Sunday, August 15, 2010

रविवार सुबह की कॉफी और जश्न-ए-आजादी पर जोश से भरने वाला एक अप्रकाशित दुर्लभ गीत रफ़ी साहब का गाया - लहराओ तिरंगा लहराओ



रात कुछ अजीब थी सच कहूँ तो रात चाँदनी ऐसे लग रही थी जैसे आकाश से फूल बरसा रही हो और बादल समय समय पर इधर उधर घूमते हुए सलामी दे रहे हों. और सुबह सुबह सूरज की किरणों की भीनी भीनी गर्मी एक अलग ही अंदाज़ मे अपनी चह्टा बिखेर रही थी. ऐसा लग रहा था के जैसे ये सब अलमतें हमें किसी ख़ास दिन का एहसास क़रना चाहते हैं. रात कुछ अजीब थी सच कहूँ तो रात चाँदनी ऐसे लग रही थी जैसे आकाश से फूल बरसा रही हो और बादल समय समय पर इधर उधर घूमते हुए सलामी दे रहे हों. और सुबह सुबह सूरज की किरणों की भीनी भीनी गर्मी एक अलग ही अंदाज़ मे अपनी छटा बिखेर रही थी. ऐसा लग रहा था के जैसे ये सब अलमतें हमें किसी ख़ास दिन का एहसास क़रना चाहते हैं. शायद आज सचमुच कोई ख़ास दिन ही तो है और ऐसा ख़ास दिन कि जिसकी तलाश करते हुए ना जाने कितनी आँखें पथरा गयीं, कितनी आँखें इसके इंतज़ार मे हमेशा के लिए गहरी नींद मे सो गयीं.

आज हमारे द्वारा 15 ऑगस्ट को मनाने का अंदाज़ सिर्फ़ कुछ भाषण होते हैं या फिर तिरंगे को फहरा देना कुछ देशभक्ति गीत बजाना जो सिर्फ़ इसी दिन के लिए होते हैं. मुझे याद आ रहा है के 90 के दशक की शुरुआत मे 1 हफ्ते पहले ही से देशभक्ति के गीत रेडियो टीवी पर गूंजने लगते थे. रविवार को प्रसारित होने वाली रंगोली 15 दिन पहले से ही इस दिन का एहसास लेकर आती थी, मगर आज क्या होता है कहने की ज़रूरत नहीं है समझना काफ़ी है. आज़ादी पाने के लिए क्या कुछ करना पड़ा कितनी क़ुर्बानियाँ दीं गयी इन पर लाखों किताबें लिखी जा चुकी हैं और भी शायद लिखी जाती रहेंगी. आज़ादी से पहले भी कुछ साहित्य छपता रहता था दैनिक, साप्ताहिक या मासिक पत्र निकाले जाते थे जिनमें क्रांतिकारियों के लिए संदेश या फिर उनमें जोश भरने के लेख होते थे. कई ऐसे पत्रों को अंग्रेज सरकार ने बंद करा दिया, जब्त कर लिया, उनकी प्रतिया बेचने और खरीदने पर पाबंदियाँ लगा दीं मगर इन सब के बावजूद भी वो उस सैलाब को नहीं रोक पाए. लेखन सामग्री के साथ साथ ही भारतीय फिल्मों ने भी इसमें योगदान किया लेकिन फिल्मों का दायरा पत्रों से ज़्यादा बड़ा था और ज़्यादा असर करता था दूसरे इस प्रकार की फ़िल्मे बनाना एक जोखिम का काम था क्योंकि इसमे पैसा ज़्यादा लगता था. लेकिन फिर भी समय समय पर इस प्रकार की फ़िल्मे बनीं जो अंग्रेज हुकूमत पर सीधे सीधे तो नहीं लेकिन शब्दों के बाणों को छुप छुप कर चलाते थे.

मुझे याद आ रहा है 1944 मे नौशाद अली के संगीत निर्देशन मे बनी “पहले आप” का गीत “हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा, हिंदू मुस्लिम दोनो की आँखों का तारा” इस गीत मे सभी धर्मो को एक साथ मिलकर देश प्रेम की शिक्षा दी गयी है, जो अंगेजों की फुट डालो और शासन करो की नीति को चुनौती देता है यानी एक साथ मिलजुल के रहेंगे तो किसी भी मुसीबत का मुक़ाबला कर सकते हैं. इससे पहले भी 1936 मे आई फिल्म जन्मा भूमि के गीत “ जाई जाई प्यारी जन्मा भूमि” , “ माता ने जानम दिया” और ना जाने कितने ही…….

