Saturday, July 23, 2011

OIG - शनिवार विशेष - 51 - किशोर दा के कई गीतों में पिताजी का बड़ा योगदान था



पार्श्वगायिका पूर्णिमा (सुषमा श्रेष्ठ) अपने पिता व विस्मृत संगीतकार भोला श्रेष्ठ को याद करते हुए...

ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' में। दोस्तों, १९३१ से लेकर अब तक फ़िल्म-संगीत संसार में न जाने कितने संगीतकार हुए हैं, जिनमें से बहुत से संगीतकारों को अपार सफलता और शोहरत हासिल हुई, और बहुत से संगीतकार ऐसे भी हुए जिन्हें वो मंज़िल नसीब नहीं हुई जिसकी वो हक़दार थे। कभी छोटी बजट की फ़िल्मों में मौका पाने की वजह से तो कभी स्टण्ट या धार्मिक फ़िल्मों का ठप्पा लगने की वजह से, कभी व्यक्तिगत कारणों से और कभी कभी सिर्फ़ क़िस्मत के खेल की वजह से ये प्रतिभाशाली संगीतकार गुमनामी में रह कर चले गए। पर फ़िल्म-संगीत के धरोहर को अपनी सुरीली धुनों से समृद्ध कर गए। ऐसे ही एक कमचर्चित पर गुणी संगीतकार हुए भोला श्रेष्ठ। आज की पीढ़ी के अधिकतर नौजवानों को शायद यह नाम कभी न सुना हुआ लगे, पर गुज़रे ज़माने के सुरीले संगीत में दिलचस्पी रखने वालों को भोला जी का नाम ज़रूर याद होगा। पर बहुत कम ऐसे लोग होंगे जिन्हें यह पता होगा कि भोला श्रेष्ठ दरअसल पार्श्वगायिका पूर्णिमा (सुषमा श्रेष्ठ) के पिता हैं। पिछले दिनों हमनें सम्पर्क किया पूर्णिमा जी से और उनसे जानना चाहा उनके पिता के बारे में। पूर्णिमा जी नें बहुत ही आग्रह के साथ हमें सहयोग दिया और हमसे बातचीत की। तो आइए, आज के इस विशेषांक में प्रस्तुत है पूर्णिमा जी से की हुई बातचीत।

सुजॉय - पूर्णिमा जी, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है 'हिंद-युग्म' के 'आवाज़' मंच पर।

पूर्णिमा जी - नमस्कार!

सुजॉय - पूर्णिमा जी, आज की पीढ़ी के लोग सुषमा श्रेष्ठ और पूर्णिमा के नामों से तो भली-भाँति वाकिफ़ हैं, पर बहुत ही कम लोग ऐसे होंगे जिन्होंने भोला श्रेष्ठ जी का नाम सुना होगा। इसलिए हम चाहते हैं कि आपके पिता भोला जी के बारे में जानें और अपने पाठकों को भी जानकारी दें।

पूर्णिमा जी - ज़रूर!

सुजॉय - तो बताइए अपने पिता के बारे में। क्या उन्हें संगीत विरासत में मिली थी? कहाँ से ताल्लुख़ रखते थे वो?

पूर्णिमा जी - मेरे पिताजी श्री भोला श्रेष्ठ जी का जन्म १७ जून १९२४ में कोलकाता में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई कोलकाता से ही पूरी की। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि किसी संगीतमय परिवार से ताल्लुख़ न रखते हुए भी वो एक बहुत अच्छे तबला वादक थे। बनारस घराने के दिग्गज कलाकारों से उन्होंने हिंदुस्तानी परकशन की बारीक़ियों को सीखा। फिर १९४९ में वो मुंबई आए फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़माने। मुंबई आकर वो जुड़े 'बॉम्बे टॉकीज़' से और सहायक बनें खेमचंद प्रकाश के। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि फ़िल्म 'महल' के सदाबहार गीत "आयेगा आनेवाला" में उनका कितना बड़ा योगदान था।

सुजॉय - अच्छा? यह तो वाक़ई ताज्जुब की बात है! उसके बाद जब सहायक से स्वतंत्र संगीतकार बनें, तो बतौर स्वतंत्र संगीतकार उन्होंने अपनी पारी कहाँ से शुरु की थी?

पूर्णिमा जी - उनके संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी 'नज़रिया' (१९५२), जिसमें गीत लिखे थे राजकुमार संतोषी के पिता श्री पी. एल. संतोषी जी नें। इसके बाद आई फ़िल्म 'नौ लखा हार' (१९५३), 'ये बस्ती ये लोग' (१९५४), 'आबशार' (१९५४) आदि।

सुजॉय - पूर्णिमा जी, एक पिता के रूप में भोला जी को आपने कैसा पाया?

पूर्णिमा जी - एक पिता के रूप में वो बहुत ही सख़्त अनुशासन-पसंद इंसान थे, पर साथ ही साथ फ़्लेक्सिबल भी थे। वो यह नहीं चाहते थे कि मैं या उनका कोई और संतान किसी तरह के क्रीएटिव आर्ट को अपना प्रोफ़ेशन बनाए। शायद अपनी अनुभूतिओं और दुखद परिस्थितिओं को देखने के बाद उनको ऐसा लगा होगा। पर मैं तब तक अपना करीयर शुरु कर चुकी थी। मैं स्टेज पर गाती थी, पर उन्हें इस बात का पता नहीं था क्योंकि वो हमेशा किशोर कुमार जी के साथ टूर पे रहते थे, और जिनके वो सहायक थे अपने अंतिम दिनों तक। एक दिन मेरी माँ की ज़िद की वजह से उन्होंने मुझे मुंबई के किसी स्टेज शो पर गाते हुए सुना और अपने ख़यालात के सामने वो झुके। इसके बाद मैंने उनसे संगीत सीखना शुरु किया।

सुजॉय - मैंने सुना है कि भोला जी का बहुत कम उम्र में देहान्त हो गया था। आपकी उम्र उस वक़्त क्या होगी?

