Thursday, May 20, 2010

फिल्मों गीतों की दास्ताँ गीता के जिक्र बिना कैसे पूरी हो...



ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ३०

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज वह गीत जिस गीत के बनने के बाद से गीता दत्त ओ.पी. नय्यर साहब को बाबूजी कह कर बुलाया करती थीं। आप समझ चुके होंगे, जी हाँ, "बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभलना"। उन दिनों गीता दत्त के गाए इस तरह के नशीले अंदाज़ वाले गीतों को काफ़ी बोल्ड समझा जाता था। कई बार तो सेन्सर बोर्ड की भी आपत्ति का सामना करना पड़ा है, जैसे कि एक बार हुआ था "जाता कहाँ है दीवाने, सब कुछ यहाँ है सनम" गीत को लेकर। आज के दौर में यह वाक़ई अजीब सा लगता है सोच कर! तो साहब मजरूह सुल्तानपुरी, ओ. पी. नय्यर, और गीता दत्त, ५० के दशक के मध्य भाग में इस तिकड़ी ने फ़िल्म संगीत जगत में जैसे हंगामा ही खड़ा कर दिया था। अपने शुरुआती दिनों में गीता दत्त को केवल भक्ति रचनाएँ ही गाने को मिलते थे। उनकी आवाज़ में भक्ति गीत बेहद सुदर जान पड़ते। ऐसा लगने लगा था कि गीता जी की प्रतिभा को भक्ति रस के खाँचे में ही क़ैद कर दिया जाएगा। लेकिन संगीतकार ओ. पी. नय्यर ने पहली बार अपनी पहली ही फ़िल्म 'आसमान' में गीता जी से गानें गवाए और यहा~म से शुरु हुई एक नशीली लम्बी यात्रा। 'आर पार, 'सी.आई.डी', ' मिस्टर ऐण्ड मिसेस ५५', ' हावड़ा ब्रिज', '१२ ओ'क्लॊक' वगैरह। पेश है नय्यर साहब के कुछ शब्द गीता दत्त की शान में - "हम हैं वो कॊम्पोज़र जिन्होने लता मंगेशकर की आवाज़ पसंद ही नहीं की। वो गायिका नंबर एक हैं, पसंद क्यों नहीं की, क्योंकि हमारे संगीत को सूट नहीं करती। 'थिन थ्रेड लाइक वायस' हैं वो। और मुझे चाहिए थी 'सेन्सुयस, फ़ुल ऒफ़ ब्रेथ', जैसे कि गीता दत्त, शमशाद बेग़म। 'टेम्पल बेल्स' की तरह वायस है उनकी (शमशाद)। वो शमशाद जी की आवाज़ इतनी ऒरिजिनल है कि कमाल है। गीता दत्त, जिनको मैं 'ब्लैक ब्युटी' कह कर पुकारता था हमेशा, वो इतनी 'इंडिविजुयल' आवाज़ थी कि वाह!" दुखद बात यह रही कि आशा की आवाज़ को पा कर नय्यर साहब ने गीता दत्त और शमशाद बेग़म से किनारा कर लिया, और इस बात को नय्यर साहब ख़ुद भी स्वीकारते हैं। ख़ैर, हर कलाकार का अपना दौर होता है, अपना समय होता है। नए कलाकार पिछली पीढ़ी के कलाकारों की जगह ले लेते हैं और इसी तरह से संगीत का यह सफ़र आगे बढ़ता रहता है। तो चलिए हम भी इस सुरीली यात्रा को आगे बढ़ाते हुए सुनते हैं फ़िल्म 'आर पार' का यह चंचल, चुलबुला और शोख़ नग़मा।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -बाबूजी धीरे चलना...
कवर गायन -डाक्टर पारसमणी आचार्य




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डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

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indu puri का कहना है कि -

सजीव जी
पारस जी की आवाज में ये गाना सुनना चाहती थी किन्तु 'एरर' बता रहा है.
कई बार कोशिश की,पर गाना क्यों नही सुनाई दिया? राम जाने.
यूँ कल्पना कर सकती हूँ कि उन्होंने कैसा गया होगा,पहले भी उन्हें सुन् चुकी हूँ.
आप 'गुदड़ी के लाल' ढूँढ ढूँढ कर जाने कहाँ से ल रहे हैं.
आश्चर्य चकित हूँ हमारे देश में कितना 'टेलेंट' है.एक्स्पोज़ तो बहुत कम हो पते हैं हर किसी को मंच नही मिलता.
इसलिए भी आपका प्रयास ज्यादा सराहनीय है .

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