Saturday, February 26, 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - पियानो स्पर्श से महके फ़िल्मी गीतों सुनने के बाद आज मिलिए उभरते हुए पियानो वादक मास्टर बिक्रम मित्र से



नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शनिवार की विशेष प्रस्तुति के साथ हम फिर हाज़िर हैं। पिछले दिनों आपने इस स्तंभ में पियानो पर केन्द्रित लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' का आनंद लिया, जिसमें हमनें आपको न केवल पियानों साज़ के प्रयोग वाले १० लाजवाब गीत सुनवाये, बल्कि इस साज़ से जुड़ी बहुत सारी बातें भी बताई। और साथ ही कुछ पियानो वादकों का भी ज़िक्र किया। युवा पियानो वादकों की अगर हम बात करें तो कोलकाता निवासी, १७ वर्षीय मास्टर बिक्रम मित्र का नाम इस साज़ में रुचि रखने वाले बहुत से लोगों ने सुना होगा। स्वयं पंडित हरिप्रसाद चौरसिआ और उस्ताद ज़ाकिर हुसैन जैसे महारथियों से प्रोत्साहन पाने वाले बिक्रम मित्र नें अपना संगीत सफ़र ७ वर्ष की आयु में शुरु किया, और एक सीन्थेसाइज़र के ज़रिए सीखना शुरु किया प्रसिद्ध वेस्टर्ण क्लासिकल टीचर श्री दीपांकर मिश्र से। उन्हीं की निगरानी में बिक्रम ने प्राचीन कला केन्द्र चण्डीगढ़ से संगीत में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की। अब बिक्रम 'इंद्रधनु स्कूल ऒफ़ म्युज़िक' के छात्र हैं जहाँ पर उनके गुरु हैं प्रसिद्ध हारमोनियम एक्स्पर्ट पंडित ज्योति गोहो। अपने शुरुआती दिनों में बिक्रम मित्र 'अंजली ऒर्केस्ट्रा' नामक ग्रूप से जुड़े रहे जहाँ पर उन्होंने दो वर्ष तक वोकलिस्ट की भूमिका अदा की। उसके बाद उनका रुझान गायन से हट कर साज़ों की तरफ़ होने लगा। उन्हें दुर्गा पूजा के उपलक्ष्य पर 'शारदीय सम्मान' से सम्मानित किया जा चुका है। सीन्थेसाइज़र पर उन्होंने जिन बैण्ड्स के साथ काम किया, उनमें शामिल हैं 'Hellstones', 'Touchwood', 'Crossghats' आदि। यह हमारा सौभाग्य है कि हमें बिक्रम मित्र के संस्पर्श में आने का अवसर प्राप्त हुआ और उनका यह बड़प्पन है कि इस इंटरव्यु के लिए तुरंत राज़ी हो गए। तो आइए आपको मिलवाते हैं इस युवा प्रतिभाशाली पियानिस्ट से।

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सुजॊय - बिक्रम, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'हिंद-युग्म' के इस मंच पर। यह वाक़ई संयोग की ही बात है कि इन दिनों हम इस मंच पर पियानो पर केन्द्रित एक शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें हम १० ऐसे फ़िल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जिनमें पियानो मुख्य साज़ के तौर पर प्रयोग हुआ है। ऐसे में आप से मुलाक़ात हो जाना वाक़ई हैरान कर देने वाली बात है।

बिक्रम - बहुत बहुत शुक्रिया आपका!

सुजॊय - बिक्रम, सब से पहले तो यह बताइए कि इतनी कम उम्र में पियानो जैसी साज़ में आपकी दिलचस्पी कैसे हुई?

