि "रूठने" की इस प्रकिया में ना कोई "दिल टूटने का दर्द" चस्पां है और ना हीं कोई "मज़ेदार किस्सा" तो फिर शेर बनाएँ तो कैसे और अगर शेर बना भी लिया तो उसमें "सच्चाई" तो होगी नहीं। इसे अगर दूसरी तरह से समझे तो माज़रा यह बनता है कि "महबूब के रूठने के बाद उनकी ज़िंदगी में ना कोई मेहर है और ना हीं कोई कहर यानि कि जीने लायक कोई ज़िंदगी हीं नहीं बची, इसलिए इस बेमतलब की ज़िंदगी के ऊपर कोई सच्चा शेर कैसे सुनाया जा सकता है।" दोनों हीं अर्थों में "महबूब" से हिज्र को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया गया है। इस गज़ल के बाकी शेरों में भी ऐसा हीं अनोखापन है। इस गज़ल की ओर बढने से पहले क्यों ना हम "अतर" साहब का एक शेर देख लें:

ऐ सरापा रंग-ओ-निखत तू बता,
किस धनक से तेरा पैराहन बुनूँ।


चलिए अब थोड़ा भी देर किए बिना आज की गज़ल से रूबरू होते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया, अब उसका हाल बताएँ क्या,
कोई मेहर नहीं, कोई कहर नहीं, फिर सच्चा शेर सुनाएँ क्या।

एक हिज़्र जो हमको ला-हक है, ता-देर उसे दुहराएँ क्या,
वो जहर जो दिल में उतार लिया, फिर उसके नाज़ उठाएँ क्या।

एक आग ग़म-ए-तन्हाई की, जो सारे बदन में फैल गई,
जब जिस्म हीं सारा जलता हो, फिर दामने-दिल को बचाएँ क्या।

हम नगमा-सरा कुछ गज़लों कें, हम सूरत-गर कुछ ख्वाबों के,
ये जज्बा-ए-शौक सुनाएँ क्या, कोई ख्वाब न हों तो बताएँ क्या।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मैं ____ भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

आपके विकल्प हैं -
a) दरिया, b) समंदर, c) साहिल, d) मांझी

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"शहर" और सही शेर कुछ यूं था -

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा...

इब्न-ए-इंशा के इस शेर को सबसे पहले सही पकडा एक बार फिर शरद जी ने, बधाई जनाब -

अब नए शहरों के जब नक्शे बनाए जाएंगे
हर गली बस्ती में कुछ मरघट दिखाए जाएंगे ।
गैर मुमकिन ये कि हम फुटपाथ पर भी चल सकें
क्योंकि हर फुटपाथ पर बिस्तर बिछाए जाएंगे ।

क्या बात है शरद जी, जहां के दर्द को बड़ी हीं खूबसूरती से दर्शाया है आपने।
दिशा जी महफ़िल में आईं तो ज़रूर, लेकिन गलत शब्द चुन लिया।
मिलिंद जी आपका स्वागत है महफ़िल-ए-गज़ल के इस मुहिम में। आपका शेर कुछ यूँ था:

सीने में जलन, आँखों में तूफ़ानसा क्यों है ?
इस शहर में हर शक्स परेशानसा क्यों है?

अगली कोशिश में दिशा जी ने सही शब्द पकड़ा। कोई बात नहीं- देर आयद, दुरूस्त आयद:

इस शहर में हर कोइ अज़नबी लगता है
भीड़ में भी हर मंजर सूना दिखता है
कहूँ तो कहूँ किससे बात अपनी
मुझे हर शख्स यहाँ बहरा लगता है...

मन्जु जी, आपका भी स्वागत है..शब्द तो सही पकड़ा है आपने,लेकिन यही दरख्वास्त रहेगी कि देवनागरी में टंकण करें।
सुमित जी, आप तो हर बार कमाल कर जाते हैं। बस ये दो बार पोस्ट करने की अदा समझ नहीं आती :)

कोई दोस्त है न रकीब है ,
तेरा शहर कितना अजीब है

शुभान-अल्लाह!

मनु जी के तो हम फ़ैन हो गए हैं। वैसे भी हमारे वो बहुत काम आते हैं। मुख्यत: शब्दार्थ बताने के :)

वैसे उनके ये दो शेर भी काबिल-ए-तारीफ़ हैं:

हर मोड़ पे रुसवाइयों का दाम मिला है
पर शहर में तेरे बहुत आराम मिला है..

घर पे आते ही मेरा साया मुझ से यूं लिपटा,
अलग शहर में था दिन भर, अलग-अलग सा रहा..

पूजा जी! आप भी यूँ हीं आती रहिए और महफ़िल का आनंद उठाती रहिए........बस एक गिला है, आप आती तो हैं लेकिन कोई शेर नहीं सुनाती। भला ऐसा क्यों? अगली बार से ऐसा नहीं चलेगा।
बाकी सभी मित्रों से भी अनुरोध है कि महफ़िल की शमा जलाए रखने में हमारे साथ बने रहें। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.


Thursday, July 2, 2009

दिल लगाकर हम ये समझे ज़िंदगी क्या चीज़ है- शक़ील बदायूँनी की दार्शनिक शायरी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 129

"होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है, इश्क़ कीजिये फिर समझिये ज़िंदगी क्या चीज़ है"। जगजीत सिंह की आवाज़ में फ़िल्म 'सरफ़रोश' की यह मशहूर ग़ज़ल तो आप ने बहुत बार सुनी होगी, जिसे लिखा था शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली साहब ने। 1999 में यह फ़िल्म आयी थी, लेकिन इससे लगभग 34 साल पहले गीतकार शक़ील बदायूँनी ने फ़िल्म 'ज़िंदगी और मौत' में एक गीत लिखा था "दिल लगाकर हम ये समझे ज़िंदगी क्या चीज़ है, इश्क़ कहते हैं किसे और आशिक़ी क्या चीज़ है"। आख़िरी अंतरे की अंतिम लाइन है "होश खो बैठे तो जाना बेख़ुदी क्या चीज़ है", जो एक बार फिर से हमारा ध्यान "होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है" की तरफ़ ले जाती है। इसमें कोई शक़ नहीं कि इन दोनों गीतों में अद्‍भुत समानता है, बोलों के लिहाज़ से भी और कुछ हद तक संगीत के लिहाज़ से भी। जिस तरह से कई गीतों का संगीत एक दूसरे से बहुत अधिक मिलता जुलता है, ठीक वैसी ही बहुत सारे गाने ऐसे भी हैं जो लेखनी की दृष्टि से आपस में मिलते जुलते हैं। 1965 की 'ज़िंदगी और मौत' तथा 1999 की 'सरफ़रोश' फ़िल्मों के ये दो गीत इसी श्रेणी में आते हैं। आगे चलकर हम इसी तरह के कुछ और उदाहरण आप के सामने लाते रहेंगे। तो आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सज रही है महेन्द्र कपूर के गाये फ़िल्म 'ज़िंदगी और मौत' के इसी गीत से। वैसे इस गीत के दो संस्करण हैं, दूसरी आवाज़ आशा भोसले की है। यह फ़िल्म संगीतकार सी. रामचन्द्र के संगीत सफ़र के आख़िरी मशहूर फ़िल्मों में से एक है। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि सी. रामचन्द्र ने ही गायक महेन्द्र कपूर को पहला बड़ा ब्रेक दिया था फ़िल्म 'नवरंग' में, जिसमें महेन्द्र कपूर ने आशाजी के साथ कुछ यादगार गीत गाये थे।

