Saturday, November 26, 2011

मिलिए २३-वर्षीय फ़िल्मकार हर्ष पटेल से



ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 69

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष' में मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का फिर एक बार स्वागत करता हूँ। दोस्तों, आज हम आपकी मुलाक़ात करवाने जा रहे हैं एक ऐसे फ़िल्म-मेकर से जिनकी आयु है केवल २३ वर्ष। ज़्यादा भूमिका न देते हुए आइए मिलें हर्ष पटेल से और उन्हीं से विस्तार में जाने उनके जीवन और फ़िल्म-मेकिंग् के बारे में।

सुजॉय - हर्ष, बहुत बहुत स्वागत है आपका 'आवाज़' पर। यह साहित्य, संगीत और सिनेमा से जुड़ी एक ई-पत्रिका है, इसलिए हमने आपको इस मंच पर निमंत्रण दिया और आपको धन्यवाद देता हूँ हमारे निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए।

हर्ष - आपका भी बहुत बहुत धन्यवाद!

सुजॉय - हर्ष, यूं तो आपकी उम्र बहुत ही कम है, और भविष्य में आप बहुत बड़े फ़िल्मकार बनेंगे ऐसी हम ईश्वर से दुआ करते हैं, पर अब तक भी आपकी जो उपलब्धियाँ रही हैं, वो भी कुछ कम नहीं हैं। हम शुरु करना चाहेंगे आपके परिवार से। कौन कौन हैं आपके परिवार में?

हर्ष - मेरा जन्म अहमदाबाद में ४ अक्टूबर १९८८ को हुआ था। हमारा संयुक्त परिवार है जिसमें ९ सदस्य हैं। मैं, मेरा छोटा भाई, मेरे मम्मी-पापा, मेरी दादी, और मेरे चाचा जी के परिवार के ४ सदस्य। इस तरह से ९ सदस्यों का हमारा परिवार है। मेरा बचपन भी बहुत अच्छे से गुज़रा। हमारे परिवार में लगभग २५ साल बाद किसी बच्चे का जन्म हुआ और वह मैं था। मेरा भाई मेरे से ५ साल बाद और चाचाजी के बच्चे भी बाद में आये। इसलिए मुझे अपने परिवार और आस-पड़ोस से बहुत लाड-प्यार मिला। मैंने अपने दादाजी को नहीं देखा, पर मेरी दादी नें जैसे मेरी सारी ज़िम्मेदारियाँ ले रखी थीं।

सुजॉय - वाह! बहुत अच्छा लगा आपके परिवार के बारे में जान कर। बचपन में कौन कौन से खेल खेला करते थे?

हर्ष - बचपन में ज़्यादातर आउटडोर गेम्स का मुझे शौक था। छुटपन से ही मैं बहुत ज़्यादा धार्मिक भी था क्योंकि मैं अपनी दादी के बहुत करीब था। खेलों में मुझे तैराकी ही सबसे ज़्यादा पसन्द था। और मुझे क्रिकेट से सख़्त नफ़रत थी जो कि हमारे देश में सबसे ज़्यादा फ़ेवरीट है।

सुजॉय - ये तो थी खेल-कूद की बात, कला के क्षेत्र में आपकी किस तरह की रुचि थी, यह हम आपसे अभी जानेंगे, लेकिन उससे पहले हम चाहेंगे कि आप अपनी पसन्द का कोई गीत हमारे श्रोता-पाठकों को सुनवाएँ?

हर्ष - हिन्दी फ़िल्मों में इतने अच्छे अच्छे गानें आये हैं कि किसी एक गीत को चुनना बड़ा मुश्किल लगता है। फिर भी, इस वक़्त जो गीत मुझे याद आ रहा है, वह है "हँसता हुआ नूरानी चेहरा", 'पारसमणि' फ़िल्म का।

सुजॉय - वाह! मुझे ताज्जुब हो रहा है कि आपनें इतने पुराने गीत को चुना, लता मंगेशकर और कमल बारोट की आवाज़ों में पेश है यह गीत।

गीत - हँसता हुआ नूरानी चेहरा (पारसमणि)


सुजॉय - हर्ष, अब बताइए आपकी कलात्मक रुचियों के बारे में।

हर्ष - मुझे शुरु से ही कला के विभिन्न क्षेत्रों में गहरी दिलचस्पी रही है। डान्स, मॉडलिंग्, ऐक्टिंग्, पेण्टिंग्, फ़ैशन-डिज़ाइनिंग् और भी न जाने किस किस में रुचि थी। पर सबसे ज़्यादा जो माध्यम, जो कला मुझे आकर्षित करती, वह था 'मोशन मीडियम'। I used think like How these Characters play with magic in Ramayana & Mahabharata. कोई फ़िल्म देखता तो उसके डिरेक्शन और एडिटिंग् के नज़रिये से विश्लेषण किया करता, किस तरह से शॉट्स लिए गए होंगे, लॉंग् शॉट्स, क्लोज़-अप, आदि।

सुजॉय - यानि आप फ़िल्म देखते समय उसकी तकनीकी पहलुओं पर भी ग़ौर किया करते थे।

हर्ष - बिलकुल!

