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‘ए हो जन्मी है बिटिया हमार...’ कन्या-जन्म पर पारम्परिक सोहर का अभाव है - Sajeev

‘सिया रानी के जाये दुई ललनवा, विपिन कुटिया में...’ सोहर से होता है नवागन्तुक का स्वागत - Sajeev

‘जिनके दुश्मन सुख मा सोवें उनके जीवन को धिक्कार...’ वीर रस की लोक-काव्य-धारा : आल्हा - Sajeev

‘जा दिन जनम लियो आल्हा ने, धरती धँसी अढ़ाई हाथ.....’ बुन्देलखण्ड की लोकप्रिय लोक-गायकी शैली - Sajeev

सुर संगम में आज - जारी है लोक संगीत शैली कजरी पे चर्चा - Sajeev

"नीक सैयाँ बिन भवनवा नाहीं लागे सखिया..." - रिमझिम फुहारों के बीच श्रृंगार रस में पगी कजरी - Sajeev

उर्जा से भरी तान और ठेके "टप्पे" के - Sajeev

परदेस में जब घर-परिवार और सजनी की याद आई तब उपजा लोक संगीत "बिरहा" - Sajeev

सुर संगम में आज - गुरूदेव रबिंद्रनाथ ठाकुर और रबिंद्रसंगीत - Sajeev

सुर संगम में आज - नवरात्रों की जगमग और चैती - Sajeev

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