Monday, January 17, 2011

कहीं दीप जले कहीं दिल.....एक ऐसा गीत जिसने लता जी का खोया आत्मविश्वास लौटाया



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 572/2010/272

'मानो या ना मानो' - दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कल से हमने शुरु की है यह लघु शृंखला। भूत-प्रेत और आत्मा के अस्तित्व के बारे में बहस लम्बे समय से चली आ रही है, जिसकी अभी तक कोई ठोस वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो पायी है। दुनिया के हर देश में भूत प्रेत की कहानियाँ और क़िस्से सुनने को मिलते हैं, और हमारे देश में भी बहुत ऐसे उदाहरण पाये जाते हैं। आज के ज़माने में अधिकांश लोगों को भले ही ये सब बातें ढोंगी लोगों की करतूत लगे, लेकिन उसे आप क्या कहेंगे अगर Archaeological Survey of India ही ऐसा बोर्ड लगा दे कि रात के बाद फ़लाने जगह पर जाना खतरनाक या हानीकारक हो सकता है? जी हाँ, राजस्थान में भंगढ़ नामक जगह है जहाँ पर ASI ने एक साइनबोर्ड लगा दिया है, जिस पर लिखा है - "Entering the borders of Bhangarh before sunrise and after sunset is strictly prohibited." जो पर्यटक वहाँ जाते हैं, वो कहते हैं कि भंगढ़ की हवाओं में एक अजीब सी बात महसूस की जा सकती है जो दिल में बेचैनी पैदा करती है। आइए इस जगह के इतिहास के बारे में आपको कुछ बताया जाये। १७-वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में अम्बर के माधो सिंह ने भंगढ़ को अपनी राजधानी बनाई थी। ऐसा उन्होंने बाबा बलानाथ, जो वहाँ तपस्या कर रहे थे, से अनुमति माँग कर किया था। लेकिन उन्होंने उनसे एक शर्त भी ली कि "अगर तुम्हारे राज-प्रासाद की साया मुझ पर पड़ गई तो सब कुछ ख़त्म हो जाएगा, तुम्हारे राज्य का अस्तित्व ही मिट जाएगा"। लेकिन अज्ञानता की वजह से अजब सिंह, जो माधो सिंह के उत्तराधिकारियों में से एक थे, ने उस प्रासाद का निर्माण करते हुए इतनी ऊंचाई तक ले गया कि उसकी छाया उस साधु पर पड़ गई, और उसी से भंगढ़ का क़िला ढेर हो गया, और कहा जाता है कि तभी से इसमें भौतिक गतिविधियाँ महसूस की जाती है। एक अन्य पौराणिक कहानी के अनुसार रानी रत्नावली और सिंह सेवरा के बीच एक तांत्रिक युद्ध हुआ था। सिंह सेवरा रानी की सुंदरता पर मुग्ध हो गया और तांत्रिक पद्धतियों के द्वारा रानी को अपने वश में करने की कोशिश की लेकिन बार बार असफल होता रहा। उन दोनों के बीच अंतिम युद्ध के दौरान रानी का क्रोध इतना ज़्यादा बढ़ गया कि उन्होंने कांच की शिशि में रखी तेल को एक बड़े पत्थर में परिवर्तित कर दिया और उस पहाड़ी की तरफ़ दे मारा जिस पर वह दानव बैठा हुआ था। यह इतना अकस्मात हुआ कि सेवरा को अपनी बचाव का कोई मौका ना मिल सका। लेकिन मरते मरते वह अभिशाप दे गया कि "मैं मर रहा हूँ, लेकिन रत्नावली भी यहाँ नहीं रह सकेगी। ना रत्नावली, ना ही उसका कोई सगा संबंधी, ना ही इस राज्य की दीवारें; यहाँ की कोई भी चीज़ कल सुबह का सूरज नहीं देख सकेगी"। तब रात भर में पूरे शहर का स्थानांतरण कर दिया गया अजबगढ़, और सुबह होते होते भंगढ़ का सबकुछ धूलीसात हो गया। दोस्तों, यह कितनी पुरानी मान्यताएँ हैं, लेकिन आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यहां अद्भुत गतिविधियाँ महसूस की जा सकती हैं। हमारे राजस्थान के दोस्तों से अनुरोध है कि आप इस जगह के बारे में अपनी राय बताएँ। शरद तैलंग जी, आप सुन रहे हैं ना!

