Monday, March 28, 2011

राधे रानी दे डारो ना....गीत उन दिनों का जब सहगल साहब केवल अपने गीतों के गायक के रूप में पर्दे पर आते थे



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 622/2010/322

फ़िल्म जगत के प्रथम सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला 'मधुकर श्याम हमारे चोर' की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। कल पहली कड़ी में हमने आपको बताया सहगल साहब के शुरुआती दिनों का हाल और सुनवाया उनका गाया पहला ग़ैर फ़िल्मी गीत। आइए आज आपको बताएँ कि उनके करीयर के पहले दो सालों में, यानी १९३२-३३ में उन्होंने किन फ़िल्मों में कौन कौन से यादगार गीत गाये। १९३२ में न्यु थिएटर्स ने सहगल को तीन फ़िल्मों में कास्ट किया; ये फ़िल्में थीं - 'मोहब्बत के आँसू', 'सुबह का तारा' और 'ज़िंदा लाश'। इन तीनों फ़िल्मों में संगीत बोराल साहब का था। 'मोहब्बत के आँसू' में सहगल साहब और अख़्तरी मुरादाबादी के स्वर में कई गीत थे जैसे कि "नवाज़िश चाहिए इतनी ज़मीने कूवे जाना की" और "हम इज़तराबे कल्ब का ख़ुद इंतहा करते"। इन बोलों को पढ़ कर आप अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह की भाषा का इस्तमाल होता होगा उस ज़माने की ग़ज़लों में। ख़ैर, 'सुबह का तारा' फ़िल्म के "न सुरूर हूँ न ख़ुमार हूँ", "खुली है बोतल भरे हैं सागर", "आरज़ू इतनी है अब मेरे दिल-ए-नाशाद की" जैसे गानें ख़ूब चले थे। 'ज़िंदा लाश' फ़िल्म के "सारा आलम धोखा है, यह जीना है", "गुज़रे हाँ यूँ ही कटे दिन रैन", "आँखों में सर रहता है क्यों", "लगी करेजवा में चोट", "जानते हो तुम मुहब्बत किस क़दर इस दिल में है", "सज़ा मिली है मुझे तुमसे दिल लगाने की", "पहले तो शौक में ख़ाक दरे-मैख़ाना बनूँ" गानें भी एक से बढ़ कर एक थे। आज भले इन गीतों को दुनिया भुला चुकी है, लेकिन इनका भी अपना एक ज़माना था।

१९३२ की इन तीनों फ़िल्मों के गीतों ने कुछ ऐसा सर चढ़ के बोला कि अगले साल सहगल और बोराल की जोड़ी ने एक और कीर्तिमान स्थापित किया 'पूरन भगत' फ़िल्म के ज़रिए। न्यु थिएटर्स के मशहूर निर्देशक देबकी बोस निर्देशित यह प्रथम हिंदी फ़िल्म थी। सहगल का जादू कुछ ऐसा चला था कि कोई भूमिका न होते हुए भी सहगल को इस फ़िल्म में सिर्फ़ गीतों के लिए पर्दे पर उतारा गया था। इस फ़िल्म का सब से मशहूर गीत था "राधे रानी दे डारो ना", जो राग यमन कल्याण पर आधारित था, हालाँकि कहीं कहीं पर इसे राग बिहाग पर आधारित भी बताया गया है। आज के अंक को हम इसी गीत से सजा रहे हैं। इसी फ़िल्म का सहगल का गाया अन्य गीत "दिन नीके बीत जात है" भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ था। 'पूरन भगत' के मुख्य कलाकारों में थे सी एम् रफ़ीक, अंसारी और के.सी. डे. के सी डे ने भी इस फ़िल्म में कुछ लोकप्रिय गीत गाये। दोस्तों, क्योंकि आज ज़िक्र एक साथ हुआ है सहगल साहब और के.सी. डे साहब का, तो क्यों न के.सी. डे साहब के भतीजे, यानी कि सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे के सहगल साहब से संबंधित कहे हुए शब्द पढें - "सहगल साहब बहुत लोकप्रिय थे। मेरे सारे दोस्त जानते थे कि मेरे चाचा जी, के.सी. डे साहब के साथ उनका रोज़ उठना बैठना है। इसलिए उनकी फ़रमाइश पे मैंने सहगल साहब के कई गानें एक दफ़ा नहीं, बल्कि कई बार गाये होंगे। 'कॊलेज-फ़ंक्शन्स' में उनके गाये गानें गा कर मैंने कई बार इनाम भी जीते।" और अगर आज के भजन की बात करें तो इसके कद्रदानों में संगीतकार रोशन साहब भी शामिल हैं। उनके शब्दों में - "वैसे तो मैं पहले से सुरों के पीछे पागल तो था ही, मगर एक सहगल साहब का भजन था जो मुझे बहुत पसंद था, यह उनका पहला ही गाना था फ़िल्मों के लिए, फ़िल्म थी 'पूरन भगत', मैंने कई बार यह फ़िल्म सिर्फ़ इस भजन के लिए देखी।" तो लीजिए, सुनिए फ़िल्म 'पूरन भगत' से "राधे रानी दे डारो ना"।