सुजॉय - तो फिर इस शौक को करीयर बनाने के लिए आपने कौन सी राह अख़्तियार की?

हर्ष - मैं C-DAC इन्स्टिट्युट में भर्ति हो गया जहाँ मैंने 'मौल्टि-मीडिया' सीखा, और साथ ही साथ साइन्स में ग्रजुएशन भी पास किया। मीडिया स्टडी के बाद मैं मुम्बई में Vision 2000 स्टुडियो जॉइन कर ली और एडिटिंग् के क्षेत्र से अपने सफ़र की शुरुआत की। Documentary, short films, film teaser जैसे प्रोजेक्ट्स में मैंने काम किया। फिर फ़िल्म-मेकिंग् सीखने के लिए मैं 'बालाजी टेलीफ़िल्म्स लिमिटेड' के साथ जुड़ गया। वहाँ मैंने टीवी धारावाहिक 'कितनी मोहब्बत है' में सहायक के रूप में काम किया, और 'प्यार की यह एक कहानी' धारावाहिक के कई एपिसोड्स एडिट किए। और अब मैं गुजरात के गांधीनगर में CPIFT (City Pulse Institute of Film & TV) में काम कर रहा हूँ बतौर प्रोडक्शन ऐसिस्टैण्ट और एडिटर।

सुजॉय - बहुत ख़ूब! हर्ष, अब आपके पसन्द के एक और गीत की बारी।

हर्ष - "गुनगुना रहे हैं भँवरें", 'आराधना' फ़िल्म से।

गीत - गुनगुना रहे हैं भँवरें (आराधना)


सुजॉय - हर्ष, बहुत अच्छा लग रहा है आपसे बातें करते हुए, और आपके पसन्द की भी मैं दाद दूंगा। अच्छा, यह बताइए कि आप ने अब तक कौन कौन सी फ़िल्मों का निर्माण किया है?

हर्ष - मैं स्वतंत्र रूप से लघु फ़िल्में बनाता हूँ। इसके अलावा सरकारी और ग़ैर-सरकारी संस्थानों के लिए वृत्तचित्र (documentary) भी बनाता हूँ। मेरी पहली लघु फ़िल्म थी 'After Black'।

सुजॉय - इस फ़िल्म के बारे में बताइए।

हर्ष - इस फ़िल्म की कहानी में वर्ष २०१४ दिखाया गया है। जैसा कि आप जानते हैं कि २०१२ के दिसंबर में दुनिया के समाप्त हो जाने की बात या अफ़वाह, जो भी कहें, चल रही है, तो अगर ऐसा हुआ तो २०१४ में धरती पर क्या-कुछ हो सकता है, उसी का अनुमान है इस लघु फ़िल्म में। बहुत कम लोग शेष रह गए हैं धरती पर। पेड़-पौधे मर चुके हैं, हरियाली ग़ायब है, इन्सान आदमख़ोर बन चुका है। खेती के लिए धरती उपयुक्त नहीं रही। कुछ जीवित वैज्ञानिक ऐसी धरती की तलाश में है जहाँ पर जीवन-यापन किया जा सके। एक वैज्ञानिक नें ऐसा बीज और तकनीक तैयार कर लिया है जो केवल ४८ घण्टों में पैदावार दे सके। ज़मीन की भी खोज मिल जाती है पर वहाँ पहुँचने पर वहाँ मौजूद आबादी उन्हें मार कर खा जाती है। उनके बाद उनकी बहन उसके अधूरे मिशन को कामयाब करने वहाँ जाती है।

सुजॉय - बड़ा ही रोमांचक विषय चुना है आपने। हम आपकी अगली फ़िल्म के बारे में भी जानना चाहेंगे, पर उससे पहले एक और गीत हो जाए?

हर्ष - "एक चतुर नार बड़ी होशियार"

गीत - एक चतुर नार बड़ी होशियार (पड़ोसन)


सुजॉय - आपकी दूसरी फ़िल्म कौन सी थी?

