Thursday, July 31, 2008

कविता और संगीत से अव्वल, सुर को जिताने वाले मोहम्मद रफ़ी



अमर आवाज़ मोहम्मद रफ़ी को उनकी 28वीं बरसी पर याद कर रहे हैं संजय पटेल

मेरा तो जो भी कदम है वो तेरी राह में है॰॰॰

जी हाँ, स्तम्भकार संजय पटेल ने अपने ज़िंदगी के बहुत से कदम रफ़ी की याद में बढ़ाये हैं। संयोग है कि हमारे लिये ये विशेष आलेख रचने वाले संजय भाई ने मोहम्मद रफ़ी की मृत्यु पर ही पहला लेख इन्दौर के एक प्रतिष्ठित दैनिक में लिखा था. संजय भाई रफ़ी साहब के अनन्य मुरीद हैं और इस महान गायक की पहली बरसी से आज तक 31 जुलाई के दिन रफ़ी साहब की याद में उपवास रखते हैं। प्रस्तुत संजय की श्रद्धाँजलि-

रफ़ी एक ऐसी मेलोडी रचते थे कि मिश्री की मिठास शरमा जाए,सुनने वाले के कानों में मोगरे के फ़ूल झरने लगे,सुर जीत जाए और शब्द और कविता पीछे चली जाए.
मेरी यह बात अतिरंजित लग सकती है आपको लेकिन रफ़ी साहब का भावलोक है ही ऐसा. आप जितना उसके पास जाएंगे आपको वह एक पाक़ साफ़ संसारी बना कर ही छोड़ेगा.

मोहम्मद रफ़ी साहब को महज़ एक प्लै-बैक सिंगर कह कर हम वाक़ई एक बड़ी भूल करते हैं.दर असल वह महज़ एक आवाज़ नहीं;गायकी की पूरी रिवायत थे.सोचिये थे तो सही साठ साल से सुनी जा रही ये आवाज़ न जाने किस किस मेयार से गुज़री है. पंजाब के एक छोटे से क़स्बे से निकल कर मोहम्मद रफ़ी नाम का किशोर मुंबई आता है,कोई गॉड फ़ादर नहीं,कोई ख़ास पहचान नहीं ,सिर्फ़ संगीतकार नौशाद साहब के नाम का एक सिफ़ारिशी पत्र और अपनी क़ाबिलियत के बूते पर मोहम्मद रफ़ी देखते देखते पूरी दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम बन जाता है . इसमें क़िस्मत के करिश्मे का हाथ कम और मो.रफ़ी की अनथक मेहनत का कमाल ज़्यादा है. जिस तरह के अभाव और बिना आसरे की बसर मो.रफ़ी साहब ने की वह रोंगट खड़ी कर देने वाली दास्तान है. उस पर फ़िर कभी लेकिन ये तो बताना भी चाहूँगा कि मो.रफ़ी साहब की ज़िन्दगी में एक दिन ऐसा भी हुआ कि रेकॉर्डिंग के
बाद सब चले गए हैं और रफ़ी साहब स्टुडियो के बाहर देर तक खड़े हैं . तक़रीबन दो घंटे बाद तमाम साज़िंदों का हिसाब-किताब करने के बाद नौशाद साहब स्टुडियो के बाहर आकर रफ़ी साहब को देख कर चौंक गए हैं.पूछा तो बताते हैं कि घर जाने के लिये लोकल ट्रेन के किराये के पैसे नहीं है. नौशाद साहब हक़्के – बक़्के ! अरे भाई भीतर आकर माँग लेते ...रफ़ी साहब का जवाब : अभी काम पूरा हुआ नहीं और अंदर आकर पैसे माँगूं ? हिम्मत नहीं हुई नौशाद साहब. नौशाद साहब की आँखें छलछला आईं हैं. सोचिये किस बलन के इंसान थे रफ़ी साहब. और आज किसी रियलिटी शो में थोड़ा नाम कमा लेने वाले छोकर कैसे इतरा रहे हैं. लगता है भद्रता और शराफ़त का वह दौर रफ़ी साहब के साथ ही विदा हो गया.

आइये अब रफ़ी साहब की गायकी के बारे में बात हो जाए.सहगल साहब के बाद मोहम्मद रफ़ी एकमात्र नैसर्गिक गायक थे. उन्होने अच्छे ख़ासे रियाज़ के बाद अपनी आवाज़ को माँजा था. जिस उम्र में वे शुरू हुए उसके बारे में जान कर हैरत होती है कि कब तो उन्होंने सीखा , कब रियाज़ किया और कब की इतनी सारी और बेमिसाल रेकॉर्डिंग्स. संगीतकार वसंत देसाई की बात याद आ गई ...वे कहते थे रफ़ी साहब कोई सामान्य इंसान नही थे...वह तो एक शापित गंधर्व था जो किसी मामूली सी ग़लती का पश्चाताप करने इस मृत्युलोक में आ गया.बात रूपक में कही गई है लेकिन रफ़ी साहब की शख़्सियत पर एकदम फ़बती है. आज तो रफ़ी , किशोर और मुकेश गायकी परम्परा के ढेरों नक़ली वर्जन पैदा हो गए है लेकिन जिस दौर में रफ़ी साहब शुरू हुए तब के.एल.सहगल,पंकज मलिक,के.सी.डे,जी.एम.दुर्रानी जैसे चंद नामों को छोड़ कर पार्श्वगायन में कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी. हाँ जो अच्छा था वह यह कि बहुत क़ाबिल म्युज़िक डायरेक्टर्स थे जो गायकों को एक लाजवाब घड़ावन देते रहे.
रफ़ी साहब को भी श्यामसुंदर,नौशाद, ग़ुलाम मोहम्मद, मास्टर ग़ुलाम हैदर,खेमचंद प्रकाश,हुस्नलाल भगतराम जैसे गुणी मौसीकारों का सान्निध्य मिला जो रफ़ी साहब के कैरियर में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुए.