1965 की फ़िल्म 'ज़िंदगी और मौत' का निसार अहमद अंसारी ने फ़िल्म का निर्देशन किया था और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और फ़रियाल। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में यह गीत तो ख़ुद ही सुनेंगे, लेकिन आशा जी वाले वर्ज़न में से तीन अंतरे हम यहाँ आलेख में पेश कर रहे हैं शक़ील साहब की शान में - "बाद मुद्दत के मिले तो इस तरह देखा इधर, जिस तरह एक अजनबी पर अजनबी डाले नज़र, आप ने यह भी ना सोचा दोस्ती क्या चीज़ है", "पहले पहले आप ही अपना बना बैठे हमें, फिर न जाने किस लिये दिल से भुला बैठे हमें, अब हुआ मालूम हमको बेरुख़ी क्या चीज़ है", "प्यार सच्चा है तो मेरा तो देख लेना ऐ सनम, तोड़े देंगे आप ही आकर मेरी ज़ंजीर-ए-ग़म, बंदा परवर जान लेंगे बंदगी क्या चीज़ है"। शक़ील साहब की शायरी की जितनी तरीफ़ की जाए, कम है। उनकी शायरी की तारीफ़ में उन्हीं का शे'र कहना चाहेंगे कि "शक़ील दिल का हूँ तर्जुमा, मोहब्बतो का हूँ राज़दान, मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़ीम्दगी से जुदा नहीं"!




और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. जोड़ी संगीतकार का संगीत।
2. 'ग़रीबों की लता' कहीं जाने वाली गायिका की आवाज़।
3. गीत के बोल फिल्म 'ख़ानदान' के एक गीत से मिलते-जुलते हैं।

पिछली पहेली का परिणाम-
स्वप्न मंजूषा को एक बार और बधाई। अब आप 26 अंकों पर पहुँच गईं, शरद जी अंकों के बिलकुल क़रीब। राज जी, दिशा जी, मंजू जी, मनु जी का धन्यवाद। पराग जी हमेशा की तरह कुछ नायाब लेकर आये हैं। साधुवाद

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, July 1, 2009

तुमको पिया दिल दिया कितने नाज़ से- कहा मंगेशकर बहनों ने दगाबाज़ से



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 128

काश की सुंदरता केवल चाँद और सूरज से ही नहीं है। इनके अलावा भी जो असंख्य सितारे हैं, जिनमें से कुछ उज्जवल हैं तो कुछ धुंधले, इन सभी को एक साथ लेकर ही आकाश की सुंदरता पूरी होती है। यही बात फ़िल्म संगीत के आकाश पर भी लागू होती है। भले ही कुछ फ़नकार बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध हुए हों, फ़िल्म संगीत जगत पर छाये रहे हों, लेकिन इनके अलावा भी बहुत सारे गीतकार, संगीतकार और गायक-गायिकायें ऐसे भी थे जिनका इनके मुकाबले नाम ज़रा कम हुआ। लेकिन वही बात कि इन सभी को मिलाकर ही फ़िल्म संगीत सागर अनमोल मोतियों से समृद्ध हो सका है। इन कम चर्चित फ़नकारों के योगदान को अगर अलग कर दिया जाये, फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने से निकाल दिया जाये, तो शायद इस ख़ज़ाने की विविधता ख़त्म हो जायेगी, एकरसता का शिकार हो जायेगा फ़िल्म संगीत संसार। इसीलिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिये समय समय पर 'हिंद-युग्म' सलाम करती है ऐसे कमचर्चित फ़नकारों को। आज का गीत भी एक कमचर्चित संगीतकार द्वारा स्वरबद्ध किया हुआ है, जिन्हें हम और आप जानते हैं जी. एस. कोहली के नाम से। कोहली साहब का पूरा नाम था गुरुशरण सिंह कोहली, और उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका जन्म पंजाब में सन 1928 में हुआ था। धर्म से वो सिख थे लेकिन दाढ़ी-मूँछ उन्होंने नहीं रखी। 1951 में ओ. पी. नय्यर की पहली ही फ़िल्म 'आसमान' से जी. एस. कोहली नय्यर साहब के सहायक बन गये थे, और आगे चलकर उनकी एक से एक 'हिट' फ़िल्मों में उन्होने नय्यर साहब को ऐसिस्ट किया। नय्यर साहब के बहुत से गीतों में कोहली साहब ने शानदार तबला भी बजाये। बतौर स्वतंत्र संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी 'लम्बे हाथ' (1960)। अपने पूरे कैरीयर में उन्होंने कुछ 10-11 फ़िल्मों में संगीत दिया, लेकिन दो फ़िल्में जिनके संगीत की वजह से लोग उन्हें पहचानते हैं, वो दो फ़िल्में हैं- 'नमस्तेजी' और 'शिकारी', और आज इसी 'शिकारी' से एक सदाबहार नग़मा आप की ख़िदमत में हम लेकर आये हैं।

