Sunday, September 4, 2011

वे (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) असाधारण गीतकार तथा संगीतकार थे - माधवी बंद्योपाध्याय



सुर संगम - 33 -रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष-२०११ पर श्रद्धांजलि (पहला भाग)

बांग्ला और हिन्दी साहित्य की विदुषी श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय से कृष्णमोहन मिश्र की रवीन्द्र साहित्य और उसके हिन्दी अनुवाद विषयक चर्चा
त कर देना शीश को प्रभु, चरण कमल रज के तल में।
मेरे अहं को सतत डुबोना, मेरे वचन अश्रु-जल में।


‘सुर संगम’ का आज का अंक हमने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता के हिन्दी अनुवाद से किया है।‘गीतांजलि’ के इस पद का हिन्दी काव्यानुवाद विदुषी माधवी बंद्योपाध्याय ने किया है। १२ सितम्बर, १९३७ को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक प्रवासी बंगाली परिवार में माधवी जी का जन्म हुआ था। पारिवारिक संस्कार और स्वाध्याय से उन्होने बांग्ला भाषा और साहित्य का गहन अध्ययन किया। अँग्रेजी विषय में उन्होने स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की। माधवी जी को बाल्यावस्था से कविता, कहानी, निबन्ध आदि लिखने में पर्याप्त रुचि थी। विवाह के उपरान्त पति श्री दिलीप कुमार बनर्जी के सहयोग और प्रोत्साहन से बांग्ला और हिन्दी की मौलिक तथा अनूदित कृतियाँ एक के बाद एक प्रकाशित होती रहीं। अब तक माधवी जी की लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हमारे आग्रह पर माधवी दीदी ने‘सुर संगम’के लिए रवीन्द्र-संगीत, साहित्य और उनके हिन्दी अनुवाद पर चर्चा करने की सहर्ष सहमति दी। हम उनके प्रति आभार प्रकट करते हुए इस बातचीत का सिलसिला आरम्भ करते हैं।

कृष्णमोहन- आदरणीया माधवी दीदी, नमस्कार! और‘सुर संगम’के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। यद्यपि यह स्तम्भ शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित है किन्तु इस अंक में हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर के १५० वें जयन्ती वर्ष के उपलक्ष्य में रवीन्द्र संगीत के साथ-साथ उनके समग्र साहित्य पर आपसे चर्चा करेंगे।

माधवी दीदी- नमस्कार! कृष्णमोहन जी आपको और ‘सुर संगम’के सभी पाठकों का आभार प्रकट करती हूँ कि आपने मुझे विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की सार्द्धशती वर्ष में उनको श्रद्धांजलि अर्पण करने का अवसर दिया।

कृष्णमोहन- माधवी जी, आपने रवीन्द्र साहित्य का न केवल गहन अध्ययन किया है, बल्कि उनकी अनेक कृतियों का हिन्दी अनुवाद भी किया है। सर्वप्रथम हमें यह बताएँ कि विश्वकवि और उनका साहित्य आपकी दृष्टि में किस प्रकार उल्लेखनीय है?

माधवी दीदी- विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर आज हमारे बीच सशरीर उपस्थित नहीं हैं, किन्तु उनकी पवित्र आत्मा सदा हमारे बीच विद्यमान है। वह हमारी अन्तरात्मा के साथ इस प्रकार घुलमिल गए हैं कि अब उन्हें स्वयं से अलग करना सम्भव नहीं है। वायु-प्रकाश सदैव हमारे साथ लिप्त रहते हैं। उनके बिना हम एक पल नहीं जी सकते। हम उन्हें हर समय अनुभव नहीं करते है फिर भी ये दोनों तत्व अनजाने में ही हमारे साथ बने रहते हैं। कविगुरु भी इसी प्रकार अनजाने में सदा हमारे मन में विद्यमान रहते हैं। यद्यपि हम उन्हें हर समय स्मरण नहीं करते हैं पर, वह हमारे मन में इस प्रकार बसे हुए है कि हम उन्हें कभी भूलते भी नहीं हैं। रवीन्द्रनाथ को हम एक शब्द में महामानव कह सकते हैं। उनके गुणों की परिधि की विशालता उनके ६ विराट कर्मकाण्ड तथा उनकी विविधता के बारे में हम निर्वाक होकर केवल सोचते ही रहते है।

एक तरफ है उनकी साहित्यिक कृतियों के अन्तर्गत- कथा साहित्य में उपन्यास, लघुकथाएँ, प्रबन्ध आदि अत्यन्त रोचक है। नाट्य साहित्य में उनके नाटक, नृत्य नाटिकाएँ वास्तव में मनोगुग्धकारी है। कविताओं की जितनी प्रशंसा करें, कम हैं। ‘गीतांजलि’ में उन्होंने नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया था, जो हर भारतवासी के लिये गर्व की बात है। रवीन्द्रनाथ का प्रबन्ध अपनी एक अलग गभ्भीरता रखता है। यदि उनके संगीत के बारे में कहा जाय तो वह रस और भाव से भरा हुआ है। वे असाधारण गीतकार तथा संगीतकार थे। स्वयं गीत लिखते थे और स्वयं ही उसकी स्वरलिपि बनाते थे। रवीन्द्र संगीत का एक अलग ही वैशिष्ट्य होता है। गाने से पूरे परिवेश में वह सुर छा जाता है। गीत सुनकर ही पता चल जाता है कि वह रवीन्द्र संगीत है।


