Tuesday, July 12, 2011

कान्हा मैं तोसे हारी...कृष्णलीला से जुड़ी श्रृंगारपूर्ण ठुमरी



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 698/2011/138

स श्रृंखला की आरम्भिक कड़ियों में ठुमरी शैली के विकास के प्रसंग में हमने अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार की चर्चा की थी| कथक नृत्य और ठुमरी का विकास नवाब के संरक्षण में ही हुआ था| श्रृंखला की चौथी कड़ी में हमने नवाब के दरबार में सुप्रसिद्ध पखावजी कुदऊ सिंह और नौ वर्षीय बालक बिन्दादीन के बीच अनोखे मुकाबले का प्रसंग प्रस्तुत किया था| यही बालक आगे चल कर कथक नृत्य के लखनऊ घराने का संस्थापक बना| मात्र नौ वर्ष की आयु में दिग्गज पखावजी कुदऊ सिंह से मुकाबला करने वाला बिन्दादीन 12 वर्ष की आयु तक तालों का ऐसा ज्ञाता हो गया, जिससे बड़े-बड़े तबला और पखावज वादक घबराते थे| बिन्दादीन के भाई थे कालिका प्रसाद| ये भी एक कुशल तबला वादक थे| आगे चल कर बिंदादीन कथक नृत्य को शास्त्रोक्त परिभाषित करने में संलग्न हो गए और तालपक्ष कालिका प्रसाद सँभालते थे| विन्ददीन द्वारा विकसित कथक नृत्य में ताल पक्ष का अनोखा चमत्कार भी था और भाव अभिनय की गरिमा भी थी| उन्होंने लगभग 1500 ठुमरियों की रचना भी की, जिनका प्रयोग परम्परागत रूप में आज भी किया जाता है|

बिन्दादीन निःसन्तान थे, किन्तु उनके भाई कालिका प्रसाद के तीन पुत्र- अच्छन महाराज, शम्भू महाराज और लच्छू महाराज थे| इन तीनों को बिन्दादीन महाराज ने प्रशिक्षित किया था| तीनों भाइयों ने आगे चल कर कथक के तीन अलग-अलग दिशाओं में कालिका-बिन्दादीन घराने की कीर्ति-पताका को फहराया| बड़े भाई अच्छन महाराज को बिन्दादीन महाराज का ताल-ज्ञान मिला और उन्होंने कथक के शुद्ध "नृत्त" पक्ष को समृद्ध किया, जबकि शम्भू महाराज को कथक के भाव-अभिनय की कुशलता प्राप्त हुई और उन्होंने इसी अंग को विस्तार दिया| कथक नृत्य में "बैठकी" का अन्दाज अर्थात मंच पर बैठ कर ठुमरी या भजन पर भाव दिखाने में शम्भू महाराज अद्वितीय थे| तीसरे भाई लच्छू महराज की नृत्य-शिक्षा अपने पिता और चाचा से अधिक अग्रज अच्छन महाराज से प्राप्त हुई| वह आरम्भ से ही कथक में प्रयोगवाद के पक्षधर थे| युवावस्था में ही लच्छू महाराज ने फिल्म जगत की ओर रुख किया और फिल्मों के माध्यम से कथक के नये-सरल मुहावरों को घर-घर में पहुँचाया| लच्छू महाराज भारतीय फिल्मों के सबसे सफल नृत्य-निर्देशक हुए हैं| 1959 में प्रदर्शित महत्वाकांक्षी फिल्म "मुग़ल-ए-आज़म" के नृत्य-निर्देशक लच्छू महाराज ही थे, जिन्होंने फिल्म में एक से एक आकर्षक नृत्य-संरचनाएँ तैयार की थी| इसी फिल्म में लच्छू जी ने बिन्दादीन महाराज की एक ठुमरी को भी शामिल किया था| इस ठुमरी की चर्चा से पहले आइए लखनऊ कथक घराने के वर्तमान संवाहक पण्डित बिरजू महाराज के व्यक्तित्व और कृतित्व पर थोड़ी चर्चा करते हैं| बिरजू महाराज (बृजमोहन मिश्र) अच्छन महाराज के सुयोग्य पुत्र हैं| नौ वर्ष की आयु में इनके सिर से पिता का साया हट गया था| अपनी माँ की प्रेरणा, अपने चाचाओं के मार्गदर्शन और इन सबसे बढ़ कर स्वयं अपनी प्रतिभा के बल पर बिरजू महाराज ने अपने पूर्वजों की धरोहर को न केवल सँभाला बल्कि अपने प्रयोगधर्मी वृत्ति से कथक को चहुँमुखी विस्तार दिया| बिरजू महाराज ने अपने पितामह बिन्दादीन महाराज की ठुमरियों को संरक्षित भी किया और उसका विस्तार भी|

