Sunday, October 24, 2010

क्या हमने बिगाड़ा है, क्यों हमको सताते हो....गुजरे दिनों में लौट चलिए सहगल और अमीरबाई के साथ इस नटखट से गीत में



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 511/2010/211

इंसान मात्र से ग़लतियाँ होती रहती हैं। चाहे हम लाख कोशिश कर लें, छोटी मोटी ग़लतियाँ फिर भी हर रोज़ हम कर ही बैठते हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस महफ़िल में! आप यह सोच रहे होगे कि यह हम क्या ग़लतियों की बातें लेकर बैठ गये। फिर भी दोस्तों, ज़रा सोचिए, क्या ऐसा भी कोई इंसान है जिसने अपने जीवन में कोई ग़लती ना की हो? बल्कि हम युं भी कह सकते हैं कि ग़लतियों से ही हमें सीखने का मौका मिलता है, अपने आप को सुधारने का मौका मिलता है। जिस दिन हमने कोई ग़लती ना की हो, जिस दिन हमें किसी परेशानी का सामना ना करना पड़ा हो, उस दिन हमें यह यकीन कर लेना चाहिए कि हम ग़लत राह पर चल रहे हैं। ये वाणी मेरी नहीं बल्कि स्वामी विवेकानंद की है। आज हम ग़लतियों की बातें इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आज से हम जो शृंखला शुरु कर रहे हैं, उसका भी विषय यही है। युं तो हमारे फ़िल्मी गीतकार, संगीतकार, गायक, गायिकाएँ और फ़िल्म निर्माता व निर्देशक बड़ी ही सावधानी के साथ गानें बनाते हैं और पूरा पूरा पर्फ़ेक्शन उनमें डालने की कोशिश करते हैं, लेकिन फ़िल्मी इतिहास गवाह है कि कई बार ऐसा हुआ है कि इन अज़ीम फ़नकारों से भी थोड़ी भूल चूक हो गई है जाने अनजाने। तो दोस्तों, ऐसे ही कुछ गड़बड़ी वाले गीतों को हम समेट लाये हैं एक लघु शृंखला की शक्ल में। तो लीजिए आज से अगले १० अंकों में सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'गीत गड़बड़ी वाले'। इससे पहले कि हम इस शृंखला के पहले गीत का ज़िक्र करें, हम यह बताना चाहेंगे कि इस शृंखला का उद्देश्य इन महान कलाकारों की ग़लतियाँ निकालना नहीं है। ऐसी ग़ुस्ताख़ी हम नहीं कर सकते। इन कलाकारों ने जो योगदान दिया है, उनकी तुलना में ये छोटी मोटी ग़लतियाँ नगण्य है। आपको याद होगा फ़िल्म 'ख़ूबसूरत' में रेखा का एक संवाद था "हम ये सब आण्टी जी को चोट पहुँचाने के लिए थोड़े कर रहे हैं, हम तो ये सब कर रहे हैं निर्मल आनंद के लिए"। बस यही बात यहाँ भी लागू होती है। यह शृंखला सिर्फ़ और सिर्फ़ निर्मल आनंद के लिए है। तो आइए हम सब हल्के फुल्के अंदाज़ में इस शृंखला का आनंद उठाते हैं, और पहले उन सभी कलाकारों से क्षमा याचना भी कर लेते हैं जिनकी ग़लतियाँ इस शृंखला में उजागर होंगी।

