Saturday, November 20, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (१७)...वादियों में मिले जब दो चाहने वाले तो इस गीत ने दी उनके प्रेम को परवाज़



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, बहुत बहुत स्वागत है आप सभी का इस शनिवार विशेषांक में। इसमें हम आपके लिए लेकर आते हैं 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', जिसमें आप ही में से किसी ना किसी दोस्त के यादों को पूरी दुनिया के साथ बांटा करते हैं जिन्हें आपने हमसे शेयर किए हैं एक ईमेल के माध्यम से। आज भी एक बड़ा ही दिल को छू लेनेवाला ईमेल हम शामिल कर रहे हैं। हाँ, इस ईमेल को पेश करने से पहले आपको बता दें कि जिस शख़्स ने हमें यह ईमेल भेजा है, इन्होंने ना तो अपना नाम लिखा है और ना ही हमारे oig@hindyugm.com के पते पर इसे भेजा है, बल्कि एक गुमनाम आइ.डी से सीधे मेरे व्यक्तिगत ईमेल आइ.डी पर भेज दिया है। कोई बात नहीं, आपके जज़्बात हम तक पहुँच गए, यही बहुत है हमारे लिए। तो ये रहा आपका ईमेल...


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प्रिय सुजॊय जी,
मैं अपना यह ईमेल आप के ईमेल पते पर भेज रहा हूँ, ताकि आप पहले यह जाँच लें कि यह पोस्ट करने लायक है भी या नहीं। अगर सही लगे तो शामिल कर लीजिएगा।

मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का 'ईमेल के बहाने...' बहुत ध्यान से पढ़ता हूँ और सब के अनुभवों से भावुक भी हो जाता हूँ। हाल में मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही क़िस्सा हुआ जिसे मैं आप सब के साथ शेयर करना चाहता हूँ। क़िस्सा कहना शायद ग़लत होगा, यु कहिए कि मेरी ज़िंदगी के साथ मुलाक़ात हो गई। मैं ३३ साल का युवा हूँ, और आज की पीढ़ी का तो आप जानते ही हैं कि प्रेम संबंध कितने जल्द बनते हैं और टूटते भी हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। लेकिन इतने सालों में मुझे अब जाकर एक ऐसा साथी मिला जिसे पाकर जैसे मेरी दुनिया ही बदल गई। मैंने यह जाना है कि शारीरिक मिलन से बहुत बहुत ज़्यादा बढ़के होता है मन से मन का मिलन। लगता है कि मुझे भी अपना मन का मीत मिल ही गया। हमारे ना केवल ख़यालात मिलते जुलते हैं, बल्कि हर चीज़ में टेस्ट बिल्कुल एक जैसा है। भले ही हमारे बीच उम्र का लगभग ८-९ साल का फ़ासला है, लेकिन मन-मस्तिष्क बिल्कुल समान आयुवर्ग जैसा ही लगता है। और तो और, फ़िल्मी-गीतों में भी हमारी पसंद बिल्कुल एक जैसी है। हमारी जिस दिन पहली मुलाक़ात हुई थी, एक गाना बज रहा था, "दिखाई दिए युं कि बेख़ुद किया, हमें आप से भी जुदा कर चले"। गाना तो अपने समय से ख़्तम हो गया, पर इसका असर गहरा था। हम अपने अपने घर चले गए, और घर पहुँचकर मेरे साथी ने एस.एम.एस पर इस गीत का मुखड़ा लिख कर भेजा। क्योंकि मुझे बहुत जल्द ही यह शहर छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए चले जाना था, मैंने जवाब में लिख दिया, "बहुत आरज़ू थी गली की तेरी, सो यास-ए-लहू में नहा कर चले"। और बस, हमें एक दूसरे से प्यार हो गया। फ़ोन पर देर तक हम रोते रहे, रोते ही रहे।

हमारी मुलाक़ातें होती रहीं। ऐसे ही किसी दिन हमने गाना सुन लिया "दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन"। गीत कुछ ऐसा भाया कि बार बार रिवाइण्ड कर सुनते रहे और जैसे गीत के तीसरे अंतरे की तरफ़ सचमुच किसी बर्फ़ीली पहाड़ी में पहूँच गए। उस रात मेरे साथी ने भी सपने में देखा कि हम दोनों किसी पहाड़ पर किसी झरने के बगल में हाथों को हाथों में लिए बैठे हुए हैं। बस फिर क्या था, मेरे मन में आया कि क्यों ना हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ने से पहले एक बार किसी हिल-स्टेशन की सैर कर उस साथी के सपने को पूरा किया जाए, इसे अपने जीवन की एक अविस्मरणीय यात्रा बना ली जाए। बस, गुलज़ार साहब के चमत्कृत कर देने वाले बोलों के सहारे हम भी चल पड़े उस बर्फ़ीली सर्दी वाले पहाड़ की तरफ़, जहाँ पर ख़ामोशियाँ गूंजती हुई सुनाई देती हो। और जहाँ तक आँखों में भीगे भीगे लम्हों का सवाल था, उसकी कसर हम दोनों ने पूरी कर दी। ख़ूब रोये हम एक दूसरे के कंधों पर सर रख कर। इस समाज व्यवस्था के लिए हम दोनों का अकेले इस तरह से जाने को शायद मान्यता ना मिले, लेकिन हमारा प्यार कितना पवित्र है, यह बस हम ही जानते हैं और हमें किसी को कोई कैफ़ीयत देने की ज़रूरत नहीं। तो हम पहुँच गए अपने गंतव्य स्थल, और जिस गीत को अब तक हज़ारों बार सुना था, ऐसा लगा कि पहली बार इसे हम जी रहे हों। "बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर, वादी में गूँजती हुई ख़ामोशियाँ सुनें, आँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिए हुए..."। हम वापस भी आ गए और अब बस दो तीन रोज़ में मैं जा रहा हूँ यहाँ से, लेकिन गुलज़ार साहब का लिखा यह गीत हमेशा हमेशा के लिए जैसे मेरे दिल में, आँखों में क़ैद हो गया।

और पता है हम दोनों ने मिलकर इसी गीत को आगे बढ़ाते हुए कुछ लिखा भी है इस गीत की ही शैली में। गुलज़ार साहब का तो कोई भी मुक़ाबला नहीं कर सकता, बस युंही हमने कुछ लिख दिया यहाँ वहाँ से लफ़्ज़ जुटा कर। तो पहले पढ़िए कि मेरे साथी ने क्या लिखा है...

"या रिमझिम बरसात में झरोखे से ताक कर,
युंही काले बादलों की गड़गड़ाहट सुनें,
बूंदों को हथेलियों पर देखें टपकते हुए,
दिल ढ़ूंढ़ता है..."

और फिर मैंने भी तो कुछ लिखा था...

"सर्पीले रास्तों पे किसी कारवाँ में बैठकर,
नग़में प्यार के सुनें कांधों पे रख के सर,
पोंछते रहें अश्क़ों को मुस्कान लिए हुए,
दिल ढ़ूंढ़ता है..."

बस इतना ही कहना था मुझे। हमारे प्यार को भले ही स्वीकृति ना मिले लेकिन हम दोनों को पता है कि हमारे बीच किस तरह का मधुर रिश्ता है और वही हमारे लिए बहुत है। आप हम दोनों की तरफ़ से फ़िल्म 'मौसम' के इसी गीत को सुनवा दीजिएगा।

बहुत बहुत धन्यवाद!