'शिकारी' 1963 की फ़िल्म थी। 'ईगल फ़िल्म्स' के बैनर तले एफ़. सी. मेहरा ने इस फ़िल्म का निर्माण किया था, कहानी सुरिंदर मेहरा की थी, पटकथा ब्रजेन्द्र गौड़ का, और निर्देशन मोहम्मद हुसैन का। अजीत और रागिनी अभिनीत इस छोटी फ़िल्म को आज अगर याद किया जाता है तो केवल इसके गानों की वजह से। इस फ़िल्म में चार गाने लिखे फ़ारूख़ क़ैसर ने और दो गानें क़मर जलालाबदी ने भी लिखे। इस फ़िल्म का जो सब से मशहूर गीत है वह है लता मंगेशकर और उषा मंगेशकर की आवाज़ों में। क़ैसर साहब के लिखे इस गीत का शुमार सर्वाधिक कामयाब 'फ़ीमेल डुएट्स' में होता है। "तुम को पिया दिल दिया कितने नाज़ से" गीत की कामयाबी का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस गीत के बनने के 40 साल बाद, यानी कि हाल ही में इस गीत का रीमिक्स बना और वह भी ख़ूब चला। लेकिन अफ़्सोस की बात यह है कि इस गीत के मूल संगीतकार को न तो इसका कोई श्रेय मिल सका और न ही उस समय उन्हें किसी फ़िल्मकार ने बड़ी बजट की कोई फ़िल्म दी। हालाँकि इस गीत को परदे पर मैंने कभी देखा नहीं है, लेकिन गीत के बोलों को सुनकर गीत को सुनकर यह कोई मुजरा गीत जान पड़ता है। अगर मैं ग़लत हूँ तो ज़रूर संशोधन कर दीजियेगा। अब बस यह बताते हुए कि लता और उषा, इन दो बहनों ने एक साथ सब से पहले फ़िल्म 'आज़ाद' में गाया था। याद है न आप को वह "अपलम चपलम" वाला गीत! यह गीत भी आगे चलकर हम ज़रूर सुनवाने की कोशिश करेंगे, फ़िल्हाल सुनिये जी. एस कोहली और फ़ारूख़ क़ैसर की याद में फ़िल्म 'शिकारी' का यह दिलकश नग़मा।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. गीत के गायक ने 'नवरंग' फिल्म में भी गाने गाये हैं।
2. इस गीत को आशा भोसले ने भी गाया है।
।3. गीत के बोल 1999 में आई फिल्म 'सरफरोश' की ग़ज़ल से मिलते-जुलते हैं।

पिछली पहेली का परिणाम-
कल भी काँटे की टक्कर रही। स्वप्न मंजूषा 2 मिनट आगे रहीं। बधाई। स्वप्न मंजूषा बहुत तेज़ी से शरद जी के 30 अंकों के करीब बढ़ रही हैं। आपके 24 अंक हो गये हैं। शरद जी, मंजू और मनु जी, इसी तरह से हमारी महफिल को गुलज़ार करते रहें। पराग जी, आपके उस आलेख का हमें भी इंतज़ार रहेगा।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, June 30, 2009

जुल्फों की घटा लेकर सावन की परी आयी....मन्ना डे ने कहा आशा से "रेशमी रुमाल" देकर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 127

यूँतो फ़िल्म जगत में एक से बढ़कर एक संगीतकार जोड़ियाँ रही हैं, जिनके नाम गिनवाने की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन बहुत सारी ऐसी संगीतकार जोड़ियाँ भी हुई हैं जो सफलता और शोहरत में थोड़े से पीछे रह गये। कमचर्चित संगीतकार जोड़ियों की बात करें तो एक नाम बिपिन-बाबुल का ज़हन में आता है। स्वतंत्र रूप से संगीतकार जोड़ी बनने से पहले वे मदन मोहन साहब के सहायक हुआ करते थे। 1958 से वे बने कल्याणजी-आनंदजी के सहायक। बतौर स्वतंत्र संगीतकार बिपिन-बाबुल ने संगीत दिया 'सुल्ताना डाकू', 'बादल और बिजली', और '24 घंटे' जैसी फ़िल्मों में, जिनमें '24 घंटे' 'हिट' हुई थी। पर आगे चलकर बिपिन दत्त और बाबुल बोस की जोड़ी टूट गयी। बिपिन को कामयाबी नहीं मिली। लेकिन बाबुल को थोड़ी बहुत कामयाबी ज़रूर मिली। उनकी फ़िल्म '40 दिन' के गानें आज भी सदाबहार गीतों में शामिल किया जाता है। वैसे बाबुल की तमन्ना थी गायक बनने की। लखनऊ के 'मॊरिस कॊलेज' से तालीम लेकर दिल्ली और लाहौर के रेडियो से जुड़े रहे, लेकिन देश विभाजन के बाद उनहे भारत लौट आना पड़ा, तथा बम्बई आ कर मदन मोहन के सहयक बन गये। 'मधोशी' से लेकर 'रेल्वे प्लेटफ़ार्म' जैसी फ़िल्मों में उन्होने मदन मोहन के साथ काम किया। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम बिपिन-बाबुल' की जोड़ी की नहीं, बल्कि सिर्फ़ बाबुल द्वारा संगीतबद्ध की हुई फ़िल्म 'रेशमी रूमाल' का एक बड़ा ही प्यारा सा गीत आप को सुनवाने जा रहे हैं जिसे आशा भोंसले और मन्ना डे ने गाया था - "ज़ुल्फ़ों की घटा लेकर सावन की परी आयी, बरसेगी तेरे दिल पर हँस हँस के जो लेहराई"।

'रेशमी रूमाल' सन् 1961 की फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था हरसुख जगनेश्वर भट्ट ने, और मुख्य भूमिकाओं में थे मनोज कुमार और शक़ीला। बाबुल बोस ने इस फ़िल्म में आशा जी और मन्ना दा के अलावा सुमन कल्याणपुर, तलत महमूद और मुकेश से भी गानें गवाये थे। ख़ास कर मुकेश का गाया "गरदिश में हो तारे, ना घबराना प्यारे" बहुत बहुत पसंद किया गया था। लेकिन जो प्रस्तुत गीत है, वह भी अपने आप में बेहद ख़ास है अपने बोलों, संगीत और गायिकी के लिहाज़ से। कुछ हद तक शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गीत को सुनते हुए इसके इंटरल्युड संगीत में आप को सचिन देव बर्मन द्वारा इस्तेमाल होने वाले उस ध्वनि की झलक सुनने को मिलेंगी जिसे सचिन दा अक्सर अपनी धुनों में इस्तेमाल किया करते थे। आप सुनिये, खुद ही समझ जायेंगे मैं किस ध्वनि की बात कर रहा हूँ। इस गीत को लिखा था गीतकार राजा मेहंदी अली ख़ान ने। यूँ तो सावन और बरसात पर असंख्य गीत लिखे गये हैं, लेकिन प्रस्तुत गीत में सावन का जिस तरह से मानवीकरण किया गया है, वह लाजवाब है। सावन को परी और बादलों को उसके ज़ुल्फ़ों की उपमा दी गयी है। आगे चलकर दूसरे अंतरे में वो लिखते हैं कि "आती हो तो आँखों में बिजली सी चमकती है, शायद यह मोहब्बत है आँखों से छलकती है", अर्थात्, बिजली की चमक को सावन का प्यार जो वो लुटाती है इस धरती पर। तो चलिये, अब और देर किस बात की, सावन की इसी प्यार से भीगते हैं आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. संगीतकार जी एस कोहली ने संगीतबद्ध किया है इस गीत को.
२. फारूख कैसर है गीतकार.
३. ये एक "फिमेल" डुइट है, जिसके मुखड़े में शब्द है - "दगाबाज़".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
30 अंकों पर शरद जी हैं तो स्वप्न जी भी कल के सही जवाब के साथ बढ़कर अब 22 अंकों पर आ गयी हैं, भाई इनमें तो कडा मुकाबला है पर पराग जी, मनु जी, नीरज जी, आप सब कहाँ है? पुराने दिग्गजों जरा जोश में आओ. शामिख फ़राज़ जी, निर्मला जी, सुमित जी आप सब का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, न वादा-ए-अलस्त का..........अभी तो मैं जवान हूँ!!



