Wednesday, October 19, 2011

श्याम रंग रंगा रे...येसुदास के पावन स्वरों से महका एक गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 769/2011/209

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! लघु शृंखला 'पुरवाई' की नवी कड़ी में आज हम लेकर आये हैं बंगाल के कीर्तन और श्यामा संगीत पर आधारित एक गीत। हर राज्य का अपना भक्ति-संगीत का स्वरूप होता है। जैसे कि असम के भक्ति-संगीत पर आधारित एक गीत इसी शृंखला में हमने सुनवाया था, वैसे ही बंगाल में भी कई तरह के भक्ति गीतों की लोकप्रियता है जिनमें कीर्तन शैली और श्यामा संगीत का काफ़ी नाम है। श्यामा संगीत की बात करें तो ये भक्ति रचनाएँ माँ काली को समर्पित रचनाएँ होती हैं ('श्यामा' शब्द काली माता के लिए प्रयोग होता है), और इन्हें शक्तिगीति भी कहते हैं। और क्योंकि बंगाल में माँ काली को लोग बहुत मानते हैं, इसलिए श्यामा-संगीत भी ख़ूब लोकप्रिय है। श्यामा संगीत इसलिए भी लोकप्रिय है क्योंकि इसमें माँ और उसके बच्चे के रिश्ते की बातें होती हैं। साधारण पूजा-पाठ के नियमों से परे होता है श्यामा संगीत। १२-वीं और १३-वीं शताब्दी में जब शक्तिवाद बंगाल में पनपने लगी, तब कई कवि और लेखक प्रेरीत हुए माँ काली पर गीत और कविताएँ लिखने के लिए। १५८९ में मुकुन्दरामा, जिन्हें 'कविकंकन' भी कहा जाता है, नें अपनी मशहूर कविता लिखी 'चंडी'। १८-वीं शताब्दी के मध्य भाग में कवि रामाप्रसाद सेन नें इसे नया जीवन देते हुए इसे बंगला गीतों की एक श्रेणी ही बना डाली। रामाप्रसाद के बाद कई संगीतकार जैसे कमलाकान्त भट्टाचार्य (१७७२-१८२१), रसिकचन्द्र राय (१८२०-१८९३), रामचन्द्र दत्त (१८६१-१८९९) और नीलकान्त मुखोपाध्याय नें श्यामा-संगीत की परम्परा को समृद्ध किया और आगे बढ़ाया। आधुनिक समय में रबीन्द्रनाथ ठाकुर और काज़ी नज़रूल इस्लाम नें श्यामा-संगीत की कविताएँ लिखीं।

श्यामा-संगीत को दो भागों में बांटा जा सकता है - भक्तिमूलक गीत और उमासंगीत/ आगमनी या विजय गीत। भक्तिमूलक गीत भक्ति और आध्यात्मिक भावों से प्रेरीत होता है, जबकि विजय गीतों में दैनन्दिन पारिवारिक और सामाजिक गतिविधियों का उल्लेख होता है। श्यामा-संगीत के बारे में एडवार्ड थॉमप्सन नें जो बातें १९२३ में कहे थे, वो आज भी सार्थक हैं। उन्होंने कहा था -

But the Śākta poems are a different matter. These have gone to the heart of a people as few poets' work has done. Such songs as the exquisite 'This day will surely pass, Mother, this day will pass,' I have heard from coolies on the road or workers in the paddy fields; I have heard it by broad rivers at sunset, when the parrots were flying to roost and the village folk thronging from marketing to the ferry. Once I asked the top class in a mofussil high school to write out a song of Rabindranath Tagore's; two boys out of forty succeeded, a result which I consider showed the very real diffusion of his songs. But, when I asked for a song of Rāmprasād's, every boy except two responded. Truly, a poet who is known both by work and name to boys between fourteen and eighteen, is a national poet. Tagore's songs are heard in Calcutta streets, and have been widely spread by the student community and the Brahmo Samaj; but in the villages of Bengal they are unknown, while Rāmprasād's are heard everywhere. 'The peasants and the paṇḍits enjoy his songs equally. They draw solace from them in the hour of despair and even at the moment of death. The dying man brought to the banks of the Ganges asks his companions to sing Rāmprasādī songs.

दोस्तों, कीर्तन और श्यामा-संगीत पर आधारित जिस फ़िल्मी गीत को हमने आज चुना है, उसके संगीतकार हैं बप्पी लाहिड़ी। येसुदास और साथियों का गाया यह है फ़िल्म 'अपने पराये' का गीत "श्याम रंग रंगा रे, हर पल मेरा रे, मेरा मतवाला है मन, मधुबन तेरा रे"। भले ही इस गीत में भगवान कृष्ण की बातें हो रही हैं, पर संगीत के लिए बप्पी लाहिड़ी नें श्यामा-संगीत शैली को अपनाया है। साथ ही बंगाल का कीर्तन रूप भी साकार हो उठता है इस गीत में। गीतकार योगेश का लिखा यह गीत सुन कर मन बड़ा शान्त हो जाता है। बप्पी लाहिड़ी पे यह इलज़ाम है कि उन्होंने फ़िल्म-संगीत को अनर्थक साज़ और शोर शराबे से प्रदूषित किया है। इस बात में सच्चाई है, पर अगर हम उन पर यह आरोप लगा रहे हैं तो कम से कम 'अपने पराये' के प्रस्तुत गीत के लिए उन्हें बधाई भी तो देनी चाहिए! चलिए सुना जाये यह भक्ति रचना।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
नीरज के लिखे गीत में "गंगा" का वंदन है

पिछले अंक में
बप्पी दा ने ऐतबार में "किसी नज़र को तेरा" और शराबी में "मंजिलें अपनी जगह है" जैसे यादगार और सुरीले गीतों को रचा था.
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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3 श्रोताओं का कहना है :

Amit का कहना है कि -

'maa ganga lyricst neeraj song', सर्च करने पर तो एक ही गाना आता है. फिल्म मंझली दीदी का ' माँ ही गंगा माँ ही जमुना'.

क्या यही है?

Amit का कहना है कि -

और नहीं ढूंढ पा रहा हूँ :(

Smart Indian का कहना है कि -

"श्याम रंग रंगा रे, हर पल मेरा" सुनाने का धन्यवाद!

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