Tuesday, November 3, 2009

मौसम है आशिकाना, ये दिल कहीं से उनको ऐसे में ढूंढ लाना...आईये सज गयी है महफिल ओल्ड इस गोल्ड की



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 251

दोस्तों, शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' जी के बाद एक लम्बे इंतेज़ार के बाद हमें मिली हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड पहेली प्रतियोगिता' के तीसरे विजेयता के रूप में पूर्वी जी। और आज से अगले पाँच दिनों तक हम सुनने जा रहे हैं पूर्वी जी के पसंद के पाँच सदाबहार नग़में। पूर्वी जी ने हमें कुल दस गानें चुन कर भेजे थे, जिनमें से हमने पाँच ऐसे गीतों को चुना है जिनकी फ़िल्मों का कोई भी गीत अब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर नहीं बजा है। हमें पूरी उम्मीद है कि पूर्वी जी के पसंद ये गानें आप सभी बेहद एन्जॉय करेंगे, क्योंकि उनका भेजा हुआ हर एक गीत है गुज़रे ज़माने का सदाबहार नग़मा, जिन पर वक़्त का कोई भी असर नहीं चल पाया है। शुरुआत कर रहे हैं लता मंगेशकर के गाए फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के गीत "मौसम है आशिक़ाना" से। वैसे तो 'पाक़ीज़ा' फ़िल्म का कोई भी गीत ताज़े हवा के झोंके की तरह है जो इतने सालों के बाद भी वही ताज़गी, वही ख़ुशबू लिए हुए है। इन मीठे धुनों को साज़ों से निकालकर फ़ज़ाओं में बिखेरने वाले जादूगर का नाम है ग़ुलाम मोहम्मद। जी हाँ, यह बहुत ही अफ़सोस की बात है कि ग़ुलाम साहब अपने करीयर की इस सब से महत्वपूर्ण फ़िल्म की ज़बरदस्त कामयाबी को देखे बग़ैर ही इस दुनिया से चले गए। हिंदी फ़िल्मी गीतों में मटके का प्रयोग शुरु करने वाले दो संगीतकारों में दो नाम मशहूर हैं। इनमें से एक तो थे श्याम सुंदर और दूसरे ग़ुलाम मोहम्मद। ग़ुलाम साहब की म्युज़िकल हिट फ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के संगीत को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार ग़ुलाम मोहम्मद की प्रतिभा का ही सम्मान था। इस सम्मन ने यह साबित किया था कि भले ही वो कमचर्चित संगीतकार हों, लेकिन प्रतिभा और उत्कृष्ट संगीत देने की दृष्टि से वो किसी से भी कम नहीं। फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' के बनने में इतने ज़्यादा समय लग गए (करीब १४ साल) कि ग़ुलाम साहब के देहान्त के बाद नौशाद साहब ने फ़िल्म का संगीत पूरा किया और फ़िल्म के 'बैकग्राउंड म्युज़िक' भी तैयार किए। यह एक तरह से नौशाद साहब की श्रद्धांजली थी अपने उस साथी के लिए जिन्होने उनकी तमाम फ़िल्मों में उनके सहायक और वादक रहे। आपको यह भी बता दें कि ग़ुलाम मोहम्मद की तरह फ़िल्म के सिनेमाटोग्राफर जोसेफ़ विर्स्चिंग् का भी फ़िल्म के पूरे होते होते निधन हो गया था। इस फ़िल्म से जुड़ी कुछ और दिलचस्प और दर्द भरी बातें हम आपको फिर कभी बताएँगे, अभी तो इस फ़िल्म के और भी गानें बजने हैं इस महफ़िल में।