पूर्णिमा जी - पिताजी अचानक एक दिन दिल का दौरा पड़ने पर चल बसे। उनकी उम्र केवल ४६ वर्ष थी। वह दिन था ११ अप्रैल १९७१, और मैं उस वक़्त ११ साल की थी।

सुजॉय - अपने पिता की विशेषताओं के बारे में कुछ बताइए।

पूर्णिमा जी - पिता जी का दिमाग़ बहुत ही विश्लेषणात्मक था, he had an analytical mind, और उनके सेन्स ऑफ़ ह्युमर के तो क्या कहने थे। पर उन्हें ग़ुस्सा जल्दी आ जाता था, लेकिन बहुत जल्द शांत भी हो जाते थे। उनका दिमाग़ बहुत तेज़ था और हर चीज़ को बारीक़ी से ऑबसर्व करते थे। हालाँकि उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी नहीं कर सके, पर उन्होंने ख़ुद ही अपनी शिक्षा पूरी की। He was totally self educated. मैं यह बहुत मानती हूँ कि एक उत्कृष्ट संगीतकार और म्युज़िशियन होने के बावजूद इस फ़िल्म इंडस्ट्री नें उन्हें वो सब कुछ नहीं दिया जिसके वो हक़दार थे। उनकी प्रतिभा का इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि किशोर कुमार के स्वरबद्ध कई मशहूर गीतों में उनका बहुत बड़ा योगदान था। "बेकरार दिल तू गायेजा", "पंथी हूँ मैं उस पथ का", "जीवन से ना हार जीने वाले" जैसे गीतों की धुनों में पिता जी का भी बड़ा योगदान था।

सुजॉय - जी, यह मैंने भी कहीं पढ़ा था कि "बेकरार दिल" की धुन भोला जी नें ही बनाई थी। अच्छा, भोला जी द्वारा स्वरबद्ध किन किन गीतों को आप उनकी सर्वोत्तम रचनाएँ मानती हैं?

पूर्णिमा जी - मेरी व्यक्तिगत पसंद होगी "दिल जलेगा तो ज़माने में उजाला होगा", यह १९५४ की फ़िल्म 'ये बस्ती ये लोग' का गीत है। फिर "मैं हूँ हिंदुस्तानी छोरी" (नज़रिया) और "बेकरार दिल तू गायेजा" (दूर का राही), ये सब गीत मेरे दिल के बहुत करीब हैं।

सुजॉय - भोला जी को उनका कौन सा गीत सब से प्रिय था?

पूर्णिमा जी - मेरा ख़याल है "दिल जलेगा" और "बेक़रार दिल" भी उनके पसंदीदा गीत थे।

सुजॉय - भोला जी के बारे में और कोई बात हमारे पाठकों को बताना चाहेंगी?

पूर्णिमा जी - बहुत ज़्यादा लोगों को यह मालूम न होगा कि हालाँकि मेरे पिताजी का जन्म कोलकाता में हुआ और वहीं उनकी परवरिश हुई, और हर दृष्टि से वो एक बंगाली थे, पर जन्म से वो नेपाली थे।

सुजॉय - पूर्णिमा जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका अपने पिता के बारे में वो सब जानकारी दी जो कहीं और से प्राप्त करना मुश्किल था। अगली बार जब हम बातचीत करेंगे तो हम आपके करीयर के बारे में जानना चाहेंगे, आपके एक से एक सुपरहिट गीत की भी चर्चा करेंगे। लेकिन आज चलते चलते भोला जी का कौन सा गीत आप हमारे श्रोताओं को सुनवाना चाहेंगी जो आपकी तरफ़ से भोला जी को डेडिकेशन स्वरूप होगा?

पूर्णिमा जी - एकमात्र गीत जिसे मैं उन्हें समर्पित कर सकती हूँ, वह है "बेक़रार दिल तू गायेजा"।

गीत - बेक़रार दिल तू गायेजा (दूर का राही)


तो ये था फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका पूर्णिमा (सुषमा श्रेष्ठ) से उनके पिता व गुज़रे दौर के संगीतकार भोला श्रेष्ठ पर एक बातचीत। अब आज की यह प्रस्तुत समाप्त होती है, नमस्कार!

और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

अनुराग शर्मा की कहानी "गुरुर्ब्रह्मा"



'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की कहानी "टोड" का पॉडकास्ट उन्हीं की आवाज़ में सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा का एक व्यंग्य "गुरुर्ब्रह्मा ...", उन्हीं की आवाज़ में। कहानी "टोड" का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 13 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट बर्ग वार्ता ब्लॉग पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।


पतझड़ में पत्ते गिरैं, मन आकुल हो जाय। गिरा हुआ पत्ता कभी, फ़िर वापस ना आय।।
~ अनुराग शर्मा

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी
"उन्होंने भैंस-सेवा का काम अपने गुर्गों को सौंपकर सरस्वती-सेवा में फ़िर से हाथ आज़माना शुरू किया।"
(अनुराग शर्मा की "गुरुर्ब्रह्मा" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
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#137th Story, Gururbrahma : Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2011/18. Voice: Anurag Sharma