बिक्रम - मुझे पियानो में दिलचस्पी सात वर्ष की आयु में होने लगी थी। एक दिन मेरे एक चाचा ने एक की-बोर्ड हमारे घर में ला कर रख दिया, एक 'यामाहा की-बोर्ड', और मैं उसे बजाने लग पड़ा था बिना कुछ सोचे समझे ही। बस कुछ छोटे छोटे पीसेस, लेकिन कहीं न कहीं मुझे मेलडी की समझ होने लगी थी। और वो पीसेस सुंदर सुनाई दे रहे थे, हालाँकि उनमें बहुत कुछ वाली बात नहीं थी। लेकिन यकायक मैंने ख़ुद को कहा कि मैं एक म्युज़िशियन ही बनना चाहता हूँ। और तब मैंने पियानो को अपना साज़ मान लिया, जो मेरे लिए बहुत बड़ी चीज़ बन गई, एक ऐसी चीज़ जो मुझे ख़ुशी देने लगी और जिसकी मैं पूजा करने लगा।

सुजॊय - वाह! बहुत ख़ूब बिक्रम! अच्छा यह बताइए कि आपने पहली बार घर से बाहर पियानो कब और कहाँ पर बजाया था?

बिक्रम - मेरा पहला इन्स्ट्रुमेण्टल प्रोग्राम मेरे स्कूल में ही था, जिसमें मैंने एक रबीन्द्र संगीत बजाया था।

सुजॊय - आपके अनुसार भारत में एक पियानिस्ट का भविष्य कैसा है? क्या एक भारतीय पियानिस्ट वही सम्मान और शोहरत हासिल कर सकता है जो एक पाश्चात्य पियानिस्ट को आमतौर पर मिलता है?

बिक्रम - इसमें कोई संदेह नहीं कि पियानो एक विदेशी साज़ है। और ख़ुद एक पियानिस्ट होने के कारण मैं यही कह सकता हूँ कि जब आप किसी पाश्चात्य साज़ पर भारतीय संगीत प्रस्तुत करते हैं तो आपका परिचय, आपकी आइडेण्टिटी बहुत ज़रूरी हो जाती है, क्योंकि आप दुनिया के सामने भारतीय शास्त्रीय संगीत पेश कर रहे होते हैं। पियानो एक बहुत ही सुरीला और महत्वपूर्ण साज़ है और मैं समझता हूँ कि भारतीय संगीत का पियानो की तरफ़ काफ़ी हद तक झुकाव है। यह आपकी सोच और सृजनात्मक्ता पर निर्भर करती है कि आप इस बात को किस तरह से समझें। और यह पूरी तरह से कलाकार पर डिपेण्ड करता है कि पियानो को किस तरह से वो अपना प्रोफ़ेशन बनाए और अपने आप को साबित कर दिखायें। लेकिन जो भी है भारत में पियानिस्ट का भविष्य उज्वल है और इसकी वजह है भारतीय शास्त्रीय संगीत।

सुजॊय - क्या बात है! बहुत ही अच्छा लगा आपके ऐसे विचार जान कर कि आप एक विदेशी साज़ के महारथी होते हुए भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को सब से उपर रखते हैं। अच्छा, आपके क्या क्या प्लैन्स हैं भविष्य के लिए?

बिक्रम - मेरे प्लैन्स? मैं चाहता हूँ कि मैं देशवासियों को यह समझाऊँ कि अपनी धरती का संगीत कितना महान है, और यह बात मैं मेरी पियानो के माध्यम से समझाना चाहता हूँ। एक युवा होते हुए जब मैं अपनी चारों तरफ़ युवाओं को देखता हूँ रॊक, पॊप और रैप जैसी शैलियों में डूबे रहते हुए, या पूरी तरह से पाश्चात्य अंदाज़ में रंगते हुए, तब मुझे कहीं न कहीं बहुत चोट पहुँचती है। मैं सोचने लगता हूँ कि हमारे संगीत में कहाँ ख़ामियाँ रह गईं जो आज की पीढ़ी इससे दूर होती जा रही है! इसलिए मेरा यह मिशन होगा कि मैं दुनिया को बताऊँ कि भारतीय संगीत क्या है?

सुजॊय - वाह! बहुत ख़ूब!

बिक्रम - चाहे ग़ज़ल हो, ख़याल हो, या कोई साधारण हिंदी फ़िल्मी गीत के ज़रिये ही क्यों न हो!

सुजॊय - जी बिल्कुल!

