Friday, April 17, 2009

बेईमान बालमा मान भी जा...आशा की इस गुहार से बचकर कहाँ जायेंगे...



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 54

.पी. नय्यर के गानों में एक अलग ही चमक हुआ करती थी। चाहे गाना ख़ुशरंग हो या फिर ग़मज़दा, नय्यर साहब का हर एक गीत रंगीन है, चमकदार है। उनका संगीत संयोजन कुछ इस तरह होता था कि उनके गीतों में हर एक साज़ बहुत ही साफ़ साफ़ सुनाई पड़ता था। दूसरे संगीतकारों की तरह उन्होने कभी 'वायलिन' से 'हार्मोनी' पैदा करने की कोशिश नहीं की, बल्कि हर साज़ को एकल तरीके से गीतों में पेश किया। फिर चाहे वह सारंगी हो या सितार, 'सैक्सोफ़ोन' हो या फिर बांसुरी। मूड, पात्र और स्थान - काल के आधार पर साज़ों का चुनाव किया जाता था, और इन साज़ों के हर एक पीस को बहुत ही निराले ढंग से पेश किया जाता था। इन साज़ों को बजाने के लिए भी नय्यर साहब ने हमेशा बड़े बड़े साज़िंदों और फ़नकारों को ही नियुक्त किया। इन फ़नकारों के बारे में विस्तार से हम फिर कभी बात करेंगे, चलिये अब आ जाते हैं आज के गीत पर। आज का गीत है फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' से, नय्यर साहब का संगीत, मजरूह साहब के बोल, और आशाजी की आवाज़।

शम्मी कपूर, नलिनी जयवन्त और अमीता अभिनीत फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' आयी थी सन १९५६ में, जो बनी थी फ़िल्मिस्तान के बैनर तले। फ़िल्मिस्तान सन १९४४ से फ़िल्में बना रही थी और तब से लेकर 'हम सब चोर हैं' के बनने तक, यानी कि १९५६ तक कई संगीतकारों को मौका दिया जैसे कि मास्टर ग़ुलाम हैदर, हरि-प्रसन्न दास, सी. रामचन्द्र, सचिन देव बर्मन, विनोद, श्यामसुंदर, हेमन्त कुमार, मदन मोहन, बसंतप्रकाश, एस. मोहिन्दर, रवि और सरदार मलिक। १९५६ में इस बैनर ने अपने नाम दो और संगीतकार जोड़ लिए- फ़िल्म 'हीर' में अनिल बिश्वास और 'हम सब चोर हैं' में ओ. पी. नय्यर। आइ. एस. जोहर निर्देशित इस फ़िल्म को बहुत ज़्यादा ख्याति तो नहीं मिली, लेकिन नय्यर साहब अपने गीत संगीत के ज़रिये लोगों के दिलों में अपनी जगह बरक़रार रखने में जरूर कामियाब रहे । प्रस्तुत गीत में आशा भोंसले की आवाज़ के उछाल में बह जाइए दोस्तों, और साथ ही महसूस कीजिए नय्यर साहब की वह ख़ास अंदाज़ जो वो उत्पन्न करते थे 'चेलो' (cello) और सारंगी के मिश्रण से। 'हम सब चोर हैं' फ़िल्म से पेश है "बेइमान बालमा मान भी जा, बेजान ज़ालमा मान भी जा"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कैफी आज़मी के बोल और मदन मोहन का संगीत.
२. राजकुमार और प्रिय राजवंश हैं इस फिल्म में.
३. मुखड़े में शब्द है- "सदके"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी के लिए जोरदार तालियाँ, एक मुश्किल गीत का संकेत पकडा है आपने. शन्नो जी जब दिल से दिल जुड़ जाते हैं तो "telepathy" काम करती है. इन गीतों के माध्यम से हम सब के दिल जुड़ जो गए हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि आप गीत सोचें और हम प्रस्तुत करें. वैसे मनु जी ने भी कुछ हद तक सही कहा है, कहीं प्याज काटते वक़्त तो ये गीत याद नहीं आया न...हा हा हा..


खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



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4 श्रोताओं का कहना है :

manu का कहना है कि -

शानदार गीत लता का,,

दो दिल टूटे दो दिल हारे.....
दुनिया वालो सदके तुम्हारे............

neelam का कहना है कि -

o p nayyar ji ne jo naayab gaane diye hain .aasha ji ki aawaj me
sab ke sab bemisaal hain .ek musaafir ek haseena film ke kuch gaane bhi sunvaaiye .

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आशा जी द्वारा गाया गया गीत मधुर है...सदके से मनु ने सही पहचाना है...सदके का एक और गीत है जो मुझे पसंद है 'मेरी जान तुम पे सदके अहसान इतना कर दो, मेरी जिन्दगी में अपनी चाहत का रंग भर दो...'कभी सुनवा दीजियेगा...

shanno का कहना है कि -

मुझे फिर हंसी आ गयी पढ़कर......मनु जी का दिमाग बहुत ही advanced है....उसकी पहुँच वहां तक है जहाँ किसी की भी सोच नहीं पहुँच सकती. प्याज़ से मेरे गाने का कोई सम्बंध नहीं था उस दिन, उस दिन प्याज की कोई खता नहीं थी, ऐसा कुछ नहीं हुआ. मनु जी को ग़लतफ़हमी हो गयी है. मैं तो बस अपना मनोरंजन कर रही थी खुद गाकर क्योंकि किसी और के सामने अपनी आवाज़ में गाने की हिम्मत नहीं कर सकती, कान में उंगली लगाकर सब उठकर भाग जाते हैं या फिर मुझे चुप करा दिया जाता है.....मेरा मतलब समझ गए ना आप? समझदार के लिए इशारा काफी, है ना?
वैसे कभी 'न हम तुम्हे जानें न तुम हमें जानो मगर लगता है कुछ ऐसा.....' वाला गाना भी सुनाने की तकलीफ करें. और जो आचार्य जी ने इस बार बताया है वह भी मेरी पसंद का है. आगे कुछ और भी सोच कर कभी बताऊंगी. शुक्रिया.

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