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दोस्त, आप ने अपना नाम तो नहीं लिखा, ना ही उस हिलस्टेशन का नाम लिखा जहाँ पर आप गए थे, लेकिन फिर भी आपके ईमेल ने हमारे दिल को छू लिया और यही हमारे लिए बहुत है। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं ज़िंदगी में जिन्हें कोई नाम नहीं दिया जा सकता। अब देखिए, गुलज़ार साहब ने ही तो लिखा था ना कि "हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ूशबू, हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलज़ाम ना दो, सिर्फ़ अहसास है यह रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो"। तो आइए फ़िल्म 'मौसम' के उस गीत को सुनते हैं लता मंगेशकर और भूपेन्द्र की आवाज़ों में जो अब आपके जीवन का एक हिस्सा बन चुका है। आपने इस गीत के साथ जुड़ी अपनी भावनाओं को तो व्यक्त कर दिया, अब हमें भी मौक़ा दीजिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के रवायत के मुताबिक़ इस गीत से जुड़ी कुछ तथ्य बताने का। विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में आशा भोसले और आर. डी. बर्मन से बातचीत करते हुए गुलज़ार साहब ने इस गीत के बारे में कहा था - "इस गाने के बारे में एक बात कह दूँ कि इस गाने का जो मुखड़ा है, जो पहली लाइन है, "दिल ढ़ूंढ़ता है फिर वोही फ़ुरसत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए", यह दरअसल ग़ालिब का शेर है। तो कुछ शेरों में मैंने नज़्में कही है इस तरह कि वो फ़ुरसत के कौन से दिन थे, किस तरह का मूड होगा, जिसकी तलाश ग़ालिब कर रहे थे जब उन्होंने यह शेर कहा था। और यह सिचुएशन मेरे हाथ में थी कि यह आदमी छुट्टियों की तलाश कर रहा है, इसलिए मैंने ग़ालिब की इस शेर को ले लिया।" तो आइए मदन मोहन के संगीत निर्देशन में इस कालजयी रचना का आनंद लेते हैं। गीत तो उत्कृष्ट है ही, लता जी की आवाज़ में गीत का शुरुआती आलाप से ही जैसे इश्क़ हो जाता है, और मन कहीं दूर निकल जाता है फ़ुरसत के लम्हों की तलाश में। आप सब इस गीत के साथ अपने फ़ुरसत के उन मीठे लम्हों को दुबारा जी लीजिए और मुझे फिलहाल इजाज़त दीजिए कल तक के लिए, नमस्कार!

गीत - दिल ढ़ूंढ़ता है (मौसम, लता-भूपेन्द्र)


सुजॉय चट्टर्जी

अनुराग शर्मा की कहानी "बांधों को तोड़ दो"



'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की मार्मिक कहानी "गन्जा" का पॉडकास्ट उन्हीं की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक सामयिक कहानी "बांधों को तोड़ दो", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।कहानी "बांधों को तोड़ दो" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 25 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट बर्ग वार्ता ब्लॉग पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

पतझड़ में पत्ते गिरैं, मन आकुल हो जाय। गिरा हुआ पत्ता कभी, फ़िर वापस ना आय।।
~ अनुराग शर्मा

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी
"बांध के लिए कानपुर, कलकत्ता, दिल्ली को क्यों नहीं डुबाते हैं ये लोग? हमें ही क्यों जाना पडेगा घर छोड़कर?"
(अनुराग शर्मा की "बांधों को तोड़ दो" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#112nd Story, Bandhon Ko Tod Do: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2010/44. Voice: Anurag Sharma

Friday, November 19, 2010

Go Green- दुनिया और पर्यावरण बचाने की अपील- आवाज़ का एक अंतरराष्ट्रीय गीत



हिन्द-युग्म ने इंटरनेट की दुनिया में शुक्रवार की एक नई परम्परा विकसित की है, जिसके अंतर्गत शुक्रवार के दिन इंटरनेटीय जुगलबंदी से रचे गये संगीतबद्ध गीत का विश्वव्यापी प्रदर्शन होता है। हिन्द-युग्म ने संगीत की इस नई और अनूठी परम्परा को देश से निकालकर विदेश में भी स्थापित किया है। वर्ष 2009 में आवाज़ ने भारत में स्थित रूसी दूतावास के लिए भारत-रूस मित्रता के लिए एक गीत 'द्रुज्बा' बनाया था। वह हमारा पहला प्रोजेक्ट था जिसमें हमने एक से अधिक देश की संवेदनाओं को सुरबद्ध किया था।

आज हम एक ऐसा गीत लेकर आये हैं, जिसमें अंतर्निहित संवेदनाएँ, चिंताएँ और सम्भावनाएँ वैश्विक हैं। पूरी दुनिया हरियाली के भविष्य को लेकर चिंतित है। यह चिंता पर्यावरणवादियों को खाये जा रही है कि बहुत जल्द पुरी दुनिया फेफड़े भर हवा के लिए मरेगी-कटेगी। हम सब की यह जिम्मेदारी है कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को हम कम से कम एक ऐसी दुनिया दे जिसमें हवा-पानी की लड़ाई न हो। शायद इसीलए जो थोड़ा भी संजीदा है, वे 'गो ग्रीन' के साथ है।

हमने इस बार फ्यूजन के माध्यम से इसी संदेश को ताज़ा किया है। शास्त्रीय संगीत और पश्विमी संगीत के इस फ्यूजन में मिक्सिंग और साउंड-इंजीनियरिंग का काम बॉलीवुड-फेम के सन्नी सनौर ने किया है, जो संगीतकार संदीप चौठा के सहायक हैं। गाने का अंग्रेजी हिस्सा विदेशी कलाकारों द्वारा परिणित हुआ है, इसलिए यह हिन्द-युग्म का अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट है।


तो सुनिए 'दुनिया बचाने, पर्यावरण बचाने और गो ग्रीन' का संगीतबद्ध संदेश-


गीत के बोल (Song's Lyrics):

See the trees dancing for singing birds
See the waves fighting on the sea shores
Beauty is all we got from nature
Are we gonna see that here forever

Save our mother
Today together
Tell our people
we go we go we go we go we

Go green go green

We go we go we go green

Go green go green
We go we go we go green

हरियाले जंगल, पर्वत, झरने, नदिया और समुन्दर

ये सब हैं अपनी जागीरें

कुदरत ने बांटे हैं बिन मोल ही सबको देखो यारों

जीने की सारी तदबीरें,

नेमतें हजारों मिली है हमें जब

कुछ तो यारों हम भी करें अब ज़रा,

स्वर्ग से भी सुन्दर नज़र आएगी धरा,

रंग दो इसे अब हरा

Save our mother
Today together
Tell our people
we go we go we go we go we

Go green go green
We go we go we go green
Go green go green
We go we go we go green

मेकिंग ऑफ़ "Go Green" - गीत की टीम द्वारा

Juniana Lanning: When I first got a copy of "Go Green" from Bala, I knew right away from the sound of it I was going to have fun with this project! In fact, I immediately began singing it as I was doing my work around the house! Within the next couple of weeks, I was able to record an initial vocal track to accompany the music, send it to Bala for critique, and then begin working on the final version. It was a chance for me to learn to sing in a slightly different style than I usually would in my own music. I found it challenging, educating and rewarding, especially when I got the final mix back from Bala and heard it entirely in context with the song. It sounded so great- I was excited! After that, the song underwent a change that I did not expect! I knew that Bala was working with another woman (Kuhoo Gupta) on the other vocal part,which was originally sung by Unnikrishnan Kb, and I was anxious to hear how it turned out. The final version is actually quite different from the first mix I got, and really sounds beautiful! Everyone did an excellent job, and I am honored and humbled to have had a chance to be a part of this project!.

