Tuesday, November 10, 2009

हम दोनों मिलके कागज़ पे दिल के चिट्टी लिखेंगें जवाब आएगा...चिट्टी पत्री के दिनों में लौटें क्या फिर से



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 258

दोस्तों, यह बताइए कि आख़िरी बार आपने किसी को काग़ज़ पर चिट्ठी कब लिखी थी? हाँ हाँ याद कीजिए, दिमाग़ पर और थोड़ा सा ज़ोर लगाइए। मुझे पूरा विश्वास है कि आप में से अधिकतर लोग काग़ज़ पर पत्र लिखना छोड़ चुके होंगे। ई-मेल, मोबाइल, और एस.एम.एस की रफ़्तार ने और ज़िंदगी की तेज़ गति ने पारम्परिक चिट्ठी पत्री के रिवाज़ पर गहरा चोट की है। हम नए टेक्नोलोजी के ख़िलाफ़ नहीं है, लेकिन काग़ज़ पर चिट्ठी लिखने में जो अहसासात ज़हन में उभरते हैं, वो अहसासात ई-मेल या एस.एम.एस नहीं पैदा कर सकती। किसी ने ठीक ही कहा है कि विज्ञान ने हमें दिया है वेग, लेकिन हमसे छीन लिया है हमारा आवेग! दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि आज मैं ऐसे फ़ंडे क्यों दे रहा हूँ। तो कारण एक ही है, कि आज का जो गीत हमने चुना है वह चिट्ठी लिखने पर आधारित है। लेकिन यह चिट्ठी किसी आम काग़ज़ पर नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि दो प्यार करने वाले इसे लिख रहे हैं अपने दिलों के काग़ज़ पर, और जिसका दिल से ही जवाब आना है। आशा भोसले और मुकेश की युगल आवाज़ों में यह सुंदर गीत है ७० के दशक के आख़िर का। यानी कि १९७८ में यह फ़िल्म जब रिलीज़ हुई थी तब मुकेश इस दुनिया में मौजूद नहीं थे। फ़िल्म 'तुम्हारी क़सम' का यह गीत है "हम दोनों मिलके, काग़ज़ पे दिल के, चिट्ठी लिखेंगे, जवाब अएगा"।

'तुम्हारी क़सम' का निर्माण किया था सी. वी. के शास्त्री ने, सह-निर्माता थे आर. एन. कुमार। रवि चोपड़ा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे जीतेन्द्र, मौसमी चटर्जी, नवीन निश्चल और पद्मिनी कपिला। इस फ़िल्म के संगीतकार थे राजेश रोशन और गानें लिखे गीतकार आनंद बक्शी साहब ने। राजेश रोशन एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिन्होने वक़्त के साथ साथ अपने आप को साबित करके दिखाया है। नहीं तो साधारणतः क्या होता है कि बदलते दौर के साथ साथ संगीतकार अपने आप को ढाल नहीं पाते और नई पीढ़ी टेक-ओवर कर लेती है। लेकिन राजेश रोशन के साथ ऐसा नहीं हुआ। ७० के दशक में वे हिट गानें दिए और आज २००० के दशक में भी वो सुपर डुपर हिट गानें दे रहे हैं। अपने पिता रोशन की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया राजेश ने, और यह तब शुरु हुई जब गीतकार आनंद बक्शी ने उन्हे मिलवाया था संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से। राजेश बने एल.पी के सहायक और उनसे बहुत कुछ सीखा। बतौर स्वतंत्र संगीतकार राजेश रोशन को पहला ब्रेक दिया महमूद ने अपनी फ़िल्म 'कुंवारा बाप' में। आर. डी. बर्मन को भी महमूद जी ने ही पहला ब्रेक दिया था 'छोटे नवाब' और 'भूत बंगला' जैसी फ़िल्मों में। राजेश रोशन एक प्रयोग धर्मी संगीतकार रहे हैं। जहाँ एक तरफ़ उन्होने बेहद नाज़ुक-ओ-तरीन गानें दिए हैं, वहीं दूसरी ओर ज़बरदस्त टेक्नो धुनों में भी महारथ हासिल की है। आज का गीत एक रोमांटिक सीधा सरल गीत है। आम बोलचाल की भाषा में लिखा बक्शी साहब का यह गीत जल्द ही दिल में उतर जाता है और होठों पर गुनगुनाहट बन कर सजा रहता है देर तक। आप भी सुनिए, मुझे उम्मीद है कि एक लम्बे अरसे से इस गीत को आप ने नहीं सुना होगा, तभी तो आज यह गीत 'आवाज़' पर बज रहा है ख़ास आप के लिए। मैं आप से गुज़ारिश करूँगा कि आज इस गीत को सुनने के बाद आप अपने किसी प्रिय आत्मीय, परिजन, या किसी निकट के मित्र को एक सफ़ेद काग़ज़ पर एक ख़त ज़रूर लिखेंगे और ज़रा अंदाज़ा लगाइए कि जब आपका ख़त उन तक पहुँचेगा तो कितना बड़ा सर्प्राइज़ उन्हे मिलेगा और कितनी ख़ुशी उन्हे मिलेगी। है ना?



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत को परदे पर जिन नायक-नायिका पर फिल्माया गया था, खुद उन्होंने ही अपना पार्श्वगायन किया था.
२. गीतकार शकील बदायुनीं साहब हैं यहाँ.
३. मुखड़े में शब्द है -"मालूम".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी आपका क्या कहना.....बस कमाल है, दूसरी बार भी आप ४० के अन्कदें तक पहुच गए हैं, लगता है बाकी सब लोग हथियार डाल चुके हैं, रोहित राजपूत और दिलीप जी सब कहाँ है भाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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3 श्रोताओं का कहना है :

शरद तैलंग का कहना है कि -

मन धीरे धीरे गाए रे
मालूम नहीं क्यूं
स्वर : तलत एवं सुरैया
फ़िल्म : मालिक (१९५८)
संगीत : गुलाम मोहम्मद

निर्मला कपिला का कहना है कि -

कुछ दिनों की अनुपस्थिती के लिये क्षमा चाहती हूँ आज का गीत भी लाजवाब है धन्यवाद्

prachi... का कहना है कि -

एक उम्दा अनसुना गीत सुनवाने के लिए शुक्रिया...

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