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२५

ज़लों की यह महफ़िल अपने पहले पड़ाव तक पहुँच चुकी है। आज हम आपके सामने महफ़िल-ए-गज़ल का २५वाँ अंक लेकर हाज़िर हुए हैं। आगे बढने से पहले हम इस बात से मुतमईन होना चाहेंगे कि जिस तरह इस महफ़िल को आपके सामने लाने पर हमने फ़ख्र महसूस किया है, उसी तरह आपने भी बराबर चाव से इस महफ़िल की हर पेशकश को अपने सीने से लगाया है। ऐसा करने के पीछे हमारी यह मंशा नहीं है कि आपका इम्तिहान लिया जाए, बल्कि हम यह चाहते हैं कि अब तक जितने भी फ़नकारों को हमने इस महफ़िल के बहाने याद किया है, उनकी यादों का असर थोड़ा-सा भी कम न हो। वैसे भी बस आगे बढते रहने का नाम हीं ज़िंदगी नहीं है, राह में चलते-चलते कभी-कभी हमें पीछे छूट चुके अपने साथियों को भी याद कर लेना चाहिए। और इसी कारण आज से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है।तो दोस्तों! कमर कस लीजिए इस अनोखी प्रतियोगिता का हिस्सा बनने के लिए । ये रहे आज के सवाल: -

१) "मक़दूम मोहिउद्दीन" की लिखी एक गज़ल "आपकी याद आती रही रात भर" गाकर इन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरूआत की थी।
२) २००५ में रीलिज हुई "सावन की रिमझिम में" में से ली गई एक नज़्म , जिसे कलमबद्ध किया था योगेश ने और संगीत से सजाया था श्याम शर्मा ने।


चलिए अब ,बाकी के दिनों की तरह हीं आज की गज़ल और उससे जुड़े फ़नकारों की बात करते हैं। आज हम जो गज़ल/गीत/नज़्म लेकर आपके सामने हाज़िर हुए हैं, उसकी खासियत यह है कि ना सिर्फ़ उसके शायर की मक़बूलियत का लोहा माना जाता है, बल्कि उसे गाने वाली फ़नकारा का भी कोई जवाब नहीं है और सबसे बढकर वह नज़्म खुद अपनी प्रसिद्धि की जीती-जागती एक मिसाल है। जहां में ऐसा कौन होगा जिसने "अभी तो मैं जवान हूँ" का कम से कम एकबार भी लुत्फ़ न लिया हो। यह शब्द-समूह, यह "मिसरा" सुनने में बड़ा हीं साधारण महसूस होता है,लेकिन मेरा दावा है कि अगर एक बार भी आपने पूरी नज़्म को सही से सुन लिया तो आप खुद को इसका मुरीद होने से नहीं रोक पाएँगे। "हसीन जलवारेज़ हो, अदाएं फ़ितनाख़ेज़ हो, हवाएं इत्रबेज़ हों, तो शौक़ क्यूँ न तेज़ हो?"- वल्लाह! शायर ने कितने आराम से इश्क और हुस्न की अदाओं का जिक्र किया है, पढो तो एक-एक हर्फ़ इत्र में डूबा नज़र आता है सुनो तो आवाज़ में एक शोखी-सी घुली लगती है। वैसे शायर के लफ़्ज़ों में ऐसा असर हो क्यूँ ना, जोकि शायर का नाम "हाफ़िज़ जालंधरी" हो। मुल्के-पाकिस्तान का क़ौमी तराना "पाक सरजमीं शद बद" लिखने वाले इस शायर के खाते में पाकिस्तान का सबसे बड़ा तमगा "हिलाल-ए-इम्तियाज़" और "प्राइड आफ़ परफ़ारमेंश" दर्ज़ है। इस शायर ने "फिरदौसी" के "शाहनामा" के तर्ज़ पर "शाहनामा-ए-इस्लाम" की रचना की है। "दीन-ए-इस्लाम" की इज्जत करने वाले इस शख्स की सोच का कमाल देखिए कि जो नज़्म एक तरफ़ किसी की अदाओं और शोखियों को बयान करती है, वहीं दूसरी तरफ़ बड़ी हीं खामोशी से "दर्शन" की भी बात करती है। जरा इस मिसरे पर गौर फ़रमाईयेगा: "न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, बुलंद का न पस्त का, न बूद का न हस्त का न वादा-ए-अलस्त का। " अर्थात - "मुझे अपनी ज़िंदगी के न तो बंद किस्से का ग़म है और न हीं किसी खुली दास्तां का। मैं सफ़र में आई न किसी ऊँचाई की फ़िक्र करता हूँ और न हीं किसी गहराई की। मुझे न अपने होने की चिंता है और न हीं अपने रूतबे की। और न हीं मैं संसार की उत्पत्ति के समय किए गए किसी वादे से इत्तेफ़ाक रखता हूँ।"

जानकारी के लिए बता दूँ कि "अलस्त" का शाब्दिक अर्थ है "नहीं हूँ" ,लेकिन इसका भावार्थ बड़ा हीं व्यापक है। कहा जाता है कि जब खुदा ने इस कुदरत की तख्लीक की थी तो उस समय उन्होंने इसी शब्द का उच्चारण किया था। "अलस्त" कहकर उन्होंने अपने पहले बंदे से यह सवाल किया था कि "क्या मैं तुम्हारा खुदा नहीं हूँ?" और उस बंदे ने जवाब दिया था कि "हाँ, आप हीं मेरे खुदा हैं।" किसी के भी द्वारा उठाई गई संसार में यह सबसे पहली कसम है। और जब कोई इंसान इस कसम को झुठलाने को तैयार हो जाए तो या तो वह इश्क में डूबा है या फिर वह काफ़िर है। वैसे भी कहते हैं कि आशिक और दार्शनिक में फ़र्क नहीं होता। इसलिए यहाँ पर इंसान का इश्क हीं ज़ाहिर होता है। इस नज़्म में और भी ऐसी बातें हैं,जिसपर तहरीरें लिखी जा सकती हैं। लेकिन कुछ लिखने से अच्छा है कि उसे महसूस किया जाए। इसलिए हम यही चाहेंगे कि आप इस नज़्म का एक-एक हर्फ़ खुद में उतार लें, एक-एक हर्फ़ जियें, फिर देखिए..जवानी कहीं भी हो,आपके पास न आ जाए तो कहिएगा। इस नज़्म को जिन फ़नकारा ने अपनी आवाज़ के जादू से सराबोर किया है, उनकी बात किए बिना इस महफ़िल की शमा को बुझाना तो एक गुस्ताखी होगी। "मजज़ूब" बाबा मोती राम ने इन्हें "मल्लिका" कहा था तो इनकी चाची ने इन्हें खुशबू से भरा "पुखराज"। महज़ "नौ" साल की उम्र में "कश्मीर" के राजा "महाराज हरि सिंह" को इन्होंने अपनी आवाज़ का दीवाना बना दिया था। फिर तो ये उस दरबार की शान हो गईं। "अठारह" साल की उम्र तक इन्होंने वहीं गुजर किया, लेकिन जब इन्हें इस बात की भनक पड़ी कि राजा की नियत इन्हें अपने हरम में डालने की है तो ये वहाँ से भाग निकली। अपनी आवाज़ और अपने हुस्ने के लिए जानी जाने वाली इस मल्लिका ने "घुड़सवारी" का ऐसा नज़ारा पेश किया कि देखने और सुनने वाले दंग रह गए। "मल्लिका पुखराज" एक ऐसी शख्सियत थीं,जिन्हें एक आलेख में समेटा नहीं जा सकता। इसलिए इनके बारे में आगे कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