'गीत गड़बड़ी वाले' शृंखला की पहली कड़ी के लिए हम जिस गीत को चुन लाये हैं, उसमें आवाज़ें हैं फ़िल्म जगत के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल और अमीरबाई कर्नाटकी की। फ़िल्म 'भँवरा' का यह गीत है "क्या हमने बिगाड़ा है, क्यों हमको सताते हो"। पता है इस गीत में गड़बड़ी कैसी हुई? गीत के आख़िर में अमीरबाई कर्नाटकी की लाइन "तुम हमें अपना बनाते हो" दो बार आना था। लेकिन जैसे ही अमीरबाई एक बार इस लाइन को गाती हैं और दूसरी बार गाने के लिए शुरु करती हैं तो सहगल साहब ग़लती से अपनी लाइन "क्या हमने बिगाड़ा है" गाते गाते रुक जाते हैं। और अमीरबाई की लाइन होने के बाद उसे सही जगह पर गाते हैं। इस तरह से गड़बड़ी वाले गीतों में यह गीत शामिल हो गया। दोस्तों, ४० के दशक का यह एक बेहद मक़बूल गाना है। भले ही सहगल साहब ने इस गीत में ग़लती की हों, लेकिन उससे इस गीत की लोकप्रियता में तनिक भी कमी नहीं आयी थी उस ज़माने में। 'भँवरा' रणजीत मोवीटोन की फ़िल्म थी जिसमें सहगल साहब के साथ थे अरुण, कमला चटर्जी, याकूब, मोनिका देसाई, बृजमाला और केसरी। फ़िल्म में संगीत था खेमचंद प्रकाश का। तो आइए किदार शर्मा निर्देशित १९४४ की इस फ़िल्म के इस अनोखे गीत को सुनते हैं। कल एक ऐसा ही गीत लेकर आयेंगे जिसमें बिल्कुल इसी तरह की गड़बड़ी की है एक और गायक ने। तो अनुमान लगाइए कल के गीत की और मुझे इजाज़त दीजिए, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि कुंदन लाल सहगल १९४२ में कलकत्ते के न्यु थिएटर्स में इस्तीफ़ा देकर बम्बई के रणजीत मूवीटोन में चले गये थे। उस समय धीरे धीरे फ़्रीलांसिंग् का दौर भी चलने लगा था। १९४४ में जहाँ एक तरफ़ सहगल साहब ने रणजीत के 'भँवरा' में काम किया, वहीं वापस कलकत्ते जाकर न्यु थिएटर्स के 'माइ सिस्टर' में भी अभिनय किया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०२ /शृंखला ०२
ये पंक्तियाँ सुनिए गीत की -


अतिरिक्त सूत्र - किशोर कुमार का मशहूर अंदाज़ है जो अभी आपने सुना

सवाल १ - सहगायिका बताएं इस युगल गीत की - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम कान्त जी पहली बाज़ी जीतने के बाद दूसरी श्रृखला में भी आपने शानदार शुरूआत की है, २ अंकों की बधाई. अमित जी और बिट्टू जी १ -१ अंक आप दोनों के खाते में भी आये. शंकर लाल जी जैसा कि बटुक नट जी ने कहा कि हम सब आपके साथ हैं...शयर बाज़ार ४ बजे बंद हो जाता है उसके बाद खूब सारा संगीत सुनिए....शाम तक सारी थकान उतर जायेगी....और हाँ एक गुजारिश है आप सब बहुत हद तक नए हैं इस परिवार के अन्य सदस्यों के लिए और हमारे लिए भी....कुछ अपने बारे में विस्तार से हमें लिखें ताकि ये सम्बन्ध और गहरे हो सकें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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7 श्रोताओं का कहना है :

ShyamKant का कहना है कि -

3- Jan Nisar Akhtar

amit का कहना है कि -

1- Asha bhosle

bittu का कहना है कि -

2: O P Nayyar

AVADH का कहना है कि -

अरे तीनों उत्तर आ गए.
अब क्या करें? बाप रे बाप.
अवध लाल

इंदु पुरी गोस्वामी का कहना है कि -

देखो न नए नए लोग आ रहे हैं .अच्छा है न हम भी तो यही चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग हमारे इस ब्लॉग से जुड़े.
यूँ ओ.पी.नय्यर जी के संगीत निर्देशन में गाये गए आशा भोसले जी के गानों में जो कशिश और मिठास थी वो और वैसी दुबारा फिर नही मिली .
मेरे पास तो लम्बी लिस्ट है इन गानों की.
बस इतनी बिजी हूँ कि देख लो रात के बारह से ऊपर समय हो रहा है.
पर आती हूँ पद्धति.तभी सोती हूँ.हा हा हा क्या करूं? ऐसिच हूँ मैं तो.

Anonymous का कहना है कि -

सजीव व सुजॉय
आशीर्वाद
धन्यवाद के शब्द कोण से शब्दकोश से ढूंढ का लायूं
सहगल जी और अमीरबाई जी गीत सुना तो बचपन याद आ गए १९४४ में सहगल साहिब को लाहोर में दर्शन किये थे
काश आज के समय में ऐसे गीत ,स्वर,धुन ,गायक,संगीतकार

अभिनेता ,अभिनेत्रियां होती

गुड्डोदादी का कहना है कि -

सजीव सुजॉय
क्षमा करना
गलती से ANONYMOUS में छप गया

गुड्डो दादी

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