Sunday, January 17, 2010

ये कहाँ आ गए हम...यूँ हीं जावेद साहब के लिखे गीतों को सुनते सुनते



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 317/2010/17

स्वरांजली' की आज की कड़ी में हम जन्मदिन की मुबारक़बाद दे रहे हैं गीतकार, शायर और पटकथा व संवाद लेखक जावेद अख्तर साहब को। लेकिन अजीब बात यह कि जिन दिनों में जावेद साहब पटकथा और संवाद लिखा करते थे, उन दिनों मे वो गानें नहीं लिखते थे, और जब उन्होने बतौर गीतकर अपना सिक्का जमाया, तो पटकथा लिखना लगभग बंद सा कर दिया। जब यही सवाल उनसे पूछा गया तो उनका जवाब था - "यह सही है कि जब मैं फ़िल्में लिखता था, उस वक़्त मैं गानें नहीं लिखता था। लेकिन हाल ही में मैंने अपने बेटे फ़रहान के लिए फ़िल्म 'लक्ष्य' का स्क्रिप्ट लिखा है, एक और भी लिखा है, सोच रहा हूँ कि किसे दूँ (हँसते हुए)! कुछ फ़िल्में हैं जिनमें मैंने स्क्रिप्ट और गानें, दोनों लिखे हैं, जैसे कि 'सागर', जैसे कि 'मिस्टर इंडिया', जैसे कि 'अर्जुन'। मुझे स्क्रिप्ट लिखते हुए थकान सी महसूस हो रही थी, कुछ ख़ास अच्छा नहीं लग रहा था। और अब गानें लिखने में ज़्यादा मज़ा आ रहा है, और दिल से लिख रहा हूँ। इसलिए सोचा कि जब तक फ़िल्मे लिखने का जज़्बा फिर से ना जागे, तब तक गीत ही लिखूँगा।" दोस्तों, एक रचनाकार के रूप में जावेद साहब का पुनर्जनम हुआ सलीम जावेद की जोड़ी बिखर जाने के बाद, जब निर्देशक रमण कुमार ने उनसे अपनी फ़िल्म 'साथ साथ' के गानें लिखवाए। लेकिन इस फ़िल्म से पहले यश चोपड़ा के अनुरोध पर जावेद साहब ने फ़िल्म 'सिलसिला' में तीन गीत लिखे जो बेहद कामयाब हुए और ये गाने आज एवरग्रीन हिट्स में शोभा पाते हैं। इनमें से एक गीत है "देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए", दूसरा गीत था "नीला आसमान सो गया" और तीसरा गाना था "ये कहाँ आ गए हम युं ही साथ साथ चलते"। आइए आज जावेद साहब को जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हुए यही तीसरा गीत सुनें, जिसे गाया है सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर और अभिनय के शहंशाह अमिताभ बच्चन ने।

