Thursday, December 9, 2010

मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे...कौन लिख सकता है ऐसा गीत कवि शैलेन्द्र के अलावा



ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 545/2010/245

हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभों में एक स्तंभ बिमल रॊय पर केन्द्रित लघु शृंखला की पाँचवी और अंतिम कड़ी लेकर हम हाज़िर हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। ६० के दशक की शुरुआत भी बिमल दा ने ज़रबरदस्त तरीक़े से की १९६० में बनी फ़िल्म 'परख' के ज़रिए। एक बार फिर सलिल चौधरी के संगीत ने रसवर्षा की। इस फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत "ओ सजना बरखा बहार आई" हम सुनवा चुके हैं। इस फ़िल्म की विशेषता यह है कि इसके गीतकार और संगीतकार ने गीत लेखन और संगीत निर्देशन के अलावा भी एक एक और महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। जी हाँ, गीतकार शैलेन्द्र ने इस फ़िल्म में गानें लिखने के साथ साथ संवाद भी लिखे, तथा सलिल चौधरी ने संगीत देने के साथ साथ फ़िल्म की कहानी भी लिखी। बिमल दा ने ५० और ६० के दशकों में बारी बारी से सलिल दा और बर्मन दादा के धुनों का सहारा लिया। बिमल दा पर आधारित इस शृंखला का पहला गीत हमने सलिल दा का सुनवाया था, दूसरा गीत अरुण कुमार के संगीत में, और बाक़ी के तीन गीत सचिन दा के संगीत में। 'परख' के बाद १९६२ में आई फ़िल्म 'प्रेमपत्र'। इसमें भी सलिल दा का संगीत था और गीत लिखे थे राजेन्द्र कृष्ण नें। फ़िल्म नहीं चली और फ़िल्म के गानें भी कुछ ख़ास प्रसिद्ध नहीं हो सके। १९६३ में बिमल दा की अंतिम महत्वपूर्ण फ़िल्म आई 'बंदिनी', जिसके बारे में हम अंक- १७७ और १९० में चर्चा कर चुके हैं। १९६४ में 'बेनज़ीर' और 'लाइफ़ ऐण्ड मेसेज ऒफ़ स्वामी विवेकानंद', तथा १९६७ में 'गौतम - दि बुद्ध' जैसी फ़िल्में उन्होंने निर्देशित की। ७ जनवरी १९६६ में बम्बई में उनका निधन हो गया।

पुरस्कारों की बात करें तो बिमल रॊय को बेशुमार पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। आइए मुख्य मुख्य पुरस्कारों पर एक नज़र डालें। उन्होंने सात बार फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार अपने नाम किया, जिसके बारे में हम कल 'क्या आप जानते हैं?' में बता चुके हैं। इनके अलावा फ़िल्मफ़ेयर के ही तहत सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार इन्हें 'दो बीघा ज़मीन', 'मधुमती', 'सुजाता' और 'बंदिनी' के लिए मिला था। 'दो बीघा ज़मीन' को राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था और कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म का पुरस्कार भी इसी फ़िल्म को प्राप्त हुआ। कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में नामांकन पाने वाली बिमल दा की दो और फ़िल्में थीं 'बिराज बहू' और 'सुजाता'। आइए आज बिमल को समर्पित इस अंक में सुनें फ़िल्म 'बंदिनी' से मन्ना डे की आवाज़ में "मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे"। इस गीत को सुनते हुए आज भी जैसे कलेजा छलनी हो जाता है, और आँखें नम हुए बिना नहीं रहतीं। वैसे तो शैलेन्द्र का लिखा यह गीत समर्पित है इस देश के अमर शहीदों को, लेकिन इस गीत के ज़रिए हम बिमल दा के बारे में भी यह कह सकते हैं कि "कल मैं नहीं रहूँगा लेकिन जब होगा अंधियारा, तारों में तू देखेगी हँसता एक नया सितारा"। बिमल रॊय जैसे कलाकार इस दुनिया से जाकर भी कहीं नहीं जाते। भारतीय सिनेमा में उनका योअगदान स्वर्णाक्षरों में लिखा जा चुका है। फ़िल्मकारों की आज की और आने वाली पीढ़ियों के लिए बिमल दा की फ़िल्में गीता-बाइबिल-क़ुरान से कम नहीं है। बिमल रॊय को 'आवाज़' परिवार का नमन। इसी के साथ बिमल रॊय पर केन्द्रित 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' शृंखला का यह तीसरा खण्ड हुआ पूरा। रविवार से हम शुरु करेंगे इस शृंखला का चौथा और अंतिम खण्ड। अंदाज़ा लगाइए कि उसमें हम किस फ़िल्मकार को याद करेंगे, और फिलहाल आइए सुनते हैं फ़िल्म 'बंदिनी' का यह गीत। इस गीत के बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, बस सुनिए और महसूस कीजिए।