Balamurali Balu: Making music for a cause is always an additional motivation. I did a Tamil version of this song 6 months ago. Later when I was chatting with Sajeev, we casually decided about doing a Hindi version. Sajeev wrote the lyrics with a lightening speed. I have experimented mixing Indian classical and pop in this song having the experts from both the ends - Kuhoo Gupta and Juniana Lanning. Kuhoo also showed some extra interest in adding sargams and other improvisations - had fun with this process. My very good friend Subbu has played the guitar parts. Later came in Sunny Sanour, a Bollywood sound Engineer working for Sandeep Chowta. I initially contacted him for the mastering work of the song. But he was so kind and volunteered to do the mixing as well. The song portrays different moods with continuous change of instruments/arrangement throughout the song. Its really a changeling task for the sound engineer - Sunny has handled this very well.

Kuhoo Gupta: This song is different in a way, which you all will come to know after listening only :) One thing I liked about this song was the way Western and Indian music blended and the way it gave room for improvisation and the jugalbandi towards the end of the song. I thank Bala for giving me the freedom to improvise as I liked and accommodate it in the song. English and Hindi lyrics have been written very nicely. It was nice working with Bala and the team on this song.

Sajeev Sarathie: इस प्रोजेक्ट पर काम करना मेरे लिए बहुत ही खुशकिस्मती वाली बात थी. एक तो गीत में एक बहुत ज़रूरी सन्देश दिया जा रहा है दुसरे ये सही मायनों हम लोगों का पहला अंतर्राष्ट्रीय फुज़न गीत है. बाला की ये धुन किसी भी राष्ट्रीय - अंतरष्ट्रीय गीत के टक्कर की है उस पर से सन्नी भाई की मिक्सिंग ने जैसे चार चाँद लगा दिये. जुनियाना और कुहू ने मिलकर फुज़न को एक अलग ही मुकाम दे दिया है. इतने शानदार गीत का हिस्सा हूँ ये मेरे लिए फक्र की बात है।


जुनियाना लैनिंग (गायिका)
अमेरिका के शहर पोर्टलैंड ओरेजॉन में रह रही जुनियाना एक फुल-टाइम माँ और पार्ट टाइम साउंड-इंजीनियर और गायिका हैं। जब ये अपने परिवार के साथ व्यस्त नहीं होती है, तब ये पियानो, ड्रम बजा रही होती हैं, गा रही होती हैं या फिर मिक्सिंग कर रही होती हैं। हाल में ही इनका एक युगल एल्बम 'सेवन इंजन्स' रीजिल हुआ है। ये अक्सर लिखती हैं और अपने पति के साथ मिक्सिंग करती हैं। स्थानीय कलाकारों के लिए ये मिक्सिंग और मास्टरिंग का काम करती रही हैं।

सन्नी सनौर (मिक्सिंग व साउंड इंजीनयरिंग)
सन्नी बॉलीवुड में साउंड इंजीनियर हैं। संगीतकार संदीप चौठा के लिए काम करते हैं। ये नई प्रतिभाओं को उभारने में पूरा सहयोग देते हैं, जिनमें भविष्य में कुछ बड़ा करने की सम्भावना है।

बालमुरली बालू (गीत व संगीत)
दिन में रिसर्चर बालामुरली बालू रात में संगीतकार का चोला पहन लेते हैं. १५ साल की उम्र से बाला ने धुनों का श्रृंगार शुरू कर दिया था. एक ड्रमर और गायक की हैसियत से कवर बैंडों के लिए १० वर्षों तक काम करने के बाद उन्हें महसूस हुआ उनकी प्रतिभा का सही अर्थ मूल गीतों को रचने में है. बाला मानते हैं कि उनकी रचनात्मकता और कुछ नया ईजाद करने की उनकी क्षमता ही उन्हें भीड़ से अलग साबित करती है. ये महत्वकांक्षी संगीतकार इन दिनों एक पॉप अल्बम "मद्रासी जेनर" पर काम रहा है, जिसके इसी वर्ष बाजार में आने की सम्भावना है।

कुहू गुप्ता (गायिका)
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। इन्होने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की है । इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। जी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं और इनका एल्बम "कुहू कुहू बोले कोयलिया" मार्केट में आ चुका है । इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म के ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है।

सजीव सारथी (गीतकार)
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।

Song - Go Green
Singers: Juniana Lanning & Kuhoo Gupta
Guitars: Subramanian Krish
Lyrics: Sajeev Sarathie & Balamurali Balu
Mixing & Mastering: Sunny @ Static Wave
Music: Balamurali Balu


Song # 22, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

Thursday, November 18, 2010

तुम्हारे बिन गुजारे हैं कई दिन अब न गुजरेंगें....विश्वेश्वर शर्मा का लिखा एक गंभीर गीत लता रफ़ी के युगल स्वरों में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 530/2010/230

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी संगीत रसिकों का बहुत बहुत स्वागत है इस ५३०-वीं कड़ी में। दोस्तों, पिछले दो हफ़्तों से इस स्तंभ में हम सुनते चले आ रहे हैं एक से एक नायाब गीत जिन्हें जादूई शब्दों से संवारे हैं हिंदी के कुछ बेहद नामचीन साहित्यकार और कवियों ने। 'दिल की कलम से' लघु शृंखला में अब तक हमने जिन साहित्यकारों की फ़िल्मी रचनाएँ आपको सुनवाईं हैं, वो हैं पंडित नरेन्द्र शर्मा, वीरेन्द्र मिश्र, गोपालसिंह नेपाली, बालकवि बैरागी, गोपालदास नीरज, अमृता प्रीतम, कवि प्रदीप, महादेवी वर्मा, और डॊ. हरिवंशराय बच्चन। आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी के लिए हम चुन लाये हैं एक ऐसे साहित्यकार को जिनका शुमार बेहतरीन हास्यकवियों में होता है। हास्यकवि, यानी कि जो हास्य व्यंग के रस से ओत-प्रोत रचनाएँ लिखते हैं। उनकी लेखनी या काव्य के एक विशेषता होती है उनकी उपस्थित बुद्धि और सेन्स ऒफ़ ह्युमर। हिंदी के कुछ जाने माने हास्यकवियों के नाम हैं ओम प्रकाश आदित्य, अशकरण अटल, शैलेश लोधा, राहत इंदोरी, सुरेन्द्र शर्मा, डॊ. विष्णु सक्सेना, श्याम ज्वालामुखी, जगदिश सोलंकी, महेन्द्र अजनबी, माणिक वर्मा, अरुण जेमिनी, पंडित ओम व्यास ओम, नीरज पुरी, अशोक चक्रधर, पद्मश्री वाली और पंडित विश्वेश्वर शर्मा। और विश्वेश्वर शर्मा ही हैं हमारे आज के अंक के केन्द्रबिंदु में। शर्मा जी को आप में से बहुतों ने अलग अलग जगहों और मंचों पर हास्य कवि सम्मेलनों में भाग लेते हुए देखा व सुना होगा। उनकी हास्य कृतियाँ हमें इस तरह से गुदगुदा जाती हैं कि कुछ देर के लिए जैसे सारे तनाव और चिंताओं से मन मुक्त हो जाता है। फ़िल्म संगीत की बात करें तो ७० के दशक में शंकर जयकिशन (उस समय जयकिशन गुज़र चुके थे) के लिए विश्वेश्वर शर्मा ने कई गीत लिखे जो बेहद मक़बूल हुए थे। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म 'संयासी' का शीर्षक गीत "चल संयासी मंदिर में" एक बेहद लोकप्रिय गीत साबित हुआ था। इस गीत में हास्य का भी एक अंग था। लता जी ने "चल" शब्द को गाते वक्त थोड़ी सी हँसी भी मिलाई थी। इसी फ़िल्म में विश्वेश्वर शर्मा ने एक और गीत लिखा था "जैसे मेरा रूप रंगीला"। फ़िल्म के बाक़ी गीत लिखे विट्ठलभाई पटेल, एम. जी, हशमत, इंदीवर और वर्मा मलिक ने।