कृष्णमोहन- इससे पहले कि हम आपसे रवीन्द्र संगीत की विशेषताओं के बारे में कुछ और प्रश्न करें, हम अपने पाठकों/श्रोताओं को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ही आवाज़ में कुछ काव्य-पंक्तियाँ सुनवाना चाहते हैं।

माधवी दीदी- अवश्य सुनवाइए कृष्णमोहन जी, स्वयं कविगुरु की आवाज़ में उन्हीं की कविता को सुनना मेरे लिए भी दुर्लभ क्षण होगा।

कविता का शीर्षक ‘प्रोश्नों’ : स्वर – रवीन्द्रनाथ ठाकुर


माधवी दीदी- इस आवाज़ को सुनवा कर आपने मेरे कानों को तृप्त कर दिया। अब मैं आपके प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करती हूँ। रवीन्द्र संगीत में ऐसी विशेषताएँ होती हैं कि इसे भारतीय संगीत के क्षेत्र में एक अलग विधा के रूप में मान्यता भी प्राप्त हो चुकी है। रवीन्द्र संगीत, स्वर तथा भाव प्रधान होता है और सादगी में सुन्दरता इसकी विशेषता है। रवीन्द्रनाथ अपने संगीत को तान-तरानों से नहीं सजाते थे। वाद्य संगति में भी सादगी होती है। मात्र स्वर और ताल के लिए एक-एक वाद्य संगति के लिए पर्याप्त होता है। खुले हुए कण्ठ में रवीन्द्र संगीत गाना चाहिए। काव्य के भावों के अनुकूल रागों का चयन और स्वर के साथ-साथ अपनी आत्मा को संतुष्टि देना ही इस संगीत का वैशिष्ट्य है। गाते समय केवल कण्ठ का ही नहीं बल्कि आत्मा की आवाज भी सुनाई देती है। रवीन्द्र संगीत कई पर्वों में विभाजित है। प्रकृति पर्व, प्रेम पर्व, पूजा पर्व, देशात्मबोधक संगीत, भानु सिंह की पदावलि इत्यादि उनके संगीत की विविधता है। एक और विशेषता यह है कि उनका प्रेमपर्व और पूजापर्व मानों एक ही साथ घुल-मिल गया है। यदि वे गीत में प्रेमी को सम्बोधित करते है तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह ईश्वर के उद्देश्य से बोल रहे है। ईश्वर ही उनका प्रेमी है।

इसके साथ ही कविगुरु प्रकृति-प्रेमी थे। प्रत्येक ऋतु के अनुकूल उन्होंने गीत रचना की है। वर्षा ऋतु पर उनके सबसे अधिक गीत हैं। उनका मानना था कि वर्षा ऋतु का प्रभाव सीधे मनुष्य के मन पर पड़ता है। बरसात की ध्वनि में जो विविधता होती है वह व्यक्ति की मानसिकता पर अलग-अलग प्रभाव का विस्तार करती है। कभी प्रेम तो कभी विरह जगाता है, कभी मन उदास होकर दूर आसमान में उड़ने लगता है, कभी-कभी वर्षा की ध्वनि मनुष्य को बावरा सा बना देता है, उसे घर में, या फिर किसी काम में मन नहीं लगता है। उन्होंने वर्षा ऋतु पर बहुत सारे गीत लिखे और भाष्य के साथ ‘वर्षामंगल’ नामक धारा-भाष्य लिखा है। ‘ऋतुरंग’ उनका दूसरा धारा-भाष्य है।

कृष्णमोहन- माधवी दी’ आपने अभी ‘वर्षामंगल’ की चर्चा की है। यहाँ थोड़ा विराम लेकर हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कालजयी रचना ‘वर्षामंगल’ का एक ऋतु आधारित गीत अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाते हैं।

रवीन्द्र संगीत : "एसो श्यामलो सुन्दरो..." (वर्षामंगल) : स्वर – आशा भोसले


दोस्तों, इस गीत के साथ आज के अंक को यहीं विराम देता हूँ। ‘सुर संगम’ के अगले अंक में भी हम रवीन्द्र साहित्य की विदुषी माधवी वंद्योपाध्याय से की गई यह चर्चा जारी रखेंगे। आप सभी संगीत प्रेमियों की हमें अगले रविवार को प्रतीक्षा रहेगी।

संलग्न चित्र परिचय :- भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान/प्रदर्शन करती हुई श्रीमती माधवी बंद्योपाध्याय.

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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2 श्रोताओं का कहना है :

अमित तिवारी का कहना है कि -

कृष्णमोहन जी मैं पिछले तीन हफ़्तों से इस अंक का इंतज़ार कर रहा था. बहुत ही बेहतरीन अंक है ये.रवींद्र संगीत मेरी हमेशा से पसंद रहा है. बहुत बहुत साधुवाद आपको. आब तो अगले अंक का इंतज़ार है.

सजीव सारथी का कहना है कि -

बहुत ही नायब साक्षात्कार

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