विविध भारती को दिए गए एक साक्षात्कार में जावेद अख़तर साहब ने बताया था कि वो गीतकारिता में कैसे आए। "मैं गीतकार नहीं था, ज़बरदस्ती बना दिया गया। मैं तो फ़िल्में लिखा करता था। यश जी एक दिन मेरे घर अए, वो मुझसे उनकी फ़िल्म 'सिलसिला' के लिए एक गीत लिखवाना चाहते थे। मैंने साफ़ इंकार कर दिया, कहा कि मैं पोएट्री सिर्फ़ अपने लिए लिखा करता हूँ, फ़िल्म के लिए नहीं लिख सकता। लेकिन वो तो पीछे ही पड़ गए। इसलिए न चाहते हुए भी मैं एक गीत लिखने के लिए राज़ी हो गया। मैंने उनसे कहा कि मुझे इसके लिए कोई क्रेडिट नहीं चाहिए क्योंकि मैंने सोचा कि वो लोग मुझे एक ट्युन सुना देंगे और मुझसे उस पर गाना लिखने की उम्मीद करेंगे, अगर लिख ना पाया तो क्या होगा? मुझे फिर यश जी ने शिव-हरि से एक दिन मिलवा दिया। वो धुन सुनाते गए और शाम तक मैं "देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए" लिख चुका था। मैंने ५०० से ज़्यादा गानें लिखे हैं पर यह गीत मेरे लिए आज भी बहुत स्पेशल है। मैंने 'सिलसिला' में कुल ३ गीत लिखे, युं कह सकते हैं कि मुंह में ख़ून लग गया था। शबाना जी को "ये कहाँ आ गए हम" बहुत पसंद है, वो अकसर इसे गुनगुनाती हैं।" दोस्तों, यह गीत ही इतना ज़बरदस्त है कि इसकी बातें इतनी आसानी से ख़त्म नहीं हो सकती। अब हम आपको इस गीत के बनने की कहानी बताते हैं इस गीत के संगीतकार जोड़ी शिव-हरि के पंडित शिव कुमार शर्मा के शब्दों में जो उन्होने कहे थे विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम के तहत 'मेरी संगीत यात्रा' शृंखला के दौरान। "आप ने एक चीज़ नोटिस की होगी कि यह एक 'अन्युज़ुयल' गाना है। मैं आपको इसका बैकग्राउंड बताउँगा कि यह गाना कैसे बना। शुरु में यश जी ने कहा कि मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ कि हीरो अपने ख़यालों में बैठा हुआ है और कुछ पोएट्री लिख रहा है, या पोएट्री रीसाइट कर रहा है, कुछ शेर, और बीच में कुछ आलाप ले आएँगे, लता जी का ऐसा कुछ। तो इस तरह का सोच कर के शुरु किया कि थोड़ा म्युज़िक रहेगा, थोड़ी शेर-ओ-शायरी होगी, और फिर कुछ बीच में आलाप आएगा। यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि इस तरह का गाना बनेगा। बनते बनते, जैसा होता था कि उस ज़माने में अमिताभ बच्चन, अभी भी उतने ही बिज़ी हैं, उस ज़माने की क्या बात कहें, कि वो १२-१ बजे जब उनकी शूटिंग् की शिफ़्ट ख़त्म होती थी, तो वो आते थे। और फिर आकर के हमारे साथ बैठते थे क्योंकि उन्होने गानें भी गाए हैं, होली का जो गाना है, और "नीला आसमान"। तो यह गाना जब बनने लगा तो उसकी शुरुआत ऐसे ही हुई, बनते बनते कुछ उसमें धुन का ज़िक्र जब आया, तो जावेद अख़तर साहब बैठे हुए थे, तो बीच में उनकी ही सारी नज़्में हैं जो बच्चन साहब ने पढ़े हैं। तो जब एक धुन गुनगुना रहे थे हम लोगोँ ने सोचा कि इसके उपर बोल आ जाएं तो कैसा लगेगा। तो धीरे धीरे जब बोल आया तो लगा कि अस्थाई बन गई। ऐसा करते करते कि ये जो नज़्म है, जो शेर पढ़ रहे हैं, उसको हम ऐसा इस्तेमाल करते हैं कि जैसे इंटर्ल्युड म्युज़िक होता है, जैसे 'इंट्रोडक्शन म्युज़िक' होता है। ऐसे करते करते इसकी शक्ल ऐसी बनीं। और वो एक ऐसा 'अन्युज़ुयल' गाना बन गया कि पोएट्री और गाना साथ में चल रहा है, लेकिन वो एक के साथ एक जुड़ा हुआ है, और वो बात आगे बढ़ रही है। तो इस क़िस्म के, मेरे ख्याल में इस किस्म का गाना फिर किसी ने दुबारा कोशिश ही नहीं की और इसमें हमनें कोरस का भी अच्छा इस्तेमाल किया था। तो वो पूरा जो उसका माहौल बना है, वह आज इस गाने को बने हुए इतने साल हो गए हैं, लेकिन अभी भी वह फ़्रेश लगता है।" बिल्कुल सही दोस्तों, आइए अब हम भी इस फ़्रेश गीत का आनंद उठाते हैं, सुर कोकिला और अभिनय के शहंशाह की आवाज़ों के साथ, और साथ ही जावेद साहब को एक बार फिर से जनमदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

क्या होता है सपनों का टूट जाना,
वही समझे जिसने हो ये दर्द पाला,
उड़कर तो आना चाहूँ तेरे पास पर,
पैरों बेडी गले पड़ी रिवाजों की माला...

अतिरिक्त सूत्र - फिल्म जगत के सबसे पहले सिंगिंग सुपर स्टार को समर्पित है ये स्वरांजली

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी आपने खुद ही कहा कि जो गीत आपने चुना वो गोल्ड तो है पर ओल्ड नहीं, शरद जी यहाँ सही निकले, बधाई जनाब २ अंक हुए आपके और...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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बहुत सुन्दर गीत. शिव-हरी की संगीत रचना में बंधकर तो यह अविस्मरणीय हो गया है.

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