बिक्रम - मैं फ़िल्में भी बनाना चाहता हूँ जिनमें मैं अपनी संगीत को भी उस तरह से पेश करना चाहता हूँ जैसा मुझे पसंद है। और फिर मैं एक इन्स्ट्रुमेण्टल बैण्ड भी बनाना चाहता हूँ क्योंकि आख़िर में मैं यही चाहूँगा कि जब मैं स्टेज पर से उतरूँ तो सभी मुस्कुरायें।

सुजॊय - बहुत ही ख़ूबसूरत विचार हैं आपके बिक्रम, बहुत ही अच्छा लगा, और हमें पूरी उम्मीद है कि आज की युवा पीढ़ी के जितने भी संगीत में रुचि रखने वाले लोग आपकी इन बातों को इस वक़्त पढ़ रहे होंगे, वो बहुत ही मुतासिर हो रहे होंगे। अच्छा बिक्रम, जैसा कि हमने आपको बताया था कि पियानो पर आधारित फ़िल्मी गीतों से सजी लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' हमने पिछले दिनों प्रस्तुत किया था, जिसमें हमनें ३० के दशक से लेकर ९० के दशक तक के १० हिट गीत सुनवाये गये थे। हम आप से यह पूछना चाहेंगे कि पियानो पर आधारित किस फ़िल्मी गीत को आप सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं पियानो के इस्तमाल की दृष्टि से?

बिक्रम - ऐसा कोई एक गीत तो नहीं है जिसका मैं नाम ले सकूँ, मुझे अपने पियानो पर पुराने गानें बजाने में बहुत अच्छा लगता है। मुझे किशोर कुमार बहुत पसंद है। मुझे आर.डी. बर्मन बहुत पसंद है।

सुजॊय - किशोर कुमार और आर.डी. बर्मन की जोड़ी का एक बहुत ही ख़ूबसूरत पियानो वाला गीत "जीवन के दिन छोटे सही हम भी बड़े दिलवाले" उस शृंखला में हमनें शामिल किया था।

बिक्रम - मोहम्मद रफ़ी साहब मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं। मैं इन सब के गानें बजाता हूँ। और आपको यह जानकर शायद हैरानी हो कि मुझे हर तरह के गानें पियानो पर बजाने में अच्छा लगता है, यहाँ तक कि मैं 'दबंग' के गानें भी बजा चुका हूँ। और सॊफ़्ट रोमांटिक नंबर्स भी।

सुजॊय - आप ने रफ़ी साहब का नाम लिया, तो आइए चलते चलते रफ़ी साहब की आवाज़ में फ़िल्म 'बहारें फिर भी आयेंगी' से "आप की हसीन रुख़ पे आज नया नूर है", यह गीत सुनते हैं, जिसमें पियानो का लाजवाब इस्तेमाल हुआ है। वैसे तो संगीत ओ.पी. नय्यर साहब का है, लेकिन इस गीत में पियानो बजाया है रॊबर्ट कोरीया नें जो उस ज़माने के एक जाने माने पियानिस्ट थे जिन्होंने अनगिनत फ़िल्मी गीतों के लिए पियानो बजाये, ख़ास कर संगीतकार शंकर-जयकिशन के लिए।

बिक्रम - ज़रूर सुनवाइए!

सुजॊय - इस गीत को लिखा है गीतकार अंजान नें, आइए सुनते हैं...

गीत - आप की हसीन रुख़ पे आज नया नूर है (बहारें फिर भी आयेंगी)

सुजॊय - बिक्रम, बहुत अच्छा लगा आप से बातें कर के, मैं अपनी तरफ़ से, हमारी तमाम पाठकों की तरफ़ से, और पूरे 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से आपको ढेरों शुभकामनाएँ देता हूँ, कि आप इतनी कम आयु में जिस महान कार्य का सपना देख रहे हैं, यानी कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को पियानो के ज़रिये पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करना, इसमें ईश्वर आपको कामयाबी दें, आप एक महान पियानिस्ट बन कर उभरें। आपको एक उज्वल भविष्य के लिए हम सब की तरफ़ से बहुत सारी शुभकामनाएँ।

बिक्रम - सुजॊय, आपका बहुत बहुत शुक्रिया इस ख़ूबसूरत मुलाक़ात के लिए, मुझे भी बहुत अच्छा लगा। आपके मैगज़ीन पर इसे पढ़कर भी मुझे उतना ही आनंद आयेगा।

सुजॊय - शुक्रिया बहुत बहुत!

