Wednesday, June 22, 2011

बिछुडती नायिका की अपने प्रियतम के लिए कामना -"मैं मिट जाऊँ तो मिट जाऊँ, तू शाद रहे आबाद रहे...."



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 684/2011/124

'रस के भरे तोरे नैन' - फिल्मों में ठुमरी विषयक इस श्रृंखला में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार फिर आपका स्वागत करता हूँ| कल की कड़ी में हमने आपसे चर्चा की थी कि नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में 'ठुमरी' एक शैली के रूप में विकसित हुई थी| अपने प्रारम्भिक रूप में यह एक प्रकार से नृत्य-गीत ही रहा है| राधा-कृष्ण की केलि-क्रीड़ा से प्रारम्भ होकर सामान्य नायक-नायिका के रसपूर्ण श्रृंगार तक की अभिव्यक्ति इसमें होती रही है| शब्दों की कोमलता और स्वरों की नजाकत इस शैली की प्रमुख विशेषता तब भी थी और आज भी है| कथक नृत्य के भाव अंग में ठुमरी की उपस्थिति से नर्तक / नृत्यांगना का अभिनय मुखर हो जाता है| ठुमरी का आरम्भ चूँकि कथक नृत्य के साथ हुआ था, अतः ठुमरी के स्वर और शब्द भी भाव प्रधान होते गए|

राज-दरबार के श्रृंगारपूर्ण वातावरण में ठुमरी का पोषण हुआ था| तत्कालीन काव्य-जगत में प्रचलित रीतिकालीन श्रृंगार रस से भी यह शैली पूरी तरह प्रभावित हुई| नवाब वाजिद अली शाह स्वयं उच्चकोटि के रसिक और नर्तक थे| ऊन्होने राधा-कृष्ण के संयोग-वियोग पर कई ठुमरी गीतों की रचना करवाई| ठुमरी और कथक के अन्तर्सम्बन्ध नवाबी काल में ही स्थापित हुए थे| वाजिद अली शाह के दरबार की एक बड़ी रोचक घटना है; जिसने आगे चल कर नृत्य के साथ ठुमरी गायन की धारा को समृद्ध किया| एक बार नवाब के दरबार में अपने समय के श्रेष्ठतम पखावज वादक कुदऊ सिंह आए| दरबार में उनका भव्य सत्कार हुआ और उनसे पखावज वादन का अनुरोध किया गया| कुदऊ सिंह ने वादन शुरू किया| उन्होंने ऐसी-ऐसी क्लिष्ट और दुर्लभ तालों और पर्णों का प्रदर्शन किया कि नवाब सहित सारे दरबारी दंग रह गए| कुदऊ सिंह को पता था कि नवाब के दरबार में कथक नृत्य का बेहतर विकास हो रहा है| उन्होंने ऐसी तालों का वादन शुरू किया जो नृत्य के लिए उपयोगी थे; उनकी यह भी अपेक्षा थी कि कोई नर्तक उनके पखावज वादन में साथ दे| कुदऊ सिंह की विद्वता के सामने किसी का साहस नहीं हुआ| उस समय दरबार में कथक गुरु ठाकुर प्रसाद अपने नौ वर्षीय पुत्र के साथ उपस्थित थे| ठाकुर प्रसाद नवाब वाजिद अली शाह को नृत्य की शिक्षा दिया करते थे| कुदऊ सिंह की चुनौती उनके कानों में बार-बार खटकती रही| अन्ततः उन्होंने अपने नौ वर्षीय पुत्र बिन्दादीन को महफ़िल में खड़े होने का आदेश दिया| फिर शुरू हुई एक ऐसी प्रतियोगिता, जिसमें एक ओर एक नन्हा बालक और दूसरी ओर अपने समय का प्रौढ़ एवं विख्यात पखावज वादक था| कुदऊ सिंह एक से एक क्लिष्ट तालों का वादन करते और वह बालक पूरी सफाई से पदसंचालन कर सबको चकित कर देता था| अन्ततः पखावज के महापण्डित ने उस बालक की प्रतिभा का लोहा माना और उसे अपना आशीर्वाद दिया|

यही बालक आगे चलकर बिन्दादीन महाराज के रूप कथक के लखनऊ घराने का संस्थापक हुआ| बिन्दादीन और उनके भाई कालिका प्रसाद ने कथक नृत्य को नई ऊँचाई पर पहुँचाया| बिन्दादीन महाराज ने कथक नृत्य पर भाव प्रदर्शन के लिए 1500 से अधिक ठुमरियों की रचना की थी, जिनका प्रयोग आज भी कथक नर्तक / नृत्यांगना करते हैं| "रस के भरे तोरे नैन" श्रृंखला के आगामी किसी अंक में हम बिन्दादीन महाराज की ठुमरियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे|

इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आपने अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में 1944 की फिल्म "भर्तृहरि" से राग हेमन्त की ठुमरी सुनी थी| आज हम आपको जो ठुमरी सुनवाने जा रहे हैं, वह भी अमीरबाई कर्नाटकी के स्वरों में ही है| 1947 की फिल्म "सिन्दूर" से यह ठुमरी ली गई है| यह वह समय था जब अमीरबाई पार्श्वगायन के क्षेत्र में शीर्ष पर थीं| 'कन्नड़ कोकिला' के नाम से विख्यात अमीरबाई ने 1947 में फिल्मिस्तान द्वारा निर्मित फिल्म "सिन्दूर" में राग "तिलक कामोद" की एक बेहद कर्णप्रिय ठुमरी का गायन किया है| फिल्म के संगीतकार हैं खेमचन्द्र प्रकाश तथा गीतकार हैं कमर जलालाबादी| ठुमरी की नायिका जाते हुए प्रियतम के कुशलता की कामना करती है, जब कि इस बिछोह से उसका ह्रदय दुखी है और आँखें आँसुओं से भीगी हैं| आइए सुनते हैं रस-भाव से भरी यह ठुमरी -



क्या आप जानते हैं...
कि भक्तकवि नरसी भगत का चर्चित भजन -"वैष्णवजन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाने रे..." गाने के कारण महात्मा गाँधी अमीरबाई कर्नाटकी के बहुत बड़े प्रशंसक बन गए थे|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - किस राग पर आधारित है ये ठुमरी - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - इस पारंपरिक ठुमरी के संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
हिन्दुस्तानी जी और दीप चंद्रा जी के साथ अमित जी को बधाई. क्षिति जी इस शृंखला में आप सशक्त दावेदार हैं, जमे रहिये

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

फेसबुक-श्रोता यहाँ टिप्पणी करें
अन्य पाठक नीचे के लिंक से टिप्पणी करें-

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

4 श्रोताओं का कहना है :

अमित तिवारी का कहना है कि -

राग: Bhairavi

Kshiti का कहना है कि -

vazidali shah

Kshiti का कहना है कि -

navab vazidali shah urf akhtar pia

Avinash Raj का कहना है कि -

Iske Sangeetkar Rai Chand Boral hain

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

संग्रहालय

25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

भेंट-मुलाक़ात-Interviews

संडे स्पेशल

ताजा कहानी-पॉडकास्ट

ताज़ा पॉडकास्ट कवि सम्मेलन