Sunday, January 16, 2011

मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना....और भुला पाना उन फनकारों को जिन्होंने हिंदी सिनेमा में सस्पेंस थ्रिलर की नींव रखी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 571/2010/271

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नए सप्ताह में आप सभी का फिर एक बार हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, बचपन में आप सभी ने कभी ना कभी अपनी दादी-नानी से भूत-प्रेत की कहानियाँ तो ज़रूर सुनी होंगी। सर्दी की रातों में खाना खाने के बाद रजाई ओढ़कर मोमबत्ती या लालटेन की रोशनी में दादी-नानी से भूतों की कहानी सुनने का मज़ा ही कुछ अलग होता था, है न? और कभी कभी तो बच्चे अगर ज़िद करे या शैतानी करे तो भी उन्हें भूत-प्रेत का डर दिखाकर सुलाया जाता है, आज भी। लेकिन जब हम धीरे धीरे बड़े होते है, तब हमें अहसास होने लगता है कि ये भूत-प्रेत बस कहानियों में ही वास करते हैं। हक़ीक़त में इनका कोई वजूद नहीं है। लेकिन क्या वाक़ई यह सच है कि आत्मा या भूत-प्रेत का कोई वजूद नहीं, बस इंसान के मन का भ्रम या भय है? दोस्तों, सदियों से सिर्फ़ हमारे देश में ही नही, बल्कि समूचे विश्व में भूत-प्रेत की कहानियाँ तो प्रचलित हैं ही, बहुत सारे क़िस्से ऐसे भी हुए हैं जिनके द्वारा लोगों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि भूत-प्रेत और आत्माओं का अस्तित्व है। हर देश में इस तरह के किस्से, इस तरह की घटनाओं का ब्योरा मिलता है। तो हमने भी सोचा कि क्यों ना देश विदेश की ऐसी ही तमाम "सत्य" घटनाओं को संजोकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक लघु शृंखला चलाई जाये, जिसमें हम देश विदेश की इन रोमहर्षक घटनाओं का ज़िक्र तो करेंगे ही, साथ ही यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि विज्ञान क्या कहता है इनके बारे में। और लगे हाथ हम कुछ ऐसे गीत भी सुनेंगे जो सपेन्स थ्रिलर या हॊरर फ़िल्मों से चुने हुए होंगे। तो प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'मानो या ना मानो'। आज इसकी पहली कड़ी में हम ज़िक्र करना चाहेंगे आकाशवाणी कोलकाता की। अब आप हैरान हो रहे होंगे कि भूत प्रेत से आकाशवाणी कोलकाता का क्या रिश्ता है! बात ऐसी है कि आकाशवाणी कोलकाता का जो पुराना ऒफ़िस था गार्स्टिन प्लेस नामक जगह में, जो अब परित्यक्त है, ऐसा सुनने में आता है कि यह जगह हौण्टेड है। अभी हाल ही में स्टार आनंद (स्टार टीवी का बंगला चैनल) पर कई कलाकारों के विचार दिखाये गये थे जिन्होंने इस बात की पुष्टि की है, और इनमें से एक गायिका हेमंती शुक्ला भी हैं। हेमंती जी ने बताया कि उन्हें गुज़रे ज़माने के कुछ कलाकारों ने बताया कि उस जगह पर अजीब-ओ-ग़रीब आवाज़ें सुनी जा सकती है। अपने आप ही पियानो के बजने की आवाज़ भी कई लोगों ने सुनी है रात के वक़्त। १ गार्स्टिन प्लेस, जहाँ पर ऒल इण्डिया रेडिओ कोलकाता का जन्म हुआ था, उसके विपरीत अब जॊब चारनॊक की कब्र है, और शायद यह भी एक कारण है लोगों के इस जगह को हौण्टेड मानने का। भले ही आज लोग रात के वक़्त इस जगह के आसपास से गुज़रना पसंद नहीं करते हों, लेकिन वैज्ञानिक तौर पर इस रहस्य के पीछे का कारण पता नहीं चल सका है।

