Friday, April 17, 2009

किन्नी बीती ते किन्नी बाकी ऐ..मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा....



पंजाबी शायर और कवि शिव कुमार बटालवी पर विशेष. दीप जगदीप बाँट रहे है अपने अनुभव बटाला शहर के

यौवन की ऋतु में जो भी मरता है,
वह या तो फूल बन जाता है या तारा।
यौवन की ऋतु में आशिक़ मरता है
या फिर करमों वाला।

- शिव बटालवी

हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है.

1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है.

शिव की दीवानगी का सिलसिला मेरी जवानी के साथ ही शुरू हुआ और कब ये इश्क पागलपन तक पहुंच गया,खुद मुझे मालूम नहीं। तीन साल पहले की बात है, पता चला कुछ साहित्यकार दोस्त बटाला जा रहे हैं। मैंने एक दम कह दिया मैं भी चलूंगा, वहां पर साहित्य समारोह था, सभी उसमें शिरकत करने जा रहे थे। मुझे कवि गुरभजन गिल ने कहा सुबह 6 बजे जाना होगा, तुम पंजाबी भवन पहुंच जाना। अगली सुबह मैं छह से पहले वहां पहुंच गया। इसे मेरी खुशनसिबी समिझए कि जिस होटल में ये कार्यक्रम था, उसके ठीक सामने शिव की याद में एक ऑडिटोरियम बन रहा था। दो बार नींव पत्थर रखे जाने के बावजूद उसकी हालत पखाने से बद्दतर थी। जंग लगे बड़े से गेट पर ताला लटक रहा था। डा.जगतार धीमान ने मुझे दीवार फांद अंदर जाने की सलाह दी, वो भी मेरे साथ हो लिए। बीस पच्चीस कदम दीवार पर चलने के बाद हम अंदर के दरवाजे के सामने पहुंच कर नीचे कूद गए। ऑडिटोरियम में अंधेरा था और बैठने वाली सीढि़यों के दायरे के रुप में सीमेंट ईंट का ढांचा खड़ा था। उसके बीच मिट्टी के ढेर पड़े थे। बीचों बीच दो ढेर बिल्कुल गोल पहाड़ी की तरह करीब 5 फुट उंचाई तक होंगे, मैं यूं ही मस्ती में उन पर कोहनी रख कर खड़ा हो गया। धीमान साहब फोटो खींचने में बिजी थे, अचानक उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो चेताने वाले लहजे में बोले वहां से हट जा उसमें सांप हो सकता हैं। मैं हैरान था, मुझे पता चला ये सांप की बाम्बियां है। वहां से हटने से पहले ही मेरे दिमाग में बात गूंज गई कि शिव जिंदगी भर अपने गीतों में सांप और उनकी वर्मियों की बातें करता रहा और आज वह उसकी अधूरी खंडहर यादगार पर भी कुंडली मारे बैठे हैं, मैंने उन्हीं के साथ फोटो खिचवाई। अफसोस के वो फोटो आज तक नहीं मिल सके।

उसी दोपहर को बटाले वाले सुभाष कलाकार और रंधावा के साथ हम शिव का घर देखने गए। घर बंद पड़ा था,जो कोई वहां पर रहता था, मौजूद नहीं था। पड़ोसियों ने मेरी आंखों की अकांक्षा समझ ली शायद और उनके घर की सीढि़यां चढ़ कर दीवार फांद कर हम शिव के उस छोटे से चौबारे में पहुंचे, जहां पर कहते हैं शिव ने कई खूबसूरत शामें गुजारी हैं। बिल्कुल खाली पड़ा कमरा, गली को खुलती लोहे की सलाखों वाली खिड़की और ठंडा सीमेंट का फर्श। कुछ पल खिड़की के पार झांकते हुए मैंने सोचा शायद शिव भी यूं अपना शहर यहां से देखता होगा। फिर न जाने क्या सूझी के ठंडे फर्श पर मैं लेट गया। एक पल लगा मानों मैं हल्का पंख हो गया फर्श की ठंडक भरी गोद में यूं लगा शिव की गोद में सो रहा हूं। आवाज गूंजी "चलो चलें" तो मेरा ख्वाब टूटा भीगी पलकों के साथ खड़ा हुआ, तो दो बूंदें फर्श पर गिर पड़ी, मुझे याद आ गया शिव ने कहा था, "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा...". अंदर से आवाज गूंजी शिव तेरे फर्श पर दो पल सकून के गुजारने का भाड़ा मेरे दो आसूं रख लेना शायद यही मेरे लिए तसल्ली की बात थी कि "पीड़ां दा परागा" भुनाने के बदले आंसूओं का भाड़ा देने वाले शिव को मैंने उसी का सरमाया लौटाया है।

आज हम आवाज़ के श्रोताओं के लिए लाये हैं शिव के गीत, जिन्हें अलग अलग फनकारों ने अपनी आवाजों से सजाया है. जिन्हें पंजाबी आती है उनके लिए तो ये संकलन एक शानदार तोहफा है ही, भाषा पर पकड़ न रखने वालों के लिए भी उन्हें सुनना एक यादगार अनुभव होगा, ऐसा हमारा दावा है. तो शुरू करते है "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा..." से, फनकार है सतबीर कौर.