ऐसा नहीं है कि विश्वेश्वर शर्मा ने केवल हास्य और हल्के फुल्के गीत ही लिखे। फ़िल्म 'दुनियादारी' के लिए उनका लिखा फ़िल्म का शीर्षक गीत "नाव काग़ज़ की गहरा है पानी, ज़िंदगी की यही है कहानी" में कितनी सच्चाई, कैसा दर्शन छुपा हुआ है, गीत को सुनते हुए अनुभव किया जा सकता है। विश्वेश्वर शर्मा की फ़िल्मी गीत लेखन का एक और ख़ूबसूरत उदाहरण है फ़िल्म 'आत्माराम' का युगल गीत "तुम्हारे बिन गुज़ारे हैं कई दिन अब न गुज़रेंगे"। दोस्तों, ये जितनी भी फ़िल्मों का हमने ज़िक्र किया, ये सब सोहनलाल कंवर की फ़िल्में हैं। दरअसल बात ऐसी है कि ७० के दशक में निर्माता शंकर को वह पूरा ६० सदस्यों वाला ऒरकेस्ट्रा नहीं मंज़ूर करते थे जिनके साथ उनकी रचनात्मक्ता खिल जाती थी। ऐसा ऒरकेस्ट्रा उन्हें केवल पुराने विश्वासपात्र मित्र सोहनलाल कंवर ही दिला सकते थे, और यही कारण है कि उपर लिखे फ़िल्मों के गानें ख़ूब चले, भले ही इन फ़िल्मों ने बहुत ज़्ज़्यादा व्यापार नहीं किया। ख़ैर, हम विश्वेश्वर शर्मा की बात कर रहे थे। तो आज हम आपको फ़िल्म 'आत्माराम' का यही सुंदर लोच भरा गीत सुनवा रहे हैं जिसे गाया है लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे शत्रुघ्न सिंहा, बिंदिया गोस्वामी, विद्या सिंहा, अरुणा ईरानी, फ़रीदा, प्राण और अमजद ख़ान। यह १९७९ की फ़िल्म थी। शंकर ने शंकर जयकिशन के नाम से फ़िल्म में संगीत दिया। इस फ़िल्म में उन्होंने सुलक्षणा पंडित से भी गानें गवाये थे। बहरहाल लता-रफ़ी का गाया फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत सुनते हैं। और इसी के साथ 'दिल की कलम से' शृंखला को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिए। जिन साहित्यकारों का ज़िक्र इस शृंखला में जाने अंजाने नहीं हो पाया, उन सब के लिए हम क्षमा चाहते हैं। आपको यह शृंखला कैसी लगी, टिप्पणी के अलावा oig@hindyugm.com के पते पर ईमेल करके हमें ज़रूर सूचित करें। शनिवार की शाम 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में आपसे फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि पंडित विश्वेश्वर शर्मा के लिखे फ़िल्म 'दुनियादारी' के शीर्षक गीत "नाव कागज़ की गहरा है पानी" को शंकर ने उसी धुन में स्वरबद्ध किया जिस धुन में उन्होंने रचा था १९५५ की फ़िल्म 'सीमा' का वह सदाबहार गीत "सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी"। ज़रा इन दोनों गीतों को गुनगुनाकर तो देखिए, आपको इसका अंदाज़ा हो जाएगा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली १ /शृंखला ०४
ये है गीत के अंतरे की एक झलक -


अतिरिक्त सूत्र - उपलब्ध ग्रामोफोन रेकॉर्ड्स में इस फिल्म का ये गीत सबसे पुराना माना जाता है.

सवाल १ - गायक पहचानें - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - कौन थे फिल्म के निर्देशक - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ताज्जुब है....कोई जवाब नहीं बूझ पाया या फिर जानकार नहीं दिया क्योंकि श्याम जी पहले ही जीत चुके थे ?...खैर तीसरी कड़ी के विजेता रहे श्याम जी. इस तरह वो अब तक दो बार विजेता बन कर सबसे आगे चल रहे हैं, इस शृंखला में उन्हें शरद जी और अमित से अच्छी टक्कर मिली. श्याम जी को बधाई. चलिए अब कमर कस लीजिए एक नयी जंग के लिए.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 17, 2010

कोई गाता मैं सो जाता....जब हरिवंश राय बच्चन के नाज़ुक बोलों को मिला येसुदास का स्वर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 529/2010/229

लाहाबाद के पास स्थित प्रतापगढ़ ज़िले के रानीगंज के बाबूपट्टी में एक कायस्थ परिवार में जन्म हुआ था प्रताप नारायण श्रिवास्तव और सरस्वती देवी के पुत्र का। घर पर प्यार से उन्हें 'बच्चन' कह कर पुकारते थे, जिसका अर्थ है "बच्चे जैसा"। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है 'दिल की कलम से' शृंखला की इस कड़ी में। पहली लाइन को पढ़कर आप समझ चुके होंगे कि आज जिस साहित्यकार की चर्चा हम कर रहे हैं, वो और कोई नहीं डॊ. हरिवंशराय बच्चन हैं। हरिवंशराय की शिक्षा एक स्थानीय म्युनिसिपल स्कूल में हुई और अपने पारिवारिक परम्परा को बनाये रखते हुए कायस्थ पाठशाला में उर्दू सीखने लगे। बाद में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू युनिवर्सिटी से भी शिक्षा अर्जित की। इसी दौरान वो स्वाधीनता संग्राम से जुड़ गये, महात्मा गांधी के नेतृत्व में। उन्हें यह अहसास हुआ कि यह राह वो राह नहीं जिस पर उन्हें आगे चलना है। इसलिए वो विश्वविद्यालय वापस चले गए। १९४१ से १९५२ तक वो इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाते रहे, और उसके बाद दो साल कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी में पी.एच.डी की। और तभी से उन्होंने अपने नाम से 'श्रीवस्तव' को हटाकर 'बच्चन' लिखना शुर कर दिया। कैम्ब्रिज से डॊक्टोरेट की डिग्री पाने वाले वो द्वितीय भारतीय बने। भारत लौटने के बाद वो फिर से अध्यापना से जुड़ गये और आकाशवाणी के इलहाबाद केन्द्र की भी सेवा की। १९२६ में, केवल १९ वर्ष की आयु में हरिवंशराय बच्चन ने विवाह किया श्यामा से, जो १४ वर्ष की थीं। लेकिन १९३६ में श्यामा की अकालमृत्यु के बाद १९४१ में हरिवंशराय जी ने तेजी सूरी से विवाह किया, जो एक सिख परिवार से ताल्लुख़ रखती थीं। इस विवाह से उन्हें दो पुत्र हुए - अमिताभ और अजिताभ। ९५ वर्ष की आयु में हरिवंशराय बच्चन १८ जनवरी २००३ को इस दुनिया से चले गये। सम्मान और पुरस्कारों की बात करें तो १९६६ में उन्हें राज्य सभा के लिए मनोनीत किया गया था और १९६९ में उन्हें सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। १९७६ में पद्म भूषण और 'सरस्वती सम्मान' से सम्मानित हुए १९९४ में 'यश भारती सम्मान' से उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने नवाज़ा। उन्हें 'सोवियत लैण्ड नेहरु अवार्ड' और 'लोटस अवार्ड ऒफ़ दि अफ़्रो-एशियन राइटर्स कॊनफ़रेन्स' भी प्राप्त है। उनकी याद और सम्मान में सन २००३ में एक डाक टिकट भी जारी किया गया है।

