Friday, November 20, 2009

है न बोलो बोलो....पापा मम्मी की मीठी सुलह भी कराते हैं बच्चे गीत गाकर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 268

दोस्तों, बच्चों वाले गीतों की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज हम एक बार फिर से शम्मी कपूर और शंकर जयकिशन के कॊम्बिनेशन का एक गीत लेकर उपस्थित हुए हैं। लेकिन इस बार गीतकार शैलेन्द्र नहीं बल्कि हसरत जयपुरी साहब हैं। यह है १९७१ की फ़िल्म 'अंदाज़' का एक गीत जिसे मोहम्मद रफ़ी, सुमन कल्याणपुर, सुषमा श्रेष्ठ और प्रतिभा ने गाया है। बच्चों वाले गीतों की श्रेणी में यह गीत भी लोकप्रियता की कसौटी पर खरा उतरा था अपने ज़माने में। जी. पी. सिप्पी निर्मित, रमेश सिप्पी निर्देशित, और शम्मी कपूर, राजेश खन्ना व हेमा मालिनी अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की थी कि राजु (राजेश खन्ना) और शीतल (हेमा मालिनी) एक दूसरे से प्यार करते हैं। राजु अपने पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक मंदिर में शीतल से शादी कर लेता है, जिसे राजु का पिता स्वीकार नहीं करता। जल्द ही राजु एक रोड-ऐक्सिडेंट में मर जाता है और उधर शीतल माँ बनने वाली है। वो एक लड़के दीपु (मास्टर अलंकार) को जन्म देती है। शीतल को एक स्कूल टीचर की नौकरी मिल जाती है। उसका एक स्टुडेंट एक छोटी सी प्यारी सी बिन माँ की बच्ची मुन्नी है जिसके पिता हैं रवि (शम्मी कपूर)। इधर शीतल और राजु तथा उधर रवि और मुन्नी। एक ही तरह के हालातों की वजह से दोनों परिवारों में संबंध बढ़ने लगते हैं। बच्चों को लेकर रवि और शीतल अक्सर बाहर जाते हैं, पिक्निक पर जाते हैं। इन्ही सिचुयशन्स के लिए "रे मामा रे मामा रे" और "है ना बोलो बोलो" जैसे गानें लिखे गए थे। आज सुनिए "है ना बोलो बोलो"। इस फ़िल्म का एक ख़ासा लोकप्रिय गीत है किशोर दा का गाया हुआ "ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना", जिसके लिए हसरत साहब को उस साल के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। 'अंदाज़' शंकर जयकिशन के करीयर के आख़िरी हिट फ़िल्मों में से एक है। जिस समय यह फ़िल्म बनी थी, उस समय ना तो शैलेन्द्र जीवित थे और ना ही जयकिशन। लेकिन अपने दोस्त को और अपनी अमर जोड़ी को सम्मान देते हुए शंकर ने अपने जोड़ीदार जयकिशन के नाम को अपने नाम से अलग नहीं होने दिया।

दोस्तों, अभी दो दिन पहले 'ब्रह्मचारी' का गीत सुनवाते हुए हमने आपको शम्मी कपूर द्वारा शंकर जयकिशन के बारे में कहे गए बातें बताए थे विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम से उठाकर। आइए आज एक बार फिर से उसी इंटरव्य की तरफ़ रुख़ करते हैं और कुछ और बातें, ख़ास कर जयकिशन के बारे में, जो शम्मी साहब ने कहे थे, आपको बताते हैं। "... और हमारी आदत थी कि जिस दिन शूटिंग् ना हो, उन दिनों इतनी पिक्चरें होती नहीं थीं, तो काफ़ी वक़्त भी अपने पास होता था, क्रीकेट मैच भी देखते थे, क्रीकेट के सही या फ़ूटबॊल के, और शाम को चर्च गेट में 'बॊम्बेलीज़' हुआ करता था, फिर 'गेलॊर्ड' आ गया, तो जयकिशन की एक जगह हो गई, एक टेबल था जहाँ पर वो ११ बजे जाकर हमेशा बैठता था, वो टेबल उसके लिए रिज़र्व्ड रहती थी। यहाँ तक कि उसके गुज़र जाने के बाद भी एक काफ़ी अरसे तक उन लोगों ने वो टेबल ख़ाली रखी। किसी को बैठने नहीं देते थे वहाँ पर कि वो जयकिशन की टेबल थी। तो हम लोग मिलते थे, शाम को मिल कर के, जय, एक सिचुयशन है, तू किस किस्म का गाना मुझे दे सकता है? 'Next day he would come up and say' कि ये कैसा रहेगा? और वो ले आया "याहू, चाहे कोई मुझे जंगली कहे"। 'And the songs were created like this, by interracting with each other, by talking to each other'. ऐसा नहीं कि किसी ने गाना लिख दिया, फिर उसको फ़िल्माया, और डांस मास्टर ने डांस करवा दिया। नहीं, मेरी 'involvement' बड़ी 'total' हुआ करती थी।" दोस्तों, उन सुनहरे दिनों को शम्मी कपूर जी ने बड़े शिद्दत के साथ याद किया था उस कार्यक्रम में और तमाम संगीतकारों के बारे में बहुत सी बातें बताई थी। इन दोनों कड़ियों में हमने शंकर जयकिशन से जुड़ी बातें आपको बताई, और आइए अब सुनते हैं आज का गीत जिसमें बच्चे अपने मम्मी पापा को छेड़ते हुए गाते हैं कि "है ना बोलो बोलो, पापा को मम्मी से, मम्मी को पापा से, प्यार है प्यार है"!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. बच्चों की सामूहिक आवाज़ में ये एक प्रार्थना है.
२. जिन दो गायिकाओं की प्रमुख आवाजें थी इस गीत में उनमें से एक आगे चलकर गायिका बनी और एक मशहूर नायिका..
३. मुखड़े में शब्द है -"खुदा".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी भूल माफ़ लिखने में गलती हुई, श्याम जी को आवाज़ पर देख कर बहुत ख़ुशी हुई....जवाब भी कोई देता तो और मज़ा आता....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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4 श्रोताओं का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

teri hai zamin tera aasman

ROHIT RAJPUT

NB: kal bhi maine sahi jawab diya tha par mera naam aaya hi nahi

आमीन का कहना है कि -

you r rite

शरद तैलंग का कहना है कि -

रोहित जी का जवाब सही ही है । फ़िल्म : द बर्निंग ट्रैन
गायिकाएं : सुषमा श्रेष्ठ एवं पद्मिनी कोल्हापुरे

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

हम फ़िर चूके

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