Saturday, December 26, 2009

सुनो कहानी: पंडित सुदर्शन की कालजयी रचना हार की जीत



'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने हरिशंकर परसाई की कहानी "ग्रीटिंग कार्ड और राशन कार्ड" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं पंडित सुदर्शन की कालजयी रचना "हार की जीत", जिसको स्वर दिया है शरद तैलंग ने। हार की जीत का टेक्स्ट यहाँ पढ़ा जा सकता है

कहानी का कुल प्रसारण समय 9 मिनट 3 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।


पंडित सुदर्शन (मूल नाम: पं. बद्रीनाथ भट्ट)
(1895-1967)

सुनो कहानी के २००९ के अंतिम अंक में शरद जी के स्वर में हार की जीत प्रस्तुत करते हुए मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैंने जम्मू में पांचवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में पहली बार "हार का जीत" पढी थी। तब से ही इसके लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता थी। दुःख की बात है कि हार की जीत जैसी कालजयी रचना के लेखक के बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को है। गुलज़ार और अमृता प्रीतम पर आपको अंतरजाल पर बहुत कुछ मिल जाएगा मगर यदि आप पंडित सुदर्शन की जन्मतिथि, जन्मस्थान (सिआलकोट) या कर्मभूमि के बारे में ढूँढने निकलें तो निराशा ही होगी। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह पंडित सुदर्शन हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे हैं। उनकी गणना प्रेमचंद संस्थान के लेखकों में विश्वम्भरनाथ कौशिक, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि के साथ की जाती है। लाहोर की उर्दू पत्रिका हज़ार दास्ताँ में उनकी अनेकों कहानियां छपीं। उनकी पुस्तकें मुम्बई के हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय द्वारा भी प्रकाशित हुईं। उन्हें गद्य और पद्य दोनों ही में महारत थी। "हार की जीत" पंडित जी की पहली कहानी है और १९२० में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी। मुख्य धारा के साहित्य-सृजन के अतिरिक्त उन्होंने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे हैं. सोहराब मोदी की सिकंदर (१९४१) सहित अनेक फिल्मों की सफलता का श्रेय उनके पटकथा लेखन को जाता है। सन १९३५ में उन्होंने "कुंवारी या विधवा" फिल्म का निर्देशन भी किया। वे १९५० में बने फिल्म लेखक संघ के प्रथम उपाध्यक्ष थे। वे १९४५ में महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित अखिल भारतीय हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा की साहित्य परिषद् के सम्मानित सदस्यों में थे। उनकी रचनाओं में तीर्थ-यात्रा, पत्थरों का सौदागर, पृथ्वी-वल्लभ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। फिल्म धूप-छाँव (१९३५) के प्रसिद्ध गीत तेरी गठरी में लागा चोर, बाबा मन की आँखें खोल आदि उन्ही के लिखे हुए हैं।
(निवेदक: अनुराग शर्मा)

क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।
(पंडित सुदर्शन की कालजयी रचना "हार की जीत" से एक अंश)


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Fifty Second Story, Har Ki Jeet: Pt. Sudarshan/Hindi Audio Book/2009/46. Voice: Sharad Tailang

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7 श्रोताओं का कहना है :

निर्मला कपिला का कहना है कि -

हार की जीत बहुत अच्छी लगी। मैने पहले नहीं पढी थी ये कहानी। आपका बहुत बहुत धन्यवाद। शरद जी का धन्यवाद

परमजीत बाली का कहना है कि -

कहानी के लिए आभार।

सजीव सारथी का कहना है कि -

बहुत बढ़िया कहानी चयन और वाचन, पर अक्सर शरद जी कि रिकॉर्डिंग बी बहुत साफ़ होती है, आज कुछ व्यवधान लगा

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी का कहना है कि -

इस कहानी को कक्षा सात के पाठ्यक्रम में पढ़ा था। आपके स्वर में सुनकर आनन्द आ गया। धन्यवाद।

सजीव सारथी का कहना है कि -

कल इस पर ध्यान नहीं गया, पंडित सुदर्शन के बारे में आपने बहुत सटीक जानकारी दी है अनुराग जी, वर्ष २००९ में आपसे और भी बहुत सी उम्मीदें रहेंगीं, आशा है आप अपनी इस साहित्य सेवा को युहीं जारी रखेंगें, आवाज़ की पूरी टीम की तरफ से आपके योगदान के लिए हार्दिक धन्येवाद

संतोष त्रिवेदी का कहना है कि -

वाह।

Mehul Dutt का कहना है कि -

I am studying at 9 th and mere standard me yeh aati hai aur hame is se yah sikh milti hai ki bahut gunda gardi na kare....

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