हरिवंशराय बच्चन की साहित्यिक कृतियों की चर्चा करने लगे तो कई कई पन्ने लग जाएँगे। इसलिए यहाँ पर उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं की ही बात करते हैं। उनकी कृति 'मधुशाला' हिंदी साहित्य में एक इतिहास बना चुकी है। जब भी वो स्टेज पर अपनी 'मधुशाला' पाठ करते, श्रोतागण उसमें पूरी तरह से खो जाते और उसकी बहाव में बह जाते। उमर ख़य्याम की रुबाइयात से प्रेरीत होकर डॊ. बच्चन ने 'मधुशाला' के बाद 'मधुबाला' और 'मधुकलश' नामक कविताओं की रचना की। उनकी जानी मानी कृतियों में शामिल है इनका भागवद गीता का अवधी और हिंदी में अनुवाद। अब हिंदी फ़िल्म संगीत की बात करें तो कुछ गिने चुने फ़िल्मों में उनके गीत आये हैं। शायद ही कोई होली ऐसी गई हो कि जिस दिन हरिवंशराय का लिखा और उन्हीं के सुपुत्र अमिताभ बच्चन का गाया फ़िल्म 'सिलसिला' का गीत "रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे" हमें सुनाई ना दिया हो। फ़िल्म 'बदनाम बस्ती' में "मेले में खोई गुजारिया" गीत को स्वयं हरिवंशराय ने गाया था। और फ़िल्म 'आलाप' में भी उन्होंने एक बड़ा ही कोमल गीत लिखा था, "कोई गाता मैं सो जाता", जिसे येसुदास ने भी उसी मख़मली अंदाज़-ओ-आवाज़ में गाया। आइए आज हरिवंशराय बच्चन की याद में इसी गीत को सुना जाए। जयदेव का संगीत है इसमें और इस फ़िल्म के बाकी डिटेल्स आप प्राप्त कर सकते हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ३११ वीं कड़ी में जिस दिन हमने येसुदास को जनमदिवस की बधाई स्वरूप इसी फ़िल्म का "चांद अकेला जाये सखी री" सुनवाया था। तो आइए सुनते हैं आज का गीत...



क्या आप जानते हैं...
कि हरिवंशराय बच्चन की लिखी कविता 'अग्निपथ' पर ही ९० के दशक का वह ब्लॊकबस्टर फ़िल्म बनी थी, जिसमें अभिनय कर अमिताभ बच्चन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। पूरे फ़िल्म में अमिताभ बच्चन को इस कविता का पाठ करते देखा व सुना गया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली १० /शृंखला ०३
ये प्रिल्यूड है गीत का -


अतिरिक्त सूत्र - इस गीत में अभिनेत्री के बचते हुए दिखते है शत्रुघ्न सिन्हा.

सवाल १ - कवि / गीतकार का नाम बताएं - २ अंक
सवाल २ - अभिनेत्री का नाम बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने अजय बढ़त बना ली है. बहुत बधाई. शंकर लाल जी बहुत दिनों बाद नज़र आये.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, November 16, 2010

हौले हौले रस घोले....महान महदेवी वर्मा के शब्द और जयदेव का मधुर संगीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 528/2010/228

हिंदी साहित्य छायावादी विचारधारा के लिए जाना जाता है। छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में एक स्तंभ का नाम है महादेवी वर्मा। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है हिंदी साहित्यकारों की फ़िल्मी रचनाओं पर आधारित लघु शृंखला 'दिल की कलम से' की आठवीं कड़ी में। महादेवी वर्मा ना केवल हिंदी की एक असाधारण कवयित्री थीं, बल्कि वो एक स्वाधीनता संग्रामी, नारीमुक्ति कार्यकर्ता और एक उत्कृष्ट शिक्षाविद भी थीं। महादेवी वर्मा का जन्म २६ मार्च १९०७ को फ़र्रुख़ाबाद में हुआ था। उनकी शिक्षा मध्यप्रदेश के जबलपुर में हुआ था। उनके पिता गिविंदप्रसाद और माता हेमरानी की वो वरिष्ठ संतान थीं। उनके दो भाई और एक बहन थीं श्यामा। महादेवी जी का विवाह उनके ९ वर्ष की आयु में इंदौर के डॊ. स्वरूप नारायण वर्मा से हुआ, लेकिन नाबालिक होने की वजह से वो अपने माता पिता के साथ ही रहने लगीं और पढ़ाई लिखाई में मन लगाया। उनके पति लखनऊ में अपनी पढ़ाई पूरी। महादेवी जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और १९२९ में बी.ए की डिग्री लेकर १९३३ में सम्स्कृत में एम.ए कर लीं। महादेवी वर्मा और उनके पति दांपत्य जीवन में ज़्यादातर अलग अलग ही रहे अपनी अपनी रुचियों के चलते। १९६६ में स्वरूप जी के निधन के बाद महादेवी स्थायी रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं और आजीवन वहीं रहीं। महात्मा बुद्ध के विचारों का उन पर गहरा असर हुआ और एक समय उन्होंने एक बौध भिक्षुणी बनने की भी कोशिश की थी। इलाहाबाद महिला विद्यापीठ की वो प्रथम मुख्यशिक्षिका बनीं, जिसका मुख्य उद्येश्य था हिंदी माध्यम से लड़कियों को शिक्षा देना। आगे चलकर वो इस विद्यापीठ की चांसेलर भी बनीं। ११ सितंबर १९८७ के रात ९:२७ मिनट पर महादेवी वर्मा चिरनिद्रा में सो गईं।

महादेवी वर्मा द्वारा लिखित कविता संग्रह 'यामा' को बेहद सराहना मिली थी, जिसे ज्ञानपीठ पुरस्कर से सम्मानित किया गया था। १९५६ में भारत सरकार ने साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए महादेवी वर्मा को पद्म भूषण से सम्मानित किया था। इसके अलावा १९७९ में देश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। १९८८ में मरणोपरांत उन्हें पद्मविभुषण से सम्मानित किया गया था। महादेवी वर्मा की लिखी कविताएँ और कहानियाँ स्कूल कालेजों के पाठ्यपुस्तकों में स्थान पाते हैं। महादेवी वर्मा को एक फ़िल्मी गीतकार के रूप में पाना फ़िल्म जगत का सौभाग्य है। १९८६ की फ़िल्म 'त्रिकोण का चौथा कोण' में उनका लिखा एक गीत शामिल किया गया था। छाया गांगुली की आवाज़ में यह गीत एक अद्भुत रचना है जिसे जयदेव ने स्वरबद्ध किया था। दोस्तों, मैं कोई साहित्यकार नहीं जो इस गीत के साहित्यिक पक्ष पर कोई टिप्पणी कर सकूँ, लेकिन इतना ज़रूर महसूस कर सकता हूँ कि यह एक उत्कृष्ट रचना है। इस कमचर्चित फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे विजयेन्द्र घाटगे, स्वरूप सम्पत, प्रियदर्शिनी, प्रमुख। जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है, विवाह से बाहर के संबंधों का ताना बाना बुना गया होगा इस फ़िल्म की कहानी में। आइए इस गीत को सुनते हैं,

हौले हौले रस घोले बोले मुझसे जिया,
पिया पिया पे क्या जादू पर मैंने क्या किया।

इठलाये, इतराये, इतराये, इठलाये, पूछे मुझसे जिया,
पिया पिया पे क्या जादू पर मैंने क्या किया।

ज़रा देखिए कि किस तरह से "इठलाये" और "इतराये" शब्दों को दूसरी बार आपस में बदल कर गीत के सौंदर्य को और भी बढ़ा दिया है। लीजिए यह गीत सुनिए और महसूस कीजिए कि छाया गांगुली ने कैसा ख़ूबसूरत अंजाम दिया है इस गीत को। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आज का यह अंक समर्पित है महान कवयित्री और साहित्यकार महादेवी वर्मा की पुण्य स्मृति को।



क्या आप जानते हैं...
कि छायावादी विचारधारा के चार स्तंभों में महादेवी वर्मा के अलावा बाकी तीन स्तंभ कौन से हैं? ये हैं सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', जयशंकर प्रसाद, और सुमित्रानंदन

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०९ /शृंखला ०३
ये प्रिल्यूड है गीत का -


अतिरिक्त सूत्र - ये कवि पिता भी हैं इंडस्ट्री के एक महानायक के.