अभी तो मैं जवान हूँ!

हवा भी ख़ुशगवार है, गुलों पे भी निखार है
तरन्नुमें हज़ार हैं, बहार पुरबहार है
कहाँ चला है साक़िया, इधर तो लौट इधर तो आ
अरे, यह देखता है क्या? उठा सुबू, सुबू उठा
सुबू उठा, पियाला भर पियाला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र, समा तो देख बेख़बर
वो काली-काली बदलियाँ ,उफ़क़ पे हो गई अयां
वो इक हजूम-ए-मैकशां, है सू-ए-मैकदा रवां
ये क्या गुमां है बदगुमां, समझ न मुझको नातवां
ख़याल-ए-ज़ोह्द अभी कहाँ? अभी तो मैं जवान हूँ
अभी तो मैं जवान हूँ!

इबादतों का ज़िक्र है, निजात की भी फ़िक्र है
जुनून है सबाब का, ख़याल है अज़ाब का
मगर सुनो तो शेख़ जी, अजीब शय हैं आप भी
भला शबाब-ओ-आशिक़ी, अलग हुए भी हैं कभी
हसीन जलवारेज़ हो, अदाएं फ़ितनाख़ेज़ हो
हवाएं इत्र्बेज़ हों, तो शौक़ क्यूँ न तेज़ हो?
निगारहा-ए-फ़ितनागर , कोई इधर कोई उधर
उभारते हो ऐश पर, तो क्या करे कोई बशर
चलो जी क़िस्सा मुख़्तसर, तुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़र
दुरुस्त है तो हो मगर, अभी तो मैं जवान हूँ
अभी तो मैं जवान हूँ!

ये ग़श्त कोहसार की, ये सैर जू-ए-वार की
ये बुलबुलों के चहचहे, ये गुलरुख़ों के क़हक़हे
किसी से मेल हो गया, तो रंज-ओ-फ़िक्र खो गया
कभी जो वक़्त सो गया, ये हँस गया वो रो गया
ये इश्क़ की कहानियाँ, ये रस भरी जवानियाँ
उधर से महरबानियाँ, इधर से लन्तरानियाँ
ये आस्मान ये ज़मीं, नज़्ज़राहा-ए-दिलनशीं
उन्हें हयात आफ़रीं, भला मैं छोड़ दूँ यहीं
है मौत इस क़दर बरीं, मुझे न आएगा यक़ीं
नहीं-नहीं अभी नहीं, नहीं-नहीं अभी नहीं
अभी तो मैं जवान हूँ!

न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बूद का न हस्त का न वादा-ए-अलस्त का
उम्मीद और यास गुम, हवास गुम क़यास गुम
नज़र से आस-पास गुम, हमन बजुज़ गिलास गुम
न मय में कुछ कमी रहे, कदा से हमदमी रहे
नशिस्त ये जमी रहे, यही हमा-हमी रहे
वो राग छेड़ मुतरिबा, तरवफ़िज़ा आलमरुबा
असर सदा-ए-साज़ का, जिग़र में आग दे लगा
हर इक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया
पिलाए जा पिलाए जा, पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मैं जवान हूँ !




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

इस __ में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा|

आपके विकल्प हैं -
a) गली, b) बाज़ार, c) शहर, d) महफिल

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"फुर्सत" और सही शेर कुछ यूं था -

हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत,
रोने को यहाँ वैसे भी फुर्सत नहीं मिलती...

निदा फाजली के इस शेर को सबसे पहले सही पकडा एक बार फिर शरद जी ने, बधाई जनाब -

तुम्हें गैरों से कब फ़ुर्सत और हम ग़म से कब खाली
चलो अब हो चुका मिलना न तुम खाली न हम खाली

हा हा हा....वाह शरद जी, दिशा जी खूब रंग जमाया आपने भी महफिल में इन शेरों से -

वो कहते हैं कि दर्द झलकता है चेहरे पर मेरे
ग़मों ने फुर्सत ही कहाँ दी मुस्कराने की
ललक बची ही नहीं जीने की मेरे अंदर
वज़ह कहाँ से लाऊँ मुस्कराने की

कभी फु़र्सत मिले तो सोचें क्या मिला जिन्दगी से
अभी तो यूँ ही जिन्दगी जिये जाते हैं
वो दर्द बयाँ करें ना करें अपना उनकी मर्जी
चेहरे के भाव सारी दास्ताँ कह जाते हैं...

पूजा जी का ख्याल एकदम सही लगा, और शैलेश जी सही कहा आपने इंशा जी की वो ग़ज़ल वाकई नायाब है.

शबे फुरकत का जागा हूँ, फरिश्तों अब तो सोने दो
कभी फुर्सत मे कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

सुमित जी बहुत खूब....नीलम जी, शमिख जी, जरा आप भी रचना जी का ये शेर मुलाहजा फरमाएं -

दर्द मेरा था जो तेरे बहाने निकला
चन्द लम्हे फुर्सत के कमाने निकला
संघ हर शख्स ने उस पर बरसाए
जो दिल की दुनिया बसाने निकला

आशीष जी ने निदा साहब की याद किया इस शेर के साथ -

तुम्हारी कब्र में मैं दफन हूं तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना |

दिलीप जी आपका आना बहुत सुखद लगा. मंजू जी आपका शेर भी खूब रहा, और मनु साहब का ये शेर, जो हमें बहुत पसंद आया...वजह ??? बताते हैं, पहले शेर पढें -

रहने दो अपनी जल्दबाज नजर
मुझ को पढना है तो फुर्सत से पढो...

