Thursday, June 24, 2010

पल पल दिल के पास तुम रहती हो....कुछ ऐसे ही पास रहते है कल्याणजी आनंदजी के स्वरबद्ध गीत



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 425/2010/125

ल्याणजी-आनंदजी के संगीत सफ़र के विशाल सुर-भण्डार से १० मोतियाँ चुन कर उन पर केन्द्रित लघु शृंखला 'दिल लूटने वाले जादूगर' को इन दिनों हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चला रहे हैं। पिछले चार दिनों से हमने ६० के दशक के गानें सुनें, आइए आज हम आगे बढ़ निकलते हैं ७० के दशक में। ७० का दशक एक ऐसा दशक साबित हुआ कि जिसमें ५० और ६० के दूसरे अग्रणी संगीतकार कुछ पीछे लुढ़कते चले गए, और जिन तीन संगीतकारों के गीतों ने लोगों के दिलों पर व्यापक रूप से कब्ज़ा जमा लिया, वो संगीतकार थे राहुल देव बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और कल्याणजी-आनंदजी। इन तीनों संगीतकारों ने इस दशक में असंख्य हिट गीत दिए और अपार शोहरत हासिल की। आज हमने जिस गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'ब्लैकमेल' का अतिपरिचित "पल पल दिल के पास तुम रहती हो"। किशोर कुमार और कल्याणजी-आनंदजी के कम्बिनेशन के गानों का ज़िक्र हो और इस गाने की बात ना छिड़े यह असंभव है। १९७३ की फ़िल्म 'ब्लैकमेल' का यह गीत फ़िल्माया गया था, जी नहीं, धर्मेन्द्र पर नहीं, बल्कि राखी पर। राखी को अपने प्रेमी धर्मेन्द्र के प्रेम पत्रों को पढ़ते हुए दिखाया जाता है और पार्श्व में यह गीत चल रहा होता है। भले ही गीत में "ख़त" या "चिट्ठी" का ज़िक्र नहीं है, लेकिन यह है तो सही एक 'लव लेटर सॊंग्'। इस गीत को लिखा था राजेन्द्र कृष्ण साहब ने।

आइए फिर एक बार आज रुख़ करते हैं विविध भारती पर आनंदजी से की गई बातचीत की ओर, शृंखला 'उजाले उनकी यादों के' में, जिसमें इस गीत की चर्चा आनंदजी भाई ने कुछ इस क़दर की थी। "ये कम्पोज़िशन के दो तीन स्टाइल होते हैं। जैसे मैं कहूँगा अपनी स्टाइल में, मैं यानी आनंदजी, मुझे घूमने का बहुत शौक है, कल्याणजी भाई कमरे में बैठने का शौक रखते थे। तो बोलते थे कि भीड़ भड़क्के में कहाँ जाना है? तो मुझे गाना बनाने का शौक है तो गाड़ी लेके निकल पड़ता हूँ, ट्रेन में बैठ जाता हूँ, कुछ नहीं तो टेप रिकार्डर लेके बाथरूम में घुस जाता हूँ, बाथ टब में लेट गया, शावर चालू कर दिया, टेप में अपना गाना बजा दिया, ट्रेन में बैठा तो गाना बजा दिया, बाजे पे हाथ रखने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ। मैं ऐसे ही काम करूँगा पहले। क्योंकि बाजे पे आपने हाथ रखा तो एक जगह आपने सुर पकड़ लिया, आप उस सुर में बंध गए, फिर धीरे धीरे आपको लगेगा कि अभी राग में बजाऊँ, कौन से राग में बजाऊँ। तो पहले शुरु में एक्स्प्रेशन दो आप, उसको क्या भाव से आप बोल सकते हैं। उसके बाद धीरे धीरे डेवेलप करने के बाद आपके बाजे पे हाथ रखो, कि भई बाजे पे अब, कौन से सिंगर्स गाने वाले हैं, उसके स्केल पे गाना कैसे बनेगा, क्या बनेगा, उसके बाद उसकी रीदम, उसकी ताल क्या है गाने की, वह मूड को समझते हुए आप विज़ुअलाइज़ कर सकते हैं कि पिक्चराइज़ कैसे होगा गाने का। "पल पल दिल के पास", यह गोल्डी जी के वहाँ आके ऐसे ही गप मारते थे हम लोग। तो युं करते करते, वहाँ बैठे बैठे एक दिन मेरे को बोलते हैं कि एक गाना अपने को करना है ऐसा कि जिसमे मैं कुछ अलग अलग अलग अलग कुछ दिखाना चाहता हूँ, and the guy, he is an educated guy, so piano पे बैठके भी गाएगा, कुछ ये करेगा, लेकिन he is again an Indian guy, तो फ़ीलिंग् भी लानी है। तो हमने बोला कि क्या चाहिए क्या। बोले कि छोटे छोटे टुकड़े होंगे, पिक्चराइज़ करना चाहता हूँ, 'cut one two one two' ऐसे।" और दोस्तों, इस ज़रूरत को पूरा करने में राजेन्द्र कृष्ण साहब ने भी बहुत छोटे छोटे शब्दों का इस्तेमाल इस गीत में किया है "पल", "पल", "दिल", "के", "पास".....।" तो आइए अब इस गीत को सुना जाए। और यहीं पर इस शृंखला का पहला हिस्सा ख़त्म होता है। सोमवार की शाम हम फिर से हाज़िर होंगे इसी शृंखला को आगे बढ़ाने के लिए। तब तक के लिए बने रहिए 'आवाज़' के साथ, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि स्वतंत्र संगीतकार बनने से पहले कल्याणजी भाई ने लगभग ४०० फ़िल्मों में बतौर संगीत सहायक व वादक काम किया।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. राजेश खन्ना की इस फिल्म की नायिका कौन है -३ अंक.
२. इस युगल गीत के गीतकार कौन है- २ अंक.
३. फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "रोज", गीत बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ठीक है अवध जी, आप शरद जी के शिष्य ही सही, पर इस प्रतियोगिता के तीसरे सप्ताह के अंत तक आज भी आप ही आगे हैं, पर इस बार शरद जी ने ये फासला बेहद कम कर दिया है. फिर भी ३ अंकों से आगे होने के कारण इस सप्ताहांत भी आप ही विजेता रहे.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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6 श्रोताओं का कहना है :

Sajeev का कहना है कि -

ये मेरा बेहद पसंदीदा गीत है भाई, राजेन्द्र कृष्ण ने इतने सुन्दर तरीके से लिखा है इस गीत को और किशोर दा के क्या कहने....इस गीत से जुडी जाने कितनी यादें हैं, इसके भाव, शब्द , स्वर सब बेजोड हैं, अद्भुत है....थैंक्स सुजॉय

Anonymous का कहना है कि -

हमें तो जनगणना ने ऐसा फंसा रखा है ना कि......
फिलहाल बहुत व्यस्त हैं भई.
राष्ट्रिय -कार्य है.
मिलते हैं तीस जून के बाद.
दिमाग उस काम में उलझा है.
फिर उल्टा सीधा जवाब दिया तो बच्चे समझेंगे हम बुढा गए हैं.
इसलिए बाय
ढेर सारा प्यार,नमस्ते,प्रणाम यथायोग्य

AVADH का कहना है कि -

फिल्म: सच्चा झूठा
अवध लाल

वाणी गीत का कहना है कि -

सदाबहार लोकप्रिय पसंदीदा गीत ...

शरद तैलंग का कहना है कि -

नायिका : मुमताज

विश्व दीपक का कहना है कि -

गीतकार: इन्दीवर

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