एक बात जो हम सब पर लागू होती है के जब कोई चीज़ हमें नयी नयी मिलती है तो उसका उन्माद कुछ ज़्यादा होता है जैसे जैसे वक़्त गुज़रता जाता है ये उल्लास कम होता जाता है मगर अपनी आज़ादी के बारे मे ऐसा नहीं है 63 साल गुज़र जाने के बाद भी ये उन्माद कम नहीं हुवा. आज़ादी के बाद जब 31 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी “बापू” वीरगति को प्राप्त हुए तो ‘हुसनलाल भगातराम’ के संगीत मे सुर मिलाए ‘राजेन्द्र कृष्णा’ ने और आवाज़ दी मोहम्मद रफ़ी ने. उसके बाद तो फिल्मकारों के जज़्बात ने ऐसा जोश मारा के आज़ादी और देश प्रेम को लेकर फिल्म की जो झड़ी लगी तो ये बारिश अब तक रुकने का नाम नहीं ले रही है शहीद (1948), हिन्दुस्तान हमारा (1950), जलियाँवाला बाग की ज्योति (1953), झाँसी की रानी (1953), शहीद ए आज़म भगत सिंह (1954), वतन (1954), शहीद भगत सिंह (1963), हक़ीक़त (1964), शहीद (1965), नेताजी सुभाष चंद्र बोस् (1966), क्रांति (1980) बॉर्डर (1997), लगान (2001), मंगल पांडे (2005) आदि फ़ेरहिस्त बहुत लंबी है वक़्त बहुत कम.

अच्छा दोस्तो कभी आपने गौर किया है के आज़ादी का पहला जनमदिन कैसे मनाया गया होगा. मैं कभी कभी सोचता हूँ के 15 आगस्त 1948 को आज़ाद देश मे साँस लेने वाले लोगों के लिए कितना सुखदाई होगा वो दिन, क्या जोश रहा होगा, क्या जज़्बात रहे होंगे, किस प्रकार से एक दूसरे को बधाइयाँ दीं गयीं होंगी.

उस वक़्त 15 आगस्त महज़ कोई छुट्टी का दिन नहीं रहा होगा बल्कि एक त्योहार के रूप मे मनाया गया होगा.. इसी से संबंधित एक गीत आज यहाँ पेश किया जा रहा है मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ मे इस गीत के बोल नीचे लिखे हैं इन पर ज़रा ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि सुनते वक़्त इतना ध्यान नहीं दे पाते…

आओ एक बरस की आज़ादी का आओ सब त्योहार मनाओ
नगर नगर और डगर डगर लहराओ तिरंगा लहराओ

यही तिरंगा प्राण हमारा यही हमारी माया
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब पर इसकी छाया
आज इसी झंडे के नीचे आए भारत के बेटों सोचो
आज़ादी के एक बरस मे क्या खोया क्या पाया
आज ईद है आज दीवाली आओ गले लग जाओ
तिरंगा लहराओ

आज के दिन तुम भूल ना जाना बापू जी की अमृत वाणी
दूर ले गयी हमसे उनको एक हमारी नादानी
कब समझोगे राम, मोहम्मद और नानक के बेटों
कब लाएगी रंग हमारे देश पिता की कुर्बानी
जिसने दिया तिरंगा तुमको उसको भूल ना जाओ
तिरंगा लहराओ

आओ आज तिरंगे के नीचे खा लें हम कसमे
प्यार की रीत से बदल डालेंगे नफ़रत की सब रस्मे
वीर जवाहर की सेना बन दुनिया पर छा जाओ
जय हिंद कहो- (4) लहराओ तिरंगा लहराओ
नगर नगर और डगर डगर लहराओ तिरंगा लहराओ


इतना तो तय है कि ये गीत 15 आगस्त 1948 से पहले गाया गया होगा इसकी पहली कड़ी पर ध्यान दें तो आखिरी पंक्ति मे क्या खोया क्या पाया एक बरस मे ही खोने और पाने की बात करने से पता चलता है कि शायर भारत को किस मुकाम पर देखना चाहता है. खैर अब मैं इस गीत के बारे मे ज़्यादा नहीं कहूँगा वरना सुनने का मज़ा कम हो जाएगा मगर इसके साथ ही एक वादा ज़रूर करूँगा के भविष्य मे गीतों की शायराना खूबसूरती को बाहर निकालूँगा, आज़ादी को लेकर फ़िल्मे तो बनती रहीं वहीं प्राइवेट गीत भी कम नहीं गाए गये मगर वो गीत आज श्रोताओं के कुछ ख़ास वर्ग के ही पास हैं और वो उनको आम श्रोताजन को नहीं पहुँचाते हैं इसकी एक ख़ास वजह जो मैं समझता हूँ वो ये हैं कि इन गीतो का मुकाम संगीत प्रेमियों की नज़र मे काफ़ी उँचा होता है और कुछ असामाजिक तत्व जिन्हें संगीत से ख़ास लगाव नहीं होता है इसकी कीमत वसूल करने लग जाते हैं वहीं एक संगीत प्रेमी कभी ये नहीं चाहेगा की इस धरोहर का गलत उपयोग किया जाए.

इस गीत के बारे मे ज़्यादा जानकारी मुझे नहीं मिल पर अगर किसी संगीत प्रेमी के पास हो तो बताएँ.

LAHRAAO TIRANGA LAHRAAO- UNRELEASED RARE SONG BY MD. RAFI



प्रस्तुति- मुवीन



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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2 श्रोताओं का कहना है :

सजीव सारथी का कहना है कि -

very rare indeed....and rafi sahab....what a voice...great stuff

Sujoy का कहना है कि -

waaqai durlabh!!!

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