क्या आप जानते हैं...
कि अपने १५ वर्षीय करीयर में सहगल साहब ने कुल १८५ गीत गाये, जिनमें १४२ फ़िल्मी और ४३ ग़ैर फ़िल्मी हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 13
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - गायक कुंदन लाल सहगल की एक बेहद लोकप्रिय गज़ल.

सवाल १ - किस बेमिसाल शायर की है ये गज़ल - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस शायर के नाम पर बनी एक फिल्म में एक और बड़ी गायिका ने यही गज़ल गाई थी, जिसे हम ओल्ड इस गोल्ड में अभी कुछ दिनों पहले सुनाया था, कौन थी वो गायिका - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
सबसे पहले एक स्पष्टीकरण - विकीपीडिया या अन्य वेब साईटों की जानकारियाँ भी हमारे आपके जैसे कद्रदान अपडेट करते हैं, जिनमें गलतियों की संभावना रहती है. हमारे रेफेरेंस अधिकतर लिखी हुई किताबों और विविध भारती के कार्यक्रमों से होते हैं जिन पर हम शायद अधिक विश्वसनीयता रख सकते हैं. जाहिर है पंकज राग और हरमंदिर हमराज़ जैसे दिग्गजों की बातों को हम विकिपीडिया से अधिक तवज्जो देंगें. अब कुछ आप लोगों के संशय भी दूर करें -
१. अंजाना जी, गौर करें कि हरिश्चंद्र बाली का जिक्र हमने भी किया है, पर पहेली जिस गाने के सन्दर्भ में थी उस गीत के संगीतकार पूछे गए थे, जिनका सहगल के करियर में महत्वपूर्ण योगदान था.
२. १९३३ की ये फिल्म शायद ही हम में से किसी ने देखी होगी, जाहिर है उसके कास्ट के बारे में जो जानकारी उपलब्ध है उसी के आधार पर सवाल पूछा गया था, सिद्धार्थ जी की दिए हुए लिंक के अलावा कहीं भी ये नहीं लिखा कि के सी डे ने फिल्म में अतिथि भूमिका की थी, और किसी भी फिल्म में एक दो या इससे भी अधिक प्रमुख किरदार हो सकते हैं, और जब हिंट दिया जा रहा है उनके गायक होने के बारे में भी तो कोई भी व्यक्ति के सी डे तक पहुँच सकता है, और अंजाना जी पहुंचे भी हैं...तो उनके ३ अंक पक्के हैं...हमें इस सवाल में कोई उलझाव नज़र नहीं आता.
देखिये हमारे पास संगीत ज्ञान रखने वाले श्रोताओं की भरमार है जाहिर है पहेलियाँ थोड़ी सी घुमा फिरा कर ही पूछनी पड़ेगी तभी तो हमें कल प्रतीक जी और सिद्धार्थ जी जैसे छुपे हुए धुरंधर दिखे.
अमित जी और हिन्दुस्तानी जी को भी कल के लिए बधाई.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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Mirza Ghalib

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हालाँकि स्पष्ट नहीं है पर मैं यह मान लेता हूँ कि अनजाना जी ने जो उत्तर दिया है वोह शायर के नाम के बारे में है और फिल्म के नाम से नहीं.
यह गज़ल फिल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में सुरैया जी ने ज़रूर गायी थी पर सहगल साहेब ने इसे गाया था फिल्म 'यहूदी की लड़की' में.
अवध लाल

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