रफ़ी साहब ने क्लासिकल म्युज़िक का दामन कभी न छोड़ा यही वजह है कि लगभग रफ़ी साहब को पहली बड़ी क़ामयाबी देने वाली तस्वीर बैजूबावरा में उन्होंने राग मालकौंस(मन तरपत)और दरबारी (ओ दुनिया के रखवाले) को जिस अधिकार और ताक़त के साथ गाया वन इस महान गुलूकार के हुनर की पुष्टि करने के लिये काफ़ी है. रफ़ी साहब ने जो सबसे बड़ा काम पार्श्वगायन के क्षेत्र में क्या वह यह कि उन्होनें अपने आप को कभी भी टाइप्ट नहीं होने दिया. ख़ुशी,ग़म,मस्ती,गीत,ग़ज़ल,लोक-संगीत,वैस्टर्न सभी स्टाइल में गाया और बख़ूबी गाया. सन अड़तालीस में वे शुरू हुए इस लिहाज़ से 2008 उनके गायकी का हीरक जयंती वर्ष है. साठ साल बाद भी उनके गीत पुराने नहीं पड़े और यक़ीनन कह सकता हूँ सौ साल बाद भी नहीं पड़ेंगे.
शब्दों की साफ़-शफ़्फ़ाक़ अदायगी,कविता के मर्म को समझने वाला दिल,संगीत को गहराई से जानने की समझ और एक ऐसा विलक्षण दिमाग़ जो संगीतकार और कम्पोज़िशन की रूह तक उतर जाता हो और जैसा चाहा गया उससे ज़्यादा डिलिवर करता है.

इस दुनिया से चले जाने के बाद भी (सनद रहे रफ़ी साहब को गुज़रे 28 बरस हो गए हैं;एक पीढ़ी ऐसी तैयार हो गई है जो साल भर में अपने माँ-बाप को भूल जाती है) रफ़ी साहब की गायकी का जलवा क़ायम है क्योंकि रफ़ी शब्द को गाते हुए भी शब्द और समय के पार की गायकी के कलाकार थे इसीलिये उनके गीतों की ताब और चमक बरक़रार है. रफ़ी साहब को सुनने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि हम उन्हें सुनें और चुप हो जाएँ.ऐसा चुप हो जाना ही सबसे अच्छा बोलना है. सादगी से रहने और गाने वाले रफ़ी साहब ने ऐसा गाया है जैसे कोई ख़ुशबू का ताजमहल खड़ा कर दे.स्वर में ओस की बूँद की पाक़ीज़गी पैदा करने वाले मोहम्मद रफ़ी कभी भी रेकॉर्डिंग ख़त्म होने के बाद कभी नहीं कहते थे कि मैं जाता हूँ.31 जुलाई 1980 को संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की एक गीत रेकॉर्ड करने के बाद रफ़ी साहब बोले “ओके नाऊ आइ विल लीव “ क्या कोई सोच सकता है उसी दिन आवाज़ का ये जादूगर इसी शाम इस दुनिया को अलविदा कह गया.....क्या सूफ़ी और दरवेश के अलावा किसी को मृत्यु जैसी सचाई का पूर्वाभास हो सकता है ?

चित्र सौजन्य- हमाराफोटोस डॉट कॉम

आज हम पूरे दिन रफी की याद फीचर आलेख प्रकाशित करेंगे। युनूस खान की कलम से दोपहर दो बजे, रफी के बारे में विशेष जानकारी शाम ७ बजे। तो बने रहिए 'आवाज' के साथ और गुनगुनाते रहिए रफ़ी के मीठे-मीठे तराने।

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6 श्रोताओं का कहना है :

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह संजय भाई, आप रफी साब पर इतने बड़े मुरीद हैं जान कर आपके प्रति मेरा सम्मान और बढ़ गया है....रफी साब वो अफताब हैं जिनकी चमक कभी नही बुझ सकती....

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

संजय जी,

आपकी यह बात बिलकुल दुरुस्त है कि मोहम्मद रफ़ी को सुनने के बाद चुप होकर ही उनके रूहानी स्पर्श को महसूस किया जा सकता है।

मेरे साथ भी ऐसा ही है लेकिन उल्टा। जब मैं शांत होता हूँ तो रफ़ी के गीत सुनता हूँ। जैसे-

बाहोश-ओ-हवास में दीवाना, ये आज वसीयत करता हूँ॰॰॰॰

कहीं एक मासूम नाजुक सी लड़की, बहुत खूबसूरत मगर साँवली सी॰॰॰

संजय जी,

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

BRAHMA NATH TRIPATHI का कहना है कि -

बहुत अच्छा संजय जी आपने बिल्कुल सही कहा है रफी साहब कभी पुराने नही हो सकते
आज भी मेरे पास उनके गाये हुए गीतों का एक बड़ा संग्रह है जिसे मई अक्सर सुना करता हूँ

Manju Gupta का कहना है कि -

रफी जी की रूह आज भी आवाज प्रेमियों के दिलों में बसी हुयी है . हमें तो २ बजे के कार्यक्रम का इंतजार है .आभार

Meena Budhiraja का कहना है कि -

Aapka yah lekh anmol hai..rafi sahab ke baare mei ek ek shabd sach hai..unki awaaz ham sab ki rooh mei basi hai. Shukriya sanjay ji.

Meena Budhiraja का कहना है कि -

Aapka yah lekh anmol hai..rafi sahab ke baare mei ek ek shabd sach hai..unki awaaz ham sab ki rooh mei basi hai. Shukriya sanjay ji.

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