Tuesday, March 9, 2010

आई झूम के बसंत....आज झूमिए बसंत की इन संगीतमयी बयारों में सब गम भूल कर



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 368/2010/68

संत ऋतु की धूम जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर और इन दिनों आप सुन रहे हैं इस स्तंभ के अन्तर्गत लघु शृंखला 'गीत रंगीले'। आज जिस गीत की बारी है वह एक ऐसा गीत है जिसे बजाए बिना अगर हम इस शृंखला को समाप्त कर देंगे तो यह शृंखला एक तरह से अधूरी ही रह जाएगी। बसंत के आने की ख़ुशी को जिस धूम धाम से इस गीत में सजाया गया है, यह गीत जैसे बसंत पंचमी के दिन बजने वाला सब से ख़ास गीत बना हुआ है आज तक। "आई झूम के बसंत झूमो संग संग में"। फ़िल्म 'उपकार' के लिए इस गीत की रचना की थी गीतकार इंदीवर और संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी ने। युं तो ऐसे गीतों में दो मुख्य गायकों के साथ साथ गुमनाम कोरस का सहारा लिया जाता है, लेकिन इस गीत की खासियत है कि बहुत सारी मुख्य आवाज़ें हैं और कुछ अभिनेताओं की आवाज़ें भी ली गई हैं। इस गीत में आप आवाज़ें सुन पाएँगे मन्ना डे, आशा भोसले, शमशाद बेग़म, मोहम्मद रफ़ी, महेन्द्र कपूर, सुंदर, शम्मी की। कल्याणजी-आनंदजी ने कई अभिनेताओं को गवाया है, यही बात जब विविध भारती पर आनंदजी से पूछा गया था तब उनका जवाब था - "इत्तेफ़ाक़ देखिए, शुरु शुर में पहले ऐक्टर ही गाया करते थे। एक ज़माना वह था जो गा सकता था वही हीरो बन सकता था। तो वो एक ट्रेण्ड सी चलाने की कोशिश कि जब जब होता था, जैसे राईटर जितना अच्छा गा सकता है, अपने शब्दों को इम्पॊर्टैन्स दे सकता है, म्युज़िक डिरेक्टर नहीं दे सकता। जितना म्युज़िक डिरेक्टर दे सकता है, कई बार सिंगर नहीं दे सकता। एक्स्प्रेशन-वाइज़, सब कुछ गाएँगे, अच्छा करेंगे, लेकिन ऐसा होता है कि वह सैटिस्फ़ैक्शन कभी कभी नहीं मिलता है कि जो हम चाहते थे वह नहीं हुआ। तो यह हमने कोशिश की जैसे कि बहुत से सिंगरों से गवाया, कुछ कुछ लाइनें ऐक्टर्स से गवाए, बहुत से कॊमेडी ऐक्टर्स ने गानें गाए, लेकिन बेसिकली जो पूरे गानें गाए वो अमिताभ बच्चन जी थे, "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। दादामुनि अशोक कुमार जी ने 'कंगन' फ़िल्म में "प्रभुजी मेरे अवगुण चित ना धरो" गाया। हेमा मालिनी ने 'हाथ की सफ़ाई में गाया "पीनेवालों को..."। 'चमेली की शादी' का टाइटल म्युज़िक अनिल कपूर ने गाया, महमूद ने 'वरदान' में गाया। 'महावीरा' में राजकुमार जी ने संवाद बोले सलमा आग़ा के साथ। रूना लैला ने गाया था फ़िल्म 'एक से बढ़कर एक' में।"

इसी इंटरव्यू में आगे आनंदजी ने ख़ास इस गीत का ज़िक्र करते हुए कहा - "सुंदर जी से गवाया था 'उपकार' में "हम तो हीरे हैं अनमोल, हमको मिट्टी में ना तोल"। और शम्मी जी भी थीं, सब से गवाया। सब से गवाया, बहुत से चरित्र थे और डायरेक्टर भी साथ में थे, मनोज जी, तो उन्होने भी हिम्मत की कि एक एक लाइन सब से क्यों नहीं गवाएँ! इसमें एक चार्म भी है कि नैचरल लगता है, हर कोई आदमी सुर में होता भी नहीं है न, लेकिन वह, ऐसा ही रखो तो और भी अच्छा लगता है कभी कभी। जैसे बच्चा एक तुतला बोलता है तो कितना प्यारा लगता है, बड़ा कोई बोले तो अच्छा नहीं लगेगा। शुरु शुरु में बीवी अच्छी लगती है, बाद में उसकी मिठास भी चली जाती है, माफ़ करना बहनों :)!" तो दोस्तों, आनंदजी के इन्ही शब्दों के साथ आज के आलेख को विराम देते हुए आइए सुनते हैं, अजी सुनते हैं क्या, बल्कि युं कहना चाहिए कि आइए झूम उठते हैं, नाच उठते हैं इस कालजयी बसंती समूह गीत के संग, "आई झूम के बसंत"!