सवाल १ - कवि / गीतकार का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गायक बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने काफी अच्छी बढ़त बना ली है, लगता है एक और मुकाबला उनके नाम रहेगा. शरद जी और अमित को भी बधाई, अवध जी का आभार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

जी जान से खेले सोहेल सेन आशुतोष के लिए इस बार और साथ मिला जावेद साहब की अनुभवी कलम का



ताज़ा सुर ताल 45/2010

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सजीव जी, आपको भी।

सजीव - आप सभी को मेरा भी नमस्कार और सुजॊय, तुम्हे भी। आज हम एक पीरियड फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं। आशुतोष गोवारिकर एक ऐसे फ़िल्मकार हैं जो पीरियड फ़िल्मों के निर्माण के लिए जाने जाते हैं। 'लगान' और 'जोधा अकबर' इस जौनर में आते हैं। और 'स्वदेस' में उन्होंने बहुत अच्छा संदेश पहुँचाया था इस देश के युवाओं को। और अब वो लेकर आ रहे हैं 'खेलें हम जी जान से'। आज इसी फ़िल्म और इसके गीत संगीत का ज़िक्र।

सुजॊय - मैंने सुना है कि इस फ़िल्म का पार्श्व बंगाल की सरज़मीन है और यह कहानी है आज़ादी के पहले की, आज़ादी के लड़ाई की। 'खेलें हम जी जान से' में मुख्य कलाकार हैं अभिषेक बच्चन, दीपिका पादुकोण, सिकंदर खेर, विशाखा सिंह, सम्राट मुखर्जी, मनिंदर सिंह, फ़ीरोज़ वाहिद ख़ान, श्रेयस पण्डित, अमीन ग़ाज़ी, आदि। जावेद अख़्तर के लिखे गीतों को धुनों में इस बार ए. आर. रहमान ने नहीं, बल्कि सोहैल सेन ने पिरोया है। जी हाँ, वही सोहैल सेन, जिन्होंने आशुतोष की पिछली फ़िल्म 'व्हाट्स योर राशी' में संगीत दिया था।

सजीव - हाँ, और आशुतोष साहब को इस बात के लिए दाद देनी ही पड़ेगी कि 'व्हाट्स योर राशी' के गीतों के ज़्यादा ना चलने के बावजूद सोहैल को इस फ़िल्म में संगीत देने का मौका दिया है। अभी कुछ ही देर में शायद हमें इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि आशुतोष का यह निर्णय कितना सही था। तो आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं सोहैल सेन की ही आवाज़ में।

गीत - ये देस है मेरा


सुजॊय - वाह! आशुतोष ने जैसे 'स्वदेस' के रहमान के "ये जो देस है तेरा" का ही पार्ट-२ बनाया है। लेकिन एक अलग ही अंदाज़ में और गायक - संगीतकार सोहैल सेन ने पूरी पूरी मौलिकता कायम रखा है।

सजीव - सचमुच एक सुरीली शुरुआत इस ऐल्बम की हुई है इस देशभक्ति गीत से। 'स्वदेस' के गीत में था "ये जो देस है तेरा", इसमें है "ये देस है मेरा"। केवल संगीत के लिहाज़ से ही नहीं, एक गायक के रूप में भी सोहैल ने इस गीत को बहुत ही अच्छा निभाया है। वैसे थोड़ा सा रहमान का स्टाइल नज़र आ तो रहा है। हो सकता है कि यह रहमान का नहीं बल्कि आशुतोष का स्टाइल हो, क्या पता! गीत के बोलों की बात की जाए तो जावेद साहब से हम ये तो उम्मीद रख ही सकते हैं। इस गीत के बोल, जैसे कि हमने सुना, हमारे देश के सारे अंधकार दूर करने के करता है, आज़ादी और ख़ुशियों की रोशनी इस देश में वापस आये।

सुजॊय - चलिए इस देशभक्ति के जस्बे को अपने अंदर समाहित कर हम अब बढ़ते हैं ऐल्बम के दूसरे गीत की तरफ़। यह है पामेला जैन और रंजिनी जोसे की युगल आवाज़ों में एक फ़ीमेल डुएट "नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता, कोई तो है मन में तेरे हमसे सखी ना छुपा"।

गीत - नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता


सुजॊय - वाह वाह वाह! मुझे इस गीत को सुनते हुए जितनी ख़ुशी हुई, उससे भी अधिक ताज्जुब हुआ यह देख कर कि बंगाल के लोकसंगीत का किस ख़ूबसूरती से इस्तेमाल इस नटखट चंचल गीत में हुआ है! यह धुन बंगाल के बाउल लोक संगीत की धुन है। एक तो संगीत संयोजन का कमाल, और उस धुन पर जावेद साहब ने किस ख़ूबसूरती से अपने शब्दों के मोतियों को पिरोया है! मैं बाक़ी के गीतों को सुने बग़ैर ही कह सकता हूँ कि यह गीत मेरा इस ऐल्बम का सबसे पसंदीदा गीत बना रहेगा।

सजीव - वाक़ई, बहुत दिनों के बाद इस तरह के बंगला के लोकशैली का गीत सुनने को मिला है। बस एक बात जो थोड़ी सी खटकती है, वह यह कि पामिला जैन और रंजिनी की आवाज़ों में ज़्यादा कॊन्ट्रस्ट नहीं है, जिसकी वजह से साफ़ साफ़ पता नहीं चलता कि कौन सी आवाज़ किसकी है, मेरा यह मानना है कि अगर दो आवाज़ें अलग क़िस्म के चुने जाते तो गीत का इम्पैक्ट और भी कई गुणा बढ़ जाता। लेकिन जो भी है, वाक़ई बहुत ही मीठा, सुरीला गीत है।

सुजॊय - इन दो गीतों को सुनने के बाद मेरी तो उम्मीदें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं इस ऐल्बम से, आइए जल्दी जल्दी तीसरा गाना सुनते हैं, मुझसे तो सब्र नहीं हो रहा।

गीत - खेलें हम जी जान से


सजीव - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना, और अब कि बार एक ऐसा गीत जो फ़िल्म के शीर्षक को सार्थक करे, फ़िल्म की कहानी को सार्थक करे, पूरी जोश के साथ 'सुरेश वाडकर आजीवासन म्युज़िक अकादमी' के बच्चों द्वारा गाये इस समूह गीत में हम 'लगान' के "बार बार हाँ, बोलो यार हाँ" गीत के साथ बहुत कुछ मिलता जुलता अनुभव कर सकते हैं।

सुजॊय - एक अलग तरह का गीत, पहले के दो गीतों से बिल्कुल अलग, कोरस और साज़ों का अच्छा तालमेल। संगीत संयोजन में भी सोहैल ने स्तरीय काम किया है। आइए अब एक नर्मो नाज़ुक रुमानीयत से लवरेज़ युगल गीत सुनते हैं सोहैल सेन और पामिला जैन की आवाज़ों में।

गीत - सपने सलौने


सजीव - इस गीत के अरेंजमेण्ट में भी हम बंगाल के संगीत की झलक पा सकते हैं। गीत के शब्द भी बहुत अच्छे हैं, जिसमें एक प्रेमी कह रहा है कि वो अपने प्यार के सपने और वादे पूरे करेगा लेकिन पहले अपनी देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही। और यही बात इस रोमांटिक डुएट की खासियत है।