भई हम भी बस यही चाहते हैं की आप भी इस महफिल में ज़रा फुर्सत से बैठें और पढें /सुनें. यही तो चंद लम्हें हैं जिंदगी के सुकून से भरे.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.


Monday, June 29, 2009

बेकरार दिल तू गाये जा खुशियों से भरे वो तराने... जो बजते हैं ओल्ड इस गोल्ड की शान बनकर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 126

किशोर कुमार द्वारा निर्मित, निर्देशित, अभिनीत और संगीत बद्ध किये हुए गिने चुने फ़िल्मों का ज़िक्र हो रहा हो, तो उसमें एक महत्वपूर्ण नाम आता है फ़िल्म 'दूर का राही' का। १९७१ में बनी इस फ़िल्म मे किशोर दा के साथ साथ अभिनय किया था उनके बेटे अमित कुमार और बड़े भाई अशोक कुमार ने, नायिका बनीं तनुजा। वाणिज्यिक दृष्टि से फ़िल्म को उतनी सफलता नहीं मिली जितनी उम्मीद की गयी थी, लेकिन किशोर दा ने इस फ़िल्म में कुछ ऐसा संगीत दिया कि इसके गानें आज भी दिल को सुकून प्रदान कर जाते हैं। जीवन दर्शन के विचारों से ओत-प्रोत इस फ़िल्म के गीत आज भी सुननेवाले के मन में एक सकारात्मक सोच पैदा करती है। चाहे वह हेमन्त कुमार का गाया "फिर भी चला जाये दूर का राही" हो, या किशोर दा की ही आवाज़ में "जीवन से ना हार ओ जीनेवाले", या फिर सुलक्षणा पंडित और किशोर दा की युगल स्वरों में इस फ़िल्म का सब से प्यारा गीत "बेक़रार दिल तू गाये जा ख़ुशियों से भरे वो तरानें"। जी हाँ, आज यही गीत गूंज रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। यूँ तो इस फ़िल्म में शैलेन्द्र ने भी गानें लिखे थे, लेकिन प्रस्तुत गीत ए. इरशाद का लिखा हुआ है, जो फ़िल्म जगत के एक बहुत ही कमचर्चित गीतकार रहे हैं।

सुलक्षणा पंडित, जिन्होने किशोर कुमार के साथ बहुत सारे स्टेज शोज़ किये हैं, जब उनसे इस कालजयी गीत के बारे में पूछा गया, तो उन्होने उन स्वर्णिम दिनों को याद करते हुए कहा (सौजन्य: विविध भारती) - "उस गाने में किशोर दा ने मुझे बहुत चिढ़ाया था। उन्होने कहा 'नहीं, तुम "बेक़रारे" बोलोगी'; मैने बोला 'मैं "बक़रार" बोलूंगी', उन्होने फिर कहा कि 'नहीं, तुम "बेक़रारे" बोलोगी'; तो मैं बोली 'मैं "बक़रार" ही बोलूंगी'। ऐसा करते करते हम स्टुडियो पहुँचे, फ़िल्म-सेंटर, वहाँ पर रेखा भी थीं, योगिता बाली भी थीं। तो रिकॉर्डिंग के वक़्त, किशोर दा तो किशोर दा थे, बोले, 'इस लड़की को हटाओ यहाँ से, नहीं तो परदा लगा दो, बहुत देखती है मुझे'। तो इस तरह से "बेक़रार दिल" हमने गाया। "बेक़रार दिल" सिर्फ़ दो बार गाया गया। तो किशोर दा की माँगें कि 'ये लगा दो, परदा लगा दो, लड़कियों को भगा दो', और मैं भी खड़ी हुई, मैं कुछ बोलूँगी तो, पर काफ़ी देर तक जब ऐसा होने लगा तो मैने बोला 'देखिये, आप इतना क्यों कर रहे हैं, हम लोग तो ऐसे नहीं।' फिर हमने गाना गाया उनके साथ, और किशोर कुमार तो धनी हैं हर चीज़ के, संगीतकार वो हैं, अभिनेता वो हैं, लेखक वो हैं, फ़िल्मकार वो हैं, क्या नहीं हैं वो, हर चीज़ से भरपूर, सराफ़ा एक कलाकार नज़र आता है उनमें। उमर में वो मेरे पंडित जसराज जी जैसे ही थे लेकिन अंदर से बच्चे, और बातें करना अपने पत्तों से, अपने बग़ीचे से, रोज़ अपना घर बदलना, बिगाड़ना, कभी झोपड़ी बना देते थे, इतना सा, समय ज़रा भी नहीं लेते थे वो।" तो दोस्तों, ये थे गायिका सुलक्षणा पंडित के विचार हमारे किशोर दा के बारे में। गीत सुनने से पहले आप को यह भी बता दें कि इस गीत के दो वर्ज़न हैं, जिनमें से एक आज हम आप को यहाँ सुनवा रहे हैं, सुनिये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत के संगीतकार हैं - बाबुल.
२. मनोज कुमार हैं इस फिल्म में नायक.
३. सब तरफ मानसून की चर्चा हो रही है, इस युगल गीत में भी घटा और सावन का जिक्र है मुखड़े में.

कुछ याद आया...?
पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आपका तो जवाब नहीं पर आपका जवाब हमेशा ही सही होता है :) ३० अंकों के लिए बधाई. मंजूषा जी कभी अपनी आवाज़ में भी सुनवाईये ये गीत. संगीता जी गीत आपका पसंद आया यही बहुत है. सुमित जी जल्दी ही आपके लिए मुकेश साहब पर एक पूरी शृंखला ही लेकर आ जायेंगें, खुश ? :), पराग जी "नन्ही कली सोने चली..." वाह क्या गीत याद दिलाया आपने. मंजू जी, शमिख जी आभार आप सब का भी.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रूप कुमार राठोड और साधना सरगम के युगल स्वरों का है ये -"वादा"