Thursday, July 21, 2011

राही कोई भूला हुआ, तूफानों में खोया हुआ राह पे आ जाता है...राग "देस मल्हार" के सुरों में बँधा



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 705/2011/145

पावस की रिमझिम फुहारों के बीच वर्षाकालीन रागों में निबद्ध गीतों की हमारी श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" जारी है| आज श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः आपका स्वागत करता हूँ| दोस्तों आज का राग है- "देस मल्हार"| श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने कुछ ऐसे रागों की चर्चा की थी जो मल्हार अंग के नहीं हैं इसके बावजूद उन रागों से हमें वर्षा ऋतु की सार्थक अनुभूति होती है| ऐसा ही एक राग है "देस", जिसके गायन-वादन से वर्षा ऋतु का सजीव चित्र हमारे सामने उपस्थित हो जाता है| और यदि इसमें मल्हार अंग का मेल हो जाए तो फिर 'सोने पर सुहागा' हो जाता है| आज हम आपको राग "देस मल्हार" का थोड़ा सा परिचय और फिर इसी राग पर आधारित एक मनमोहक गीत सुनवाएँगे|

राग "देस मल्हार" के नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें स्वतंत्र राग "देस" में "मल्हार" अंग का मेल होता है| राग "देस" अत्यन्त प्रचलित और सार्वकालिक होते हुए भी वर्षा ऋतु के परिवेश का चित्रण करने में समर्थ है| एक तो इस राग के स्वर संयोजन ऋतु के अनुकूल है, दूसरे इस राग में वर्षा ऋतु का चित्रण करने वाली रचनाएँ बहुत अधिक संख्या में मिलते हैं| राग "देस" औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसमे कोमल निषाद के साथ सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है| "देस मल्हार" राग में "देस" का प्रभाव अधिक होता है| दोनों का आरोह- अवरोह एक सा होता है| मल्हार अंग के चलन और म रे प, रे म, स रे स्वरों के अनेक विविधता के साथ किये जाने वाले प्रयोग से राग विशिष्ट हो जाता है| राग "देस" की तरह "देस मल्हार" में भी कोमल गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है| राग का यह स्वरुप पावस के परिवेश को जीवन्त कर देता है| परिवेश-चित्रण के साथ-साथ मानव के अन्तर्मन में मिलन की आतुरता को यह राग बढ़ा देता है| कुछ ऐसे ही मनोभावों का सजीव चित्रण पूर्वांचल के एक भोजपुरी लोकगीत में किया गया है|

हरी हरी भीजे चुनर मोरी धानी, बरस रहे पानी रे हरी |
बादर गरजे चमके बिजुरिया रामा, नहीं आए सैंया मोरा तरसे उमिरिया रामा |
हरी हरी काहे करत मनमानी, बरस रहे पानी रे हरी |
बारह बरिसवा पर अईलन बनिजरवा रामा, चनन बिरिछ तले डारलन डेरवा रामा |
हरी हरी चली मिलन को दीवानी, बरस रहे पानी रे हरी |


इस लोकगीत की नायिका अपने साजन के विरह में व्याकुल है, तभी वर्षा ऋतु का आगमन हो जाता है| गरजते बादल और चमकती बिजली उसे और अधिक व्याकुल कर देते हैं| ऐसे ही मौसम में अचानक उसका साजन बारह वर्ष बाद घर आता है| बाग़ में चन्दन के वृक्ष के नीचे उसने डेरा डाल रखा है और नायिका बरसते पानी में दीवानी की भाँति मिलाने चली है| पावस ऋतु में मानवीय मनोभावों का ऐसा मोहक चित्रण आपको लोकगीतों के अलावा अन्यत्र शायद कहीं न मिले| आज का राग "देस मल्हार" भी इसी प्रकार के भावों का सृजन करता है| राग "देस मल्हार" पर आधारित आज प्रस्तुत किया जाने वाला गीत है, जिसे हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म "प्रेमपत्र" से लिया है| फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी हैं जिनके आजादी से पहले के संगीत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का स्वर मुखरित होता था तो आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द हुआ करता था| सलिल चौधरी भारतीय शास्त्रीय संगीत, बंगाल और असम के लोक संगीत के जानकार थे तो पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का भी उन्होंने गहन अध्ययन किया था| उनके संगीत में इन संगीत शैलियों का अत्यन्त संतुलित और प्रभावी प्रयोग मिलता है| आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत -"सावन की रातों में ऐसा भी होता है..." में राग "देस मल्हार" के स्वरों का प्रयोग कर उन्होंने राग के स्वरुप का सहज और सटीक चित्रण किया है| इस गीत को परदे पर अभिनेत्री साधना और नायक शशि कपूर पर फिल्माया गया है| फिल्म के निर्देशक हैं विमल रोंय, गीतकार हैं गुलज़ार तथा झपताल में निबद्ध गीत को स्वर दिया है लता मंगेशकर और तलत महमूद ने| इस गीत में सितार का अत्यन्त मोहक प्रयोग किया गया है| लीजिए आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए| रविवार की शाम हम और आप यहीं मिलेंगे एक और वर्षाकालीन गीत के साथ|



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "प्रेमपत्र" का यह गीत गुलज़ार के लिए सलिल चौधरी की पहली रचना थी| बाद में इस जोड़ी ने संगीत प्रेमियों को अनेक मनमोहक गीतों का उपहार दिया था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - इस गीत के संगीतकार की पहली फिल्म थी "नवभारत".
सूत्र २ - प्रश्न जिस गीत के बारे में है उस फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री थी सुलोचना.
सूत्र ३ - मुखड़े में एक पक्षी को संबोधन है जिसका वर्षा से खास सम्बन्ध है.

