Saturday, July 9, 2011

ओल्ड इस गोल्ड -शनिवार विशेष - संगीतकार दान सिंह को भावभीनी श्रद्धाजंली



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' में। फ़िल्म-संगीत के सुनहरे दौर के बहुत से ऐसे कमचर्चित संगीतकार हुए हैं जिन्होंने बहुत ही गिनी चुनी फ़िल्मों में संगीत दिया, पर संख्या में कम होने की वजह से ये संगीतकार धीरे धीरे हमारी आँखों से ओझल हो गये। हम भले इनके रचे गीतों को यदा-कदा सुन भी लेते हैं, पर इनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत कम लोगों को पता होता है। यहाँ तक कि कई बार इनकी खोज ही नहीं मिल पाती, ये जीवित हैं या नहीं, सटीक रूप से कहा भी नहीं जा सकता। और जिस दिन ये संगीतकार इस जगत को छोड़ कर चले जाते हैं, उस दिन उनके परिवार वालों के सहयोग से किसी अख़्बार के कोने में यह ख़बर छप जाती है कि फ़लाना संगीतकार नहीं रहे। पिछले महीने एक ऐसे ही कमचर्चित संगीतकार हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गये। लीवर की बीमारी से ग्रस्त, ७८ वर्ष की आयु में संगीतकार दान सिंह नें १८ जून को अंतिम सांस ली। दान सिंह का नाम लेते ही फ़िल्म 'माइ लव' के दो गीत "वो तेरे प्यार का ग़म" और "ज़िक्र होता है जब क़यामत का" झट से ज़हन में आ जाते हैं। आइए आज इस विशेषांक में हम दान सिंह के जीवन और संगीत सफ़र पर थोड़ा नज़र डालें।

दान सिंह राजस्थान के रहनेवाले थे, जिन्होंने संगीतकार खेमचंद प्रकाश से संगीत सीखा। वो एक अच्छा संगीतकार होने के साथ साथ एक अच्छा गायक भी थे। मुंबई आकर दो साल के संघर्ष के बाद १९६९ में उनको पहला अवसर मिला किसी फ़िल्म में संगीत देने का और वह फ़िल्म थी 'तूफ़ान'। यह फ़िल्म नहीं चली। उसके अगले ही साल आई फ़िल्म 'माइ लव', जिसके गीतों नें धूम मचा दी। लेकिन अफ़सोस की बात कि 'माइ लव' के गीतों की अपार कामयाबी के बावजूद किसी नें उनकी तरफ़ न कोई तारीफ़ की और न ही कोई प्रोत्साहन मिला। वो पार्टियों में जाते और अपनी धुनें सुनाते। "वो तेरे प्यार का ग़म, एक बहाना था सनम" गीत में दान सिंह नें जिस तरह से राग भैरवी का इस्तेमाल किया, संगीतकार मदन मोहन को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने दान सिंह को कहा था कि "भैरवी का इस्तेमाल तो हमने भी किया, पर आप इसमें ऐसा वेरिएशन कैसे ले आये?" दान सिंह को किसी नें मौका तो नहीं दिया पर उन पार्टियों में मौजूद कुछ नामी संगीतकार उनकी धुनों को चुराने लगे और अपने गीतों में उन्हें इस्तेमाल करते रहे। इससे वो इतने हताश हो गए कि अपनी डॉक्टर पत्नी उमा के साथ जयपुर लौट गए। जयपुर लौटने से पहले उन्होंने 'भूल न जाना', 'मतलबी' और 'बहादुर शाह ज़फ़र' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया, पर इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली।

बरसों बाद राजस्थान की पृष्ठभूमि पर फ़िल्म बनी 'बवंडर', जिसका संगीत तैयार किया दान सिंह नें, और उन्होंने यह साबित भी किया कि उनके संगीत में ठेठ और जादू आज भी बरक़रार है। विषय-वस्तु की वजह से फ़िल्म चर्चा में तो आई पर एक बार फिर दान सिंह का संगीत नहीं चल पाया। क़िस्मत के सिवा किसे दोष दें!!! किसी पत्रकार नें जब एक बार उनकी असफलता का कारण पूछा तो उनका जवाब था, "न पूछिये अपनी दास्तान।" दान सिंह के जीवन को देख कर यह स्पष्ट है कि प्रतिभा के साथ साथ क़िस्मत का होना भी अत्यावश्यक है, वर्ना इतने प्रतिभाशाली और सुरीले संगीतकार होने के बावजूद क्यों किसी नें उन्हें बड़ी फ़िल्मों में मौका नहीं दिया होगा! ख़ैर, आज इन सब बातों में उलझकर क्या फ़ायदा। आज दान सिंह हमारे बीच नहीं है, पर इस बात की संतुष्टि ज़रूर है कि अच्छे संगीत के रसिक कभी उनके कम पर स्तरीय योगदान को नहीं भूलेंगे। दोस्तों, पिछले दिनों मैंने जाने-माने गीतकार और रिलायन्स एण्टरटेनमेण्ट लिमिटेड के चेयरमैन अमित खन्ना का साक्षात्कार लिया था (जिसे आप इसी साप्ताहिक स्तंभ में निकट भविष्य में पढ़ेंगे), उस साक्षात्कार में उन्होंने यह बताया कि उन्होंने दान सिंह के साथ भी काम किया है। उस साक्षात्कार के वक़्त दान सिंह जीवित थे, शायद इसीलिए मुझे उनके बारे में जानने की लालसा नहीं हुई। पर आज उनके न रहने से शायद उनकी अहमियत हमारे लिए बढ़ गई है। मैंने दोबारा अमित जी से सम्पर्क किया और उनसे पूछा:

सुजॉय - अमित जी, पिछले १८ जून को संगीतकार दान सिंह का निधन हो गया। मुझे याद है आपने कहा था कि आपने उनके साथ भी काम किया है। अगर आप दान सिंह साहब के बारे में कुछ बतायें तो हम आपके आभारी रहेंगे।

अमित खन्ना - जी हाँ, मैंने उनके लिए एक गीत लिखा था। उन्होंने उस फ़िल्म में बस इसी एक गीत की धुन बनाई थी, बाक़ी के गीत बप्पी लाहिड़ी नें कम्पोज़ किए। गीत कुछ इस तरह से था "दो लफ़्ज़ों में कैसे कह दूँ ज़िंदगी भर की बात"।

सुजॉय - इस मुखड़े को सुन कर जैसे दान सिंह साहब ख़ुद ही अपनी ज़िंदगी के बारे में कह रहे हों। तभी उन्होंने भी कहा था कि न पूछिये अपनी दास्तान।

अमित खन्ना - दान सिंह की धुनों में बहुत मेलडी था, और वो बहुत सहज-सरल इंसान थे, उन्हें वो सब कुछ नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे।

सुजॉय - बहुत बहुत धन्यवाद अमित जी!

और दोस्तों, आइए आज दान सिंह साहब की याद में सुनते हैं आनन्द बक्शी का लिखा और मुकेश का गाया फ़िल्म 'माइ लव' से "ज़िक्र होता है जब क़यामत का, तेरे जलवों की बात चलती है"। और हम यह कहते हैं कि जब जब फ़िल्म-संगीत के सुनहरे दौर के इतिहास का ज़िक्र छिड़ेगा, संगीतकार दान सिंह का नाम भी सम्मान के साथ लिया जाएगा। 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार की ओर से संगीतकार दान सिंह को श्रद्धा सुमन।

गीत - ज़िक्र होता है जब क़यामत का (माइ लव, १९७०)


तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेषांक' जो समर्पित था संगीतकार दान सिंह की स्मृति को, जिनका गत १८ जून को निधन हो गया था। आज अनुमति दीजिये, फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार!

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2 श्रोताओं का कहना है :

AVADH का कहना है कि -

धन्यवाद सुजॉय जी,
आज आपने दान सिंह जी के बारे में बहुत सारी जानकारी दी.
फिल्म 'माय लव' के दोनों गीत मेरे बेहद पसंदीदा गीत रहे हैं, विशेषकर 'ज़िक्र होता है जब क़यामत का'.
अभी कुछ दिन पहले मैंने कभी 'बवंडर' का जब संगीत सुना था तो मुझे वह अच्छा लगा था पर मैं नहीं जानता था कि इसका संगीत भी दान सिंह जी ने दिया था.
मैंने तो शायद 'माय लव' के संगीतकार में हमेशा उनका पूरा नाम दान सिंह बिष्ट ही सुना था पर आपने सब जगह केवल दान सिंह का ही उल्लेख किया है. क्या मुझे गलत याद है?
ज़रा देखिएगा कि क्या उन्होंने माला सिन्हा निर्मित नेपाली फिल्म 'मायती घर' में भी संगीत दिया था?
क्या विडम्बना थी कि इतने अच्छे और मधुर संगीत के रचनाकार को पर्याप्त सफलता न मिल सकी. यह संगीत प्रेमियों का दुर्भाग्य है.
अवध लाल

कुलदीप "अंजुम" का कहना है कि -

कितनी बेरहम है ये दुनिया !
यहाँ प्रस्तुत गीत और "वो तेरे प्यार का गम " सुनकर ही उनके संगीत के आयामों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है !
उस महान फनकार को विनम्र श्रद्धांजलि !

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