बात एक एल्बम की (10)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


बात एक एल्बम की में इस माह हम चर्चा कर रहे हैं चार बड़े फनकारों से सजी एल्बम "वादा' के बारे में. गीतकार गुलज़ार और संगीतकार उस्ताद अमजद अली खान साहब के बारे में हम बात कर चुके हैं, आज जिक्र करते हैं इस एल्बम के दो गायक कलाकारों का. इनमें से एक हैं शास्त्रीय संगीत के अहम् स्तम्भ माने जाने वाले पंडित चतुर्भुज राठोड के सुपुत्र और श्रवण राठोड (नदीम श्रवण वाले) और विनोद राठोड के भाई, जी हाँ हम बात कर रहे हैं गायक और संगीतकार रूप कुमार राठोड की. अपने पिता (जिन्हें इंडस्ट्री में कल्याणजी आनंदजी और गायक अनवर के गुरु भी कहा जाता है) के पदचिन्हों पर चलते हुए रूप ने तबला वादन सीखने से अपना संगीत सफ़र शुरू किया. पंकज उधास और अनूप जलोटा के साथ उन्होंने संगत की. श्याम बेनेगल की "भारत एक खोज" में भी उन्होंने तबला वादन किया. १९८४ में अपने इस जूनून को एक तरफ रख उन्होंने गायन की दुनिया में खुद को परखने का अहम् निर्णय लिया ये एक बड़ा "यु-टर्न" था उनके जीवन का. उस्ताद नियाज़ अहमद खान से तालीम लेकर उन्होंने ग़ज़ल गायन से शुरुआत की. पार्श्व गायन में उन्हें लाने का श्रेय जाता है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को, जिन्होंने शशि लाल नायर की फिल्म "अंगार" में उन्हें गाने का मौका दिया. पर असली सफलता उन्हें मिली फिल्म "बॉर्डर" के साथ. अनु मालिक के संगीत निर्देशन में "तो चलूँ" और "संदेसे आते हैं" गीतों ने उन्हें कमियाबी का असली स्वाद चखाया, अनु के साथ उसके बाद भी उन्होंने बहुत बढ़िया और लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया. "ले चले डोलियों में तुम्हें", "मौला मेरे" और "तुझमें रब दिखता है" उनकी आवाज़ में ढले कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि इन्हें इतना सुंदर कोई और गायक गा ही नहीं सकता था. प्राइवेट अल्बम्स में भी उन्होंने जम कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है. हमारी फीचर्ड एल्बम "वादा" भी इसका अपवाद नहीं है. यकीन न हो तो सुनिए हलकी फुल्की शरारतों और छेड़ छाड़ से गुदगुदाता ये नगमा -

चोरी चोरी की वो झाँखियाँ...


और ये सुनिए मखमली एहसासों से सजे गुलज़ार साहब के "ट्रेड मार्क" शब्दों में गुंथे इस गीत को -
ये सुबह साँस लेगी....


एल्बम वादा से रूप कुमार की आवाज़ में ये नायाब गीत भी हैं -

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...
डूब रहे हो और बहते हो...
रोजे-अव्वल से ही आवारा हूँ....

बढ़ते हैं इस एल्बम के चौथे फनकार की तरफ. इससे पहले की हम उनके बारे में कुछ कहें सुनिए इसी एल्बम से उनकी आवाज़ में ये दर्द भरी ग़ज़ल -

आँखों की हिचकी रूकती नहीं है,
रोने से कब गम हल्का हुआ है...

सीने में टूटी है चीज़ कोई,
खामोश सा एक खटका हुआ है....


वाह.... सुनिए आँखों में सावन अटका हुआ है.....


ये मधुर और चैन से भरी आवाज़ है साधना सरगम की. एक ऐसी गायिका जिनकी आवाज़ और कला का हमारी फिल्म इंडस्ट्री में कभी भी भरपूर इस्तेमाल नहीं हुआ. पंडित जसराज की इस शिष्या में गजब की प्रतिभा है और उनके कायल संगीतकार ए आर रहमान भी हैं. एक ताज़ा साक्षात्कार में रहमान में स्वीकार किया कि वही एकमात्र भारतीय गायिका हैं जो हमेशा उन्हें उम्मीद से बढ़कर परिणाम देती है अपने हर गीत में. इन पक्तियों के लेखक की राय में भी लता मंगेशकर की गायन विरासत को यदि कोई गायिका निभा पायी है तो वो साधना सरगम ही है. फिल्म "लगान" के गीत "ओ पालनहारे" एल्बम में लता की आवाज़ में है पर फिल्म के परदे पर नायिका के लिए साधना की आवाज़ का इस्तेमाल हुआ है, और देखिये लता जी गाये मुखड़े के बाद साधना की आवाज़ में अंतरा आता है और लगता है जैसे दोनों आवाजें एक दूजे में घुल-मिल ही गयी हों. रहमान ने उस साक्षात्कार में यह भी कहा कि वो हर बार अपनी गायिकी से मुझे चौका देती है. वो दिए हुए निर्देशों से भी बढ़कर हर गीत में कुछ ऐसा कर जाती है कि गीत एक स्तर और उपर हो जाता है. चलिए सुनते हैं साधना की आवाज़ में एक और गीत इसी एल्बम से -

सारा जहाँ चुप चाप है....


और अब सुनिए रूप कुमार और साधना सरगम की युगल आवाजों में ये शानदार गीत -
हर बात पे हैरान है....(उस्ताद अमजद अली खान साहब ने इस गीत में एक कश्मीरी लोक धुन का खूबसूरत सामंजस्य किया है)


एल्बम वादा के अन्य गीत यहाँ सुनें -

दिल का रसिया...
ऐसा कोई -(सरोद पर)



"बात एक एल्बम की" एक मासिक श्रृंखला है जहाँ हम बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

Sunday, June 28, 2009

जलते हैं जिसके लिए तेरी आँखों के दीये....तलत साहब लाये हैं गीत वही हम सबके लिए



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 125

गर मैं आप से यह पूछूँ कि १९५९ की फ़िल्म 'सुजाता' और इस दशक की फ़िल्म 'बाग़बान' में क्या समानता है तो शायद आप चौंक उठें। इन दोनो फ़िल्मों में एक एक गीत ऐसा है जो फ़िल्म के परदे पर टेलीफ़ोन पर गाये गये हैं। फ़िल्म 'बाग़बान' में अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी पर फ़िल्माया गया "मैं यहाँ तू वहाँ ज़िंदगी है कहाँ" गीत तो आप ने हाल में इस फ़िल्म में देखा होगा। लेकिन आज से ५० साल पहले बनी फ़िल्म 'सुजाता' में भी कुछ ऐसा ही एक गीत था जिसे परदे पर सुनिल दत्त साहब ने फ़िल्म की अभिनेत्री नूतन को टेलीफ़ोन पर सुनाया था - "जलते हैं जिसके लिए तेरी आँखों के दीये, ढ़ूंढ़ लाया हूँ वही गीत मैं तेरे लिए"। उस ज़माने में टेलीफ़ोन का इतना चलन नहीं था, और ना ही आज की तरह हर कोई इसे अफ़ोर्ड कर सकता था। फ़ोन कौल की दरें भी बहुत ज़्यादा हुआ करती थीं। ऐसे में अगर फ़िल्म का नायक अपनी नायिका को फ़ोन पर एक पूरा का पूरा गाना सुनवाना चाहे, तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि मामला ज़रूर गम्भीर है। टेलीफ़ोन पर गाये गीतों की बात जब चलती है तब यही गीत सब से पहले ज़हन में आता है, इस बात में कोई दोराय नहीं है। तलत महमूद की मख़मली आवाज़ में यह गीत इतना पुर-असर है कि आज ५० सालों के बाद भी इस गीत का माधुर्य वैसा का वैसा ही बरक़रार है। "दिल में रख लेना इसे हाथों से यह छूटे ना कहीं, गीत नाज़ुक है मेरा शीशे से भी टूटे ना कहीं, गुनगुनाउँगा यही गीत मैं तेरे लिए", सच बड़ा ही नाज़ुक-ओ-तरीन अंदाज़ में गाया हुआ गीत है यह, जिसे बार बार गुनगुनाने को जी चाहता है। हमें पूरा यकीन है कि आज 'आवाज़' पर इस गीत को सुनने के बाद अगले कई दिनों तक आप इसे मन ही मन गुनगुनाते रहेंगे।


