Thursday, April 16, 2009

सावन की रिमझिम में उमड़-घुमड़ बरसे पिया......महफ़िल-ए-गज़ल और मन्ना डे



महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०५

गर आपसे कहूँ कि हमारे आज के फ़नकार "श्री प्रबोध चंद्र जी" हैं तो लगभग १ या २ फीसदी लोग हीं होंगे जो इन्हें जानने का दावा करेंगे या फिर उतने लोग भी न होंगे। लेकिन यह सच है । अरे-अरे डरिये मत..मैं किसी अजनबी की बात नहीं कर रहा ...जिनकी भी बात कर रहा हूँ उन्हें आप सब जानते हैं। जैसे श्री हरिहर जरिवाला को लोग संजीव कुमार कहते हैं, वैसे हीं हमारे प्रबोध चंद्र जी यानि कि प्रबोध चंद्र डे को लोग उनके उपनाम मन्ना डे के नाम से बेहतर जानते हैं। मन्ना दा ने फिल्म-संगीत को कई कालजयी गीत दिए हैं। चाहे "चोरी-चोरी" का लता के साथ "आजा सनम मधुर चाँदनी में हम" हो तो चाहे "उपकार" का कल्याण जी-आनंद जी की धुनों पर "कसमें-वादे प्यार वफ़ा" हो या फिर सलिल चौधरी के संगीत से सजी "आनंद" फिल्म की "ज़िंदगी कैसी है पहेली" हो, मन्ना दा ने हर एक गाने में हीं अपनी गलाकारी का अनूठा नमूना पेश किया है।

चलिये अब आज के गाने की ओर रूख करते हैं। २००५ में रीलिज हुई "सावन की रिमझिम मे" नाम के एक एलबम में मन्ना दा के लाजवाब पंद्रह गीतों को संजोया गया था। यह गाना भी उसी एलबम से है। वैसे मैने यह पता करने की बहुत कोशिश की कि यह गाना मूलत: किस फिल्म या किस गैर-फिल्मी एलबम से है ,लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हो पाया। तो आज हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसे लिखा है योगेश ने और अपने सुरों से सजाया है श्याम शर्मा ने और वह गाना है: "ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया"। वैसे इस एलबम में इस तिकड़ी के एक और गाने को स्थान दिया गया था- "कुछ ऎसे भी पल होते हैं" । संयोग देखिए कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में मन्ना दा की प्रतिभा की सही कद्र नहीं हुई उसी तरह कुछ एक संगीतकारों को छोड़ दें तो बाकी संगीतकारों ने योगेश क्या हैं, यह नहीं समझा। भला कौन "जिंदगी कैसी है पहेली" या फिर "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में छिपी भावनाओं के सम्मोहन से बाहर आ सकता है।

लोग माने या ना मानें लेकिन इस गाने और मन्ना दा के एक और गाने "लागा चुनरी में दाग" में गहरा साम्य है। साहिर का वह गाना या फिर योगेश का यह गाना निर्गुण की श्रेणी में आता है, जैसा कबीर लिखा करते थे, जैसे सूफियों के कलाम होते हैं। प्रेमिका जब खुदा या ईश्वर में तब्दील हो जाए या फिर जब खुदा या ईश्वर में आपको अपना पिया/अपनी प्रिया दिखने लगे, तब हीं ऎसे नज़्म सीने से निकलते हैं। मेरे मुताबिक इस गाने में भी वैसी हीं कुछ बातें कहीं गई है। और सच कहूँ तो कई बार सुनकर भी मैं इस गाने में छुपे गहरे भावों को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। राधा का नाम लेकर योगेश अगर सांसारिक प्रेम की बातें कर रहे हैं तो फिर मीरा या कबीर का नाम लेकर वो दिव्य/स्वर्गीय प्रेम की ओर इशारा कर रहे हैं। वैसे प्रेम सांसारिक हो या फिर दिव्य, प्रेम तो प्रेम है और प्रेम से बड़ा अनुभव कुछ भी नहीं।

हुलस हुलस हरसे हिया, हुलक हुलक हद खोए,
उमड़ घुमड़ बरसे पिया, सुघड़ सुघड़ मन होए।


दर-असल प्रेम वह कोहिनूर है ,जिसके सामने सारे नूर फीके हैं। प्रेम के बारे में कुछ कहने से अच्छा है कि हम खुद हीं प्रेम के रंग में रंग जाएँ। तो चलिए आप भी हमारे साथ रंगरेज के पास और गुहार लगाईये कि:

ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा....