दोस्तों, क्योंकि यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला है, इसलिए चाहे कितनी भी क़िस्से और कहानियाँ आपको सुनवाएँ, घूम फिर कर तो हमें पुराने फ़िल्मी गीतों की तरफ़ मुड़ना ही है। हिंदी फ़िल्मों में सस्पेन्स और हॊरर फ़िल्मों की बात करें तो जिस फ़िल्म की याद हमें सब से पहले आती है, वह है १९४९ की 'महल'। 'बॊम्बे टॊकीज़' बम्बई के मलाड में स्थित था। उसका कैम्पस बहुत बड़ा था, कंपनी में काम करने वालों के बच्चों के लिए स्कूल व अन्य सुविधाएँ भी मौजूद थी वहाँ। एक बार ऐसी बात चल पड़ी कि उस कैम्पस में भूत हैं और यहाँ तक कि हिमांशु राय का जो बंगला है, वह हौण्टेड है। जब दादामुनि अशोक कुमार ने इस बात का ज़िक्र कमाल अमरोही से किया, तो उनके दिमाग़ में पुनर्जनम की एक कहानी सूझी जिसका नतीजा था 'महल'। फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की थी कि हरिशंकर (अशोक कुमार) अपने पूर्वजों की जायदाद, एक परित्यक्त महल को देखने के लिए जाते हैं। इस 'शबनम महल' का अतीत बहुत ज़्यादा सुखदायी नहीं था। इतने बरसों के बाद उस महल में वो गये और उस वक़्त हैरान रहे गये जब उन्होंने देखा कि उनका ही एक चित्र दीवार पर टंगा हुआ है। महल की देखरेख करने वाले बूढ़े आदमी ने उस चित्र के पीछे की कहानी बताई और बताया कि किस तरह से वहाँ एक प्रेमी का और उसकी प्रेमिका का अंत हुआ था। बाद में हरिशंकर एक लड़की को देखते है गाते हुए, कभी बग़ीचे में झूला झूलते हुए, लेकिन जब भी वो उसके पास जाते हैं, वो ग़ायब हो जाती है। उस बूढ़े चौकीदार और उनका वकील दोस्त श्रीनाथ, दोनों ही उन्हें उस महल से दूर रहने की सलाह देते हैं। हरिशंकर जितना दूर जाने की कोशिश करते हैं, कुछ बात उन्हें और ज़्यादा उस महल के करीब ले जाती है, और वो क्रमश: उस महल में फैली गहरी भूतिया अंधकार में धँसते चले जाते हैं। फ़िल्म का हौण्टिंग् नंबर "आयेगा आनेवाला" हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। राजकुमारी का भी गाया हुआ "घबरा के जो हम सर को टकराएँ तो अच्छा" भी आपने सुना था इसी महफ़िल में। आइए आज इस फ़िल्म से सुनें लता मंगेशकर की आवाज़ में "मुश्किल है बहुत मुश्किल चाहत का भुला देना"। खेमचंद प्रकाश का संगीत और नक्शब जराचवी के बोल। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत है जो फ़िल्माया गया है मधुबाला पर। किसी भी सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म की सफलता में पार्श्व संगीत या बकग्राउण्ड म्युज़िक का बहुत बड़ा हाथ होता है और साथ ही बड़ा हाथ होता है छायांकन का। इन दो क्षेत्रों में क्रम से खेमचंद प्रकाश और जोसेफ़ विर्स्चिंग् ने अतुलनीय काम किया, और इस फ़िल्म ने हिंदी सस्पेन्स थ्रिलर की नीव रखी और एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म सिद्ध हुई। तो लीजिए, लता जी के करीयर के शुरुआती दौर का यह यादगार गीत सुनिए और आवाज़ दीजिए उस गुज़रे सुरीले ज़माने को। कल कुछ और दिलचस्प तथ्यों और एक और हौण्टिंग् नंबर के साथ हाज़िर होंगे, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि किशोर कुमार को पहली बार पार्श्वगायक के रूप में दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने वाले संगीतकार खेमचंद प्रकाश ही थे और वह फ़िल्म थी 'ज़िद्दी' (१९४८)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इतना बहुत है इस यादगार गीत को पहचानने के लिए.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका जून है - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दोस्तों पिछली शृंखला के परिणाम बताते हुए हमसे एक भूल हुई, अमित जी के कुछ अंक हमसे गलती से छूट गए...दरसअल अमित जी के १२ अंक है शरद जी के १० अंकों की तुलना में, तो इस तरह ७ वीं शृंखला अमित जी ने नाम रही....अमित जी ने हमारा ध्यान इस तरफ़ आकर्षित करवाया, और उन्हीं से हमें पता चला कि उनका पूरा नाम अमित तिवारी है और वो उस अमित जी से अलग हैं जो पहले एक शृंखला जीत चुके हैं. बहरहाल अब की सात श्रृंखलाओं में स्कोर अब इस प्रकार है - श्याम जी -४, शरद जी २, और अमित और अमित तिवारी जी एक एक. असुविधा के लिए क्षमा चाहेंगें. नयी शृंखला में एक बार फिर अमित तिवारी जी ने बढ़त बनाई है २ अंक लेकर शरद जी और प्रतिभा जी पर जिन्हें १-१ अंक मिले हैं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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4 श्रोताओं का कहना है :

अमित तिवारी का कहना है कि -

गीतकार बताएं-शकील बदायुनी

शरद तैलंग का कहना है कि -

Music Director : Hemant Kumar

AVADH का कहना है कि -

नायिका: वहीदा रहमान
अवध लाल

इंदु पुरी गोस्वामी का कहना है कि -

कहीं दीप जले कहीं दिल जरा देख ले आ कर परवाने तेरी कौन सी है मंज़िल' मस्त मस्त गाना.
इस फिल्म के नायक विश्वजीत जी ने सबसे ज्यादा सस्पेंस फिल्म्स की होगी मेरे विचार से.पुरानी इन सस्पेंस फिल्म्स में एक दो गाने तो बड़े ही प्यारे होते थे.बीस साल बाद,कोहरा,पूनम कीरात,गुमनाम, वो कौन थी,अनीता,परदे के पीछे,नूरमहल एसी ही कुछ फिल्म्स है जिनके एक दो गानो ने ही फिल्म के नाम को अमर करदिया. जानती हूँ न थोडा थोडा? क्या करू?
ऐसिच हूँ मैं तो सच्ची.

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