Tuesday, July 14, 2009

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी....और फिर याद आई संगीतकार मदन मोहन की



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 141

दन मोहन के संगीत की सुरीली धाराओं के साथ बहते बहते आज हम आ पहुँचे हैं 'मदन मोहन विशेष' की अंतिम कड़ी पर। आज है १४ जुलाई, आज ही के दिन सन् १९७५ में मदन साहब इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ गये थे। विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के शब्दों में - "मदन मोहन के धुनों की मोहिनी में कभी प्रेम का समर्पण है तो कभी मादकता से भरी हैं, कभी विरह की वेदना है और कभी स्वर लहरी से भर देती हैं दिल को, जिसका मध्यम मध्यम नशा है। मदन मोहन के शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों में साज़ों की अनर्थक ऐसी भीड़ भी नहीं है जिससे गाने की आत्मा ही खो जाये। उनके धुनों की स्वरधारा पर्वत से उतरती है और सुर सरिता में विलीन हो जाती है। धाराओं में धारा समाने लगते हैं, और ऐसी ही एक धारा में नहाकर आत्मा तृप्त हो जाती हैं। व्यक्तिगत अनुभव के स्तर पर हर श्रोता को कोई संगीतकार, गीतकार या गायक दूसरों से ज़्यादा पसंद आते हैं जिनकी कोई मौलिकता उन्हे प्रभावित कर जाती हैं। मदन मोहन के संगीत में भी मौलिकता है। फ़िल्म संगीत एक कला होने के साथ साथ एक व्यावसाय भी है जिसमें कई बार कलाकारों को समझौता करना पड़ता है। मदन मोहन जैसे संगीतकार को भी कहीं कहीं समझौता करना पड़ा है, लेकिन कल्पनाशील संगीतकार वो है जो कोई ना कोई रास्ता निकाल लेता है और हर बार अपना छाप छोड़ जाता है। मदन मोहन उनमें से एक हैं।" आज इस विशेष प्रस्तुति के अंतिम अध्याय में हमें याद आ रही है वो भूली दास्ताँ जिसे दशकों पहले लता मंगेशकर ने बयाँ किया था राजेन्द्र कृष्ण के शब्दों में, १९६१ की फ़िल्म 'संजोग' के प्रस्तुत गीत में। दर्द का ऐसा असरदार फ़ल्सफ़ा हर रोज़ बयाँ नहीं होता। और यही वजह है कि यह गीत मदन मोहन के 'मास्टर-पीस' गीतों में गिना जाता है।

प्रमोद चक्रवर्ती निर्देशित 'संजोग' के मुख्य कलाकार थे प्रदीप कुमार और अनीता गुहा। दोस्तों, आप को याद होगा कि 'मदन मोहन विशेष' का पहला गीत "बैरन नींद न आये" (चाचा ज़िंदाबाद) भी अभिनेत्री अनीता गुहा पर ही फ़िल्माया गया था। सही में यह संजोग की ही बात है कि इस शृंखला का अंतिम गीत फिर एक बार अनीता गुहा पर फ़िल्माया हुआ है। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद सुरीले भी हैं और लोकप्रिय भी, लेकिन प्रस्तुत गीत में कुछ ऐसी बात है कि जो इसे दूसरे गीतों के मुकाबिल दो क़दम आगे को रखती है। यह मदन मोहन और लता जी के हौंटिंग मेलडीज़ का एक बेमिसाल नग़मा है जो दिल को उदास भी कर देता है और साथ ही इसका सुरीलापन मन को एक अजीब शांति भी प्रदान करता है। और्केस्ट्रेशन की तो क्या बात है, शुरुवाती संगीत अद्‍भुत है, पहले इंटर्ल्युड में सैक्सोफ़ोन पुर-असर है, कुल मिलाकर पूरा का पूरा गीत एक मास्टरपीस है। "बड़े रंगीन ज़माने थे, तराने ही तराने थे, मगर अब पूछता है दिल वो दिन थे या फ़साने थे, फ़कत एक याद है बाक़ी, बस एक फ़रियाद है बाक़ी, वो ख़ुशियाँ लुट गयीं लेकिन दिल-ए-बरबाद है बाक़ी"। सच दोस्तों, कहाँ गये वो सुरीले दिन, फ़िल्म संगीत का वह सुनहरा युग! आज मदन मोहन हमारे बीच नहीं हैं, जुलाई का यह भीगा महीना बड़ी शिद्दत से उनकी याद हमें दिलाता है, पर आँखें नम करने का हक़ हमें नहीं है क्यूंकि उन्ही का एक गीत हम से यह कहता है कि "मेरे लिए न अश्क़ बहा मैं नहीं तो क्या, है तेरे साथ मेरी वफ़ा मैं नहीं तो क्या"। हिंद युग्म की तरफ़ से मदन मोहन की संगीत साधना को प्रणाम!



पिछले वर्ष हमने मदन मोहन साहब को याद किया था संजय पटेल जी के इस अनूठे आलेख के माध्यम से. आज फिर एक बार जरूर पढें और सुनें ये भी.
नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.....इस गीत से जुडा है एक मार्मिक संस्मरण


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. माउथ ओरगन की धुन इस गीत की खासियत है.
2. राहुल देव बर्मन ने बजायी थी वह धुन इस गीत में.
3. मस्ती से भरे इस गीत के एक अंतरे में "काज़ी" का जिक्र है.

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, मात्र ४ अंक पीछे हैं अब आप अपनी मंजिल से, बहुत बहुत बधाई....पता नहीं हमारी स्वप्न मंजूषा जी कहाँ गायब हैं, पराग जी भी यही सवाल कर रहे हैं. जी पराग जी आपने सही कहा ये गीत रेडियो पर बहुत सुना गया है पर हमें तो यही लगता है कि यह गीत उस श्रेणी का है जिसे जितनी भी बार सुना जाए मन नहीं भरता.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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9 श्रोताओं का कहना है :

शरद तैलंग का कहना है कि -

hai apna dil to aawaara na jane kis pe aayega

शरद तैलंग का कहना है कि -

hua jo kabhi raazi to mila nahi kaazi jahan pe lagi baazi vahin pe haara. Singer Hemant Kumar

शरद तैलंग का कहना है कि -

अजी सब लोग कहाँ चले गए ? क्या मैं अकेला ही रह गया हूँ

Shamikh Faraz का कहना है कि -

शरद जी निर्विरोध जीत के लिए बधाई.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

माफी चाहती हूँ बूझने के मामले मैं मैं जरा नालायक ही हूँ मगर आप गीत इतने बडिया लाते हैण कि जिन्हे बार बार सुनने का मन करता है धब्यवाद्

rachana का कहना है कि -

आप की पहेली पढ़ के जान गई थी पर फिर देखा तो उत्तर मिलगया था
है अपना दिल तो आवारा
आप को बधाई हो
सादर
रचना

manu का कहना है कि -

खुले थे दिल के दरवाजे...
मुहब्बत भी चली आयी....

लाजवाब गीत...शानदार फिल्मांकन...

manu का कहना है कि -

अदा जी...
आप जाने कहाँ चली गयी...
हम भी तो आते हैं ...भले ही जवाब दिया जा चुका हो...

Disha का कहना है कि -

कितनी ही जल्दी क्यो ना आओ जवाब पहले ही मिल जाता है. शरद जी को बधाई.
"है अपना दिल तो आवारा"बहुत ही मधुर गीत है

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