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
फिल्म का नाम बताएं - २ अंक
गायक कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी ने कल एक बार बाज़ी मारी, शरद जी और अमित जी सेफ खेल कर २ अंक कमा गए. प्रतीक जी एक अंक आपको दे देते हैं, क्या याद करेंगे :) हिन्दुस्तानी जी और दादी को भी आभार सहित १ अंक मिलता है. नीरज जी ये रेडियो आवाज़ की ही एक नयी पहल है, प्रोमोशन के इरादे से कुछ दिनों तक इसे लाईव रखा गया है, जल्द ही इसे एच्छिक कर देंगें. वैसे इसे बहुत आसानी से बंद किया जा सकता है.

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, July 20, 2011

उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा...उत्साह, उल्लास और उमंग से भरपूर राग वृन्दावनी सारंग का एक अलग रंग



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 704/2011/144

"उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" श्रृंखला की चौथी कड़ी में एक और वर्षागीत लेकर मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके बीच उपस्थित हूँ| दोस्तों; श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमने आपके लिए राग "वृन्दावनी सारंग" का परिचय और इसी राग पर आधारित गीत प्रस्तुत किया था| आज के गीत में हम आपको राग "वृन्दावनी सारंग" का एक दूसरा पहलू दिखाने का प्रयत्न कर रहे हैं| हम यह चर्चा कर चुके हैं कि यह राग गम्भीर प्रकृति का होने के कारण विरह भाव की सृष्टि करता है| ऐसे परिवेश के सृजन के लिए राग "वृन्दावनी सारंग" का गायन-वादन पूर्वांग में किया जाता है| परन्तु जब राग के स्वर-समूहों को हम पूर्वांग से उत्तरांग में ले जाते हैं, तब राग का भाव बदल जाता है और हमें उल्लास, उत्साह और प्रकृति के आनन्द की सार्थक अनुभूति होने लगती है| दोस्तों; आज हम आपको राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित जो गीत सुनवाने जा रहे हैं, उसमे आपको प्रकृति का नैसर्गिक आनन्द तो मिलेगा ही, साथ ही आलस्य त्याग कर कर्म करने की प्रेरणा देने में भी यह गीत सक्षम है| कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने सम्भवतः ऐसे ही परिवेश के लिए यह पंक्तियाँ लिखी होगी -

आली, घिर आए घन पावस के |
लख ये काले-काले बादल, नील सिन्धु में खिले कमल-दल,
हरित ज्योति चपला अति चंचल, सौरभ के रस के |
द्रुत समीर काँपे थर-थर-थर, धाराएँ झरतीं फर-फर-फर,
जगती के प्राणों में समर भर, बेध गए कस के |


दोस्तों; आज जो गीत हम आपको सुनवाने जा रहे हैं, वह भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध एक ऐसे संगीतकार की रचना है, जिन्होंने अपनी पहली फिल्म "शोभा" (1942) से लेकर अन्तिम फिल्म "शक" (1976) तक संगीत की शुद्धता को कायम रखा| आप अनुमान तो लगा ही चुके होंगे- मेरा संकेत निश्चित रूप से संगीतकार बसन्त देसाई की ओर ही है| 1957 में राजकमल कला मन्दिर की फिल्म "दो ऑंखें बारह हाथ" प्रदर्शित हुई थी| इस फिल्म के निर्देशक व्ही. शान्ताराम ने अपनी पिछली फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी बसन्त देसाई को संगीत निर्देशन का दायित्व दिया| कहने की आवश्यकता नहीं कि फिल्म के साथ-साथ इसके गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए| फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का निर्माण बिलकुल नये और अनूठे विषय पर किया गया था| निर्माता-निर्देशक शान्ताराम जी ने आजीवन कारावास का दण्ड भुगत रहे क्रूर और हत्यारे बन्दियों के सुधार और उन्हें समाज की मुख्य धारा में वापस लाने का आग्रह इस फिल्म के माध्यम से किया था|

एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि जब इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ था उन दिनों विख्यात शिक्षाविद और राजनीतिज्ञ डा. सम्पूर्णानन्द उत्तर प्रदेश के मुखमंत्री थे| इसके बाद 1962 से 1967 तक वे राजस्थान के राज्यपाल पद पर भी रहे| उन्हीं के कार्यकाल में भारत का पहला बन्दी सुधारगृह अर्थात खुली जेल 1963 में राजस्थान के सांगानेर में स्थापित हुआ था| सम्भवतः व्ही. शान्ताराम कि फिल्म से प्रेरित होकर डा. सम्पूर्णानन्द ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में यह योजना बनाई थी, जो राज्यपाल बनने की अवधि में कार्यान्वित हुई थी| राजस्थान के बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी बन्दी सुधार गृह की स्थापना की गई थी| आजकल इसे सम्पूर्णानन्द आदर्श कारागार के नाम से जाना जाता है| बहरहाल; फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का गाँधीवादी विचारधारा, जैसा अनूठा विषय था; वैसा ही संगीत बसन्त देसाई ने भी दिया था| शास्त्रीय और लोक संगीत में रचे-बसे फिल्म के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे| फिल्म का एक गीत -"ऐ मलिक तेरे बन्दे हम..." तो आज भी अनेक विद्यालयों की प्रातःकालीन प्रार्थना के रूप में गाया जाता है| इस फिल्म का एक अन्य गीत -"उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा..." आज हमने आपको सुनवाने के लिए चुना है| फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का यह गीत राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित है| मन्ना डे और लता मंगेशकर के युगल स्वरों में यह गीत है और इसके गीतकार हैं भरत व्यास| लीजिए आप भी सुनिए उत्साह, उल्लास और उमंग से भरपूर यह गीत-