क्या आप जानते हैं...
कि वर्ष १९९२ में पद्मविभूषण के लिए चुना गया था स्व: वी. शान्ताराम को। पद्मभूषण के लिए नौशाद, तलत महमूद, बी. सरोजा देवी, गिरीश कारनाड, और हरि प्रसाद चौरसिया को चुना गया था। और पद्मश्री के लिए चुना गया था आशा पारेख, मनोज कुमार, जया बच्चन, और कल्याणजी-आनंदजी को

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. गीत के मुखड़े में शब्द है "ताल", गीत बताएं -३ अंक.
2. श्रीमति शशि गोस्वामी की मूल कहानी पर आधारित इस फिल्म का नाम बताएं -२ अंक.
3. इस बेहद खूबसूरत गीत के गीतकार का लिखा ये पहला गीत था, उनका नाम बताएं-२ अंक.
4. लता और महेंद्र कपूर के साथ एक और गायक ने अपनी आवाज़ मिलायी थी इस गीत में उनका नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी और पदम जी ने ३-३ अंकों को अपनी झोली में डाला तो अवध जी और शरद जी भी २-२ अंक कमाने में कामियाब रहे, पारुल आपको गीत पसंद आया, इसे अपनी आवाज़ में गाकर भेजिए कभी :)
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

फेसबुक-श्रोता यहाँ टिप्पणी करें
अन्य पाठक नीचे के लिंक से टिप्पणी करें-

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

6 श्रोताओं का कहना है :

शरद तैलंग का कहना है कि -

पुरवा सुहानी आई रे,पुरवा
ढोली ढोल बजाना. ताल पे ताल मिलाना

indu puri का कहना है कि -

poorab aur pashcim

padm singh का कहना है कि -

santosh anand

AVADH का कहना है कि -

गीत में एक आवाज़ मनहर उदास जी की भी है.
अवध लाल

indu puri का कहना है कि -

सुन्दर जी -'' मेरी हटती के लाखों मन दाने तेरी भट्टी में भुन गये जा के शम्शादजी(शायद ) - दिल को रखना ओ बुड्ढ़े बचा के ,भून डालूंगी में भट्टी में मिला के
मोहन चोटी-गुलशन बावरा गाते हैं -'' ना ना बापू .
सुंदर- क्या है बेटे ?
बेटे; ओ बापू झूठ ना ऐसे बोल हम तो हीरे हैं अनमोल
हम को भट्टी में ना रोल अपने दिल के संग में
आई झूम के बसंत झूमो .......

सुजोय बाबा/सजीव जी
इस फिल्म की, v.c.d.fir c.d fir द्वद मेरे पास आज भी है अपने बच्चों को जबरन दिखाई,स्कूल के बच्चो को पकड़ कर दिखाई .
एक एक सीन आँखों के सामने घूम जाता है अब भी .
इसलिए बता रही हूँ आप ऩे जो पंक्तिया लिखी है' वो ' सुंदर जी ऩे नही गई थी .
अवध्जी, शरद जी ,पाबला भैया जी सारे जाने कहाँ चले गये ?

---------

AVADH का कहना है कि -

अरे इंदु बहिन,
सब लोग यहीं हैं.
महागुरु शरदजी तो सदैव की भांति सर्वप्रथम थे.
हाँ मैं अवश्य लगभग उसी समय हाजिरी लगा रहा था जब आप सजीव/सुजॉयजी को हड़का रही थीं.
हडकाना=धमकियाना- लखनऊ की ज़बान में.
आनंद जी के अनुसार सुन्दर के साथवाली आवाज़ शम्मीजी की थी.लेकिन अगर न पता लगता तो मैं भी शमशाद बेगमजी की ही समझता.
अरे पाबला साहेब क्या रूठ गए हैं? उन्हें खींच कर लाया जाये.
अवध लाल

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

संग्रहालय

25 नई सुरांगिनियाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड शृंखला

महफ़िल-ए-ग़ज़लः नई शृंखला की शुरूआत

भेंट-मुलाक़ात-Interviews

संडे स्पेशल

ताजा कहानी-पॉडकास्ट

ताज़ा पॉडकास्ट कवि सम्मेलन