Sunday, July 24, 2011

नाच मेरे मोर जरा नाच...कम चर्चित संगीतकार शान्ति कुमार देसाई की रचना



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 706/2011/146

"ओल्ड इज गोल्ड" पर जारी श्रृंखला "उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" की छठीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः उपस्थित हूँ| आज हम आपके लिए एक बेहद मधुर राग और उतना ही मधुर गीत लेकर आए हैं| दोस्तों; आज का राग है "मियाँ की मल्हार" | इस राग पर आधारित कुछ चर्चित गीत -"बोले रे पपीहरा..." (फिल्म - गुड्डी) और -"भय भंजना वन्दना सुन हमारी..." (फिल्म - बसन्त बहार) आप "ओल्ड इज गोल्ड" की पूर्व श्रृंखलाओं में सुन चुके हैं| इसी राग पर आधारित एक और सुरीला गीत आज हम आपको सुनवाएँगे, परन्तु उससे पहले थोड़ी चर्चा राग "मियाँ की मल्हार" पर करते हैं|

राग "मियाँ की मल्हार" एक प्राचीन राग है| यह तानसेन के प्रिय रागों में से एक है| कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था| यह राग काफी थाट का और षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है| अर्थात; आरोह में छह और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं| आरोह में शुद्ध गान्धार का त्याग, अवरोह में कोमल गान्धार का प्रयोग तथा आरोह-अवरोह दोनों में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है| आरोह में शुद्ध निषाद से पहले कोमल निषाद तथा अवरोह में शुद्ध निषाद के बाद कोमल निषाद का प्रयोग होता है| राग "मियाँ की मल्हार", राग "बहार" के काफी निकट है| इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार ऐसा प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था| राग "मियाँ की मल्हार" के स्वरों में प्रकृति के मनमोहक चित्रण की तथा विरह-पीड़ा हर लेने की अद्भुत क्षमता है| महाकवि कालिदास रचित "मेघदूत" के पूर्वमेघ, नौवें श्लोक का काव्यानुवाद करते हुए हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि डा. ब्रजेन्द्र अवस्थी कहते हैं-

गिनती दिन जोहती बार जो व्याकुल अर्पित जीवन सारा लिए
प्रिया को लखोगे घन निश्चय ही गतिमुक्त अबाधित धारा लिए
सुमनों-सा मिला ललनाओं को है मन प्रीतिमरंद जो प्यारा लिए
विरहानल में जल के रहता मिलनाशा का एक सहारा लिए |


वास्तव में पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ, विरह से व्याकुल नायक- नायिकाओं की विरहाग्नि को शान्त करते हैं और मिलन की आशा जगाते हैं| वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण करने की अद्भुत क्षमता भी राग "मियाँ की मल्हार" के स्वरों में है| इस राग पर आधारित और वर्षाकालीन परिवेश का कल्पनाशील चित्रण करता आज का गीत हमने 1964 में प्रदर्शित फिल्म "तेरे द्वार खड़ा भगवान" से चुना है| इस फिल्म की संगीत रचना शान्ति कुमार देसाई नामक एक ऐसे संगीतकार ने की थी, जिनके बारे में आज की पीढ़ी प्रायः अनजान ही होगी| 1934 में चुन्नीलाल पारिख द्वारा निर्देशित फिल्म "नवभारत" से संगीतकार शान्ति कुमार देसाई का फिल्मों में पदार्पण हुआ था| उनके संगीत निर्देशन में कई देशभक्ति गीत अपने समय में बेहद लोकप्रिय हुए थे| शान्ति कुमार देसाई ने अधिकतर स्टंट और धार्मिक फिल्मों में संगीत रचनाएँ की थी| पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में नई धारा के वेग में उखड़ जाने वाले संगीतकारों में श्री देसाई भी थे| लगभग एक दशक तक गुमनाम रहने के बाद 1964 में फिल्म "तेरे द्वार खड़ा भगवान" के गीतों में फिर एक बार उनकी प्रतिभा के दर्शन हुए| अभिनेता शाहू मोदक और अभिनेत्री सुलोचना अभिनीत इस फिल्म में शान्ति कुमार देसाई ने राग "मियाँ कि मल्हार" के स्वरों में बेहद कर्णप्रिय गीत -"नाच मेरे मोर जरा नाच..." की संगीत रचना की थी| वर्षाकालीन प्रकृति का मनमोहक चित्रण करते पण्डित मधुर के शब्दों को श्री देसाई ने सहज-सरल धुन में बाँधा था| पूरा गीत दादरा ताल में निबद्ध है; किन्तु अन्त में द्रुत लय के तीनताल का टुकड़ा गीत का मुख्य आकर्षण है| मींड और गमक से परिपूर्ण मन्नाडे के स्वर तथा सितार, ढोलक और बाँसुरी का प्रयोग भी गीत की गुणबत्ता को बढ़ाता है| आइए; सुनते हैं, राग "मियाँ की मल्हार" पर आधारित फिल्म "तेरे द्वार खड़ा भगवान" का यह गीत-