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "दो आँखें बारह हाथ" का कथानक ब्रिटिश शासनकाल में एक भारतीय रियासत की सत्य घटना पर आधारित था| फिल्म के आरम्भ में यह घोषणा व्ही. शान्ताराम ने की थी

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - फिल्म की नायिका साधना है.
सूत्र २ - पुरुष स्वर है तलत महमूद का.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "राही"

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी सबसे आगे चल रही हैं, पर बढ़त कब तक रख पाएंगीं ये देखना दिलचस्प होगा, नए नियमों के चलते शृंखला का मज़ा दुगना हो गया है, बाज़ी किसी के भी हाथ आ सकती है

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, July 19, 2011

गरजत बरसत भीजत आई लो...राग गौड़ मल्हार और लता जी के स्वरों में मिलन की आतुरता



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 703/2011/143

र्षा ऋतु के गीतों पर आधारित श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करता हूँ| आज का राग है- "गौड़ मल्हार"| पावस ऋतु का यह एक ऐसा राग है जिसके गायन-वादन से सावन मास की प्रकृति का यथार्थ चित्रण किया जा सकता है| आकाश पर कभी मेघ छा जाते हैं तो कभी आकाश मेघ रहित हो जाता है| इस राग के स्वर-समूह उल्लास, प्रसन्नता, शान्त और मिलन की लालसा का भाव जागृत करते हैं| मिलन की आतुरता को उत्प्रेरित करने में यह राग समर्थ होता है| आज के अंक में हम आपको ऐसे ही भावों से भरा फिल्म "मल्हार" का मनमोहक गीत सुनवाएँगे; किन्तु उससे पहले राग "गौड़ मल्हार" के स्वर-संरचना की एक संक्षिप्त जानकारी आपसे बाँटना आवश्यक है|

राग "गौड़ मल्हार" की रचना राग "गौड़ सारंग" और "मल्हार" के मेल से हुई है| यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसमें सात स्वरों का प्रयोग होता है| शुद्ध और कोमल, दोनों निषाद का प्रयोग राग के सौन्दर्य बढ़ा देते हैं| शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं| गन्धार स्वर का बड़ा विशिष्ठ प्रयोग होता है| इस राग की तीनताल की एक बन्दिश -"कारी बदरिया घिर घिर आई..." का सुमधुर गायन पण्डित ओमकारनाथ ठाकुर के स्वरों में बेहद लोकप्रिय हुआ था| राग "गौड़ मल्हार" के परिवेश का यथार्थ चित्रण महाकवि कालिदास की कृति "ऋतुसंहार" के एक श्लोक में किया गया है| "ऋतुसंहार" के द्वितीय सर्ग के दसवें श्लोक में महाकवि ने वर्षाऋतु के ऐसे ही परिवेश का वर्णन किया है, जिसका भावार्थ है -"बार-बार गरजने वाले मेघों से आच्छन्न आकाश और घनी अँधेरी रात में चमकने वाली बिजली के प्रकाश में रास्ता देखती हुई, प्रेम से वशीभूत नायिका तेजी से अपने प्रियतम से मिलने के लिए आतुर हो जाती है| सच तो यही है कि राग "गौड़ मल्हार" वर्षाऋतु के रागों में श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ है| आज के अंक में प्रस्तुत किये जाने वाले गीत में श्रृंगार के संयोग पक्ष का भावपूर्ण चित्रण किया गया है| इस राग का दूसरा पहलू है श्रृंगार का विरह पक्ष, जिसकी चर्चा हम इसी श्रृंखला की आगामी एक कड़ी में करेंगे|

आज हमने आपके लिए 1951 में प्रदर्शित फिल्म "मल्हार" का गीत -"गरजत बरसत भीजत आई लो, तुम्हरे मिलन को अपने प्रेम पियरवा..." का चयन किया है| वास्तव में यह गीत राग "गौड़ मल्हार" पर आधारित गीत नहीं बल्कि इसी राग में निबद्ध तीनताल की एक पारम्परिक बन्दिश है| संगीतकार रोशन ने फिल्म के शीर्षक गीत के रूप में इस बन्दिश का प्रयोग किया था| गीत को लता मंगेशकर ने अपने मनमोहक स्वरों से सँवारा है| फिल्म "मल्हार" का निर्माण पार्श्वगायक मुकेश ने किया था| मुकेश और रोशन अभिन्न मित्र थे और कहने की आवश्यकता नहीं कि जब फिल्म के निर्माता मुकेश होंगे तो संगीत निर्देशक निश्चित रूप से रोशन ही होंगे| फिल्म "मल्हार"के गीत बड़े मधुर थे किन्तु दुर्भाग्य से फिल्म चली नहीं और गीत भी चर्चित नहीं हो पाए| राग "गौड़ मल्हार" के स्वरों से सजी यही संगीत रचना रोशन ने एक दशक बाद थोड़े शाब्दिक परिवर्तन के साथ फिल्म "बरसात की रात" में दुहराया और इस बार फिल्म के साथ-साथ गीत भी हिट हो गया| आइए सुना जाए फिल्म "मल्हार" का शीर्षक गीत, राग "गौड़ मल्हार" की तीनताल में निबद्ध बन्दिश के रूप में|