सुजॊय - मुझे भी यह गीत पसंद आया, लेकिन मास लेवेल पर कितना कामयाब हो पाएगा कह नहीं सकते। ख़ैर, अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, अब कि बार "वंदेमातरम"। इसे भी एक ग्रूप ने गाया है, 'सिने सिंगर्स ऐसोसिएशन ग्रूप कोरस'। न जाने क्यों ए. आर. रहमान की थो़ड़ी बहुत छाप नज़र आती है इस गीत में भी।

गीत - वंदेमातरम


सजीव - इस "वंदेमातरम" की खासियत है कि संस्कृत के मूल गीत को हिंदी में अनुवाद कर इसे लिखा व रचा गया है। एक और देशभक्ति गीत इस तरह से फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध किया। और फ़िल्म के ट्रेलरों में इसी गीत को दिखाया जा रहा है। और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि फ़िल्म में इसे पार्श्वसंगीत के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा, जो कहानी या सीन को और भी ज़्यादा असरदार या भावुक बनाएगा।

सुजॊय - इस फ़िल्म में बस इतने ही गानें हैं, बाक़ी कुछ इन्स्ट्रुमेण्टल वर्ज़न हैं इन्हीं गीतों के, जैसे कि Long Live Chittagong, The Teenager's Whistle, Surjya's Sorrow, Vande Mataram, The Escape, तथा Revolutionary Comrades. आइए इनमें से कम से कम एक यहाँ पर सुन लेते है।

धुन - Revolutionary Comrades


सुजॊय - मज़ा आ गया आज सजीव जी। बहुत दिनों के बाद एक अच्छा ऐल्बम सुनने को मिला जिसे सुनकर दिल को बहुत ही सुकून और शांति मिली है। और जैसा कि मैंने पहले कहा था, अब भी मैं अपने उसी बात पर बरकरार रहते हुए यह ऐलान करता हूँ कि "नैन तेरे झुके झुके" ही मेरा फ़ेवरीट नंबर है इस फ़िल्म का। आशुतोष गिवारिकर, सोहैल सेन और जावेद अख़्तर को मेरी तरफ़ से "थम्प्स अप"!!! आपके क्या विचार हैं सजीव जी?

सजीव - देखिये सुजॉय, अक्सर हम कहते हैं कि पुराना संगीत बहुत अच्छा था, बात में सच्चाई भी नज़र आती है क्योंकि आज इतने सालों के बाद भी वो हमें मधुर लगते हैं, जानते हैं वजह क्या है ?....उन गीतों को, गीतकार, संगीतकार, निर्देशक, गायक और जितने भी साजिन्दे उससे जुड़े हुए हैं उन सब का भरपूर स्नेह मिलता था मतलब हर गीत को एक शिशु की तरह संवार कर सबके सामने लाया जाता था. अब मेकिंग में वो प्यार नहीं रहा सब कुछ आनन् फानन में होता है....मगर जब भी कोई काम दिल से होता है वो दिल तक अवश्य पहुँचता है, अभी हाल में गुज़ारिश के गीत भी इसी श्रेणी में आते हैं और अब इस फिल्म के गीतों को देखिये, इन्हें सुनकर पता लगता है कि इन पर कितनी मेहनत की गयी, इन्हें प्यार से संवारा गया है, दिल से संजोया गया है तभी तो देखिये दिल को छू पा रहे हैं, आशुतोष, सोहेल और जावेद भाई को इस शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई. मुझे तो सभी गीत बेहद पसंद आये पर शीर्षक गीत बेहद खास लगा उसके कोरस के चलते. इसे सुनकर सचमुच ४० वें दशक की एक युवा टीम सामने साकार हो जाती है.

सुजॊय - और आज की इस प्रस्तुति को समाप्त करने से पहले मैं 'ताज़ा सुर ताल' के अपने दोस्तों को यह बता दूँ कि अगले हफ़्ते से मैं इस स्तंभ का हिस्सा नहीं रहूँगा, कम से कम अगले कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए, लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हमारी मुलाक़ात युंही होती रहेगी। 'ताज़ा सुर ताल' के महफ़िल की शमा सजीव और विश्वदीपक युंही जलाते रहेंगे। इसी बात पर अब हमें आज के इस अंक को समाप्त करने की इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Monday, November 15, 2010

हम लाये हैं तूफानों के किश्ती निकाल के.....कवि प्रदीप का ये सन्देश जो आज भी मन से राष्ट्र प्रेम जगा जाता है



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 527/2010/227

दोस्तों कल था १४ नवंबर, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्मदिवस। नेहरु जी का बच्चों के प्रति अत्यधिक लगाव हुआ करता था। बच्चों के लिए उन्होंने बहुत सारा कार्य भी किया। इसी वजह से आज का यह दिन देश भर में 'बाल दिवस' के रूप में मनाया जाता है। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार। 'दिल की कलम से', इस शुंखला में आज हम लेकर आए हैं एक ऐसे कवि की बातें जो एक कवि होने साथ साथ एक उत्कृष्ट गीतकार और गायक भी थे, जिनकी लेखनी और गायकी में झलकता है उनका अपने देश के प्रति प्रेम और देशवासियों में जागरुक्ता लाने की शक्ति। जी हाँ, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में ज़िक्र कवि प्रदीप का। कवि प्रदीप का जन्म १९१५ में मध्य प्रदेश के उज्जैन के बाधनगर में हुआ था। उनका पूरा नाम था रामचन्द्र नारायणजी द्विवेदी। उनकी शिक्षा अलाहाबाद में हुई और वहीं उन्होंने कविताएँ लिखनी शुरु की। गर्मियों की छुट्टियों मे वे मित्रों के घर जाया करते थे। ऐसी ही एक छुट्टी में वे बम्बई आये और उनकी मुलाक़ात हो गई बॊम्बे टॊकीज़ के हिमांशु राय से। उनकी लेखनी से प्रभावित होकर उन्होंने कवि प्रदीप को १९३९ में फ़िल्म 'कंगन' के गानें लिखने का मौका दे दिया। यही प्रदीप की पहली फ़िल्म थी बतौर गीतकार और गायक। उनकी लोकप्रिय गीतों वाली फ़िल्म थी १९४० में बनी फ़िल्म 'बंधन', जिसका एक गीत "चल चल रे नौजवान" तो आज भी उतना ही लोकप्रिय है। इस फ़िल्म के बाद उन्हें काम की कमी नहीं हुई। 'कंगन', 'झूला', 'नया संसार', 'क़िस्मत' जैसी फ़िल्में एक के बाद एक आती चली गईं। कवि प्रदीप को उनकी योगदान के लिए सम्मानित किया गया था 'दादा साहब फाल्के' पुरस्कार से। उन्होंने करीब १५०० गानें लिखे जो ज़्यादातर देश भक्ति और ईश्वर भक्ति रस में ओत-प्रोत हैं। ब्रॊण्काइटिस से आक्रान्त होकर वे चुप-चाप चले गए हमसे बहुत दूर, जैसे कह रहे हों अपनी ही दिल की बात इस गीत में, कि "चल अकेला चल अकेला चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला"।

