Tuesday, October 5, 2010

फूल अहिस्ता फैको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं....इसे कहते है नाराज़ होने, शिकायत करने का लखनवी शायराना अंदाज़



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 498/2010/198

नौ रसों में कुछ रस वो होते हैं जो अच्छे होते है, और कुछ रस ऐसे हैं जिनका अधिक मात्रा में होना हमारे मन-मस्तिष्क के लिए हानिकारक होता हैं। शृंगार, हास्य, शांत, वीर पहली श्रेणी में आते हैं जबकि करुण, विभत्स और रौद्र रस हमें एक मात्रा के बाद हानी पहुँचाते हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार, 'रस माधुरी' शृंखला में आज बातें रौद्र रस की। जब हमारी आशाएँ पूरी नहीं हो पाती, तब हमें लगता है कि हमें नकारा गया है और यही रौद्र रस का आधार बनता है। यह ज़रूरी नहीं कि ग़ुस्से से हमेशा हानी ही पहुँचती है, कभी कभी रौद्र का इस्तेमाल सकारात्मक कार्य के लिए भी हो सकता है जैसे कि माँ का बच्चे को डाँटना, गुरु का शिष्य को डाँटना, मित्र का अपने मित्र को भलाई के मार्ग पर लाने के लिए डाँटना इत्यादि। लेकिन निरर्थक विषयों पर नाराज़ होना और बात बात पर नाराज़ होकर सीन क्रीएट कर लेना अपने लिए भी और पूरे वातावरण के लिए हानिकारक ही होता है। यह जानना बहुत ज़रूरी है कि ग़ुस्से से कोई भी समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि वह समस्या और विस्तारित होती है। मन अशांत होता है तो समस्या के समाधान के लिए उचित राह नहीं खोज पाता। रौद्र रस का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है माँ दुर्गा का रौद्र का दानव महिषासुर का वध करना। यह पौराणिक कहानी हमें सिखाती है कि किस तरह से हम अपने अंदर के रौद्र रूपी दानव का वध कर सकते हैं अपने अच्छे और दैवीय शक्तियों, जैसे कि क्षमा, स्वीकारोक्ति, विनम्रता, और हास्य आदि के इस्तेमाल से। प्राकृतिक कारणो से रौद्र बहुत देर तक हमारे अंदर नहीं रहता, इसलिए अगर हम रौद्र का भरण-पोषण नहीं करेंगे तो थोड़े समय के बाद यह ख़ुद अपने आप ही ख़त्म हो जाता है। अलग अलग प्राणियों में देखा गया है कि किसी में यह रस बहुत ज़्यादा होता है तो किसी किसी में बहुत कम। निष्कर्ष यही है कि हम अपने अंदर जितना कम रौद्र रखेंगे, हमारी सेहत के लिए उतना ही बेहतर होगा। अब फ़िल्मी गीतों पर आते हैं। रौद्र रस पर आधारित कोई गीत याद आता है आपको? फ़िल्म 'नगीना' का "मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा, मैं नागिन तू सपेरा", या फिर फ़िल्म 'राम लखन' का "बेक़दर बेख़बर बेवफ़ा बालमा, ना मैं तुझको मारूँगी, ना मैं तुझको छोडूँगी...", या फिर 'मेरा गाँव मेरा देश' फ़िल्म का "मार दिया जाए के छोड़ दिया जाए", जैसे बहुत से गानें हैं। लेकिन हमने जिस गीत को चुना है, वह यकायक सुनने पर शायद रौद्र रस का ना लगे, लेकिन ध्यान से सुनने पर और शब्दों पर ग़ौर करने पर पता चलता है कि किस ख़ूबसूरती से, बड़े ही नाज़ुक तरीके से रौद्र को प्रकट किया गया है इस गीत में। फ़िल्म 'प्रेम कहानी' का युगल गीत "फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं"। लता-मुकेश की आवाज़ें, आनंद बख्शी के बोल और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत।

'प्रेम कहानी' १९७५ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया लेखराज खोसला ने और निर्देशन किया था राज खोसला ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे शशि कपूर, राजेश खन्ना, मुमताज़ और विनोद खन्ना। संवाद डॊ. राही मासूम रज़ा के थे और फ़िल्म के गानें लिखे आनंद बख्शी ने। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के धुनों से सजे इस फ़िल्म के सभी गानें ख़ूब सुने गए, ख़ास कर लता-किशोर के दो युगल गीत "प्रेम कहानी मे एक लड़का होता है" और "चल दरिया में डूब जाएँ"। लता और मुकेश की आवाज़ों में आज का प्रस्तुत गीत भी गली गली गूँजा करता था एक समय। दोस्तों, इस गीत में जिस तरह से नाराज़गी ज़ाहिर की गई है, उसे सही तरीक़े से महसूस करने के लिए हम इस गीत के पूरे बोल यहाँ पर लिख रहे हैं। इन्हें पढ़िए और ख़ुद ही महसूस कीजिए इस गीत में छुपे रौद्र रस को।