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार रोशन ने अपने प्रारम्भिक दौर की असफल फिल्मों के कुछ सुरीले धुनों को लगभग एक दशक बाद दोबारा सफल प्रयोग किया| फिल्म 'आरती (१९६२)' के गीत -'कभी तो मिलेगी...' की धुन प्रारम्भिक दौर की फिल्म 'घर घर में दीवाली' के गीत -'कहाँ खो गई...' की धुन का दूसरा संस्करण है| इसी प्रकार 1957 की फिल्म 'दो रोटी' के गीत -'तुम्हारे कारण...' और 1959 की फिल्म 'मधु' के गीत -'काहे बनो जी अनजान...' की धुनों को रोशन ने 1966 की फिल्म 'देवर' में क्रमशः -'रूठे सैंया हमारे...' और -'दुनियाँ में ऐसा कहाँ...' की धुनों में सफलतापूर्वक दुहराया था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - सावन के इस युगल गीत में एक स्वर लता का है.
सूत्र २ - इस फिल्म के निर्देशक "हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ" शृंखला में फीचर्ड ४ निर्देशकों में से एक थे.
सूत्र ३ - लता के स्वरों में जो पहला बंद है उसमें शब्द है - "दुल्हनिया"

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
साथी गायक कौन हैं - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
हालंकि अमित जी और प्रतीक जी ने के ही समय पर जवाब दिया, पर प्रतीक जी का जवाब ही पूर्ण माना जायेगा. पर अमित जी आपने जो विस्तृत जानकारी दी राग के बारे में उसके लिए धन्येवाद, आपको हम १ अंक अवश्य देंगें. अविनाश जी, शरद जी बधाई. हिन्दुस्तानी जी, क्षिति जी, और और अवध जी को भी बधाई १-१ अंकों के लिए

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, July 18, 2011

सावन के बादलों उनसे जा कहो...रिमझिम फुहारों के बीच विरह के दर्द में भींगे जोहरा बाई और करण दीवान के स्वर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 702/2011/142

"ओश्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की दूसरी कड़ी में आपका पुनः स्वागत है| कल की कड़ी में आपने वर्षा ऋतु के आगमन की सार्थक अनुभूति कराने वाले राग "मेघ मल्हार" पर आधारित गीत का रसास्वादन किया था| आज हम जिस वर्षाकालीन राग और उस पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनने जा रहे हैं, वह "मल्हार" के किसी प्रकार के अन्तर्गत नहीं आता; बल्कि "सारंग" के अन्तर्गत आता है| परन्तु इसका स्वर संयोजन ऐसा है कि इसके गायन-वादन से वर्षाकालीन परिवेश सहज रूप में उपस्थित हो जाता है| दोस्तों, आज का राग है- "वृन्दावनी सारंग"| कल के अंक में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि मल्हार अंग के रागों के अलावा "वृन्दावनी सारंग", "देस" और "जयजयवन्ती" भी ऐसे राग हैं; जो स्वतंत्र रूप से और "मल्हार" के मेल से भी वर्षा ऋतु के परिवेश की सृष्टि करने में सक्षम हैं| मल्हार के मिश्र रागों पर आधारित गीत हम आपको श्रृंखला की अगली कड़ियों में सुनवाएँगे; परन्तु आज हम आपको राग "वृन्दावनी सारंग" का संक्षिप्त परिचय और उस पर आधारित एक विरह गीत सुनवाने जा रहे हैं|

यह राग वर्षा ऋतु में नायक-नायिका के विरह भाव को उत्प्रेरित करता है| राग "मेघ मल्हार" की तरह "वृन्दावनी सारंग" भी गान्धार और धैवत रहित औडव-औडव जाति का राग है तथा शुद्ध और कोमल- दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है| शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं| राग "वृन्दावनी सारंग" में ऋषभ पर आन्दोलन ना करने से यह "मेघ मल्हार" से अलग हो जाता है| गम्भीर प्रकृति का राग होने के कारण यह श्रृंगार रस के विरह पक्ष को उभारता है| राग की प्रकृति के एकदम अनुकूल रीतिकालीन सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी की यह पंक्तियाँ हैं, जिसमें रानी नागमती का विरह वर्णन है-

चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा, साजा बिरह दुन्द दल बाजा |
सावन बरस मेंह अतवानी, मरन परी हौं बिरह झुरानी |

आज का गीत भी नायक-नायिका के बीच की दूरी और विरह भाव को व्यक्त करता है| 1944 में प्रदर्शित फिल्म "रतन" के लिए संगीतकार नौशाद ने दीनानाथ मधोक के गीत को राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित संगीतबद्ध किया था| इस गीत को अपने समय की चर्चित गायिका जोहरा बाई और गायक-अभिनेता करण दीवान ने युगल गीत के रूप में गाया है| फिल्मांकन में नायक-नायिका के बीच परस्पर दूरी है और वे आकाश में छाए बादलों को लक्ष्य करके अपनी-अपनी विरह व्यथा को व्यक्त करते हैं| उस समय तक नौशाद द्वारा संगीतबद्ध किये गए फिल्मों में "रतन" सर्वाधिक सफल फिल्म थी| इस फिल्म के संगीत की सफलता आकलन इस तथ्य से ही किया जा सकता है कि फिल्म की निगेटिव का मूल्य पचहत्तर हजार रुपए था; जबकि गीतों की रायल्टी साढ़े तीन लाख रुपए आई थी| रायल्टी की इस राशि ने उस समय तक के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे| यही नहीं फिल्म "रतन" के गीतों के कारण ही गायिका जोहरा बाई चोटी की गायिका बन गईं थीं| आप सुनिए राग "वृन्दावनी सारंग" पर आधारित यह गीत और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिये, कल के नए अंक में, एक नए राग और एक नए गीत के साथ आपसे फिर मिलूँगा|