बिरजू महाराज ने इन ठुमरियों का कथक नृत्य में भाव प्रदर्शन के लिए तो प्रयोग किया ही, अपने चाचा शम्भू महाराज की तरह बैठकी के अन्दाज़ में भी पारंगत हुए| अपने चाचा लच्छू महाराज की तरह बिरजू महाराज का फिल्मों में योगदान बहुत अधिक तो नहीं है, परन्तु जितना है, वह अविस्मरणीय है| ऊपर की पंक्तियों में फिल्म "मुग़ल-ए-आज़म" में शामिल बिन्दादीन महाराज की ठुमरी का जिक्र हुआ था| राग गारा में निबद्ध यह ठुमरी थी -"मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे...", जिसे लच्छू महाराज ने थोड़ा परिष्कृत कर नृत्य में ढाला था| इसी प्रकार बिरजू महाराज ने 1977 में प्रदर्शित फिल्म "शतरंज के खिलाड़ी" में बिन्दादीन महाराज की ठुमरी -"कान्हा मैं तोसे हारी..." का भाव सहित स्वयं गायन किया था| हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कथाकार मुंशी प्रेमचन्द की कहानी पर विश्वविख्यात फिल्म-शिल्पी सत्यजीत रे ने इस फिल्म का निर्माण किया था| कथानक के अनुरूप 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से पहले ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अवध की सत्ता हड़पने के प्रसंग फिल्म में यथार्थ रूप से चित्रित किये गए हैं| बिन्दादीन महाराज की यह ठुमरी नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में कथक नृत्य के साथ प्रस्तुत की गई है| वाद्य संगतकारों के साथ स्वयं बिरजू महाराज अभिनेता और गायक के रूप में उपस्थित हैं| राग खमाज की इस ठुमरी को महाराज जी ने भावपूर्ण अन्दाज़ में प्रस्तुत किया है| नृत्यांगना हैं बिरजू महाराज की प्रमुख शिष्या शाश्वती सेन| आइए रसास्वादन करते हैं बिन्दादीन महाराज की कृष्णलीला से जुड़ी श्रृंगारपूर्ण ठुमरी पण्डित बिरजू महाराज के स्वरों में-



क्या आप जानते हैं...
कि बिन्दादीन महाराज की एक और ठुमरी -"काहे छेड़ छेड़ मोहें गरवा लगाए...." 2002 की फिल्म "देवदास" में भी शामिल थी, जिसे बिरजू महाराज, कविता कृष्णमूर्ति और माधुरी दीक्षित ने स्वर दिया है|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 18/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - पारंपरिक ठुमरी है
सवाल १ - राग बताएं - ४ अंक
सवाल २ - किस अभिनेत्री पर फिल्मांकित है ये गीत - ३ अंक
सवाल ३ - गायिका बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी और क्षिति जी एक बार फिर हमारी उम्मीदों पर खरे उतरे हैं, पर यहाँ भी अमित ४ अंक बटोर के ले गए बधाई

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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