और आइए अब आज के गीत के बारे में बताने की बारी। फ़िल्म 'महल' के बाद इस जौनर में जिस फ़िल्म की याद आती है, वह है 'मधुमती'। लेकिन इस फ़िल्म के कई गीत आपको सुनवाए जा चुके हैं, इसलिए आज इस फ़िल्म के बाजु में रखते हुए हम बढ़ जाते हैं आगे और हमारे हाथ लगती है एक और सस्पेन्स थ्रिलर 'बीस साल बाद', जो उस ज़माने की एक बेहद मशहूर डरावनी फ़िल्म थी। गायक-संगीतकार हेमंत कुमार ने ख़ुद इस फ़िल्म का निर्माण किया था 'गीतांजली पिक्चर्स' के बैनर तले। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि वहशी ठाकुर एक जवान लड़की की इज़्ज़त लूटता है जिसके बाद वह लड़की आत्महत्या कर लेती है। उसके बाद उस ठाकुर की भी मौत हो जाती है और गाँववाले कहते हैं कि उस लड़की की भटकती आत्मा ने ही उसका ख़ून किया है। फिर उसके बाद ठाकुर के बेटे की भी कुछ उसी तरह से मौत होती है। मौत का सिलसिला जारी रहता है और ठाकुर का भाई भी मौत के घाट उतरता है। बीस साल बाद ठाकुर का पोता कुमार विजय सिंह (बिस्वजीत) विदेश से लौटता है अपने पूर्वजों की हवेली में। उन्हें लोगों से सलाह मिलती है कि वो उस हवेली से दूर ही रहे जिसने उसके पूरे परिवार की जान ली है, लेकिन विदेश में पला बढ़ा विजय ठान लेता है कि वह असली क़ातिल को ढ़ूंढ निकालेगा। इस प्रयास में वो एक निजी जासूस गोपीचंद जासूस (असित सेन) को नियुक्त करते हैं। कुमार की मुलाक़ात राधा (वहीदा रहमान) से होती है जो एक स्थानीय चिकित्सक रामलाल वैद (मनमोहन कृष्ण) की पुत्री है; और दोनों में प्यार हो जाता है। तभी अचानक एक दिन एक आदमी की लाश मिलती है जिसने कुमार विजय सिंह की पोशाक पहनी हुई है। यानी कि कातिल ने ग़लती से कुमार की जगह उस आदमी को मार डाला है। कुमार को अब फ़ैसला करना है कि क्या वो उस हवेली में रहना जारी रखेगा और हर रोज़ मौत का ख़ौफ़ लिये जीता रहेगा, या फिर वहाँ से दूर, बहुत दूर चला जाएगा। यही थी 'बीस साल बाद' के कहानी की भूमिका। इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए। हेमंत दा का कर्णप्रिय संगीत बहुत सराहा गया। तो इस फ़िल्म से आपको सुनवा रहे हैं वह गीत जिसके लिए लता मंगेशकर को अपना दूसरा फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। जी हाँ, "कहीं दीप जले कहीं दिल, ज़रा देख ले आकर परवाने, तेरी कौन सी है मंज़िल"। सस्पेन्स भरे गीतों में यह गीत एक अहम स्थान रखता है। जितने रूहाने इसके बोल हैं (शक़ील बदायूनी), उतना ही रहस्यजनक है इसका संगीत और लता जी का आलाप तो जैसे वाक़ई दिल में एक डर सा पैदा कर देता है। और जब वो गाती हैं कि "ना मैं सपना हूँ न कोई राज़ हूँ, एक दर्द भरी आवाज़ हूँ", तो जैसे डर के साथ एक दर्द भी दौड़ जाता है नस नस में। इस गीत के साथ लता जी के ज़िंदगी का एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ जुड़ा हुआ है। इस क़िस्से को हम पंकज राग की किताब 'धुनों की यात्रा' से ही प्रस्तुत कर रहे हैं। "दरअसल लता इन दिनों काफ़ी बीमार हो गईं थीं और बीमारी से उठने के बाद उन्हें लगने लगा था कि उनकी आवाज़ पर भी बीमारी का बुरा असर पड़ा है। लता को लगने लगा कि रिहर्सलों में बात नहीं बन पा रही है, पर हेमन्त ने लता को बिना बताये उनके एक रिहर्सल को ही रेकॊर्ड कर लिया और उसी को रेकॊर्डिंग् मानकर लता को सुनाया और विश्वास दिला दिया कि लता की आवाज़ अभी भी लता की ही आवाज़ थी। इस मुश्किल गीत को जब वो सफलतापूर्वक गा सकीं तो उन्हें अपना खोया हुआ आत्मविश्वास वापस मिल गया। यह भी एक कारण है कि इस गीत को १९६७ में उनके द्वारा उद्घोषित अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में लता ने स्थान दिया।" तो चलिए, डरावने माहौल का आप भी ज़रा लुत्फ़ उठाइए लता जी की आवाज़ के साथ।