क्या आप जानते हैं...
कि फिल्म "रतन" की संगीत रचना के लिए संगीतकार नौशाद को 50 रुपए प्रति गीत के हिसाब से कुल 800 रुपए मानदेय प्राप्त हुआ था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - संगीतकार के अभिन्न मित्र थे फिल्म के निर्माता गायक.
सूत्र २ - स्वर है लता जी का.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "गरवा"

अब बताएं -
किस वर्षा के राग की ताल पर स्वरबद्ध रचना है ये - ३ अंक
फिल्म के निर्माता का नाम बताएं - २ अंक
संगीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी ने एक बार फिर शानदार शुरुआत की है. अमित जी और अविनाश जी ने २ -२ अंक बटोरे. कल के सभी टिप्पणीकारों को हम १-१ अंक दे रहे हैं, पर याद रहे आज से ये १ अंक किसी रचनात्मक टिपण्णी के ही मिलेंगें, गलत जवाब देने पर नहीं.

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, July 17, 2011

बरसो रे कारे बादरवा...कारे-कजरारे मेघों का भावपूर्ण आह्वान



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 701/2011/141

"ओल्ड इज गोल्ड" पर आज से आरम्भ हो रही नई श्रृंखला में अपने पाठकों-श्रोताओं का मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार फिर स्वागत करता हूँ| दोस्तों; आज का यह अंक हम सब के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण है| पिछली श्रृंखला के समापन अंक से "ओल्ड इज गोल्ड" ने सात सौ अंकों का आँकड़ा पार कर लिया है| आज हम सब आठवें शतक के पहले अंक में प्रवेश कर रहें हैं| "ओल्ड इज गोल्ड" की श्रृंखलाओं को यह ऐतिहासिक उपलब्धि दिलाने में आप सभी पाठकों-श्रोताओं का ही योगदान है| "आवाज़" के सम्पादक सजीव सारथी तथा "ओल्ड इज गोल्ड" श्रृंखलाओं के संवाहक सुजॉय चटर्जी ने एक बार पुनः मुझे एक नई श्रृंखला का दायित्व दिया, इसके लिए मैं इनके साथ-साथ अपने पाठकों-श्रोताओं के प्रति भी आभार प्रकट करता हूँ|

दोस्तों; इन दिनों आप प्रकृति के अद्भुत वरदान- वर्षा ऋतु का आनन्द ले रहें हैं| आपके चारो ओर परिवेश ने हरियाली की चादर ओढ़ रखी है| तप्त-शुष्क मिट्टी पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है| ऐसे ही मनभावन परिवेश में आपके उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए हम लेकर आए हैं यह नई श्रृंखला -"उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" | इस शीर्षक से यह अनुमान आपको हो ही गया होगा कि श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस-गन्ध से पगे गीतों की है| भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ हैं- बसन्त और पावस; इस श्रृंखला में हम आपको वर्षा ऋतु के रागों का संक्षिप्त परिचय देते हुए उसी राग पर आधारित फिल्म-गीत भी प्रस्तुत करेंगे| इसके साथ ही भारतीय साहित्य में पावस ऋतु के कुछ अनूठे उद्धरण भी आपके साथ बाँटेंगे| संगीत शास्त्र के अनुसार मल्हार के सभी प्रकार पावस ऋतु की अनुभूति कराने में समर्थ हैं| इसके साथ ही कुछ सार्वकालिक राग- वृन्दावनी सारंग, देस और जयजयवन्ती भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं|

वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है| आज के अंक में हम राग मेघ अथवा मेघ मल्हार की ही चर्चा करेंगे| काफी थाट का यह राग औडव-औडव जाति का है; अर्थात आरोह-अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है| गन्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता| समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के रूप में अवरोह में गन्धार का प्रयोग भी करते हैं| ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है| यह पूर्वांग प्रधान राग है| इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, काले मेघों का आकाश पर छा जाने और उमड़-घुमड़ कर वर्षा के प्रारम्भ होने के परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है| वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने "मेघदूत" के प्रारम्भिक श्लोकों में बड़े यथार्थ रूप में चित्रित किया है-

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श ||

अर्थात; रामगिरि पर्वत-श्रृंखला पर शापित यक्ष विरह-ताप से पीड़ित हो चुका था, ऐसे में आषाढ़ मास के पहले दिन आकाश में काले-काले मेघ मँडराने लगे| ऐसा प्रतीत होने लगा मानो मदमस्त हाथियों का झुण्ड पर्वत-श्रृंखलाओं के साथ अटखेलियाँ कर रहे हों|

इस परिवेश से मिलता-जुलता परिवेश हमारे आज के गीत का भी है| आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म "तानसेन" से चुना है| फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग "दीपक" गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा| कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग "मेघ मल्हार" की अवतारणा की जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया| इस प्रसंग में राग "मेघ मल्हार" गाकर मेघों का आह्वान करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है| बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग "मेघ मल्हार" मेघों का आह्वान करने में सक्षम है| दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है| फिल्म "तानसेन" के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे| फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल सहगल ने राग आधारित कई गीत गाये थे; जिनमे "सप्त सुरन तीन ग्राम..." (राग कल्याण का ध्रुवपद), "रुनझुन रुनझुन चाल तिहारी..." (राग शंकरा), "काहे गुमान करे..." (राग पीलू) सहित खुर्शीद के साथ गाये सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे| राग "मेघ मल्हार" पर आधारित आज प्रस्तुत किया जाने वाला गीत अभिनेत्री-गायिका खुर्शीद के स्वरों में है| गीतकार हैं पं. इन्द्र| तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है| एक स्थान पर ध्रुवपद की तरह दोगुन में भी गायन किया गया है| आइए सुनते हैं- वर्षा का आह्वान करते राग "मेघ मल्हार" पर आधारित यह गीत-