क्या आप जानते हैं...
कि मराठी फिल्म "रायगढ़" (१९४०) में शान्ति कुमार देसाई ने लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर के साथ संगीत निर्देशन किया था|

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - फिल्म के नायक है संजीव कुमार.
सूत्र २ - लता की आवाज़ में है गीत.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है -"बसंती".

अब बताएं -
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक
फिल्म की नायिका कौन है - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अविनाश जी और हिन्दुस्तानी जी बहुत बधाई

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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8 श्रोताओं का कहना है :

अमित तिवारी का कहना है कि -

Gaur Malhar

Kshiti का कहना है कि -

rag gaud malhar

Hindustani का कहना है कि -

Geetkar: Gulzar

Avinash Raj का कहना है कि -

iski nayika Sumitra Sanyal hain

Satyajit Phadke का कहना है कि -

Wah Kya gaana chuna hai aapne. Film Aashirwad se 'Jhir Jhir Barse Saawan'. Sangeet diya tha 'Vasant Desai' ne. Aashirwad dil ko cho lene waali film hai. Ashok Kumar ka Abhinay lazwaab hai.
Bahut Bahut Dhanywaad aapko is gaane ko prastut karne ke liye.

पंकज सुबीर का कहना है कि -

इस प्रकार का एक गाना फिल्‍म 'राजा और रंक' का रंग बसंती, अंग बसंती आ गया' याद तो आ रहा है उसमें भी संजीव कुमार हैं, लता जी ने गाया है । लेकिन शायद ये उस गाने की चर्चा नहीं है क्‍योंकि वो तो वर्षा ऋतु पर न होकर बसंत पर है, बसंत के अवसर पर आयोजित किसी मेले में होता है । पहले ऋतुओं से जुड़े तीन पर्व होते थे, बसंत पर्व, बरखा पर्व और शरद पर्व । और हमारी फिल्‍मों में भी उनको स्‍थान मिलता था । अब तो जानने की इच्‍छा हो रही है उस समय के किस गीतकार ने वर्षा गीत में बसंती शब्‍द का उपयोग करने की भूल की थी ।

पंकज सुबीर का कहना है कि -

अरे हां ये तो आशीर्वाद का ही गीत है । गुलज़ार साहब का लिखा हुआ लता जी का गाया हुआ झिर झिर बरसें सावनी अंखियां सांवरिया घर आ, तेरे संग सब रंग बसंती, तुझ बिन सब सूना । संगीत शायद वसंत देसाई का था और परदे पर सुमिता सान्‍याल ने गाया था जो बिट्टू के किरदार में थीं । ऋषिकेश मुखर्जी की एक और जानदार शानदार फिल्‍म जिसे दादा मुनि ने अपने अभिनय से अमर कर दिया था । कौन निभा सकता था जोगी ठाकुर के किरदार को दादा मुनि के सिवा ।

सजीव सारथी का कहना है कि -

पंकज जी जब पहेली बना रहा था तो यही शब्द खटका , सोचा कि थोडा सा श्रोताओं को बरगलाया जाए, पर यहाँ तो आप जानते हैं कि सब धुरंधर हैं. पर आपकी पारखी नज़रों से सही बिंदु पकड़ा :)

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