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तो दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आज हमनें आपका परिचय एक युवा-प्रतिभा से करवाया, एक उभरते पियानिस्ट मास्टर बिक्रम मित्र से। आशा है आपको अच्छा लगा होगा। अगले हफ़्ते 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के साथ वापस आयेंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिए, और हाँ, कल सुबह 'सुर-संगम' में पधारना न भूलिएगा, क्योंकि कल से यह स्तंभ पेश होगा हमारे एक नये साथी की तरफ़ से। आज बस इतना ही, नमस्कार!

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7 श्रोताओं का कहना है :

सजीव सारथी का कहना है कि -

sujoi, bikram ji se is baatcheet ko padhkar bahut badhiya lage....unke iraade kaafi sachhe hain, ham unhen shubhkaamnayen dete hain

Sumit Chakravarty का कहना है कि -

प्यारे सुजॉय दा!

आपको तथा पूरे हिन्द-युग्म परिवार को "ओल्ड इज़ गोल्ड" की ६०० कड़ियाँ पूरी होने पर हार्दिक बधाई। पिछ्ली दस लघु श्रंख्‍लाओं में जहां आपने ऎल.पी. के "प्यार के नग़मे" सुनाये, "गीत गड़बड़ी वाले" से गुदगुदाया, वहीं प्रख्यात साहित्यकारों - कवियों की "दिल की कलम" से तथा "हिन्दी सिनेमा के लौह स्तंभों" से भी रू-ब-रू करवाया; एक ओर जहाँ "एक मैं और एक तू" में प्रेम भरे युगल गीतों से हमारे मन में प्रेम-रस घोला, वहीं दूसरी ओर "मानो या न मानो" के ज़रिए हमें रोमांच का अनुभव करवाया| सुरैया जी को समर्पित "तेरा ख़याल दिल से भुलाया न जायेगा" एक क़ाबिल-ए-तारीफ़ प्रयास था - जिससे मुझ जैसे उनको न जानने वाले को भी उनकी शख़्सियत और गीतों से प्रेम हो गया। अन्तत: "पियानो की साज़ पर फ़िल्मी परवाज़" ने हमारे दिलों को "धीरे-धीरे मचलने" को मजबूर कर दिया। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि आपका यह खज़ाना सदा भरा-पूरा रहे और आपके यश में सदैव वृद्धि हो।

आपका अनुज
सुमित चक्रवर्ती

अमित तिवारी का कहना है कि -

बहुत बढ़िया. मज़ा आ गया. आवाज़ का हर अंक अपने आप में हटकर होता है.

Anjaana का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
kashish का कहना है कि -

keep up....i am impressed by ur dedication towards music....way to go m...

kashish का कहना है कि -

i'm impressed by ur dedication towards music......keep it up

Markand Dave का कहना है कि -

प्रिय सुजॉय दा ।

मैं करीब चालीस सालों से संगीत जगत से जुड़ा हुआ हूँ । मैनें संगीत की कई साईट्स देखी, मगर आपकी साईट अपने आपमें अनोखी और अद्वितिय है । अब यहां बार-बार अने का मन करेगा ।

वैसे मैं खुद सोन्ग राईटर, सिंगर, कंपोझर, म्यूझिक डायरेक्टर और हवाईयन ईलेक्ट्रीक गीटार प्लेयर हूँ ।

मेरा खुद का ऑडीयो रॅकोर्डिंग स्टूडियो-अहमदाबाद में पिछले बीस सालों से कार्यरत है ।

आप युँ ही मिलते रहेंगे।

आपके प्रयासों के लिए मेरी ओर से ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ ।

धन्यवाद ।

मार्कण्ड दवे।
mktvfilms

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