हर्ष - मेरी दूसरी फ़िल्म का नाम था 'Corruption Live in Action'। यह ३० मिनट की लघु फ़िल्म थी। कहानी जवान लड़के-लड़कियों की थी जिन्होंने अभी अभी पढ़ाई पूरी की है और उन्हें समझ में आने लगा है कि अब और मौज-मस्ती का वक़्त नहीं रहा, अगर ज़िन्दा रहना है तो काम करना पड़ेगा। पर वो जहाँ भी काम ढूंढने गए, वहीं उन्हें भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा। अन्त में उन युवक-युवतियों नें हिडन कैमरों की मदद से भ्रष्टाचारियों का पर्दाफ़ाश किया, और इस प्रयास में उन लोगों ने मीडिया का भी सहारा लिया।

सुजॉय - वाह! यह बहुत ही सार्थक विषय है आज, अभी हाल ही में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पूरे हिन्दुस्तान को आवाज़ उठाते हुए हमने देखा था।

हर्ष - जी। मेरी तीसरी फ़िल्म थी 'समय नी हाथताली', जो ७ मिनट की एक गुजराती फ़िल्म थी। जौनर था सोशल ड्रामा। कहानी पिता-पुत्र की थी जिनके बीच मतभेद है और जिसका कारण है जेनरेशन गैप। पुत्र घर बेचना चाहता है क्योंकि उसके १० गुणा ज़्यादा कीमत मिल रही है; जबकि पिता का उस घर के साथ बहुत सारी यादें जुड़ी होने की वजह से उसे नहीं बेचना चाहते। 'सुवर्ण पथ' एक डॉकुमेन्टरी-ड्रामा थी जिसे मैंने BAPS स्वामीनारायण संस्था के लिए एडिट किया था और जिसकी बहुत चर्चा हुई थी और राज्य स्तर पर प्रथम पुरस्कार भी मिला था।

सुजॉय - वाह! और किन किन फ़िल्मों के लिए आपको पुरस्कार मिले?

हर्ष - 'Corruption Live in Action' गुजरात की पहली लघु फ़िल्म थी जिसे सबसे ज़्यादा दर्शकों के बीच में प्रदर्शित किया गया था। 'समय नी हाथताली' को 'अहमदाबाद फ़िल्म प्रोजेक्ट' के लिए चुना गया था।

सुजॉय - अब एक और गीत की बारी, बताइये कौन सा गीत सुनवाना चाहेंगे?

हर्ष - "बीती न बिताई रैना"

सुजॉय - क्या बात है!

गीत - बीती न बिताई रैना (परिचय)


सुजॉय - निकट भविष्य में क्या कर रहे हैं?

हर्ष - भविष्य में मैं और भी कई लघु फ़िल्में बनाना चाहता हूँ और एक टेलीफ़िल्म भी प्लैन कर रहा हूँ। और एक फ़ीचर फ़िल्म में भी बतौर सहायक निर्देशक और एडिटर काम करने जा रहा हूँ।

सुजॉय - बहुत बहुत शुभकामनाएँ आपको कि आप अपने लक्ष्य तक पहुँचे, कामयाबी आपके कदम चूमे।

हर्ष - धन्यवाद!

सुजॉय - अच्छा हर्ष, ये जो आपने अपने पसन्द के गानें हमें बताए, मुझे ऐसा लगता है कि आपको संगीत में भी ज़रूर रुचि होगी, क्योंकि आपकी पसन्द जो इतनी अच्छी है, इतनी रुचिकर है।

हर्ष - मुझे भारतीय शास्त्रीय संगीत से बहुत प्यार है और साथ ही इण्डियन-वेस्टर्ण फ़्युज़न से भी। मैंने 'सप्तक म्युज़िक फ़ेस्टिवल' अटेण्ड की थी जो संगीत-प्रेमियों में बहुत लोकप्रिय है। मेरी ख़ुशकिस्मती है कि इन दिनों मैं एक म्युज़िक शो भी एडिट कर रहा हूँ गुजरात के GTPL चैनल पर और शो का नाम है 'दि फ़्राइडे'। 'दि फ़्राइडे' CPIFT द्वारा आयोजित एक ईवेण्ट है जो हर शुक्रवार को होता है और मैं उस ईवेण्ट शूटिंग्‍ का डिरेक्टर और एडिटर हूँ। अब तक जिन महान संगीत शिल्पियों के साथ ईवेण्ट करने का मौका मिला है, उनमें शुभा मुदगल और शुजात ख़ान शामिल हैं।

सुजॉय - बहुत अच्छा लगा हर्ष जो आप हमारे साथ इतनी सारी बातें की। आप बहुत बड़े फ़िल्मकार बनें, और अपने परिवार का नाम रोशन करें, ऐसी हम आपको शुभकामना देते हैं, बहुत बहुत धन्यवाद, नमस्ते।

हर्ष - मुझे भी बहुत अच्छा लगा आपसे बातें करते हुए, आपका बहुत अभुत धन्यवाद!

तो ये था आज का 'शनिवार विशेष', आशा है आपको पसन्द आया होगा, आज बस इतना ही, फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार!

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