Sunday, March 8, 2009

मैं हूँ झुम झुम झुम झुम झुमरूं, फक्कड़ घूमूं बन के घुमरूं ...



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 17

किशोर कुमार ने जब हिन्दी फिल्म संगीत संसार में क़दम रखा तो शायद पहली बार फिल्म जगत को एक खिलंदड, मस्ती भरा गायक मिला था. किशोर के इस खिलंदड रूप को देखकर कई गण्य मान्य लोगों ने उन्हे गायक मानने से इनकार कर दिया. लेकिन किशोर-दा को अपने विरोधियों के इस रुख से कोई फरक नहीं पडा और वो अपनी ही धुन में गाते चले गये. किशोर-दा जैसी 'रेंज' बहुत कम गायकों को नसीब होती है. और कम ही लोगों को इतने तरह के गीत गाने को मिलते हैं. सच-मुच किशोरदा के हास्य गीत तो जैसे उस सुरमे की तरह है जो किसी के भी बेजान आँखों में चमक पैदा कर सकती है. और आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में ऐसी ही चमक पैदा करने के लिए हम किशोर-दा के गाए गीतों के ख़ज़ाने से चुनकर लाए हैं फिल्म "झुमरू" का शीर्षक गीत.

1961 में बनी फिल्म "झुमरू" किशोर कुमार के बहुमुखी प्रतिभा की एक मिसाल है. उन्होने न केवल इस फिल्म में अभिनय किया और गाने गाए, बल्कि वो इस फिल्म के संगीतकार भी थे. शंकर मुखेर्जी निर्देशित इस फिल्म में किशोर कुमार और मधुबाला की जोडी पर्दे पर दिखाई दी और इस फिल्म के गाने लिखे मजरूह सुल्तानपुरी ने. झुमरू फिल्म के इस शीर्षक गीत में किशोर-दा ने अपनी पूरी मस्ती और खिलंदडपन का प्रमाण दिया है. 'यूड़ेल्लिंग' जो उनके गायिकी की पहचान थी, इस गाने में भरपूर सुनने को मिलती है. इस गीत का 'ऑर्केस्ट्रेशन' भी सुंदर है जिसके लिए श्रेय जाता है सुहरीद कर को. अगर आप ने यह फिल्म देखी है तो आपको याद होगा की यह गीत फिल्म के पहले 'सीन' में ही आता है और इसी गीत के दौरान फिल्म की नामावली दिखाई जाती है. और साथ ही पहाड़ों के बीच में से गुज़रती हुई 'ट्रेन' और 'ट्रेन' में बैठी मधुबाला. लेकिन दूर दूर तक किशोर कुमार का कोई आता पता नज़र नहीं आता इस गीत में. तो चलिए अब जल्दी से नीचे 'क्लिक' कीजिए और मस्त हो जाइए किशोर कुमार के साथ.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. मेहन्द्र कपूर की आवाज़.
२. ओ पी नय्यर और एस एच बिहारी की टीम.
३. मुखड़े में शब्द है - "एहसान"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
दिलीप जी ने सही जवाब के साथ वापसी की है. संगीता जी और मनु जी भी नहीं चूके, पर आचार्य सलिल जी गडबडा गए...फिर भी कोशिश की इसके लिए बधाई. पारुल और शोभा जी का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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2 श्रोताओं का कहना है :

ujjawal kumar का कहना है कि -

आज का सवाल का उत्तर है .
गाना है .
मेरी जन तुमपे सदके
एहसान इतना कर दो ।
फ़िल्म 'सावन की घटा '।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

गिरते हैं शाह-सवार ही मैदाने जंग में.
वो तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले.

उत्तर गलत हुआ तो क्या? चलचित्रों से कम ही जुडाव रहा है.मनु जी का साथ देने कभी-कभी तीर-तुक्का चला देते हैं. किशोर जी अपनी मिसाल आप थे. झुमर्रू सुन कर झूम रहा हूँ.

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