१९७२ की फ़िल्म 'पाक़ीज़ा' कमाल अमरोही की महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म को हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फ़िल्मों में गिना जाता है। यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसके ज़िक्र के बग़ैर कमाल अमरोही, ग़ुलाम मोहम्मद और अदाकारा मीना कुमारी की कोई भी चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। अशोक कुमार, राज कुमार और नादिरा फ़िल्म के महत्वपूर्ण किरदारों में थे। फ़िल्म की कहानी, संवाद, स्क्रीनप्ले, इत्यादि जितने सशक्त थे, उतना ही सुरीला था फ़िल्म का संगीत। इस फ़िल्म की सफलता के पीछे इसके संगीत का भी पूरा पूरा हाथ रहा। इस फ़िल्म में कई गीतकारों ने गीत लिखे, जैसे कि कैफ़ी आज़्मी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ भोपाली, और ख़ुद कमाल अमरोही साहब भी। आज का प्रस्तुत गीत कमाल साहब का लिखा हुआ है। कमाल साहब आम बोलचाल में भी बड़े ही अदबी भाषा का प्रयोग किया करते थे। जिस तरह का उर्दू अमरोहा में उस ज़माने में बोला जाता था, वैसी बोली बोलते थे, जिसकी वजह से कभी कभी सामने वाला हक्का बक्का रह जाता था। कुछ ऐसी ही हालात से गुज़रे थे हमारे निदा फ़ाज़्ली साहब जब वो फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के गानें लिखने के लिए उनके पास गए थे। कमाल अमरोही साहब ने प्रस्तुत गीत में नायिका के दर्द का इज़हार किया है। कभी उन्होने पलकों का शामियाना बिछाया है तो कभी सावन के महीने को क़ातिलाना क़रार दिया है, और कभी जुगनुओं को ज़मीं पर उतरे हुए सितारे कहे हैं। यह गीत फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक उत्कृष्टतम गीत है, जिसकी तारीफ़ शब्दों में संभव नहीं। पूर्वी जी, हम आपकी पसंद की दाद देते हैं। भई वाह! क्या गाना चुना है आपने!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत के संगीतकार की ये पहली फिल्म थी.
२. आर के फिल्म्स की इस फिल्म में निर्देशन राज कपूर का नहीं था.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"भूख".

पिछली पहेली का परिणाम -

दिलीप जी ८ अंकों के लिए बधाई. अवध जी आपने सही कहा. शरद जी इन दोनों गीतों में अक्सर ये भूल हो जाती है :) राज जी हमें पता था की ये आपका सबसे पसंदीदा गीत है, तभी तो सुनवाया :)वैसे किसी ने भी बोनस अंकों के लिए नहीं खेला, जानकारी के लिए बता दें एस डी बर्मन के संगीत निर्देशन में बने गीत सबसे अधिक बजे हैं ओल्ड इस गोल्ड में.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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3 श्रोताओं का कहना है :

purvi का कहना है कि -

सजीव जी, सुजोय जी,
आपका बहुत बहुत बहुत शुक्रिया, यह गाना हमें बचपन से ही बहुत प्रिय है, रेडियो में जब भी कभी यह गीत बजता था, हम सारे काम छोड़ कर यह गीत सुनने में मगन हो जाते थे :) और साथ साथ गुनगुनाते जाते थे.... खैर... अब ऐसा नहीं करते :), आज ,अब तक तीन बार यह गीत सुन चुकी हूँ... एक बार और सुन लिया जाए....क्या ख्याल है आपका?

सुजोय जी,
आपने इस फिल्म के गीतों के बारे में जो भी कहा है, बहुत सही कहा है, इन गीतों की धुनें इतनी मीठी हैं कि लगता है बस सुनते ही रहें . गुलाम मोहम्मद के बारे में जानकारी देने का भी शुक्रिया .

आज ओल्ड इस गोल्ड के खिलाडी कहाँ हैं, अब तक मैदान में कोई नहीं ...!!!

सजीव सारथी का कहना है कि -

अरे भाई लगता है सब चकरा गए.....चलिए एक सूत्र और...
इस चुलबुले गीत के मुखड़े में शब्द है -"दाल"

AVADH का कहना है कि -

भूख लगी तो चिड़िया रानी मूंग की दाल पकायेगी.
कव्वा रोटी लायेगा , ला कर उसे खिलायेगा
मोर भी आया चूहा भी आया .....
छुन छुन करती आई चिड़िया.
अब दिल्ली दूर नहीं
अवध लाल

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