क्या आप जानते हैं...
कि 'बीस साल बाद' फ़िल्म की कहानी आर्थर कॊनन डायल के प्रसिद्ध उपन्यास 'The Hound of the Baskervilles' से प्रभावित थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इतना बहुत है इस यादगार गीत को पहचानने के लिए.

सवाल १ - गीतकार बताएं - 1 अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, शरद जी और अवध जी को बधाई...इंदु जी आप कभी गलत हुईं है क्या ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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7 श्रोताओं का कहना है :

अमित तिवारी का कहना है कि -

फिल्म-कोहरा - 1964

इंदु पुरी गोस्वामी का कहना है कि -

hemant kumar

शरद तैलंग का कहना है कि -

Geetkar : kaifi aazami

शरद तैलंग का कहना है कि -

आज की पहेली सरल थी किन्तु ठीक ६.०० बजे लाइट गई तो अब आई.

इंदु पुरी गोस्वामी का कहना है कि -

bahut hi pyara geet hai yh.iske alawa bhi iske saare gane ek se bdhkr ek hain.ye nayan dre dre'
raah bni khud manzil'
o beqrar dil ho gaya hai mujh ko aansuon se pyar'
musical,thrilier,mystery film.
mujhe ye films pasand hai ya kahun is tarah ki.kintu horror films bilkul psnd nhi.aaj bhii drti hun unse.
kya kru?
aisich hun main to-darpok.
ha ha ha

शरद तैलंग का कहना है कि -

सुजॉय जी ! ख़ेद है कि मैं कभी भी अजबगढ या भन्गड नहीं गया इसलिए मुझे वहां के वारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. लेकिन वहां जो बोर्ड लगाया गया है उसका कारण तो जंगली जानवरों की वज़ह से बताया गया है.

इंदु पुरी गोस्वामी का कहना है कि -

भंगढ़ के लिए कुछ नही कह सकती किन्तु मेरे विचार से ये सब फालतू की बाते हैं.चित्तोड दुर्ग के लिए ऐसी ही बाते जब मैंने कादम्बिनी जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में पढ़ी कि दिवाली की रात को यहाँ प्रेत आत्माओं का मेला लगता है मैं अपने ,मेरे पति,भाई,भाभी,भानजा सब रात एक बजे से सुबह चार बजे तक उन सभी स्थानों पर घूमे किन्तु वहाँ ऐसा कुछ नही देखा.लोग कहते हैं राक्षसी गुण वालों को ही दिखाई देता है देव गुण (मैं और देवगुण???????हा हा हा ) वालों को भूत प्रेत दिखाई नही देते.हमारे साथ भाभी और भांजे की पत्नी भी थी जो अक्सर कहती थी कि उन्हें 'कुछ' दिखाई देता है.उन्हें भी वहाँ कुछ नही दिखा.शायद मैं साथ थी इसलिए.हा हा हा क्योंकि मेरे सामने ऐसी बकवास कोई नही करता.
अमावस की रात थी उस रात में सबका साथ घूमना पैदल जरूर हमारे लिए यादगार घटना हो गई,बाकि ....
इसलिए ऐसी बातों को प्रोत्साहन नही देना चाहिए.
मैं इन सब बातों को नही मानती इसलिए बस इन फिल्म्स को इंजॉय कीजिये और प्यारे प्यारे गाने सुनिए और सुनाइये.वरना झगड़ा करूंगी.क्या करूं?
ऐसिच हूँ मैं तो सच्ची.नम्बर वन झगडालू
ऐसी बातों को ले के.
हा हा हा

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