Sunday, April 12, 2009

तुम बिन जीवन कैसे बीता पूछो मेरे दिल से....मुकेश और एल पी का संगम



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 49

यूँ तो गीतकार राजा मेंहदी अली ख़ान का नाम लेते ही याद आ जाते हैं संगीतकार मदन मोहन. और क्यूँ ना आए, आखिर इन दोनो की जोडी ने फिल्म संगीत के ख़ज़ाने को एक से एक नायाब मोतियों से समृद्ध जो किया है. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम राजा मेंहदी अली ख़ान के साथ मदन मोहन साहब की नहीं, बल्कि अगली पीढी की मशहूर संगीतकार जोडी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का बनाया हुया एक गीत सुनवा रहे हैं. राजा-जी और लक्ष्मी-प्यारे की जोडी ने बहुत कम एक साथ काम किया है. इस जोडी की सबसे चर्चित फिल्म का नाम है "अनिता". फिल्म के निर्माता शायद 1964 की फिल्म "वो कौन थी" से कुछ ज़्यादा ही प्रभावित हुए थे कि उसी 'स्टार कास्ट' यानी कि साधना और मनोज कुमार और वही गीतकार यानी राजा मेंहदी अली ख़ान को लेकर 1967 में "अनिता" फिल्म बनाने की सोची. बस मदन मोहन साहब की जगह पर आ गयी लक्ष्मी-प्यारे की जोडी. अनिता की कहानी भी कुछ रहस्यमय ही थी, पूरी फिल्म में नायिका के चरित्र पर एक रहस्य का पर्दा पड़ा रहता है. इस फिल्म में लता मंगेशकर ने कई खूबसूरत गीत गाए जो अलग अलग रंग के थे. एक गीत "करीब आइए नज़र फिर मिले ना मिले" राजाजी और मदन साहब की जोडी की याद दिला जाती है. लेकिन आज इस फिल्म से पेश है मुकेश का गाया एक दर्द भरा नग्मा.

जिंदगी आज एक भीड में खो कर रह गयी है. इंसान और अकेला, और ज़्यादा तन्हा हो गया है, रिश्ते नाते भी जैसे बदल से गये हैं. जिनकी आँखों में टूटे रिश्ते का दर्द हो, जो तन्हाई की किसी रात में अकेले आँसू बहा रहा हो, मुकेश के गीत उनके हमसफ़र बनकर उनके दिल के बोझ को बाँट लेते हैं. कुछ इसी तरह का फलसफा बयाँ हुआ है इस गीत में भी - "तुम बिन जीवन कैसे बीता पूछो मेरे दिल से". यह गीत आधारित है राग यमन कल्याण पर. इससे पहले कि आप यह गीत सुने आपको इसी गीत से मिलते जुलते चाँद और नग्मों की याद दिला देते हैं, यानी कि मुकेश के गाए कुछ और दर्द भरे नग्में जो आधारित है राग कल्याण पर. यह गाने हैं "आँसू भरी हैं ये जीवन की राहें" (परवरिश), "कोई जब तुम्हारा हृदय तोड दे" (पूरब और पश्चिम), और "तुम मुझे भूल भी जाओ तो यह हक़ है तुमको" (दीदी). तो आज पेश है फिल्म अनिता से "तुम बिन जीवन कैसे बीता"...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कल ओल्ड इस गोल्ड का ५० वां एपिसोड है जो समर्पित है हिंदी फिल्मों के पहले "महागायक" के एल सहगल को.
२. साथ में हैं नौशाद साहब और मजरूह सुल्तानपुरी.
३. मुखड़े में शब्द है -"नाज़ुक".

कुछ याद आया...?
पिछली पहेली का परिणाम-
सागर नाहर जी पहली बार आये पर ज़रा सा चूक गए...पर वन डाउन आये नीरज जी ने सही जवाब देकर टीम का हौसला रखा. दिलीप जी और मनु जी ने भी सही जवाब दिया बधाई. आचार्य जी आप युहीं सुनते रहें. मधुर गीत लेकर आयेंगे हम ये वादा रहा.
खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



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3 श्रोताओं का कहना है :

Neeraj Rohilla का कहना है कि -

gham diye mustakil,
kitna naazuk hai dil yeh na jaana
haaye haaye yeh zaalim zamana...

manu का कहना है कि -

सदा बहार गीत सहगल का,,,,फिल्म शायद शाहजहान हो,,,,

सही जवाब नीरज जी का..

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

राग बताने के साथ उसकी खासियत और नोटेशन बता दें तो सोने में सुहागा हो...

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