सुरिंदर कौर की आवाज़ में सुनिए - "गमां दी रात लम्बी ऐ..." और चित्र सिंह की आवाज़ में "गीतां वे चुंज भरी..."




जगजीत सिंह से सुनिए "एक शिकरा यार बनाया..." और "रोग बन के रह गया है इश्क तेरे शहर का..."




कुलदीप दीपक ने एक पूरी एल्बम उन्हें समर्पित किया है, जिसके कुछ हिस्से यहाँ पेश हैं -


और अब सुनिए खुद शिव की आवाज़ में ये गीत -
मैनू तेरा शबाब ले बैठा,
रंग गोरा गुलाब ले बैठा,
मैंनू जद वी तुसी हो याद आए,
दिन दिहाडे शराब ले बैठा,
किनी बीती ते किनी बाकी ऐ,
मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा.....




प्रस्तुति - गीत चतुर्वेदी के साथ जगदीप सिंह

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11 श्रोताओं का कहना है :

मनुज मेहता का कहना है कि -

great presentation
I just love reading this note again and again. i too have similar memories of Batala. being a punjabi i have read Shiv's collection in his own language. thank you all for presenting such memorable moments and songs from the legend.

regards
Manuj Mehta

अजित वडनेरकर का कहना है कि -

बहुत सुंदर पोस्ट। लेखकों ने बहुत सारी जानकारियां, बेहद आत्मीयता से दी हैं। गीत-नग़में भी सुने। शिवजी की आवाज़ में अपनी पसंदीदा रचना सुनना उपलब्धि रही।
शुक्रिया

Parul का कहना है कि -

antim geet laajavaab...shukriyaa..sundar post ke liye

रंजना [रंजू भाटिया] का कहना है कि -

आज लगता है आवाज़ ने मेरे दिल की बात सुनी ...:) सब मेरे पसंद के गीत और लेख बहुत बढ़िया लगा ..सिर्फ पहला गाना एरर शो कर रहा है ..बाकी सब संजो के रख लिए हैं ..शुक्रिया

Deep Jagdeep का कहना है कि -

सजीव जी सभी पाठकों श्रोताओं से रुबरु करवाने के लिए शुक्रिया।
@मनूज मेहता जी
शुक्रिया हम आपकी बटाला से जुड़ी यादों को भी ज़रुर सुनना चाहेंगे।

अजित और पारुल जी
प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया, पारुल जी आप से भी बहुत कुछ सुनने की इच्छा है, अपने शास्त्रीय संगीत के ज्ञान को आवाज़ के माध्यम से सभी पाठकों से बांटिए ताकि हम भी राग मलहार के साथ झूम सके, राग दरबारी में मुग्ध हो सकें, जोगेशवरी संग जोगी हो जाएं।

pawan arora का कहना है कि -

thanx 4 giving me such a beautiful gift..
(tera birhara)surender kaur ki aawaz me mujhe rula gaya..
thanx again..

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

बहुत खूभ-शुक्रिया ऐसी सौगात का।
पर कुछ गलतियां भी हैं
शिकरा-not शिखरा
२ किनी बीती ते किनी बाकी है not किनी पीती..
और भी है
गमां not
गमन
but thanks again for it

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

हमें पंजाबी तो नहीं आती, लेकिन फिर भी संगीत की जुबान हम समझ गये और बहुत मज़ा आया

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

सरस, सुमधुर प्रस्तुति ...साधुवाद.

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

शुद्धिकरण हेतु धन्यवाद !
यह भी देखें

मैनू जब भी तुसी हो याद आये,
मैंनू जद वी तुसी हो याद आए- करें
श्याम सखा श्याम

gorav का कहना है कि -

शिव के बारे में जितना लिखा और बोला जाए वो कम है। लेकिन इस बात की खुशी है कि आज भी लोग याद करते है। एक वाक्य बताता हूं कि जब मैं शिमला में पत्रकारिता का कोर्स कर रहा था तो एक लड़के ने पूछा कि आप कहां से आए हैं तो मैने कहा कि मे बटाला से हूं। तो वहीं उसने मुझे गले से लगाया और कहा कि आप शिव के शहर से हैं और सच में सुनने में इतना अच्छा लगा कि बयान करना मुश्किल है। चलो इतनी खुशी हुई कि हमारी पहचान शिव के शहर से है

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