कवि प्रदीप के दिल में देश भक्ति की प्रबल भावना थी जो आज भी हमारे दिलों को जागृत करती है देशभक्ति के भावों से। कल नेहरु जी का जन्मदिन भी था तो उन्हें याद करते हुए मैं यहाँ पर यह बताना अत्यंत आवश्यक है कि जब सन् १९६२ में देश बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र थी, तब २९ जनवरी १९६३ को लाल क़िले की प्राचीर पर जब लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप की वह अमर रचना "अए मेरे वतन के लोगों" प्रस्तुत कीं तो पंडित नेहरु की आँखें आँसूओं से भर गए थे। प्रदीप के गीतों में खनकती हिंदी की मिठास तो है ही, उसके साथ है देशभक्ति, ईश्वर भक्ति और आंचलिक सहजता के सारे गुण। उनके लिखे देश भति गीत आज जन गीत बन गए हैं जो आज भी हमारे दिल में देश भक्ति की मशाल प्रज्वलित करते हैं। अपने देश की युवा पीढ़ी के लिए उनका यही संदेश है कि "हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भल के"। आइए पंडित जवाहरलाल नेहरु और कवि प्रदीप को एक साथ श्रद्धा सुमन अर्पित करें फ़िल्म 'जागृति' के इस गीत के ज़रिए। मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ और हेमन्त कुमार का संगीत। फ़िल्म की जानकारी हम पहले ही आपको दे चुके हैं "साबरमती के संत" गीत के आलेख में, और प्रदीप जी से एक मुलाक़ात के बारे में राज सिंह जी ने हमें बताया था 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने में', जिसमें हमने इसी फ़िल्म का "आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ" गीत सुनवाया था। तो आइए सुनते हैं यह गीत जो है आज की युवा पीढ़ी के नाम।



क्या आप जानते हैं...
कि "हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के" 'जागृति' फ़िल्म का ना केवल अंतिम गीत है, बल्कि इसी गीत के साथ फ़िल्म का भी समापन होता है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०८ /शृंखला ०३
एक शुरूआती झलक सुनिए इस गीत की-


अतिरिक्त सूत्र - संगीतकार जयदेव ने रचा है ये अद्भुत गीत.

सवाल १ - छायावादी युग की एक सशक्त कलम से निकला है ये गीत, किस की है ये रचना, नाम बताएं- २ अंक
सवाल २ - गायिका बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ७ अंकों पर है पर अभी भी श्याम कान्त जी से पीछे हैं जो १० अंकों पर हैं. अल्पना जी ने खाता खोला है १ अंक से बधाई. राज जी और अवध जी आभार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, November 14, 2010

अम्बर की एक पाक सुराही....अमृता प्रीतम की कलम का जादू और आशा के स्वरों की खुशबू



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 526/2010/226

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज रविवार की शाम, यानी कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई सप्ताह का शुभारंभ। पिछले हफ़्ते हमने शुरु की थी लघु शृंखला 'दिल की कलम से', जिसके तहत हिंदी साहित्यकारों द्वारा लिखे फ़िल्मी गीत हम आपको सुनवा रहे हैं। अब तक हमने इस शृंखला में जिन साहित्यकारों को शामिल किया है, वो हैं पंडित नरेन्द्र शर्मा, वीरेन्द्र मिश्र, गोपालसिंह नेपाली, बालकवि बैरागी, और गोपालदास नीरज। आज हम जिस साहित्यकार की बात करने जा रहे हैं, वो हैं मशहूर लेखिका व कवयित्री अमृता प्रीतम। मानव मन की जो अभिव्यक्ति होती है, उन्हें वर्णन करना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन अमृता प्रीतम द्वारा लिखे साहित्य को अगर हम ध्यान से पढ़ें तो पायेंगे कि किस सहजता से उन्होंने बड़ी से बड़ी बात कह डाली है, जिन्हें हम केवल महसूस ही कर सकते हैं। उनकी लेखनी तो जैसे फूल पर ठहरी हुई ओस की बूंदें हैं। ३१ अगस्त १९१९ को जन्मीं अमृता प्रीतम पंजाब की पहली मशहूर कवयित्री और लेखिका हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वो पहली महिला हैं और राष्ट्रपति से पद्मश्री प्राप्त करने वालीं प्रथम पंजाबी लेखिका। युं तो उन्होंने पंजाबी में ही अधिकतर लिखा है, पर हिंदी साहित्य में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई हैं। १९३५ में अमृता कौर ने प्रीतम सिंह से विवाह किया, जो लाहोर के विख्यात अनारकली बाज़ार के एक नामी व्यापारी थे। १९६० में अमृता प्रीतम अपने पति को छोड़ कर साहिर लुधियानवी के पास चली गईं। उनकी साहिर के साथ इस प्रेम कहानी को उन्होंने अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में व्यक्त की हैं। जब साहिर साहब की ज़िंदगी में एक दूसरी औरत ने प्रवेश कर लिया, तब अमृता साहिर को छोड़ नामचीन आर्टिस्ट और लेखक इमरोज़ के पास चली गईं। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी ४० साल वो इमरोज़ के साथ गुज़ारीं, जिन्होंने अमृता के ज़्यादातर किताबों के कवर डिज़ाइन किए। अमृता प्रीतम और इमरोज़ का युगल-जीवन एक किताब का विषय भी बना, अमृता इमरोज़: ए लव स्टोरी। अमृता प्रीतम ३१ अक्तुबर २००५ को एक लम्बी बीमारी के बाद इस दुनिया से चल बसीं।

हिंदी फ़िल्म 'कादम्बरी' में अमृता प्रीतम ने एक गीत लिखा था, "अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठाकर"। कहते हैं सौ सुन्हार की, और एक लुहार की, यही बात हम अमृता प्रीतम के लिए भी कह सकते हैं। बस उनका लिखा यह एक गीत दूसरे गीतकारों के लिखे कई कई गीतों पर साफ़ साफ़ भारी पड़ता है। आज हम इसी ख़ूबसूरत गीत को सुनेंगे, और बार बार सुनेंगे। 'कादम्बरी' १९७६ की एक समानांतर फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था मधुसुदन कुमार ने और निर्देशक थे एच. के. वर्मा। फ़िल्म में शबाना आज़्मी, विजय अरोड़ा, चांद उस्मानी, जीत उपेन्द्र, अपर्णा चौधरी प्रमुख ने अभिनय किया था। फ़िल्म में संगीत दिया था शास्त्रीय संगीत की मशहूर हस्ती उस्ताद विलायत ख़ान ने। इस फ़िल्म में आशा भोसले के अलावा अजीत सिंह ने भी गीत गाए हैं। 'कादम्बरी' तो व्यावसायिक दृष्टि से चली नहीं, लेकिन आज इस गीत की वजह से इस फ़िल्म का नाम लोगों के ज़हन में बाक़ी है। दोस्तों, जो गीत मुझे बेहद बेहद पसंद होते हैं, उनके बोलों को टंकित करने में मुझे अलग ही आनंद आता है। ऐसा करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं उस गीत को एक अलग ही अंदाज़ में जी रहा हूँ। लीजिए इस गीत के बोल ये लिख रहा हूँ -

अम्बर की एक पाक़ सुराही,
बादल का एक जाम उठाकर,
घूंट चांदनी पी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

कैसे इसका कर्ज़ चुकाएँ,
माँग के अपनी मौत के हाथों,
उमर की सूली सी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

अपना इसमें कुछ भी नहीं है,
दो दिल जलते उसकी अमानत,
उसको वही तो दी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

आशा भोसले ने क्या ख़ूब गाया है इस गीत को। इस आलेख को लिखते हुए जब मैं यह गीत सुन रहा हूँ तो आलेख के ख़त्म होने तक ध्यान आया कि इस गीत को मैं पिछले २० मिनट में ६ बार सुन चुका हूँ, फिर भी दिल नही भर रहा। आख़िर क्या ख़ास बात है इस गीत में? मुझे तो समझ नहीं आया। अगर आप बता सकें तो बताइएगा ज़रूर...



क्या आप जानते हैं...
कि उस्ताद विलायत ख़ान ने १९५१ की फ़िल्म 'मदहोश' का बैकग्राउण्ड म्युज़िक तैयार किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०७ /शृंखला ०३
ये है गीत का आरंभिक शेर-


अतिरिक्त सूत्र - रफ़ी साहब की आवाज़ है गीत में

सवाल १ - गीतकार कवि कौन है यहाँ - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्यामकान्त जी, अमित जी और बिट्टू जी आप तीनों को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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