मुकेश:
कहा आपका यह वजह ही सही, के हम बेक़दर बेववा ही सही,
बड़े शौक से जाइए छोड़ कर, मगर सहर-ए-गुलशन से युं तोड़ कर,
फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
वैसे भी तो ये बदक़िस्मत नोक पे कांटों की सोते हैं।

लता:
बड़ी ख़ूबसूरत शिकायत है ये, मगर सोचिए क्या शराफ़त है ये,
जो औरों का दिल तोड़ते हैं, लगी चोट उनको तो ये कहते हैं,
कि फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
जो रुलाते हैं लोगों को, एक दिन ख़ुद भी रोते हैं।

मुकेश:
किसी शौख़ को बाग़ की सैर में, जो लग जाए कांटा कोई पैर में,
वफ़ा हुस्न फूलों से हो किसलिए, ये मासूम है बेख़ता इसलिए,
फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
ये करेंगे कैसे घायल ये तो ख़ुद घायल होते हैं।

लता:
गुलों के बड़े आप हमदर्द हैं, भला क्यों ना हो आप भी मर्द हैं,
मुकेश:
हज़ारों सवालों का है एक जवाब, परे बेनज़र ये ना हो ऐ जनाब,
लता:
फूल आहिस्ता फेंको, फूल बड़े नाज़ुक होते हैं,
सब जिसे कहते हैं शबनम फूल के आँसू होते हैं।

मेरा ख़याल है कि बख्शी साहब के लिखे सब से ख़ूबसूरत गीतों में से एक है यह गीत। पता नहीं आप मुझसे सहमत होंगे या नहीं, लेकिन कहने को दिल चाहता है कि जिस तरह से मख़्दूम मोहिउद्दिन ने "फिर छिड़ी रात बात फूलों की" ग़ज़ल लिखी थी, ठीक वैसे ही फूल शब्द के इस्तेमाल में फ़िल्मी गीतों के जगत में यह गीत उसी तरह का मुक़ाम रखता है। आइए सुना जाए यह गीत जो आधारित है राग मिश्र शिवरंजनी पर।



क्या आप जानते हैं...
कि 'प्रेम कहानी' फ़िल्म में महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरु के फ़ूटेज दिखाए गए थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक अमर प्रेमिक प्रेमिका की प्रेम कहानी पर बनी यह फ़िल्म थी सन् १९७१ की। गीतकार बताइए। ४ अंक।
२. इस गीतकार ने इस फ़िल्म के संगीतकार के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी एक बेहद चर्चित फ़िल्म में काम किया था। संगीतकार पहचानिए। ३ अंक।
३. गीत के मुखड़े में शब्द है "महफ़िल"। फ़िल्म का नाम बताएँ। २ अंक।
४. इस फ़िल्म के एक अन्य गीत के मुखड़े में, जिसे इसी गीत के गायक ने गाया है, शब्द है "कूचे"। गायक पहचानिए। १ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह बहुत खूब एकदम सही पहचाना आपने. अब रौद्र रस से बाहर आ जाईये जनाब....सोचिये आज की पहेली का जवाब....सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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5 श्रोताओं का कहना है :

singhsdm का कहना है कि -

गीतकार kaifi azmi
*****
PAWAN KUMAR

ShyamKant का कहना है कि -

Q-3: Heer ranjha.

psingh का कहना है कि -

mdan mohan

amit का कहना है कि -

Q-4:-- Mohd. Rafi

AVADH का कहना है कि -

क्या कहने इस फिल्म के. केवल एक अकेली ऐसी फिल्म जिसमें सब संवाद पद्य में थे गद्य में नहीं.एक ओपेरा की तरह. और यह संभव हुआ उस अनोखी जोड़ी - मदन मोहन और कैफी आज़मी की वजह से जिसने फिल्म 'हकीकत' में भी इतने उत्तम संगीत से हमें नवाजा. और यह अनूठी सोच कल्पना थी चेतन आनंद की.
अग्रिम धन्यवाद कल के गीत हेतु.
अवध लाल

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