क्या आप जानते हैं...
कि 'रनजीत मूवीटोन' के प्रथम संगीतकार थे उस्ताद झंडे ख़ान, जिनकी इस बैनर के लिए पहली फ़िल्म थी 'देवी देवयानी'।

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - नायक नायिका अलग अलग है और बादलों को लक्ष्य कर अपने विरह की गाथा सुना रहे हैं.
सूत्र २ - संगीतकार हैं नौशाद.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "तकदीर"

अब बताएं -
किन युगल स्वरों में है ये गीत - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अवध जी, शरद जी, अनजाना जी, इंदु जी और अन्य सभी श्रोताओं को जिनका स्नेह हमें निरंतर मिला है और जो हमारी चिर प्रेरणा है, उन सबको नमन

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - सुर बहार की स्वरलहरियाँ



सुर संगम - 29 - सुर-बहार

दुर्भाग्यपूर्वक, कई कारणों से सुर-बहार अन्य तंत्र वाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका सबसे प्रमुख कारण है इसकी विशाल बनावट जिसके कारण इसे संभालना व इसके यातायात में बाधा आती है।

शास्त्रीय तथा लोक संगीत को समर्पित साप्ताहिक स्तम्भ 'सुर-संगम' के सभी श्रोता- पाठकों का मैं, सुमित चक्रवर्ती हार्दिक स्वागत करता हूँ हमारे २९वें अंक में। हम सबने कहीं न कहीं, कभी न कभी, किसी न किसी को यह कहते अवश्य सुना होगा कि "परिवर्तन संसार का नियम है।" इस जगत में ईश्वर की शायद ही कोई ऐसी रचना हो जिसमें कभी परिवर्तन न आया हो। इसी प्रकार संगीत भी कई प्रकार के परिवर्तनों से होकर ग़ुज़रता रहा है तथा आज भी कहीं न कहीं किसी रूप में परिवर्तित किया जा रहा है तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा है। न केवल गायन में बल्कि शास्त्रीय वाद्यों में भी कई इम्प्रोवाइज़ेशन्स होते आए हैं। सुर-संगम के आज के अंक में हम चर्चा करेंगे ऐसे ही परिवर्तन की जिसने भारतीय वाद्यों में सबसे लोकप्रिय वाद्य 'सितार' से जन्म दिया 'सुर बहार' को।

यूँ तो माना जाता है कि सुर-बहार की रचना वर्ष १८२५ में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद इम्दाद ख़ाँ के पिता उस्ताद साहेबदाद ख़ाँ ने की थी; परंतु कई जगहों पर इसके सृजक के रूप में लखनऊ के सितार वादक उस्ताद ग़ुलाम मुहम्मद का भी उल्लेख पाया जाता है। इसमें तथा सितार में मूल अंतर यह है कि सुर-बहार को नीचे के नोट्स पर बजाया जाता है। इसी कारण इसे 'बेस सितार' (bass sitar) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सितार के मुक़ाबले इसका तल भाग थोड़ा चपटा होता है तथा इसकी तारें भी सितार से भिन्न थोड़ी मोटी होती हैं। अपनी इसी बनावट के कारण इससे निकलने वाली ध्वनि का वज़न अधिक होता है। सुर-बहार की रचना के पीछे मूल लक्ष्य था पारंपरिक रूद्र-वीणा जैसी ध्रुपद शैली के आलाप को प्रस्तुत करना। चलिए सुर-बहार के बारे में जानकारी आगे बढ़ाने से पहले क्यों न इस प्रस्तुति को सुना जाए जिसमें आप सुनेंगे पं. रवि शंकर की प्रथम पत्नी अन्नपूर्णा देवी को सुर-बहार पर राग खमाज प्रस्तुत करते हुए|

अन्नपूर्णा देवी - सुर-बहार - राग खमाज


सुर-बहार को दो शैलियों में बजाया जाता है - पारंपरिक ध्रुपद शैली और, सितार शैली। पारंपरिक ध्रुपद शैली में सुर-बहार के सबसे उत्कृष्ट वादक माना जाता है सेनिया घराने के उस्ताद मुश्ताक़ ख़ाँ को। उनका सुर-बहार वादन सुनने वालों लगभग रूद्र-वीणा जैसा ही जान पड़ता है। सितार शैली में इसके दिग्गज माना जाता है उस्ताद इम्दाद ख़ाँ(१८४८-१९२०) को जो कि आज के दौर के सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत ख़ाँ के दादा थे। दुर्भाग्यपूर्वक, कई कारणों से सुर-बहार अन्य तंत्र वाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका सबसे प्रमुख कारण है इसकी विशाल बनावट जिसके कारण इसे संभालना व इसके यातायात में बाधा आती है। आइये आज की चर्चा को समाप्त करने से पहले हम सुनें एक और प्रस्तुति जिसमें सुर-बहार पर राग यमन प्रस्तुत कर रहे हैं इटावा घराने के सुप्रसिद्ध सितार एवं सुर-बहार वादक उस्ताद इमरात अली ख़ान साहब|

उस्ताद इमरात अली ख़ान - राग यमन


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: सुनिए और पहचानिए इस आवाज़ को जो है एक सुप्रसिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय शैली के दिग्गज की|



पिछ्ली पहेली का परिणाम: क्षिति जी को बधाई!

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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