Thursday, January 21, 2010

मेरी दास्ताँ मुझे ही मेरा दिल सुना के रोये कभी ...उषा खन्ना के संगीत में उभरा लता का दर्द



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 321/2010/21

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आज से एक बार फिर से छा रहा है फ़रमाइशी रंग। शरद तैलंग, स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा', पूर्वी, और पराग सांकला के बाद 'ओल्ड इज़ गोल्ड पहेली प्रतियोगिता' की विजेयता बनीं हैं हमारी इंदु जी। इसलिए आज से अगले पाँच दिनों तक हम सुनने जा रहे हैं इंदु जी की पसंद के पाँच गानें बिल्कुल बैक टू बैक। यकीन मानिए दोस्तों, कि इंदु जी ने ऐसे ऐसे नायाब गानें चुन कर हमें भेजे हैं कि इन्हे सुनवाते हुए हम जितना आनंद महसूस कर रहे हैं उतना ही मज़ा हमें आया इन गीतों पर आलेख लिखते हुए। तो शुरुआत करते हैं लता मंगेशकर के गाए फ़िल्म 'आओ प्यार करें' के एक बड़े ही ख़ूबसूरत गाने से, जिसके बोल हैं "मेरी दास्ताँ मुझे ही मेरा दिल सुना के रोये"। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के बोल और संगीतकार उषा खन्ना की तर्ज़। उषा जी के स्वरबद्ध किए उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है आज का प्रस्तुत गीत। इस फ़िल्म के बारे में हम अभी बात करेंगे, लेकिन उससे पहले इंदु जी के चार शब्द भी जान लें कि इस गीत की उन्होने फ़रमाइश क्यों की हैं। इंदु जी लिखती हैं कि "यह फ़िल्म नहीं देखी पर जब भी खूब रोने की इच्छा होती है, इसे सुनती हूँ, ये गीत रुला देता है। जो गानों की ताकत, असर का एक उदहारण है कि हमारे गानें कितना भीतर तक उतरने की क्षमता रखते हैं। और रो लेने से मन हल्का हो जाता है यानि मन का ट्रीटमेंट गानों के द्वारा....हा हा हा हा।"

फ़िल्म 'आओ प्यार करें' सन् १९६४ में बन कर प्रदर्शित हुई थी, जिसका निर्देशन किया था आर. के. नय्यर ने। सायरा बानो, संजीव कुमार और जॊय मुखर्जी के अभिनय से सजी इस फ़िल्म को इसके संगीत की वजह से ही लोगों ने अब तक याद रखा है। आज के प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म में और जो सुरीले नग़में थे वे हैं लता जी की ही आवाज़ में "एक सुनहरी शाम थी", "तमन्नाओं को खिलने दे", लता-रफ़ी का गाया बड़ा ही शोख़ और नटखट डुएट "तुम अकेली तो कभी बाग़ में जाया ना करो", रफ़ी साहब की आवाज़ में "बहार-ए-हुस्न", "दिल के आने में", "दिलबर दिलबर हो दिलबर", "जिनके लिए मैं दीवाना बना" और "ये झुकी झुकी झुकी निगाहें तेरी", तथा महेन्द्र कपूर और उषा मंगेशकर का गाया फ़िल्म का शीर्षक गीत "आओ प्यार करें"। इन सुरीले गीतों का श्रेय बहुत हद तक उषा खन्ना जी को जाता है। दोस्तों, दिल के तमाम भावनाओं को व्यक्त करते हैं हमारे फ़िल्मी गीत। शायद ही ऐसा कोई भाव होगा जो किसी ना किसी फ़िल्मी गीत में उभरकर सामने ना आया हो। और ऐसी भावनाओं को काव्यात्मक तरीके से हमारे समक्ष प्रस्तुत करने में उन प्रतिभाशाली गीतकारों के साथ साथ उन गुणी संगीतकारों के मधुर धुनों का भी बहुत बड़ा योगदान है। संगीतकारों की धुनें ही उन भावनाओं, उन विचारों को कई गुणा ज़्यादा असरदार बना देते हैं। उषा खन्ना जी की धुनें भी इस क़दर सुंदर बन पड़ी है कि उसका जादू, उसका असर नए नए रूप लेकर हमारे सामने आते रहे हैं। आज का प्रस्तुत गीत भी उन्ही गीतों में से एक है। अच्छे संगीत की तारीफ़ करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि हमें संगीत का ज्ञान हो। हम अहसानमंद हैं हमारे फ़िल्म संगीतकारों के जिन्होने हमारे जीवन से जुड़ी धुनें देकर हमारे जीवन को आसान बनाया है, जिन्हे सुन कर हम अपने ग़म भूल जाते हैं या दुख बँट जाता है अपने आप ही। आइए सुनें आज का गीत जो कि एक ऐसा ही गीत है।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

बांका सजन न माने गुहार,
देखे हैं मस्त आँखों से मतवाला,
घबराहट में सूखी मेरी जान,
छलिये ने घूंघट मेरा उठा डाला..

अतिरिक्त सूत्र - इस गीत को लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने

पिछली पहेली का परिणाम-
बिलकुल सही है अवध जी..लगे रहिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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PADMSINGH का कहना है कि -

बलमा माने न बैरी चुप न रहे लगी मन की कहे हाय ......शायद यही गीत है

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