पग-पग पर लाखों हीं ठग थे तन रंगने की धुन में,
सबसे सब दिन बच निकला मन पर बच ना सका फागुन में।
तो... जग में ये तन ये मेरा मन रह ना सका बैरागी,
कोरी-कोरी चुनरी मोरी हो गई हाय रे दागी।
अब जिया धड़के , अब जिया भड़के
इस चुनरी पे सबकी नज़रिया गड़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....

रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा,
उसी रंग में सब रंग डूबे कह गए दास कबीरा।
तो... नीले पीले लाल सब्ज रंग तू ना मुझे दीखला रे,
मैं समझा दूँ भेद तुझे ये , तू ना मुझे समझा रे।
प्रेम है रंग वो , प्रेम है रंग वो,
चढ जाए तो रंग ना दूजा चढे,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

सब हवायें ले गया मेरे समुन्दर की कोई,
और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया...

इरशाद ....


पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल में आपके लिए शब्द था -"खुदा" और सुजोई ने पेश की ये ग़ज़ल -

खुदा ने सोचा था कि रहेंगे सब इंसान प्यार से,
ज़मीन पे देखा तो अरमान लुटे नज़र आते हैं.
कुछ तो रहम किया होता खुदा पर इंसानों,
हाथ में तलवार लिए सरे-आम नज़र आते हैं.

नीलम जी भी उतर आई मैदान में इस शेर के साथ-

खुदा खुदी और तू,
सबमें शामिल है तेरी जुस्तजू,
वाह क्या बात है

और कमलप्रीत जी ने तो रंग ही जमा दिया ये कहकर कि -
उनकी आँखों में वो सुरूरे-इबादत है,
कि काफिर भी उठा ले अल्लाह का हलफ.

शन्नो जी, सजीव जी और आचार्य जी का भी महफिल में आने का आभार.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.


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6 श्रोताओं का कहना है :

pooja का कहना है कि -

मन्ना डे का गाया हुआ इतना सुन्दर गाना सुनवाने के लिए आपका आभार. बहुत ही प्यार और मिठास से भरा गीत है यह . कभी सुना नहीं था.

पूजा अनिल

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

सूफियाना अंदाज़ का सुरीला गीत सुना, आनंद आया... आपके चयन की दाद देना होगी।

शरद तैलंग का कहना है कि -

समुन्दर (सभी स्वरचित)

यारी जो समुन्दर को निभानी नहीं आती
ये तय था कश्तियों में रवानी नहीं आती ।

समेटॆ सब को अपने में समुन्दर की निशानी है
हमें ये खाशियत उसकी सभी के दिल में लानी है ।

आपका दिल जब समुन्दर बन गया
सच कहूँ वो एक मन्दर बन गया ।

समुन्दर की अगर जो प्यास यूं बढ़ती गई दिन दिन
तो इक दिन देखना नदिया भी अपनी धार बदलेगी।
शरद तैलंग

manu का कहना है कि -

शरद जी के शानदार शेर लगे ,,,वाह मजा आ गया,,,,,,

समुंदर आज भी लज्जत को उसकी याद करता है,
कभी इक बूँद छुट कर आ गिरी थी दोशे बादल से

shanno का कहना है कि -

वाह! मनु जी, आप इतनी अच्छी शायरी भी कर लेते हैं, यह पता नहीं था. क्या खूब समुंदर की बात की जो खुद भरा है फिर भी बादलों से पानी की बूंदों के लिए प्यासा रहता है. बहुत ही अच्छा! वैसे गुरु जी आपको ढूंढ रहे हैं कि आप अब दोहा लिखने से जी चुरा रहे हैं. ऐसा क्यों? इतनी height तक पहुँच कर फिर अचानक आपने दोहे न लिखने का संकल्प क्यों कर लिया? उस कक्षा को आपके दोहों की बहुत जरूरत है.

narendr tomr का कहना है कि -

Dilksh awajon ka yeh purluft safar mujhe apne aur film sangeet ke sunhare jamane mein le jata.Bahut bahut badhai is pahal ke liye.
narendra tomar

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