'सुजाता' बिमल राय की फ़िल्म थी। सुनिल दत्त और नूतन अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी दुखभरी थी। नवेन्दु घोष की यह कहानी जातिवाद के विषय पर केन्द्रित था, जो आज के समाज में भी उतना ही दृश्यमान है। जहाँ तक फ़िल्म के गीत संगीत का सवाल है, तो सचिन देव बर्मन का संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों ने एक बार फिर अपना कमाल दिखाया। यह दौर था लताजी और सचिन दा के बीच चल रही ग़लतफ़हमी का, इसलिए फ़िल्म के गाने आशा भोंसले और गीता दत्त ने ही गाये। गायकों में शामिल थे मोहम्मद रफ़ी और तलत महमूद। प्रस्तुत गीत के बारे में यह कहा जाता है कि सचिन दा इस गीत को रफ़ी साहब से ही गवाना चाहते थे, लेकिन जयदेव, जो उन दिनो दादा बर्मन के सहायक हुआ करते थे, उन्होने ही यह सुझाव दिया कि ऐसा नाज़ुक गीत रफ़ी साहब की आवाज़ से ज़्यादा तलत साहब की नर्म आवाज़ में अच्छा लगेगा। जयदेव कितने सही थे और कितने ग़लत, यह हमें बताने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि रफ़ी साहब इस गीत को पुरअसर तरीके से नहीं गा सकते थे, लेकिन हर गायक का अपना अपना 'फ़ोर्टे' होता है जो उनसे बेहतर कोई दूसरा नहीं गा सकता। बस यही समझ लीजिये कि यह गीत तलत साहब की मख़मली आवाज़ के लिए ही बनाया गया था। राग सिंदूरा पर आधारित यह मशहूर गीत बहुत ज़्यादा ख़ास इसलिए भी है कि बर्मन दादा और तलत साहब ने एक साथ बहुत ज़्यादा काम नहीं किया है। तो सुनिये गुज़रे दौर का यह स्वर्णिम नग़मा जिसने अभी अभी अपनी स्वर्णजयंती मनायी है, यानी कि जिसकी लोकप्रियता ५० सालों से वैसी ही बनी हुई है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ए इरशाद का लिखा गीत.
२. इस युगल गीत में महिला स्वर है सुलक्षणा पंडित का.
३. मुखड़े में शब्द है -"दुनिया".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, आपका जवाब एक मिनट पहले आया है तो २ अंक भी आपको ही मिलते हैं. स्वप्न जी आप बहुत करीब थी वाकई. शरद जी का स्कोर हो गया - २८. दिलीप जी, भाटिया जी, राज जी, शामिख जी आप सब का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

नव पॉडकास्ट कवि सम्मेलन में 20 काव्य-रश्मियों की प्रभा



सुनिए ऑनलाइन कवि सम्मेलन का वार्षिक अंक

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
पूरे भारत में गरमी अपना तांडव कर रही है। हर तरफ बस एक ही पुकार है कि अल्लाह मेघ दे, पानी दे। कभी-कभी हम जैसे भावुक हृदयवालों का मन होता है कि कहीं से खुदा को खोज निकालें और उससे विनती करें कि कृपया पानी दे दें। खैर फिलहाल हम तो आपके लिए एक ऐसी बारिश लाये हैं जिसमें आप अनुभूतियों की तरह-तरह की बूँदों से भीगेंगे। जी हाँ, आप सही समझे, गर्मी की मार से अल्पकालिक ही सही, एक राहत देने के लिए, हम लेकर हाज़िर हैं जून 2009 का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन लेकर।

इस बार के इस कवि सम्मेलन में उचित मेघ का उचित समय पर बरसने का आह्वान किया है रश्मि प्रभा ने और इस बरसात की निरंतरता का प्रयोजन किया है खुश्बू ने। खुशी की बात है कि रश्मि प्रभा के प्रयास से इस कवि सम्मेलन में हर माह नये कवि जुड़ते जा रहे हैं। इस बार भी 9 प्रतिभागी पहली पार इस ऑनलाइन कवि सम्मेलन का हिस्सा बन रहे हैं।

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का यह 12वाँ अंक है। मतलब हिन्द-युग्म के इस आयोजन ने अपना एक वर्ष पूरा कर लिया है। इसमें हमारे श्रोताओं के प्रोत्साहन का बहुत योगदान रहा है।

बगैर लम्बी भूमिका के आपको सुनवाते हैं अपना वार्षिकांक कवि सम्मेलन-



प्रतिभागी कवि-सरस्वती प्रसाद, किरण सिन्धु, गौरव शर्मा, स्वप्न मंजूषा 'शैल', प्रीति मेहता, दीपाली आब, मनोज भावुक, अनिल मासूम शायर, संत कुमार शर्मा, अक्षय मन, दीपाली पन्त तिवारी, पारुल, ललित मोहन त्रिवेदी, नीरज गोस्वामी, प्रिया, संगीता स्वरुप, शिखा वार्ष्णेय, श्यामल सुमन, यायावर।

संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इस अंक को डाउनलोड करना चाहते हैं तो नीचे का लिंक इस्तेमाल करें
उच्च क्वालिटी का mp3 (90 kbps)निम्न क्वालिटी का wma (60 kbps)




आगामी कवि सम्मेलन 'बारिश' पर केंद्रित होगा

हम उम्मीद करते हैं कि जुलाई महीने की शुरूआत समूचे भारत में मानसून के आगत से होगी और आनेवाला सावन झूम-झूम बरसेगा। इसलिए हमने यह तय किया है कि जुलाई माह का पॉडकास्ट सम्मेलन 'बारिश' को ही समर्पित होगा। कृपया इस अंक में ज़रूर भाग लें। वर्षा, बरसात, बारिश आपके कवि-मन के किस तरह से छूती है, हम सुनना चाहते हैं।

1॰ अपनी आवाज़ में 'बारिश' विषय पर केंद्रित अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7.जुलाई अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 18 जुलाई 2009
8. जुलाई अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 26 जुलाई 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 12. Month: June 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

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