क्या आप जानते हैं...
कि बिमल रॊय की मृत्यु के समय वो दो फ़िल्मों पे काम कर रहे थे - 'अमृत कुंभ' और 'दि महाभारता'। ये दोनों फ़िल्में अधूरी ही रह गयीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०६ /शृंखला ०५
गीत का प्रील्यूड सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - इससे आसान कुछ हो ही नहीं सकता :).

सवाल १ - किस फिल्मकार का हम करेंगें जिक्र अब - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गायिका न नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
३ अंक आगे हैं अभी भी श्याम जी शृंखला मध्यातर तक आ चुकी है, देखते हैं कौन बनेगा विजेता....प्रतिभा जी बहुत दिनों में दिखी, कहाँ गायब हो जाते हैं आप :) इंदु जी हाजिरी नहीं लगी है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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7 श्रोताओं का कहना है :

इंदु पुरी गोस्वामी का कहना है कि -

मजरूह सुलतानपुरी जी ही लिख सकते हैं भई 'कभी आर कभी पार लगा तीरे नज़र......है ना?

इंदु पुरी गोस्वामी का कहना है कि -

मैं कल एक शादी में चली गई थी भीलवाडा. मेरे बेहद पसंदीदा गानों में है ये गाना.इसे जब भी सुनती हूँ मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है. इसका एक एक शब्द......मन भर आता है 'शहीदों की इच्छाओं ,आकांक्षाओ,सपनों को किस तरह तोड़ा और रोंदा गया है.आजद देश के तिरंगे को लहराता हम सब देख रहे है ...पर क्या यही चाह था हमने? अच्छा हुआ 'वे' नही रहे.
मेरी आँखों के सामने कलाकार नही 'वे' पात्र आ जाते हैं....मातृ-भूमि के काम आ पाया बड़े भाग हैं मेरे....अंदर जैसे सब कुछ पिघलने लगता है और लगता है वो बहा..फिर आँखों के रास्तों से. क्या बोलू? मन उदास हो जाता है आज के हालत और ..इस गाने को सुनने पर.क्या करूं बाबु?
सचमुच ऐसिच हूँ मैं...

ShyamKant का कहना है कि -

Director- Guru Dutt

amit का कहना है कि -

Singer - Shamshad Begum

रोमेंद्र सागर का कहना है कि -

बस ...हो गए सारे जवाब ! हालाँकि अपनी तरफ से कुछ जल्दी ही आया था ...मगर भई यहाँ का गैंग बहुत तेज़ है ! सुजाय भाई ..कुछ सवाल ही ज़्यादा कर दें ...ह हा हा ! ( अब समझ में आया ...मैं गायब नहीं होता, बस थोडा समय का हेर फेर हैं ...जब तक पहुंचतें हैं , सभी जवाब हो चुके होते हैं ....)

Pratibha Kaushal-Sampat का कहना है कि -

Sujoyji,

Dhanyawaad jo aapne mujhe yaad rakha aur kiya. Kuchh samay ke abhav se aur kuchh samay ki herpher mein jab pahonchti hoon to sabhi jawab ho chuke hote hain...

Pratibha...

RAJ SINH का कहना है कि -

इंदु पुरी जी की टिप्पणी अंशतः मेरी भी . परदे पर जब इसे पहली बार देखा सुना तो रोंगटे खड़े हो गए थे .किसी मित्र ने एक बात बताई थी .मेरा ख्याल है की सही ही होगी .उसी साल 'साहिर ' को गुमराह के ' चलो एक बार फिर से अजनबी ................. ' के लिए फिल्मफैयर मिला था .लेकिन साहिर ने कहा था की इस बार के असली हक़दार ' शैलेन्द्र ' थे ' मत रो माता .............' के लिए . हाँ इंदु जी .............शर्म आती है आज के हालात पर और लगता है क्या इसी दिन के लिए शहीदों ने कुर्बानी दी थी !

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