Tuesday, April 21, 2009

लागी नाही छूटे रामा...लता तलत का गाया एक मधुर भोजपुरी गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 58

जकल भारी तादाद में भोजपुरी फ़िल्में बन रही हैं। अगर हम ज़रा इतिहास में झांक कर देखें तो पता चलता है कि भोजपूरी फ़िल्मों का इतिहास भी बड़ा पुराना है। 'लागी नाही छूटे राम' एक बहुत ही मशहूर भोजपुरी फ़िल्म रही है जो सन् १९६३ में बनी थी। यह फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' के साथ साथ रिलीज़ होने के बावजूद भी उत्तर और पूर्वी भारत में सुपरहिट रही। १९७७ की फ़िल्म 'नदिया के पार' भी एक कालजयी भोजपुरी फ़िल्म रही है। एक ज़माने में हिन्दी फ़िल्म जगत की बहुत मशहूर हस्तियाँ भोजपूरी सिनेमा से जुड़ी रही हैं। कुंदन कुमार निर्देशित इस फ़िल्म में नायक बने थे नासिर हुसैन साहब। हिन्दी फ़िल्म जगत के ऐसे दो मशहूर संगीतकार उस ज़माने मे रहे हैं जिनका भोजपुरी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये थे एस. एन. त्रिपाठी और चित्रगुप्त। फ़िल्म 'लागी नाही छूटे राम' में चित्रगुप्त का संगीत था। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी फ़िल्म से एक बहुत ही मीठा गाना हम आपके लिए चुनकर लाए हैं। हमें पूरी पूरी उम्मीद है कि इस गीत को सुनने के बाद यह गीत आपके दिलोदिमाग़ में पूरी तरह से घर कर जाएगा, और इसकी मधुरता एक लम्बे अरसे तक आपके कानों में रस घोलती रहेगी। लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज़ों में यह है मजरूह सुल्तानपूरी की गीत रचना और यह इस फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है। "जा जा रे सुगना जा रे, कही दे सजनवा से, लागी नाही छूटे रामा चाहे जिया जाये, भयी ली आवारा सजनी, पूछ ना पवनवा से, लागी नाही छूटे रामा चाहे जिया जाये".

बिहार के लोक-संगीत में जो मिठास है, जो मधुरता है, उसका एक छोटा सा उदाहरण है यह गीत। दोस्तों, यह तो हमने आपको बता दिया कि इस गीत के संगीतकार हैं चित्रगुप्त, लेकिन क्या आपको यह पता है कि उनके दो संगीतकार बेटे आनंद और मिलिन्द ने जब फ़िल्म संगीत संसार में क़दम रखा तो अपने शुरूआती दौर की मशहूर फ़िल्म 'क़यामत से क़यामत तक' में एक गीत ऐसा बनाया जो हू-ब-हू इस भोजपूरी गीत की धुन पर आधारित था! अगर याद नही आ रहा तो मैं ही याद दिलाये देता हूँ, वह गीत था अल्का याग्निक का गाया "काहे सताये, काहे को रुलाये, राम करे तुझको नींद न आये"। केवल दो मिनट का वह गाना था और वह भी बिना किसी साज़ों का सहारा लेते हुए। कहिये, याद आ गया ना? तो चलिए पिता-पुत्र की संगीत साधना को सलाम करते हुए सुनते हैं आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। यह गीत मुझे भी बेहद पसंद है!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सी रामचंद्र का एक ट्रेंड सेट्टर गीत.
२. फिल्म का शीर्षक एक वाध्य यंत्र पर है जिसे शादियों में ख़ास तौर पर बजाया जाता है.
३. मुखड़े में शब्द है -"मुर्गी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
बेहद मुश्किल था पर मनु जी आपकी याद्दाश्त को सलाम. एक दम सही पकडा आपने....बहुत बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



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4 श्रोताओं का कहना है :

Neeraj Rohilla का कहना है कि -

फ़िल्म: शहनाई

आना मेरी जान, संडे के संडे....
इसके आगे के शब्द याद नहीं आ रहा है लेकिन मुखडे में ही आता है, "मुर्गी के अंडे"

manu का कहना है कि -

खाना मुर्गी के मुर्गी के अंडे ही अंडे,,,,
पर ये याद नहीं आया के panktiyaa,, फ़िल्मी गीत की ही हैं,,,,
या अण्डों के विज्ञापन की,,,,
:::::))

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

आपने सरस भोजपुरी गीत सुनकर आनंदित किया. मैं आपको कुछ भोजपुरी दोहा पढ़वाऊंगा. कुछ समय दीजिये...जमा तो बुन्देला और मालवी के दोहे भी लाऊँगा...

सजीव सारथी का कहना है कि -

और क़यामत से क़यामत के गाने में भी मजरूह साहब ने बोल लिखे....कमाल है....मैंने जब से ये गीत सुना था यही सोच रहा था की इस धुन का और कौन सा गीत सुना हुआ सा है....तुमने याद दिलाया और खूब याद दिलाया THANKS BUDDY

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